हास्य-व्यंग्य (11-20) : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Hasya-Vyangya (11-20) : Jaychand Prajapati Jay

हम प्राइमरी के बन गए मास्टर (हास्य-व्यंग्य)

प्राइमरी के सरकारी मास्टर बन गए थे हम। पूरा मजा मिल गया। सरकारी मास्टर की कुर्सी बहुत मेहनत से मिलती है। ठाठ बाट की नौकरी। सुरती खाकर पड़े रहो। कोई नही पूछने आता है। कुर्ता धोती पहन के ,बनारसी पान खाकर कुर्सी तोड़ते है।अच्छी खासी रकम मिलती है। इस रकम से ही तो दो शादियां कर ली है। एक गांव में है। एक शहर में।

सच बता रहा हूं। ठीक से दस तक पहाड़ा नही आता है। जोड़ घटाना तो कायदे से लगा ही नहीं पाता हूं। बीएड ऐसे नही किए थे। तीन बिस्सा खेत बेच कर पैसा देकर बीएड होल्डर बना था। जन्मतिथि फर्जी है । इ सब टेक्निक है। रोज नहा धो कर। क्रीम पाउडर, चमेली का तेल लगा कर खड़खड़िया साइकिल लेकर मास्टरी करने जाते है।

एक दिन पान खाकर कुर्ता पर थूक दिए थे। कलुआ हमांर चेला है। कक्षा तीन में तीन साल से पद रहा है। तेरह साल का है। पहाड़ा आता नही है। कभी कायदे से हमने पढ़ाया नही। क्या आयेगा । कभी कभी उसकी मम्मी पराठा सब्जी भेजती है। वह बहुत ही भली औरत है। बड़ा ख्याल रखती है। कलुआ डेली घर से हमारे लिए कुछ न कुछ लाता है। इसलिए आज तक कलुआ को मारा नही। कभी पहाडा भी नही पूछता हूं। लंच में कलुआ पैर मेरा दबाता है तो मैं थोड़ा कंजूस टाइप का हूं। एक दो रुपए दे देता हूं। खुश हो जाता है कल्लू।

मास्टर जी की सेवा करना धर्म हमारा। कल्लू ऐसा सोंचता है। कल्लू नेक इरादा से हमारी खूब टहल बजाता रहता है। कल्लू आज हलुआ लाया था। मेरे मुंह में पानी आ गया जब कल्लू ने कहा कि मम्मी आज हलुआ दिया है। उस दिन एक घंटा पहले लंच की छुट्टी कर दिए। बच्चे खुश। हम भी खुश। जल्दी से कल्लू हलुआ ला बेटा। तू बहुत अच्छा है। तेरी मम्मी भी बहुत अच्छी है। कभी नही मारूंगा तुमको।

कल्लू यहां आओ...गुस्से में मैं हो गया ...ये सड़ा हलुआ लाया है। ....नही मास्टर जी तीन दिन पहले मम्मी बनाई थी। बच गया था, मम्मी ने कहा था.... कल्लू बेटा इस हलुआ को कुत्ते को दे दो। हमने सोचा आपको दे दूं। हम गुस्से में आ गए। हमको कुत्ता समझता है। कल्लू को बहुत मारा। गांव वालों में गुस्सा आ गया। गांव वाले हमको बहुत लात घूंसा से मारा। बहुत मारा भाई। जी भर कर मारा। घर आया हल्दी प्याज बांधा। आज भी याद है प्राइमरी का मास्टर बनने के लिए कितना त्याग करना पड़ता है।

कवयित्री के अंधभक्त (हास्य-व्यंग्य)

एक भारतीय कवयित्री हैं। फेसबुक पर रचना के साथ एक सौंदर्ययुक्त तस्वीर पोस्ट करते ही मिनटों में सैकड़ों लाइक कमेंट्स। हम चकरा गए। बहुत बड़ा गेम। इ सब सौंदर्य का खेल है। इ सब लगता है अंधभक्त हैं क्या? रचना पर लाइक कमेंट्स आता है कि सौन्दर्य पर।

हमने पूछ लिया कवयित्री से इ क्या माजरा है देवी जी। बोली.. इ सब मेरी रचनाओं का बिग पॉवर है। हमने कहा...बिना देखे सब कुछ देख लेते हैं। एक दिन गाय का गोबर पोस्ट करके देखो। ये सब अंधभक्त हैं।

कवयित्री का मन एक दिन डोला। सच को खंगालना चाहा।कवयित्री ने गाय का गोबर पोस्ट कर दिया। मिनटों में हजारों का लाइक कमेंट्स। कमाल का कमेंट्स आ रहे हैं। हम शरमाने लगे। कवयित्री मुंह दबा दबा कर हंस रही है।
सच में अंधभक्त हैं का पगले हैं सब। दिखता हैं नहीं।

कमेंट्स आ रहे हैं। ..क्या सौंदर्य है.. कितना खूबसूरत है..बहुत टेस्टी है...बड़ा मजेदार है..जी कर रहा है पी जाऊं घोलकर...बड़ा आनंद आ रहा है.. मन कर रहा है बाहों में भर लूं...इस तरह फीलिंग्स हो रहा है जैसे हम तुम बागों में हैं प्रेम गाथा लिख रहें हैं... मनमोहक अंदाज.. क्या जुल्फें हैं...क्या बरसाती छटा है...रसमलाई है पूरी तरह से।

ई सब का लिख रहे हो मेरे फेसबुकिया मित्रो...कवयित्री हड़बड़ा कर कमेंट लिखा.. एक ने जवाब दिया...कुछ नहीं जी..लव इज ब्लाइंड.. हैं सब समझदार हैं..एक ने लिखा..हमसे दोस्ती करोगी। गोबर क्या जवाब देगी। एक ने लिखा..हमसे शादी कर लोगी..मौज से रहोगी। कवयित्री गुस्सा गई बोली..हां,हां कर लो शादी.. गोबर के साथ सातों जन्म रहना.... वह अंधभक्त बोला ...रह लेंगे।

नेताजी का पेट खराब है (हास्य-व्यंग्य)

नेताजी की गाड़ी बड़ी तेजी से सायरन बजाते जा रही थी। सारी गाड़ियां बगल हो गयी कि नेताजी की गाड़ी है। किसी काम से जा रहे हैं। जनता के हित के लिए जा रहे हैं। सिगनल का भी ध्यान नहीं है। लाल बत्ती जल रही है फिर भी नेताजी की गाड़ी सांय-सांय करते हुए निकल गयी।

जनता तरह-तरह की बाते सोंच रही है। एक ने कहा नेताजी सच्चे देशभक्त हैं, नेताजी इसी गति से चलेंगे तो देश तरक्की की ओर जायेगा। परम सौभाग्य है कि ऐसा कर्मठ नेता पाये हैं। दूसरे ने कहा कि ऐसा नेता बिना लेन-देन किये काम करता है। करप्शन फ्री देश बना देगा।

नेताजी के तेज जाती हुई गाड़ी के बजते सायरन से एक साइकिल वाला लड़खड़ा कर गिर गया। एक बाइकवाला दूसरी बाइकवाले को ठोंक दिया। एक बुजुर्ग महिला तेज जाती गाड़ी से डरकर गिर गयी। कार, बस वाले बगल हो गये। खतरनाक ढंग से गाड़ी जा रही थी।

नेताजी आराम से बैठे चले जा रहे हैं। इतने लोग गिर गये लेकिन नेताजी को कोई खबर नहीं। इसी तरह आम जनता रो रही है। हमारे देश के नेताओं को पता ही नहीं है। नेताजी सांय-सांय गाड़ी से जा रहे है। एसी का आनंद ले रहे हैं।

नेताजी को हम पहचान गये। इतनी तेजी से सायरन बजाते हुये जाने का कारण मोबाइल से पूछा। नेताजी ने बताया कि पेट में भयंकर दर्द के कारण शौचालय की यात्रा पर हूं। अब पता चला देशसेवक देश की सेवा के लिये नहीं, जनता का माल ज्यादा हजम करने के कारण पेट में असह्य दर्द उठा है। शौचालय में असह्य पीड़ा का समाधान करने जा रहे हैं।

राम भरोसे (हास्य-व्यंग्य)

”सुना हूं गांव में चोर आए रहे और बहुत हल्ला हुआ रहा भाई सरजू, कोई बात है क्या ” लखन ने सरजू से कहा

”हम भी सुने है कि सुमेर की बकरी चोर उठा ले गए” सरजू ने कहा।

”इ नेता लोग कहे रहे की पूरी सुरक्षा देंगे पर बड़ा ढोल के अंदर पोल लग रहा है। सब गड़बड़ दिख रहा है। इ बकरी लोग जब सुरक्षित नही है। हम का घंटा बजा के सुरक्षित हैं।” लखन कहा।

”दो दिन पहले दो भैंस रंजन के चोर ले गए। ई पुलिसवाले भी कुछ नहीं किए। हाथ पर हाथ रखे रहे। पान खा के मस्त हैं।” सरजू ने गंभीर होकर कहा

”रामलाल के लड़कवा का आता पता कुछ नही चला।” लखन ने जोर लगाकर कहा।

”नेता जी से प्रधानजी बात किए थे बोले की सरकार का कोई भरोसा नहीं है। चुनाव सर पर है। आचार संहिता लगा है। हट जाने दो। कुछ उपाय करते हैं तब तक राम भरोसे रहो” सरजू ने कहा।

इतना सुनते ही लखन का दिमाग चकरा गया। बोले कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकार के भरोसे वोट दिए रहे कि राम भरोसे। सब घाल मेल बा, सब घाल मेल बा।

दोनों बतियाते-बतियाते चाय की दुकान पर चाय पीने चल दिए राम भरोसे.....

एक के साथ एक फ्री (हास्य-व्यंग्य)

भाईसाहब मैं दहेज का लोभी था, शादी के योग्य जब मैं हो गया तो तरह-तरह के ससुर का आगमन होने लगा। तरह- तरह के दहेज का प्रलोभन देने लगे। हमारे अंदर दहेज की प्रवृति जन्म ले चुकी थी, दहेज के लिये मैंने बड़े-बड़े प्रस्ताव रखे। कई ससुर दुम दबा कर चले गये।

दहेज लेने की चर्चा जोरों-शोरों से समाज में फैल गयी। मैं भी अपने पथ से विचलित नहीं हूआ। दहेज लेना है जो देगा उसकी ही बेटी हमारे घर की महारानी बनेगी। मेरे इस कठोर संकल्प से कई लड़कियों के सपने टूटकर बिखर गये।

एक बहुत ही गंभीर ससुर का आगमन मेरे द्वार पर हुआ। मेरे भाग्य के द्वार खुल गये। लिखा पढी पक्की हो गयी, दहेज में कोई चीज दी जायेगी एक के साथ एक फ्री। हर चीज डबल मिलेगा, मैं फुल कर कुप्पा हो गया।

खुशी-खुशी बारात की तैयारी शुरू हो गयी। बारात के पहुंचने पर दहेज का सारा सामान डबल रख दिया गया। दहेज के सपने आज पूरे हो रहे थे जिसकी बरसों से तमन्ना थी।

सात फेरे लिये जा रहे हैं जिस लड़की से शादी हो रही थी उसके साथ एक और लड़की फेरे ले रही थी। दो लड़की का फेरे लेना मुझे घुटन होने लगी। किसी ने कान में फुसफुसाया। लड़की भी एक के साथ एक फ्री दिया जा रहा है। मेरे साथ भयंकर छल किया गया आज।

फ्री लड़की का रूपरंग बदसूरत देखकर ह्रदय पर बज्रपात गिर गया। आंखें ठहर सी गयी। काटो तो खून नहीं। दहेज की खातिर एक ऐसा प्रपंच रचा जायेगा। मैं इससे अनभिज्ञ रहा। दहेज के लोभियों का हाल यही होता है। दहेज़ के खातिर दो लड़कियों को लेकर जीवन यापन कर रहा हूं। फ्री में मिली लड़की को फ्री में खिला रहा हूं।

युवा होने का बुखार उतरा (हास्य-व्यंग्य)

चार बच्चों की मां ने मुझे अंकल कहकर जैसे पुकारा वैसे ही मेरे अंदर की भावना अंतिम उम्र में डूब गयी। ऐसा अशुभ संकेत मेरे लिए प्राणघातक रहा। ह्रदय शून्यावस्था की गति करने लगा। जोश उत्साह का पंख शिथिल होता नजर आया। चेहरे पर अफसोस की रेखा आ गयी।

अब महसूस हुआ कि युवापन बुढापापन की ओर अग्रसरित होने के लिए तैयार है। मैंने आईना उठाकर देखा तो झुर्रियां स्पष्ट दिखाई दे रही थी । चेहरे की लालिमा खत्म लग रही थी। होंठ पर पपड़ी पड़ गयी थी। बालो की सफेदी साफ- साफ दिखाई दी। जुबान भी कुछ-कुछ लड़खड़ाकर निकल रही थी।

बुढापा देखकर हताश नहीं हुआ। हिम्मते मरदा तो मद्दते खुदा। बालों को काला करने का फैसला लिया । निर्णय कठोर था लेकिन युवापन खोना नहीं चाहता था। चेहरे पर मंहगी -महंगी क्रीम लगाया। टूटे दांतों को लगवाया। चेहरे का मेकअप करके उसी चार बच्चों की मां के सामने से गुजरा।

भाईसाहब, वही लब्ज दुहराया और अंकल कहकर पुकारा था। पैरों तले जमीन खिसक गयी थी। आंखों से अश्रु बह गये थे। चेहरा सबकुछ बता देता है चाहे लाख छुपाओ। मैं ग्लानि से भर गया था। युवा होने का बुखार उतर गया।

ससुरालियों पर व्यंग्यवाण (हास्य-व्यंग्य)

मैं एक साधारण व्यंग्यकार हूं। कभी-कभी गगनभेदी जैसा शब्दबाण फेंक देता हूं। एक बार मैं ससुरालियों पर जलभुन गया था। पत्नी के मायकेवालों पर व्यंग्यवाण छोड़ दिया। उन सभी के शरीर पर बड़े-बड़े फफोले पड़ गये। मेरे लिये बड़ी-बड़ी बद्दुआ उनके मुख से निकल पड़ी। यह बद्दुआ मेरे लिये किसी तेजवान महात्मा के श्राप से कम नहीं था।

इस श्राप से मेरे अंदर मुर्झापन आ गया। पत्नी के आंखों से झर-झर आंसू बह पड़े। मेरे द्वारा छोड़े गये व्यंग्यबाण से वह बहुत आहत लगी। कई घंटों तक आराम शैय्या पर वेसुध होकर गिर जा रही थी। निहत्थों पर वार करना महान अपराध से कम नहीं होता है। आज मैं एक अपराध भाव को महसूस किया।

इस वाण से घरेलू कलह अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है। सुख चैन छिनने का सौ फीसदी अवसर मिलता है। तलाक आने की नौबत बन सकती है। आखिर पत्नी मायके के लिये तीव्रगति से जानेवाली वाहन से निकल ली।

उसके जाने पर मैं शांतरस में डूब गया। इस घातक प्रहार के लिये शर्मिंदगी महसूस, हुई। सुबह ही व्यंग्य बाण छोड़ा था। भूख से व्याकुल मैं गैस जलाकर थोड़ी खिचड़ी बनाने का प्रयास करने लगा।

प्याज काटते वक्त आंखों से गिरते आंसू मेरी दशा पर उपहास कर रहे थे। खिचड़ी बनाने का आइडिया नहीं था। खिचड़ी पतीले से जलकर चिपक गयी थी। केवल कड़वा घूट ही मिला खाने को। व्यंग्यकारों को पत्नी के मायकेवालों पर व्यंग्यवाण चलाने से बचना चाहिये। मेरी दशा दुर्दशा से परिचित ही हो गये हैं आप सब लोग।

हस्तस्पर्श पाने को तरसते रहे (हास्य-व्यंग्य)

कई सालों से महिला स्टाफ न होने से आफिस का सारा समय नीरस मन से गुजर जाता। जैसे-तैसे आफिस लोग आते फिर दुम दबाकर चले जाते। जिस दिन से महिला स्टाफ का आगमन हुआ है। आफिस में रौनक सी आ गयी है।

उस महिला से मेलमिलाप चालू हो गया। मुंगेरीलाल के सपनों में जान आ गयी। जब से वह सुंदरी आई है। रोटी अचार की जगह जोमैटो से आर्डर करने लगे। उस महिला कर्मचारी को लंच में सहभागी बनाते। और हंस-हंसकर बतियाते।

चरणदास रोटी की जगह पुड़ी पराठे घर से बनाकर लाने लगे। उस महिला को पराठे पनीर की सब्जी महिला के टेबल पर रखकर दो चार शब्द बतिया कर स्वयं को तृप्त कर लेते। ऐसा सौभाग्यशाली दिन लौटा है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।

सारे स्टाफ के लोगों के लंच में बदलाव आ गया। वहीं चपरासी कभी सूखी रोटी लाता, कभी अचार, कभी प्याज से रोटी खा जाता, कभी किसी स्टाफ ने चपरासी के साथ हमदर्दी दिखाकर लंच में मदद नहीं की।

आज उस सौंदर्य की देवी के लिये तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बिना उसको खिलाये स्वयं एक कौर मुंह में नहीं डालते। उस महिला कर्मचारी ने सबके साथ ऐसा मुस्कान बिखेरती। सब उसके स्नेह प्रेम में सबकुछ न्योछावर कर सकने की हिम्मत करने लगे।

महिला आधुनिक नायिका की तरह समस्त गुणों से परिपूर्ण है। प्रतिदिन नये-नये परिधानों से सुसज्जित होकर आती। स्टाफ में दिनभर चर्चा का विषय बनी रहती।

जिसके जूते में पालिस हुये महीनों बीत जाते लेकिन अब प्रतिदिन पालिस करके आने लगे। कपड़ों में प्रतिदिन इस्त्री होने लगा। बालों में काली मेंहदी लगाकर आने लगे ताकि वह कम उम्र का दिखे।

कुछ महीनों में महिला के वजन में वृद्धि हो गयी। खड़खड़िया साईकिल से आने वाला भाड़े के कार से आने लगा। हजारो रूपये उस महिला पर खर्च कर दिया गया। लेकिन हस्तस्पर्श पाने को तरसते रह गये।

आधुनिक प्रेमिका (हास्य-व्यंग्य)

आधुनिक प्रेमिका का ह्रदय बहुत कोमल होता है। सरलता सादगी का तमगा पहने होती हैं। उसकी मुस्कान पर कई लोग कंगाल भी हो सकने की ताकत रखते हैं। अल्प पोशाक में देव कन्यायें भी शरमा जायेंगी। उसकी निगाह की एक रोशनी किसी पर पड़ जाये तो वह व्यक्ति वीरगति को प्राप्त कर सकता है।

एक होनहार युवक आत्म बलिदान ही कर दिया। ऐसी सुंदर चक्षुवाली भारतीय सुंदरी की चरण वंदना करते दिख गया। उसकी प्रत्येक वाणी को ईश्वर की वाणी समझता था। जिस युवती के लिये वह सम्पूर्ण भाव समर्पित कर दिया था। वह युवती उसको पार्क में एक युवक के साथ सेल्फी लेते दिखी।

उस समर्पित युवक के पैरो तले जमीं ही खिसक गयी। आसमान लाल पीला दिखा। कुछ ही समय बाद उस युवक ने देखा। वह युवक किसी को ढूंढते हुये दिखा। वह चिल्ला रहा था कि उसका पर्स ही वह ले उड़ी जिस पर्स में पचास हजार रुपया था।

सुंदर मुखमंडल देखकर युवाओं को ह्रदय पिघल जाता है। होनहार समझदार भी अल्प कपड़ों में उसकी कंचन काया को ही सब कुछ समझ लेता है। आन्तरिक दृष्टिकोण के अध्ययन से किसी के फरेब से बचा जा सकता है। मित्रता ठोंक बजाकर किया जाता है।

आज के लोग चकाचौंध की दुनिया के गिरफ्त में इतने हो गये हैं कि सहीं गलत चीज का फर्क ही नहीं कर पा रहे हैं।
जब किसी लूट का शिकार हो जाते हैं तब बुध्दि विवेक जागृत हो जाती है। अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद (हास्य-व्यंग्य)

दरोगा जी बहुत विनम्र स्वभाव के लग रहे थे। कोई नहीं कह सकता है कि वे घूसखोर हैंं। सादगी से भरे थे। एक मामला देख रहे थे। पीड़ित पक्ष पर दरोगा का सहयोगात्मक रवैया देखकर पीड़ित पक्ष ने जलपानगृह ले जाकर महंगे नाश्ते करा दिया। दरोगाजी का पेट भर गया। बोले कि आप के साथ अन्याय नहीं होने दिया जायेगा

इसी बात पर दस हजार दरोगा ऐंठ लिये और कहा कि आरोपी को सीधा जेल भेज दिया जायेगा। पीड़ित पक्ष के चेहरे पर हजार वाट का बल्ब जल गया। न्याय की उम्मीद में दस हजार रूपये थमा दिये। लोकतंत्र में पूर्ण न्याय की उम्मीद थी।

पीड़ित को उम्मीद है कि दरोगा जी न्याय की गठरी लिये घर पर आयेंगें। इतना पैसा दिये हैं। कई दिन गुजर गये। आरोपी ठाठ से घूम रहा है। दरोगा जी घूस में मिले पैसे से परिवार को खिला पिला रहे हैं। घूसखोरी के पैसों को एकाउंट में एकत्र कर रहें हैं।

अब पीड़ित पक्ष न्याय को पाने के लिए दरोगाजी को ढूंढ रहे हैं। लोगों से पूछ रहें कि वो दरोगा जी कहां हैं? कैसे मिलेंगें? लोकतंत्र में इस उम्मीद के साथ थाने प्रतिदिन आते रहे और दरोगाजी को ढूंढते रहे पर दरोगा जी दिखाई नहीं दिये।

लोकतंत्र में बहादुर सिपाही की तरह दरोगाजी को ढूंढते रह गये। कई दिन गुजर गये लेकिन दरोगाजी का पता नहीं चला। यहां तक कि घर पर नहीं गये और कई दिन तक वहीं डेरा डाले रहे।

बाद में पता चला कि दरोगाजी ने पत्नी की तबियत खराब का बहाना बनाकर अपना कहीं अन्यत्र ट्रांसफर करा लिये। पैसा ऐंठने के कारण दरोगा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया गया।

दूसरे दरोगा को जांच अधिकारी बनाया गया। उसने भी पांच हजार चार्जशीट दाखिल करने के लिये मांगा। लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद लिये बेचारे ने दूसरे दरोगा को पांच हजार दे दिया।

कुछ दिन बाद पता चला कि गवाह के अभाव में चार्जशीट दाखिल नही हो सकी लेकिन न्याय की उम्मीद पीड़ित पक्ष को अब भी है। वह लोकतंत्र के मंदिर में न्याय के लिये पंक्ति में खड़ा है।

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