हास्य-व्यंग्य (91-) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Hasya-Vyangya (91-) : Jaychand Prajapati Jay
चंदाराम चंदाचोर है (हास्य-व्यंग्य)
चंदाराम पढ़ लिखकर नौकरी की तलाश में थे। विपत्ति की मारी सरकार बेचारी रोजगार नहीं दे सकी। नून-तेल के लाले पड़ गये। गरीबी चरम पर थी। प्रभु की शरण में जाने का निर्णय लिया। प्रभु भी दयावान थे। अपने भक्त को शरण में ले लिये। भक्त का ह्रदय पवित्र था। प्रभु की सेवा करने लगा।
प्रभु की सेवा जी जान से करने लगा। चंदाराम बेचारा जो कुछ दान-दक्षिणा में मिल जाता भरण पोषण परिवार का कर रहा था। एकदिन भक्त चंदाराम की आत्मा फट गयी। प्रभु को कोसने लगा। इतनी भक्ति से प्रभु की सेवा किये जा रहा हूँ पर प्रभु हमारी तरफ ध्यान नही दे रहे हैं।
चंदाराम ने प्रभु से अपनी सेवा के बदले में कुछ पारिश्रमिक बढ़ाने की अपील की ताकि बाल-बच्चों कि परवरिश ठीक से कर सके। प्रभु भक्त की अपार भक्ति से प्रभु का हृदय खुश हो गया। दान-दक्षिणा करने वालों की संख्या बढ़ने लगी।
चंदाराम की अब कुछ पोटली भरने लगी। फल -फूल चढ़ावा बढ़ने लगा। चंदाराम ने प्रभु की सेवा और बढ़ा दी। रात-दिन सेवा करने लगा। सेवा से प्रभु जी का हृदय गदगद हो गया। प्रभु के दरबार में ढेर सारा चंदा तथा चढ़ावा मिलने लगा। प्रभु की महिमा अपरंपार। जिसको देते हैं छप्पर फाड़ कर दे देते हैं।
अब चंदाराम के गरीबी के दिन हटने लगे। प्रभु की कृपा से चंदाराम ने एक बड़ी सी कोठी बनवा लिया। नौकर-चाकर रख लिया। जूता चप्पल भी नया- नया खरीद लिया। नये- नये कपड़े भी खरीद लिया। धन-दौलत से घर भर गया। प्रभु भी खुश हो गये कि हमारा भक्त अब प्रसन्न है।
कुछ लोगों की आंखों में किरकिरी हो गयी। यह भक्त तो गरीब था। अमीर कैसे हो गया। ये तो प्रभु का चंदा चोर है। प्रभु के विकास के लिए चंदा लोग देते हैं लेकिन चंदाराम अपना विकास खुद कर लिया। चंदाराम कौन होता है चंदा लेने वाला। सब लोगों ने चंदाराम को चंदचोर कहना शुरू कर दिया।
चंदाराम प्रभु की शरण में फिर गया। प्रभु बचा लीजिए। मेरा रोजगार छीना जा रहा है। सरकार रोजगार नहीं दे सकती। आप की सेवा के बदले में आपके आशीर्वाद से यह सब मिल रहा है। इतने में सरकार के चार सिपाही आये। चंदाराम को चंदा चोरी के इल्जाम में पकड़ ले गये। चंदाराम बड़ी तेजी से चिल्लाया-- मेहनत हम करें, मजूरी दूसरा खाये। हे प्रभु। अंधेर नगरी, चौपट राजा। हाय रे, बेचारा भक्त चंदाराम। असहाय प्रभुजी भी कुछ नहीं बोल पाये।
संपादक के प्रति समर्पण (हास्य-व्यंग्य)
बार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं। अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली। इसका सीधा सरल उपाय है कि संपादक जी की शरणागत में नहीं पहुंच पाये। एक समर्पण का अभाव है। जी हुजूरी करने में आप सक्षम नहीं हैं। जिसके अभाव में साहित्यिक भाव न पैदा होने पर संपादक जी का आपकी रचना से मोहभंग हो जाता है।
संपादक जी का हृदय जीतने का सहीं उपाय है। कुछ उनकी दानपेटिका में आनलाइन तथा आफलाइन का सहयोग राशि प्रेषित कर दीजिए। मुंह मिष्ठान भी करा सकते हैं। पत्रिका की सदस्यता भी ले लेना चाहिए। इससे भी उनका कठोर हृदय परिवर्तित हो जायेगा। आपकी सड़ांध रचना दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर चमचमाती मिलेगी। यह पुरुष लेखक के लिए अनिवार्य शर्त है। महिला रचनाकार इन सब क्रिया से मुक्त है। युवा कवयित्री है तो मुख्यपृष्ठ पर चमचमाती तस्वीर के साथ श्रेष्ठ रचना के साथ पत्रिका में स्थान पा जायेगी।
कुछ संपादक जी सरल स्वभाव के होते हैं। सब रचनाकारों को पचा लेते हैं। कुछ संपादक को प्रति रचना सौ रुपये गूगल पे करके पत्रिका में स्थान ग्रहण कर सकते हैं। कुछ संपादक दीन-हीन कवियों पर दया-रस की बरसात करते रहते हैं लेकिन इनकी पत्रिका भी असहाय प्राणी की तरह होता है। गति में तेजी नहीं होती है।
कुछ संपादक कुत्ते की पूंछ की तरह होते हैं। इनको चाहे जितना तेल-मालिश, उबटन करिये। कुत्ते की पूंछ की तरह टेढ़े ही रहेंगे। आपकी रचना पर कभी नजर नहीं जाती। चाहे आप कलेजा फाड़ कर रख दीजिये। जिनसे इनका घरेलू संबंध हो जाता है। प्रत्येक अंक में उनकी हाजिरी लग जाती है और आप चाहे खेत की सारी मिट्टी उलप-पुलट दीजिये लेकिन सुई की नोंक के बराबर भी पत्रिका में जगह नहीं देंगे।
अगर कोई कवयित्री संपादक जी का फोन पर रोज हाल-चाल लेने लगे। प्रेमरस से युक्त दो-चार शब्दों का प्रेमरस पिला दे तो संपादक जी की कठोरता भंग हो जायेगी। उसके प्रति करुणा का स्वर उभर आता है। कुछ माह में उनकी प्रकाशित पुस्तक का स्वयं विमोचन के नाम पर हल्की मुस्कान का दर्शन करने के लिए पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम पत्रिका की तरफ से नि:शुल्क करवा देते हैं।
कवयित्री का जैसे ही हृदय गदगद हुआ। संपादक जी का समर्पण और तेज हो जाता है। एक भव्य स्थान कवयित्री संपादक जी के हृदय में लेती हैं। कई सालों से अगर आप निवेदन पत्र भेजकर संपादक जी से प्रतिष्ठित पत्रिका में छापने के लिए कहते थक गये होंगे। वहीं एक दो माह से संपर्क में आयी युवा कवयित्री संपादक जी के रहमोकरम से पत्रिका का पूरा अंक परिशिष्ट के अंतर्गत कवयित्री के नाम पूरी पत्रिका समर्पित हो जाती है।
एक आवारा कवि (हास्य-व्यंग्य)
एक कवि की प्रेमिका ने कवि से कहा कि तुम दूसरे की सुंदरता पर खूब तारीफ लिखते हो। कभी मेरी सुंदरता पर कोई बखान नही करते हो। क्या मैं असुंदरी हूँ ? मेरे अंदर सौंदर्यरस की कमी है। तुम एक साहित्यिक शब्दों में मेरी तारीफ करों नहीं तो मैं अपने प्रेम संबंध को संबंध विच्छेद कर दूंगी।
कवि का हृदय डगमगा गया। एक भयंकर सैलाब सा आ गया। कवि ने महसूस किया कि अगर वह छोड़कर चली जायेगी तो वह अनाथ हो जायेगा। उसका सच्चा प्रेम निर्धन हो जायेगा। उसकी कविताओं में जो लय, ताल, स्वर तथा स्पन्दन है, भावना का सृजन है। वह मौत के मुंह में चला जायेगा।
कवि ने लड़खड़ाते हुये कागज कलम उठाया। प्रिये! तुम्हें पाने की जिद थी। तुम्हारे होंठो की जो नरमियां है वह मुझ पर खूब असर किया था। तुम्हारे लहराते बालों में गेहूं की बालियों की तरह लचक है। लाल कपोल में जो सौंदर्य झलक रहा है। सुंदर परी जैसा है। मन के भावों में जो निर्मलता है, वह सहज ही किसी को आकर्षित कर लेगा।
तुम्हारी चाल हिरनी जैसी है जो दूर तक सौंदर्य बिखेरता है। तुम्हारी तन-मन में जो स्पन्दन है। वह छुने मात्र से पत्थर भी पिघल सकता है। तुम्हारे नयनों में जो अभिराम है वह एकटक निहारने की प्रिय इच्छा बनी रहती है। तुम सौंदर्य की देवी हो। एक कवि तुम्हारे इन सब गुणों से आकर्षित हो गया और तूम्हारे प्रेमपाश में बंध गया।
प्रेमिका को इस तारीफ से घोर निराशा हुई और वह यह समझ गयी कि कवि के इन शब्दों के वार से मैं पूर्णतया न्यौछावर हो गयी हूँ। इस तरह से यह कवि जिस सुंदरी के सौंदर्य का वर्णन करता होगा। इस कवि के चरणों में हजारों नायिकायें तो नतमस्तक हो जाती होंगी।
यह कवि आवारा लगता है। इसके प्रेम में सच्चाई नहीं लगती है। मैं इसके चक्कर में नहीं रहूंगी। वह कवि की कलम कागज लेकर भाग गयी। इसके साथ ही इसके लेखन का सौंदर्य लेकर चली गयी। तब से कवि बेचारा उस प्रेमिका को ढूंढ रहा है। तब से कवि आवारा हो गया। अपनी लेखनी, काजल, कलम ढूंढ रहा है। अपने सच्चे प्रेम को ढूंढ रहा है।
मैं नवजुगाड़वाद का लेखक हूँ (हास्य-व्यंग्य)
मैं नवजुगाड़वाद का लेखक हूँ । ठंडा दूध भी फूंक-फूंककर पीता हूँ। उदार हृदय होने के कारण सरकार की बुराई करने में अक्षम हूँ। आलोचना कभी कर ही नहीं सकता। भले सरकार मेरी टोपी उतार कर पहन ले लेकिन मैं सरकार से अपनी टोपी नहीं छीनूंगा।
मैं सरकार का नमक खाया हूँ। मैं सरकार के प्रति वफादार हूँ। मैं एक बिंदु भी सरकार के खिलाफ नहीं लिख सकता हूँ। मुझे सरकार से बहुत उम्मीद है। मैं सरकार का हर तलवा चाट सकता हूँ। उसके सामने मेरा सिर झुका सा रहेगा। ऊंची आवाज में कभी बात नहीं कर सकता हूँ।
यही सब मेरा आदर्श वाक्य है। सरकार की प्रशंसा में मै एक-एक शब्द सांचे में डालकर लिखूंगा। सरकार के गले में पुष्पमाला पहनाकर रखूंगा। सरकार ही माई बाप है। सरकार अगर मेरी टांग भी तोड़ देगी तो भी न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाऊंगा। तरह-तरह का अत्याचार भी करती है तो उसे अमृत का प्याला समझकर पी लूंगा।
पर मैं सत्य की राह पर डटा रहूंगा। सत्ता के पक्ष में मज़बूत बल्ली-बांस की तरह पूरी तरह से टेक दिये खड़ा रहूंगा। एक वीर पुरुष की भांति सरकार की सुरक्षा में प्राण त्याग दूंगा। कभी भी विरोधी पक्ष नहीं बनूंगा।
मेरा बेटा छात्र के रूप में सरकार का विरोध कर रहा होगा। तब भी बेटे का पक्ष नहीं लूंगा। सरकार का हर संभव साथ दूंगा। यह मेरे सच्चे लेखक होने का प्रमाण है। आप लोग किसी को मत बताना। दरअसल हम सरकार से वो चीज हासिल करना चाहते हैं ताकि मैं एक अमर कृति की तरह साहित्य के सुनहरे इतिहास में दर्ज हो जाऊँ।
नवजुगाड़वाद में एक जुगाड़ के चक्कर में हूँ। सरकार से पद्म विभूषण मिल जाता तो अपना जलवा कायम हो जाता। पद्म भूषण भी दे देगी तो हमें कोई परहेज नहीं है। पद्म श्री भी अगर मिल जाये तो भी संतोंष कर लूंगा। जिंदगी भर सरकार के नाम का माला जपता रहूँगा। कोई मेरा कुछ उखाड़ नही सकता। जब संइया भये कोतवाल तो काहे का डर।
साहित्य का नवजुगाड़वाद (हास्य-व्यंग्य)
साहित्य हमारा अंधेरे में है। आज के साहित्यकारों को पता नहीं है साहित्य का कौन सा वाद या युग चल रहा है। मैंने एक वाद का जन्म दिया है। यह एक ऐसा सिद्धांत है। इस सिद्धांत के बल पर आप अपनी औकात बना सकते हैं। आपके लिखे साहित्य की पहचान होगी। उसकी कीमत मिलेगी। इस सिद्धांत का नाम है--नवजुगाड़वाद।
हमारे यहाँ अधिकांश काम जुगाड़ से हो जाता है। बिना जुगाड़ लगाये आप दुनिया के सबसे पिछले पायदान पर जा सकते हैं। आपकी छवि भी धूमिल सी नजर आयेगी। आप अगर साहित्य लिख रहे हैं। आप की पहचान शून्य है। सर्वप्रथम आप संस्था जो साहित्यिक पुरस्कार या सम्मान देती है या पत्रिका में अपनी रचना छपवाना चाहते हैं तो आप को उस संस्था के मुख्य व्यक्ति से घुलना-मिलना होगा अर्थात घुलनशील होना एक अनिवार्य तत्व है।
पांव छूने की आदत डालिये। घर पर भी जाकर मेलजोल को बढ़ावा देना होगा। मुंह मिष्ठान की व्यवस्था करते ही पुरस्कार तथा सम्मान के हकदार होने की पूर्ण संभावना बन सकती है। कुछ अनुदान देने की व्यवस्था हो तो कामयाबी पहले मिलेगी। उनके परिवार के साथ घरेलू रिलेशनशिप बना सकते हैं तो जुगाड़ टेक्नोलॉजी पूरी तरह से असरदार हो जायेगी।
आप किसी विधा के माहिर खिलाड़ी हैं तो जरूर इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर सकते हैं। कामयाबी के नये शिखर पर पहुँच जायेंगे। आपकी प्रतिभा निखर जायेगी। आपका जलवा बनकर तैयार है। आप चाहे जितना बढिया लिख डालिये। एक प्रतिष्ठित पत्रिका नहीं छापेगी। जुगाड़ से काम हो जायेगा। मिलनसार प्रवृत्ति का गुण होना चाहिए एक साहित्यकार के अंदर। संपादक के प्रति एकदम से सिर से पांव तक नरम हो जाइये। उनको अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करिये। आप जरूर कामयाब होंगे। तन-मन-धन एक अनिवार्य भावना होनी चाहिए।
आप अच्छा लिखते हैं। वह आपसे खराब लिखता है। वह पुरस्कार जुगाड़ से पा जायेगा। आप हाथ पर हाथ रखे सोते रह जायेंगे। आप नवजुगाड़वाद में अपना साहित्य लिख रहे हैं। आपने जुगाड़ नहीं बनाया तो आप वहीं के वहीं रह जायेंगे। कमजोर स्वयं को मत समझो। जो कुछ करना है। आपको खुद करना है। कोई आपकी मदद नही करने आयेगा। आप बनों एक संपर्कमैन। घुस जाइये अंतरात्मा तक। एक कामयाबी जरूर जुगाड़ से मिल जायेगा।
आनलाइन साड़ी का सपना (हास्य-व्यंग्य)
आनलाइन मिलने वाली साड़ी की तस्वीर देखकर हरिमोहन की पत्नी का हृदय गदगद हो गया। मन मयूर हो उठा। कितनी खूबसूरत साड़ी। गुलाबी साड़ी में लड़की की तस्वीर सुंदर राजकुमारी से कम नहीं। पीली साड़ी में लगी लड़की की तस्वीर किसी फिल्म की नायिका की तरह लग रही है। ऐसी साड़ी मै पहन लूंगी तो सारी दुनिया मेरी सुंदरता के सामने नतमस्तक हो जायेगी।
ऐसी कल्पना करके हरिमोहन की पत्नी ने एक गुलाबी साड़ी का आनलाइन आर्डर कर दिया। आनलाइन आर्डर होते ही बेचारी दर्पण के सामने बैठकर एक हल्की मुस्कान ली। आज उसके सभी सपनों में से एक सपना था। वह सपना आनलाइन मंगाई साड़ी पहनकर मायके जाने का है। दर्पण में तरह-तरह का चेहरा बनाकर खुशी से ऐसे झूम रही है जैसे सावन के महीने में लड़कियां हरी-हरी साड़ी पहनकर झूला झूल रही हैं। इस झूले पर कई सहेलियाँ बैठी हैं और मस्ती में कजरी गीत गा-गाकर मदहोश और आनन्दित हो रही हैं।
आज साड़ी आने का मैसेज पढ़ कर बेचारी की खुशी दुगुनी हो गयी। जिस चित्र को देखकर साड़ी मंगाई थी। वह तस्वीर देखकर रही है। कितनी खूबसूरत लग रही है यह तस्वीर। कितनी अच्छी साड़ी है। कितना मुझ पर अच्छा लगेगा। मेरे पति महोदय मुझे इस साड़ी में देखकर मंत्रमुग्ध हो जायेंगे।
आखिर वह सुनहरा मौका आ ही गया। आनलाइन साड़ी आ गयी। जल्दी से डिब्बा खोला। एक गुलाबी कलर की साड़ी जैसे पुरानी साड़ी को प्रेस करके डिब्बे में पैक कर रख दिया गया हो। साड़ी में कोई रौनक नहीं, जो उस साड़ी को पहन ले, उसके सौंदर्य में चार चांद तो नहीं लगेगा बल्कि एक बुजुर्ग महिला की तरह महसूस होने लगेगा।
साड़ी को वापस कर दिया गया। इस प्रकार पुन: लाल रंग की साड़ी का आर्डर किया गया। सपना बेचारी बनाकर फिर बैठी रही। साड़ी में खूबसूरत दिखने का सपना था। फिर आयी साड़ी। वही पुरानी रौनक में। साड़ी वापस करके आर्डर कैंसिल कर दिया गया। आनलाइन आर्डर पुन: न करने का फैसला लिया गया। आनलाइन साड़ी ने सपनों को तोड़कर रख दिया।