हास्य-व्यंग्य (1-10) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Hindi Hasya-Vyangya (1-10) : Jaychand Prajapati Jay
मेरी मौत पर पत्नी का विलाप (हास्य-व्यंग्य)
एक बार मैं मरने का नाटक किया तो पत्नी चीख-चीखकर रोई। छाती पीट-पीट कर रोई। हाथ में खाली पर्स दिखा-दिखाकर रोई। आंखों में पानी लगा-लगाकर रोई। देखने वालों ने खूब हमदर्दी उसके साथ दिखाते रहे।
इस मक्खीचूस ने एक फूटी कौडी नहीं छोड़ी। कभी रसमलाई खिलाई नहीं। दहीबड़ा के लिये जिह्वा तरसती रह गयी पर इसके पापा पाई -पाई बचाने के चक्कर में मेरा लाखों का सावन बर्बाद कर डाला।
आखिर जाना था पहले चले गये होते आखिर बीमा के पैसे मेरे खाते में आ जाते। कुछ दिन हम भी ठठ्ठेबाजी कर लेती। शौक श्रृंगार करने के सारे सपने पूर्ण होते। इस तरह से मुझे झकझोर-झकझोर कर, हिला-हिलाकर पछाड़े खा-खाकर गिर रही थी।
कुछ महिलाये उसको संभाले हुये थी। बीच-बीच में आग में घी डाल-डाल कर आग की लौ को तेज कर देती थी। एक ने कहा, पहले चले गये होते तो दूसरी शादी लग जाती। रोने की आवाज और तेज कर दी। रोते हुये कह रही थी। बहुत पहले ही सोंचे थे कि चले गये होते तो दूसरा ठीक ठाक लड़का देखकर घर बसा लेती। किस्मत मेरी खराब थी।
अब इस बुढापे में कौन ब्याह कर ले जायेगा मुझे। ये गाल पिचक गये हैं। बदन के सारे नटबोल्ट ढीले हो गये हैं। कहीं का नहीं किया। बड़ी तेजी से चिल्लाई। हे, मोनू के पापा कहां गये हमें छोड़कर। मैं भी आंखे खोलते हुये कहा, क्या हुआ मोनू की मम्मी?
मुझे जिंदा देखकर मेरी पत्नी को सांप सूंघ गया। मुझे माफकर देना मोनू के पापा, बहुत भला बुरा कह डाला आपको। मैं मुस्करा रहा था। आज साक्षात पत्नी के दर्शन हो गये। ऐसा दर्शन सचमुच दुर्लभ होता है। मैं कितना भाग्यशाली हूं कि पत्नी अपने अंदर का दर्शन करा दिया।
नेताजी के जुमले (हास्य-व्यंग्य)
नेता बनने का शौक एक बार मेंरे अंदर भी आ गया। देश सेवा का व्रत लेना चाहते थे। हम कुछ कर जाने का जज्बा अपने अंदर जगाया। कुर्ता पायजामा विशेष आर्डर देकर सिलवा लिया। मेरी चर्चा गांव मुहल्ले में जारी हो गयी कि यह एक दिन कुशाग्र बुध्दि का नेता बनेगा।
बड़े बड़े आफर अध्यक्षीय भाषण के लिये आने लगे। एक जगह मैं भाषण के लिये बुलाया गया। नेता बनने की अपनी खुशी होती है। नया कुर्ता पायजामा पहना गया। बालों में काली मेंहदी लगा ली गयी। काला जूता पहन लिया। चमचमाती गाड़ी मेरे लिये भेजा गया।
भीड़ खचाखच भरी थी। जैसे ही भाषण के लिये मंच पर खड़ा हुआ। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा समां बंध गया।
जैसे ही मैं भाइयों बहनों का संबोधन किया। मेरे पायजामा की डोरी खुल गयी। पायजामा नीचे गिर गया। जनता यह सब देखकर हंसने लगी। मैं बात बनाने में माहिर आदमी था।
मैंने कहा.. भाइयों, बहनों, हमारा समाज इस पायजामें की तरह गिर गया है। इतना सुनते ही सारी जनता खामोश हो गयी। लोगों ने कहा नेताजी गंभीर बाते कर रहें हैं। मेरा यहां फेंकने का तजुर्बा काम रहा है। मौका देखते ही झठ से कहा कि इस गिरे समाज को हम सब को मिलकर इस पायजमें की तरह उपर उठाना है। मैंने अपना पायजामा उपर उठाते हुये कहा।
जनता ने कहा कि नेताजी प्रैक्टिकल बात कर रहे हैं। हमें तो अपना काम बनाना था। अध्यक्षीय भाषण में खुलेआम बेइज्जती की फीलिंग हुई मुझे। अब मुझे पायजामा की डोरी बांधना था। एक जुमला फिर फेंका और पायजामें की डोरी बांधते हुये कहा। भाइयों बहनों..हम सब को मिलकर पायजामें की डोरी की तरह इस बिखरे समाज को एकता की सूत्र में बांधना है।
जनता मेरे इस भाषण से बहुत प्रभावित हुई। मेरे स्वागत में विशेष तालियां बजाई गयी। लोगों ने अपनी गलती के लिये माफी मांगी। मेरी जान में जान आ गयी। मेरी नेतागिरी चमक गयी। नेताओं के जुमले ही जनता के पेट भरने में काफी है। कुछ नेता जुमले फेंक कर जनता का पेट भरते हैं। हमने भी अपना काम करके जनता को खुशकर दिया।
पत्नी से सेल्फी लेना पड़ा मंहगा (हास्य-व्यंग्य)
पत्नी से सेल्फी लेना आसान है लेकिन मेरी लिये असह्य पीड़ा की तरह है। डर लगता है कहीं घुड़क न दे इसलिए आज तक कोई सेल्फी लेने में असफल रहा। मैं नेक इरादे का आदमी हूँ । इस तरह के विचार को गलत समझता हूं।
एक बार रात में सोंचा सोते वक्त ले लूं। कोई विरोध नहीं होगा। पूरे साहस के साथ सेल्फी ली। पर सब गुड़ गोबर। सेल्फी तो ले ली पर आंखे बंद वाली सेल्फी। निराशा हाथ लगी। पसीने से तर बतर हो गया। ह्रदय की धड़कने बढ गयी। रात गुजर गयी। मैं सीधा आदमी उसे जगाया नहीं ।
सुबह हुई,। मेरी पत्नी मुस्कुरा रही थी मुझे देखकर। वह मेरे उतरे चेहरे की लालिमा देख रही थी। मैं शर्मिंदा दिखा। हौंसले पस्त हो गये। सचमुच मेरे लिए कठिन दौर था।
दुपहरिया थी। मेरी पत्नी सोलह श्रृंगार कर लिया था। आज सोंच लिया था की सेल्फी ले ही लूंगा। कुछ नजदीक गया। कैमरा आन था। वह बिल्कुल निश्चिंत थी। सेल्फी के बारे उसे तनिक भी एहसास नहीं था कि आज मेरे साथ सेल्फी लेंगें।
करीब पहुंचते ही जैसे सेल्फी के लिये हम उसके पास गये।डर के कारण मोबाइल हाथ से छूट गयी। मोबाइल पूरी तरह से ध्वस्त हो चली। नीचे झुककर मोबाइल उठाया। संपूर्ण बर्बादी हो गयी थी। सेल्फी के चक्कर में मेरा भयंकर नुकसान हुआ। कई साल बीत गये शादी हुये लेकिन सेल्फी अब तक नहीं ली जा सकी।
अभी कुंवारा हूं (हास्य-व्यंग्य)
जब मैं जवान हुआ तो शादी के लिये लोग देखने ताकने आने लगे। मुझे देखने वालों ने घूर घूर कर देखा ऐसा देखा जैसे कसाई बकरे को देखता है, सोनार सोने को देखता है जौहरी हीरे को देखता है, किसान अपने लहलहाते फसल को देखकर आनन्द की अनुभूति करता है वैसे मुझे दामाद बनाने के उद्देश्य से आये भावी ससुर जी भी आनन्द की लहरों में सैर करने लगते।
मैं भी शादी के लिये अपने आपको बिकने के लिये तैयारी कर ली। बाल वगैरह कटा कर नये हेयर स्टाइल में हो गया।
मंहगे साबुन मंगा लिये। क्रीम पाउडर का भी आर्डर कर दिया गया। हम वीआईपी टाइप से रहने लगे। प्रतिदिन शेविंग। कपडे में बराबर इस्तरी हो रही है। जूता डेली पालिश हो रहा हैं।
एक भावी ससुर आये। उपर से नीचे तक आकलन किया, कुछ देर तक घूरे। तनी रही,भौंहें। देर तक ताकते रहे। फिर बोले कि बेटा चालीस की उमर हो गयी है। अभी तक शादी नहीं किया। क्या बात है? मेरे तो पैरों तले जमीन खिसक गयी। अभी तो बीए फर्स्टियर है। अभी तो इक्कीसवीं ही चल रहा है।
ये भावी ससुर चले गये,अगलाृ ससुर आया। वो भी कसाई की तरह निहारने लगा, चाय नाश्ता हुआ। मुझे लगा कि यह भी ससुर मेरी शादी के प्रति आश्वस्त नहीं दिख रहा है। इस साल भी कुंवारा ही रह जाउंगा। कई सालों तक जी तोड कोशिश की गयी। खोदा पहाड निकली चुहिया।
अवस्था भी धीरे धीरे अब ढलान की ओर है। बाल पकने लगे हैं। चेहरे की रौनक फीकी है। कई लोग ढाढस बंधा रहे हैं। ईश्वर की लेखनी कोई मिटा नहीं सकता। शादी लिखी है। बाजा जरूर बजे। उमर के खिसकने से हमने उम्मीद लगभग अब छोड दिया।
लेकिन धडकने बराबर धडक रही है। जवानी के रोंगटे अभी भी दहाड मार रही है। अरेंज मैरेज भले नहीं हो पाया लेकिन प्रेम विवाह के रास्ते खुले हैं। जब तक जोश है शादी की आशा जगाये रखना होगा।
मिश्री लाल की लडकी भी पैंतीस के आस पास है। छरहरी बदन है। चेहरे की लालिमा देखकर ह्रदय में बिजली कौंधने लगी। उसके नयन को देखकर जो तरावट मिलती है सेब संतरे के जूस में नहीं मिलता है। मैं आसपास उसके गुजरने लगा।
एक दिन मौका पाकर लाल पुष्प को आगे बढाया। प्रेम का इजहार करना ही चाहा। बोली अंकल जी अब इस उम्र में शोभा नहीं देता। बचे खुचे सपने का भी कत्ल कर दिया मिश्रीलाल की बिटिया।
पुस्तक लोकार्पण (हास्य-व्यंग्य)
खूब लोकार्पण करवा लीजिये। बडे-बडे लेखक कवि बुलवा कर खूब चाहे तारीफ ही करवा लीजिये। अपने मुंह मियां चाहे मिट्ठू ही क्यों न बन जाइये लेकिन एक भी किताब बिकेगी नहीं। पुस्तक मेले में भी नहीं बिकेगी। यहां तक कि फ्री में भी कोई लेकर नहीं पढना चाहेगा।
हमारे मित्र ने लोकार्पण में हमको भी बुलाया था। कुर्ता पायजामा पहने मैं भी गया। बडी-बडी तारीफें हुई। बडी- बडी तारीफों के पुल बांधे गये। बडे-बडे पत्रकारों को बुलाया गया था। पंडाल भव्य सजाया गया था।
किसी ने कहा कि आपकी किताब सौन्दर्य से भरी है। ह्रदय की गहराइयों को टच कर जाता है। किसी ने कहा कि शब्दों की पैरवी बहुत सुंदर ढंग से की गयी है। किसी ने कहा कि वीर रस से भरी रचनाओं का संग्रह है। पुस्तक लोकार्पण के बाद मुंह मीठा कराया गया।
कवि जी इस लोकार्पण से गदगद हो गये उन्हें आशा जग गयी कि ई जो भीड है सब मेरी किताब खरीद लेगी। कवि ने आत्मविश्वास के साथ बैग में सारी पुस्तकें भर कर खचाखच भरे एक-एक व्यक्ति के पास ले गये कि आज एक बेहतरीन धंधा हो जायेगा। प्रकाशक खुश हो जायेगा। एक अच्छी रायल्टी मिल जायेगी।
कवि पूरे दर्शक दीर्घा तक राउन्ड मारा लेकिन ढाक के तीन पांत। तारीफों के बीच में कोई पुस्तक खरीददार नहीं मिला। एक कवयित्री से विशेष निवेदन करने पर बेचारी पिघल गयी और कहा उधार दे दो अगली बार के लोकार्पण जब करायेंगें तो पैसा दे दूंगी।
मित्र कवि महोदय, मुंह लटकाये ऐसे मंच पर चढे जैसे नानी के मरने की सूचना मिली हो। हार रे पुस्तक लोकार्पण, पूरी जिन्दगी की कमाई लई डूबी।
चापलूसी (हास्य-व्यंग्य)
मैं एक ही जगह काठ के घोड़े की तरह टिप टाप करता रहा पर कोई तरक्की नहीं हुई। किसी ने तरक्की के लिए चापलूस बनने की सलाह दी।
चापलूसी करने से बड़ा से बड़ा पद हथियाया जा सकता है। चापलूसी करने में हमें तरक्की के सुअवसर दिखते नजर आये। मैंने भी शपथ ली कि दुनिया का सबसे बड़ा चापलूस बनूंगा।
पहुंचते ही अपने आला अधिकारी को सलाम ठोंका। हल्की स्माइल की। साहब हम पर फिदा हो गये। साहब मेरे अंदर का सबसे बड़ा चापलूस देखा। मैं अब हां में हां मिलाने लगा। साहब हर बात मेरी मानने लगे।
अब मेरी चापलूसी नये शिखर पर पहुंच गयी। उपरी आमदनी भी होने लगी। रोज नये-नये ग्राहक मिलने लगे। इस कदर मेरी चापलूसी तरक्की की ओर जाने लगी भाईसाहब। आमदनी से ज्यादा चापलूसी से आय होने लगी।
रातों रात मैं मालामाल हो गया। नौकर चाकर गाड़ी घोड़ा सब आ गये। बैंक बैलेंस कई गुना हो गया। मेरी चापलूसी आगे की ओर जाने लगी। तरक्की के रास्ते खुलते गये। इस प्रकार चापलूसी की हथकंडा अपना कर बड़ा तोंद कर लिया।
चापलूसी करना गलत है। अवैध वसूली है। अहिंसक ढंग से लूटपाट करना होता है। सुधरने की बहुत कोशिश की लेकिन लत लग थी चापलूसी की छुटी नहीं। चापलूसी से पदोन्नति हो गयी। उपरी आमदनी की कई गुना वृद्धि हो गयी। चापलूसी स्वयं को लाभ दे सकता है लेकिन दूसरे के लिये हानिकारक औषधि की तरह है।
सुबह से बोहनी नही हुई (हास्य-व्यंग्य)
ई पुस्तक मेला दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहा है। सब कवि लेखक लोग वहीं मिल रहे हैं। घर द्वार बीबी बच्चे छोड़ कर आएं हैं। हम भी गए रहे। एक कवयित्री हमसे कहिन हैं.... इ हम लिखे हैं। ले लो। तुम्हार कसम हम बहुत बढ़िया लिखे हैं। पूरा आपका पईसा वसूल हो जायेगा। हमारी बोहनी सुबह से नही हुई बा। कृपा कर दो। बहुत मेहनत किए हैं। सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
हम कवयित्री को ऊपर से नीचे तक देखा। लागत वाकई दिन में कोई बोहनी नही हुई बा। चेहरा पर उदासी देखकर ह्रदय मेरा पिघला। हम कहा उधार दे दो। कुछ दिन में दे दूंगा। कवियत्री बेचारी अनमने से दे दिया। बहुत मुश्किल से एक उधारी किताब बेचारी का बिका। ये हाल है कई रचनाकारों का प्रगति मैदान में। कई रचनाकारों की बोहनी नही हुई है। फेसबुक पर बेचने का प्रयास चल रहा है।
प्रकाशक वालो को प्रचार करने कोई जरूरत नहीं। ई लेखक लोग आखिर किस दिन काम आयेंगें। ई सब जो भीड़ है। सब कवियों लेखकों की है। इ पाठक लोग नहीं हैं। जब लेखक लिखे और लेखक पदे तो पुस्तक मेला क्या मतलब। एक जमाना था जब लेखक लिख देता था। हजारों की संख्या में पाठक लोग पहुंचते थे। अब लेखक कवि की लाइन लगी है। पाठक लोग घर पर लाई चना चबा रहे हैं।
हमारे एक संपर्की लेखक हैंतंछं। वो कहानी की किताब छपवाए और खूब हाथ पैर चलाए फिर भी ढाक के तीन पात। कोई पुस्तक नही बिकी। चूरन बेचने वाले को दे दी। चूरन वाला खुश।फ्री में मिला है। दो चार हर महीना मिलते जाएं तो हमें चूरन देने का हो जाएगा। एक दिन हम चूरन खरीदे तो देखा कि यह तो ऊ लेखक हैं उनकी रचना हैं। हम पूंछ लिए।लेखक बोले लोग चूरन के बहाने ही पढ़े, का दिक्कत है। कम से कम हमारे पाठक यही चूरन खाने वाले सब हैं। लेखकों कवियों की हालत बहुत दयनीय है।
व्यंग्य का प्रहार (हास्य-व्यंग्य)
लोगों पर तीखा प्रहार करते-करते हम व्यंग्य शास्त्री हो गये। ऐसा व्यंग्य कसते थे कि कई मानसिक रूप से घायल हो जाते थे। कई तो ईर्ष्या की आग में झुलस जाते थे। कई तो हमें देखकर रास्ते की दिशा बदल देते थे। कई तो हमें अपना मित्र समझने लगे।
विरोधियों पर प्रहार करने के लिये हमें सबसे उपयुक्त प्राणी समझा गया। विरोधियों पर व्यंग्य प्रहार करने के लिये आफर दिया जाने लगा कि हमारा विरोधी बहुत कट्टर है। उस पर अगर व्यंग्य वाण छोड़ा जाये तो वह आंतरिक रूप से धराशायी हो सकता है।
कुछ लोगों ने वरमाला की तरह माल्यार्पण कर मुझे अपने पक्ष में करने लगे। किसी ने स्वादिष्ट मिठाइयाँ भिजवाई, किसी ने नया वस्त्र भिजवाया। किसी ने धनवर्षा की। किसी ने आभूषण भिजवाना पसंद किया। बड़ी खातिरदारी की जाने लगी। मन मेरा तृप्त हो गया।
व्यंग्य का रस मेरी जिह्वा से टपकने लगा। अंगारे निकलने को तैयार है। जैसे ही उसने अपने चिरविरोधी को मेरे समक्ष प्रस्तुत किया। ऐसा व्यंग्य का करारा प्रहार किया। एक की बीच समाज में पगड़ी नीचे गिर गयी। किसी का पायजामा नीचे गिर गया। किसी के यहां घरेलू कलह हो गया। किसी को स्वयं से घृणा हो गयी। किसी ने अपना हथियार डाल दिया। किसी ने आत्महत्या तक कर डाली। कोई तो अपनी पत्नी की नजरों से गिर गया। कई तो अपना मुंह समाज में दिखाने के काबिल नहीं समझ रहा है।
विरोधियों की हार होते ही लोगों ने पैसों की ढेरी लगा दी। मेरा व्यंग्य का ब्रह्मास्त्र सफल रहा। एक कर्कश स्त्री पर व्यंग्य वाण चलाने की सिफारिश की गयी। मैंने उस कर्कश स्त्री पर जैसे ही व्यंग्य प्रहार किया। उसके अंदर की शक्ति जागृत हो गयी। अब वह रौद्र रूप धारण कर लिय।
जोरदार आवाज में गालियों की बौछार चालू हो गयी। कुछ ने आग में घी डालने का काम किया। मेरे कपड़े फाड़ डाला। मुक्के का ऐसा प्रहार किया किया। मेरे अंदर का व्यंग्य शास्त्र कमजोर होने लगा। आत्मग्लानि का तीखा अनुभव हुआ। व्यंग्य शास्त्र की रूद्राक्ष माला तोड़ डाली। कठोर निर्णय लेते हुये व्यंग्य का तीर तरकश में सब रख लिया। शान्तचित्त हो गया। आजतक दुबारा व्यंग्य का तीर कभी नहीं छोड़ा।
मेरे संपादकीय का भूत उतर गया (हास्य-व्यंग्य)
मैं कटोरेलाल हूं। हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका का मैं संपादक बन गया था। अब कई साहित्यिक कवि कवयित्रियों से जान पहचान हो गई। सब लोग आत्मीय दंग से ईमेल लिखते और अपनी रचना को पत्रिका में पब्लिश के लिए निवेदन करते। कोई कवयित्री रचना को भेजती तो ह्रदय गदगद हो जाता। मन प्रफुल्लित हो जाता। नए नए तराने गूंजने लगते।
एक कवयित्री ने लिख भेजा कि संपादक जी अगर मेरी रचना छापेंगे तो आपकी प्रेयसी बनने को मैं तैयार हूं। एक सुंदर सी तस्वीर भेज दिया। बाल खुले थे। साफ सुथरी तस्वीर थी। एक आत्मविश्वास से भरी तस्वीर देख कर मन में प्रेम की तस्वीर बनने लगी। अगर मुफ्त में प्रेम प्रस्ताव मिल रहा तो क्या हर्ज है। दिन में सपने देखने लगे। संपादक बनने से दसों अंगुलिया घी में होती है।
जो नया अंक छपा उस अंक में कवर पेज पर उस कवयित्री की तस्वीर छाप दी। अपनी छाप कवयित्री के सामने छोड़ना था। कवयित्री का मन खुश हो गया, जब जाना की कवर पेज पर उसकी तस्वीर छपी है तो वह भूरि भूरि प्रशंसा मेरी की। मैं और खुश हो गया। कुछ कवि कवयित्री ने भयंकर आरोप लगा दिया की संपादक जी को कही प्रेम प्रलोभन तो नही मिल गया उस कवियत्री का। थोड़ा बहुत अफसोस रहा इस तरह के आरोप से लेकिन मैं चुप्पी साध ली।
अगले दिन कवयित्री का ईमेल आया कि वेलेंटाइन डे पर एक गिफ्ट तथा सुर्ख गुलाब को देकर प्रेम प्रस्ताव को रखूंगी। किसी को खबर न हो इसलिए 14फरवरी को उस कवयित्री का स्वागत किया जाएगा। यह प्रस्ताव पास कर दिया गया।
स्वागत समारोह की तैयारी जोरों से है। लाखो रुपए के डेकोरेशन पर खर्च कर दिया गया। सारी व्यवस्था में दो से तीन लाख रुपए का खर्च हुआ। स्वागत समारोह एकदम भव्य दंग से सजाया गया था। कुछ कवि कवयित्री बोले कि संपादक जी पगला गए हैं। एक कवयित्री को सम्मानित करने के लिए इतना सब ताम झाम की क्या जरूरत है। बहुत फोटो कवर पेज पर छपी हैं। इतना जलसा कभी नहीं हुआ। साहित्य आज नई करवट ले रहा है।
उसकी अगवानी के लिए आठ दस कवि कवयित्री के साथ मैं गेट पर गया। उस कवयित्री को देखकर मेरे तो पैरो तले जमीन खिसक गई। जैसा उसके सौन्दर्य की कल्पना किया था उसके विपरीत। चेहरे को देखकर बज्रपात गिर गया।आगे के चार दांत लंबे लंबे दिख रहे थे। चेहरे पर जैसे कालिख पोती गई है। उजड़ा बयार। चेहरा पसीने से लबालब था। कुछ लोग मुझे थामने लगे। कुछ लोग हास्पिटल लेकर चलने को कह रहे थे।
सुबह जब मेरी आंखे खुली तो मेरे सामने वह कवयित्री सुर्ख गुलाब का फूल लिए खड़ी थी। चाहत भरी दृष्टि थी। उसने सुर्ख गुलाब को मेरे तरफ बढ़ाया। मेरी सारी इंद्रियां सुषुप्त हो गई थी। काटो तो खून नहीं। न तो मैं यस कर पा रहा था न तो ना कर पा रहा था। सपनो का महल ढह गया था। मलवे में तब्दील हो गया था। बस उस खंडहर में हम दोनो खामोश। मेरी निगाहें झुकी सी थी। वह मेरे भाव को समझ गई थी। हमको हमारे हाल पर छोड़ कर बिना कुछ कहे धीरे से वह निकल गई। मेरे संपादकीय का भूत उतर गया।
मंत्री बनने का ख्वाब (हास्य-व्यंग्य)
एक दिन हमारे एक मित्र ने कहा कि कुछ बड़ा सोचो तब तरक्की होगी। यह उसकी बात हमारे दिल मे बैठ गई। एक दिन हम खटिया पर बैठे रहे और सोचने लगे अगर मंतरी बन जाए तो आगे पीछे दुनिया चलेगी। इ सब पुलिस डिपार्टमेंट सब अपना होगा। लालबत्ती मिलेगी। बादशाहत हासिल हो जायेगी। दुनिया सलाम दागेगी। अपना जलवा होगा। बैठ के चार पीढ़ी खाए कोई दिक्कत नहीं।
रामलाल की जमीन पर पूरा कब्जा अपना हो जायेगा। ससुरी नोट की थाह नहीं होगी। जिसको चाहेगे। घर से उठवा लेंगे।चमचे आगे पीछे रहेंगे। बैंक बैलेंस होगा। नौकर चाकर होंगे। गाड़ी घोड़ा होगा। दूसरी बीबी लायेंगे। मौज होगा। मेरा मित्र सही कहा है। बड़ा सोचो। हमे अभी से लग रहा है कि हम मंतरी बन गए हैं।
एक बड़ा सा बंगला होगा। एक फाइव स्टार होटल होगा। खूब प्रॉपर्टी बना लूंगा। कोई मेरे खिलाफ नहीं होगा। लल्लन के लडकवा को जिंदा दफना देंगे। हमारी बिटिया पर नजर गड़ाए है चोट्टा कहीं का। इ सब जो फटे.फटे कपड़े पहनते हैं। नरकीय जिंदगी जी रहे हैं वो मौज से कट जायेगी।
इतिहास गवाह हो जायेगा की पुत्तू के लड़कवा आज मिनिस्टर है। बाप दादा गरीबी में गुजार दिए लेकिन इ लखैरवा गुंडा मवाली के साथ रहते–रहते का से का होई गवा। तब मोहसिन कहेंगे कि ई तो फटी चड्डी पहनता था आज दुनिया इसको सलाम कर रही है। फिलिम बनाएंगे। ई सब फिलिम की छोकरिया हमारे महल में ठुमका लगाएंगी।
तभी हमार मित्रवा ऊ आ गया। वह भी उस खटिया पर बैठ गवा। खटिया कमजोर थी। धोका दे दी। खटिया टूट गई और हम दोनो गिर पड़े। हमार एक पैर की हड्डी टूट गई। हम जी छोड़ कर चिल्लाये। हाय राम ई का हुआ। मेरी हड्डी, हाय मेरी हड्डी। मेरा मित्र हॉस्पिटल ले गया। सब सपने मिट्टी में मिल गए। मंत्री बनने का ख्वाब सब ढह गया। मुंगेरीलाल के हसीन सपना सब बेकार हो गया।