हर ख़्वाब में : किरण विश्नोई
Har Khwab Mein : Kiran Vishnoi

रात के सन्नाटे में जब बाकी दुनिया सो चुकी होती है, तभी कुछ लोग जागते हैं — अपने ख़यालों के साथ।
सोनू भी उन्हीं में से एक था।
दिल्ली के एक छोटे से कमरे में, लैपटॉप की रोशनी में बैठा वह अपने अधूरे उपन्यास की आख़िरी पंक्तियाँ लिख रहा था “वो आज भी आती है, हर ख़्वाब में, हर ख़याल में…”

उसकी उंगलियाँ रुक जाती हैं।
वो खिड़की से बाहर झाँकता है — जैसे किसी की परछाई अब भी आसमान पर टंगी हो।

तीन साल पहले, देहरादून की ठंडी सुबह थी।
कॉलेज के पहले दिन सोनू अपनी कॉफी लेकर कैंपस में टहल रहा था कि एक हल्की सी टक्कर हुई —
कॉफी गिरी, किताबें बिखरीं, और सामने खड़ी थी अनिता l
बाल हवा में उड़ते हुए, आँखों में हल्की झुंझलाहट और होंठों पर मुस्कान
“माफ़ करना, मेरी गलती थी,” सोनू बोला।
“गलती तुम्हारी थी, पर कॉफी मेरी गई,” अनिता ने मुस्कराते हुए कहा।

बस वही एक पल था — जब किसी कहानी का पहला पन्ना खुला।

कॉलेज की लाइब्रेरी, कॉफी कैफ़े, और लंबी वॉक — धीरे-धीरे दोनों की बातें हर विषय से गुजरने लगीं।
सोनू को उसकी बातों में शांति मिलती थी, और अनिता को उसकी खामोशी में गहराई।

वो दोनों अलग थे —
अनिता रंगीन थी, सोनू सादगी में डूबा हुआ।
लेकिन कहते हैं न, सादगी ही तो रंगों को उभारती है।

एक शाम, कॉलेज की छत पर सूरज ढल रहा था।
सोनू ने हिम्मत जुटाई “अनिता, अगर मैं कहूँ कि तुम्हारे बिना मेरा दिन शुरू नहीं होता...”
वो मुस्कराई, और बोली —
“तो मैं कहूँगी, तुम्हारे बिना मेरा दिन पूरा नहीं होता।”

वो पहली बार था जब दोनों ने महसूस किया कि उनके बीच सिर्फ़ दोस्ती नहीं थी — वो कुछ और था, शायद “मोहब्बत”।

जैसे-जैसे कॉलेज का आख़िरी साल करीब आया, वैसे-वैसे अनिता के सपने नए शहर की ओर बढ़ने लगे —
वो विदेश पढ़ाई के लिए जाना चाहती थी।
सोनू उसे रोकना नहीं चाहता था, पर भीतर से टूट रहा था।

सोनू , ये दूरी सिर्फ़ रास्तों की होगी, दिलों की नहीं,”
अनिता ने जाते हुए कहा।

और उसके बाद — बस ख़ामोशी।

अनिता ने शुरुआत में लिखा — हर हफ़्ते एक ईमेल, हर महीने एक कॉल।
पर ज़िंदगी तेज़ थी, और वक़्त बेरहम।
धीरे-धीरे मेल बंद हो गए, और कॉल्स का इंतज़ार आदत बन गया।

सोनू ने अपने शब्दों में उसे ज़िंदा रखा।
हर अधूरी कविता में उसका नाम छिपा था, हर पंक्ति में एक याद।

तीन साल बाद, सोनू अब एक लेखक बन चुका था।
उसकी किताब “अधूरी मुलाक़ातें” चर्चाओं में थी।
लोग उसकी कहानियों में दर्द महसूस करते, पर किसी को नहीं पता था कि वो दर्द असली था।

हर इंटरव्यू में वो बस इतना कहता
“कुछ लोग जाते नहीं, बस शब्द बन जाते हैं।”

एक दिन उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला — और सामने वही थी, अनिता।
चेहरे पर वही मुस्कान, पर आँखों में पछतावा “मैंने बहुत देर कर दी, सोनू ,”
उसने कहा।
“नहीं,” सोनू ने जवाब दिया,
“तुम आई हो, बस यही काफ़ी है।”

दोनों बैठे रहे, घंटों तक — बिना कुछ बोले।
शब्दों की जगह अब खामोशी बोल रही थी।
ज़िंदगी उन्हें फिर से मिला रही थी, लेकिन इस बार बिना किसी वादे
“कभी सोचा नहीं था कि हम दोबारा मिलेंगे,”
अनिता बोली।
“मैंने तो हर ख़्वाब में तुम्हें देखा था,”
सोनू ने मुस्कराते हुए कहा।

अनिता फिर विदेश लौट गई —
पर अब कोई वादा नहीं था, कोई इंतज़ार नहीं।
बस एक यक़ीन था कि प्यार सिर्फ़ साथ होने से नहीं होता,
बल्कि यादों में जिंदा रहने से होता है।

सोनू ने अपने नए उपन्यास का शीर्षक रखा “ख़्वाबों में भी, ख़यालों में भी”