हादसा (हिंदी कहानी) : महेश केशरी

Haadasa (Hindi Story) : Mahesh Keshri

दो सौ रूपये डब्बे में यूँ ही पड़े थे। स्कूल आते - जाते समय दिनेश की नजर उस डब्बे पर पड़ती तो वो अपनी मम्मी से पूछता- " मम्मी ये रूपये आपने डब्बे में क्यों रखे हैं। दिनेश की मम्मी इस बात को हँसकर टाल देती। कोई जबाब नहीं देती। लेकिन जब -जब उस पैसे की तरफ देखती तो अँदर से बस भीगकर रह जाती।तब उसको मँजू याद आती। ये डब्बे में रखे पैसे मँजू के थे। जो मँजू को देने थे।

रूना अतीत के गहरे सुरँग में समाती चली गई।

रूना और उसका पूरा परिवार दिल्ली से हिमाचल शिफ्ट हो गया था। रूना ने कामकाज के लिए एक मेड रख लिया था। उसका नाम मँजू था। रूना और उसके परिवार को हिमाचल आए कुछ महीने ही हुए थे। एक दिन वो आँगन में बैठी धूप सेंक रही थी। तभी एक पतली- दुबली मरियल सी लड़की अहाते में आ गई। औसत कद-काठी, बाल बिखरे, कपड़ों में सलवार कमीज पहने हुए थी। वो अहाते के बाहर ग्रिल पर आकर खड़ी थी। रूना ने पूछा -" कौन है री तू इधर क्यों घूम रही है। "

लेकिन मँजू कुछ ना बोली।

रुना ने फिर पूछा -" कौन है री मरी तू बोलती क्यों नहीं। "

लेकिन वो कुछ नहीं बोली दरवाजे पर खड़ी ही रही।

रूना भीतर चली गई दो- घँटे बाद लौटी तो देखा वो लड़की वहीं गेट पर ही खड़ी है।

इस बार रूना का सब्र चूक गया। रूना आश्चर्य से देखती हुई बोली -" अरे मरी तू अब तक यहाँ ही खड़ी है। क्या चाहिए कुछ बोलेगी भी या यूँ ही यहाँ खड़ी रहेगी मूरत बनकर। क्या चाहिए तुझे। "

इस बार भी वो खड़ी रही। मुँह से कोई आवाज ना फूटा।

रूना अँदर गई और थोड़ा सा चावल खोंईंचा में लेकर आई।

इस बार मँजू गायब थी।

रूना को अजीब लगा। मरी कैसी लड़की है। देने के लिए चावल लाई । लेकिन देखो गायब हो गई।

दूसरे दिन भी यही हाल था। ग्यारह- साढ़े -ग्यारह बजे जब रूना अपना किचेन का काम निपटाकर आती तो मँजू वहीं गेट पर खड़ी मिलती। लगातार दूसरे- तीसरे दिन भी वो गेट पर आकर खड़ी हो जाती। रूना को कौतूहल होता। आश्चर्य भी। रूना सोचती लगता है कोई पगली - वगली है। घर से भागी- भटकी हो सकती है। या शायद घरवालों ने घर से निकाल दिया होगा। बहुत सारी संभावनाएँ थी। रूना को लगता कि उसे हर संभावना पर विचार करना चाहिए। फिर लगता कि वो क्यों उसके लिए मरी जा रही है।जब उसको खुद की चिंता नहीं है। लेकिन जब रात होती और रूना अपने बिछावन पर लेटी होती तो मँजू की याद हो आती। तब वो और संभावनाओं पर विचार करती। वो अखबारों में अक्सर पढ़ती। टी. वी. और न्यूज चैनलों पर देखती रहती कि कैसे बुजुर्ग दंपत्ति की हथौड़े से मारकर उनके ही घर में उनकी हत्या की गई। वो ये भी सुनती कि अकेले रह रहे दंपत्ति की किसी ने चाकूओं से गोदकर हत्या कर दी। किसी अनजान पर भरोसा ना करें। किसी भी संदिग्ध आदमी को अपने घर के आसपास देखें। या अपने मुहल्ले में देखें तो आवश्यक पूछताछ जरूर करें। या अपने निकटवर्ती थाने में इसकी सूचना अवश्य दें। रूना के दिमाग में यही सब बातें चलती रहीं। रूना बेकार में ही अपने दिमाग को तकलीफ दे रही थी। वो भी किसी अनजान व्यक्ति के लिए। खैर रूना को आधी रात के बाद सोच विचार करते -करते नींद भी आ जाती। ये रोज का सिलसला सा चल पड़ा था? अब रूना को मँजू को रोज गेट पर खड़े रहते देखने की आदत पड़ गयी थी।

अब वो मँजू को देखती तो उसको मुस्कुरा कर देखती। बदले में मँजू के चेहरे पर भी हँसी के दो टुकड़े दिखाई देते। अब ये रोज का एक सिलसिला सा चल पड़ा था।

मँजू का एक निश्चित दायरा था। इस मामले में वो बड़ा अनुशासित थी। महीना लगने को था।लेकिन वो गेट के अँदर ना आती थी। जैसे मँजू के लिए वो गेट एक लक्ष्मण रेखा थी। और मँजू गेट के बाहर ही रहती थी। एक तय दायरे में। रूना और उसके घर में अनुशासन का बहुत महत्व था। रूना खुद भी बहुत अनुशासित जीवण को जीती थी। अहाते में गैरज भी था। उसके कार की सर्विसिंग घर पर ही हुई थी। रूना को जो क्वार्टर मिला था । वो माचिस की डिबिया की तरह था। यहाँ तक की उसका जो किचेन था वो भी अहाते में था। सर्दियों के मौसम थे। लिहाजा वो रात का खाना दिन में ही पकाकर रख लेती थी। ताकि ठंढ़ में बचा जा सके। उसके पति अभिनव फॉरेस्ट विभाग में काम करते थे। दिनेश, रूना का लड़का पाँचवीं क्लास में पढ़ता था। रूना के पति सप्ताह भर की फल- सब्जियाँ खरीदकर ले आते थे। कभी-कभी तो पँद्रह -बीस दिन का राशन -पानी भी। वो ज्यादातर जँगलों में ही काम करते थे। बाजार भी बहुत दूर था। वे लोग जिप से बीस- पच्चीस किलामीटर दूर नीचे जाते और साप्ताहिक हाट में खाने- पीने का सामान एक ही बार में उठाकर ले आते। इस तरह अहाते में कार के खुले पार्टस- पुर्जे पड़े थे। खाने- पीने का सामान यहाँ तक की फ्रिज भी खुले में यानी अहाते में पड़ा रहता था। जिन पन्नियों में जो चीजें जैसे लाई गई होतीं । वो वैसे ही पड़ी रहतीं । जब तक रूना खोलकर ना निकालती। तब तक पन्नी जस- की -तस बँधी ही रहती थी।

मँजू पर विश्वास का एक कारण ये भी था कि चीजें जहाँ की थीं। वहाँ वैसे ही पड़ी रहतीं थीं ।

एक दिन रूना ने देखा कि वो सुबह- सुबह करीब छ:-सात बजे अहाते के गेट पर मँजू पड़ी है। रूना को बहुत गुस्सा आया। गुस्साते हुए बोली -" क्यों री मरी। इतनी ठंढ़ में यहाँ क्यों पड़ी है। कहीं मर- मु रा गई तो तेरी मौत मेरे सिर पर लगेगी। आखिर क्यों ये पाप मेरे सिर पर मढ़ती है। काहे यहाँ आती है रोज। जब तेरे से मेरा कोई लेना देना नहीं है। चावल देती हूँ तो लेती नहीं। भात देती हूँ तो खाती नहीं। क्या मेरी जान लेकर मानेगी। "

अपनी ताकत भर रूना ने मँजू को खूब डाँटा फटकारा। जितने कु-बोल बोलने थे, बोल दिए। बोलकर अँदर चली गई। रूना को लगा कि कहीं मर मरा गई तो लेने- के- देने पड़ जाएँगें । आखिर एक बात को दूसरे बात से लोगों को जोड़ने में समय भी तो नहीं लगता। ईश्वर बस पाप करवाने से बचाएँ। अपने इस तरह से कुबोल बोलने से रूना को पछतावा भी है रहा था। रात में जो कंबल खुद ओढ़ती थी, हाथ में लेकर आ गई मँजू को देने लिए। लेकिन मरी गायब थी। रूणा का गुस्सा धधक गया। मरी काम की ना काज की बेवजह का टेंशन दिए रहती है।

बात आई गई हो गई। सुबह से फिर दोपहर हो गई। फिर रात हो गई। रूना को बस मँजू याद आती रही। पता नहीं पगली कहाँ होगी। किस हाल में होगी। कहीं ठंढ़ तो नहीं लग गयी होगी। भारी शीतलहर चल रही है। हवा नश्तर की तरह चुभती है। और रूना की आँख लग गई।

सुबह रूना का आँख खुली। झाड़ू - बुहारू किया। चौका -बर्तन साफ किया। नाश्ता बनाया।

व्यग्रता इतनी बढ़ी कि वो क्वार्टर के आजू- बाजू के घरों में, क्वार्टर के पीछे, पहाड़ के नीचे। नदी के आसपास सब जगह जहाँ -जहाँ मँजू के होने की संभावना होती उसको तलाश चुकी थी। लेकिन वो कहीं नहीं मिली। रूना थककर बैठ गई। ना मिलती हो ना मिले मेरी बला से।

फिर कपड़े धोने चली गई। समय जैसे काटे नहीं कट रहा था। बार -बार नजर घड़ी पर ही रहती। मुई सुई भी धीरे -धीरे रेंग रही थी । जैसे आगे ना बढ़ने की कसम खा रखी हो। सात, साढ़े सात, आठ, साढ़े आठ। नाश्ता बनाया। अभिनव और दिनेश को नाश्ता बनाकर दिया। अभिनव दफ्तर और दिनेश स्कूल चला गया। लेकिन रूना की नजर घड़ी पर से हट ही नहीं रही थी। समय जैसे रेंग रहा था। फिर नौ, साढ़े नौ, दस, साढ़े -दस बज गए । फिर बहुत मुश्किल से ग्यारह बजा। कभी रूना ने ग्यारह बजने का इंतजार इस तरह ना किया होगा। जितना उस दिन किया। रूना मन- ही -मन गुस्साते हुए बोली मरी कल सुबह यहीं पड़ी मर रही थी, दरवाजे पर। आज जब राह ताक रही हूँ, तो दिखाई नहीं दे रही है। कम- से -कम कंबल तो आकर ले जाती। कम -से- कम इस ठंढ़ में राहत मिलती।

इस तरह सुबह से दोपहर है गई। आज अहाते में कोई काम नहीं था। फिर भी देर तक बैठी रही। गेट की तरफ टकटकी लगाए कि शायद मँजू दिख जाए। लेकिन मँजू ना दिखी। इन बीस एक दिनों में कोई ऐसा दिन नहीं था, जब उसके ग्रिल के आसपास मँजू मौजूद ना हो। वो रोज ग्यारह- साढ़े -ग्यारह बजे तक आ जाती थी।

रूना रात को ठीक से सो भी नहीं पाई थी। उसका सिर दुख रहा था। वो उठकर भीतर चली गई। रात को खाना भी नहीं खाया। और सो ग ई। सुबह हुई तो फिर मँजू की याद आने लगी। लेकिन इस बार बड़ी सख्ती से उसने इंसानियत के रिश्ते और उससे जुड़े तारों को झटका। एक वही मरी तो अभागी नहीं है। उसके जैसे ना जाने कितने लोग घर से बेघर हैं। कितने दुखियारे हैं। किन -किन लोगों के बारे में इस तरह से सोचती रहेगी। दुनिया में एक -से -एक लोग हैं मजबूर, बेकस, गरीब, दीन-हीन अब सबको देखा तो नहीं ना जा सकता है। अगर वो उसके गेट पर ना आती तो वो उसको देखती ही नहीं। ना ही उससे जुड़ती। सोच का कोई सिरा उससे जुड़ता ही नहीं। आज दिनेश का जन्मदिन था। उसका सारा समय घर कि साज-सजावट और केक बनाते बीता। सुबह से शाम हो गई उसने दोपहर का खाना भी नहीं खाया था। जन्मदिन की आपा-धापी में वो दिन भी शेष हो गया।

इस तरह पँद्रह- बीस दिन बीत गए। रूना अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहने लगी। वो मँजू को लगभग भूल ही चुकी थी।

तभी एक दिन उसके ग्रिल पर दस्तक हुई। रूना ने मुड़कर देखा। मँजू ही थी। एक बार तो दिल में आया कि कह दे क्यों रे मरी कहाँ मरी हुई थी अब तक। पँद्रह दिनों से मुँह क्यों ना दिखाया। लेकिन ख्याल आया, कि कहीं फिर बीस दिनों के लिए ना भाग जाए। पास में टोकरी में आलू पड़े थे रूना छील रही थी। पास में ठंढ़ से बचने के लिए रूना ने उपले जला रखे थे। घुँआ से अहाता भर गया था।

"अरे, वहाँ क्यों खड़ी है अँदर आकर अलाव ताप नहीं तो ठंढ़ी हो जाएगी। बहुत ठंढ़ है बाहर। "

इस बार मँजू सकुचाती हुई अँदर आई।
"बैठ, क्या नाम है तेरा। "
धीरे से बोली -" मँजू। "
"कहाँ थी इतने दिनों से। तुझे हर जगह ढ़ूँढा मिली नहीं कहीं। कहाँ थी रे। "
"मैं काम करती हूँ दीदी। "पहली बार उसने " दीदी "कहा।
"कहाँ काम करती है, रे तू। "
"ब्रिगेडियर साहब अए यहाँ। "
"कौन सी पी. साहब यू.पी.वाले। "
"हूँ। "
"तू उनको कैसे जानती है। "
"जानती हूँ, दीदी झारखंड में भी उनके यहाँ पर काम करती थी। "
"अच्छा तो तू झारखंड से है। "
"झारखंड में कहाँ से है। "
"राँची से दीदी। "
"राँची में कहाँ से है। "
"रातू रोड़ से दीदी। "
"यहाँ कैसे आयी। '
"यहाँ ब्रिग्रेडियर साहब लेकर आए। "
"अच्छा, तब तो ब्रिगेडियर साहब तुझे अच्छे से जानते होंगें। "
"हाँ दीदी, पिछले चार सालों से उनके पास ही रह रही हूँ। दो साल राँची में और दो साल यहाँ। "
"अच्छा। "
"तू भागी क्यों। उस दिन से फिर चेहरा क्यों ना दिखाया। उस दिन से आज आ रही है। मैं कितना परेशान हो रही थी। "
इस बार उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। जैसे पछता रही हो अपनी गलती पर।
"आज कैसे आना हुआ। "
"वो ब्रिगेडियर साहब लंदन जा रहें हैं। वो रिटायर हो गए हैं। यू. के. में उनका लड़का रहता है हमेशा के लिए। उनके पास काम छूटने वाला है। " मँजू के स्वर में जैसे बेचारगी उतर आई थी।
वो मायूस लग रही थी।
"कब जा रहें हैं। "
"पँद्रह दिनों बाद। उनके जाने के बाद सोचती हूँ कहाँ जाऊँगी क्या करूँगी। "
" मुझसे क्या चाहती है। "
"आसरा। "
"आसरा, माने काम। "
"काम, मेरे यहाँ क्यों काम चाहिए तुझे। "
"बताऊँगी दीदी सब बताऊँगी। समय आने दीजिए। बस आप रहने का ठौर दे दीजियेगा, अपने पैरों में कहीं । "
"अपने घर क्यों नहीं चली जाती। "
"मेरा घर कहाँ है, दीदी। "
"क्यों तेरी शादी नहीं हुई है, क्या। तेरा मरद तुझे नहीं रखता अपने साथ। "
"मरद को छोड़े सालों हो गए। मरद मेरा शराबी था। पहले मैं और मेरा मरद रेजा का काम करते थे। सब ठीक -ठाक चल रहा था। लेकिन पता नहीं उसको कहाँ से पीने का चस्का लग गया। और वो सब काम-धाम छोड़कर दिन भर दारू में डूबा रहने लगा। फिर मैं भी रेजा का काम छोड़ दी। और घरों में बतर्न -बासन का काम करने लगी। मेरा पति निकम्मा और आवारा हो चुका था। मैं दिनभर चूल्हा चौका का काम करती थी। तब मैं मुँबई में थी। मेरा मरद मारता पीटता था। पैसे कमाकर लाती तो छीन लेता और दारू में उड़ा देता था।

चॉल वालों से पता चला था, कि मेरा पति मेरा सौदा करना चाह रहा था। वो मुझे बेचना चाह रहा था। लोगों से एडवांस भी पकड़ लिया था। कोई कलकत्ते का दलाल था। मैं जान बचाकर उत्तर प्रदेश भागी अपने मामा के यहाँ। मेरा मामा ध्रुपद जानते थे, ब्रिगेडियर साहब को। उनके यहाँ मेरे मामा ने काम किया था, यहीं हिमाचल में। ब्रिगेडियर साहब अच्छे आदमी थे। इसलिए उनके यहाँ काम पकड़ लिया था। जब तक राँची में रही तब तक उनके यहाँ थी। बिग्रेडियर साहब के डर से मेरा आदमी मेरे पास नहीं फटकता था। नहीं तो जबतक झारखंड में थी। तब तक मुझे आकर धमकाता रहता था। भद्दी- भद्दी गालियाँ देता था। मैं काहे रहती उसके पास जब मेरी कमाई भी वो खाता था और मुझे मारता भी था। "

धीरे -धीरे अँधेरा होने लगा था। मँजू चली गई ये कहकर की वो फिर आएगी।

रात को रूना सोई तो आँखों में नींद ना थी। वो छत ताकती रही। वो आज के समाज में अपनी यानि नारियों की स्थिति देख रही थी। आज कहने को तो सबकुछ डिजीटल हो चुका था। आदमी अंतरिक्ष में पहुँच गया था। लोग मँगल पर दुनिया बसाने की बात सोच रहे थे । चँद्रमा पर पानी खोजा जा रहा था। लोग दुनिया में बड़े बदलाव करके दुनिया में क्राँति लाना चाह रहे थे। लेकिन औरत को लेकर आदमी की सोच नहीं बदली थी। वो आज भी औरत को अपने जूते की नोंक पर रखना चाहता हैं। फिर कैसे बदली है ये दुनिया? जहाँ आज भी इस धरती पर औरतों की इज्जत नहीं है। लोग जिसका खा रहें हैं। उसका एहसान नहीं मान रहे हैं । आदमी की सोच नहीं बदली थी। औरत आज भी उसकी जर-खरीद गुलाम थी।

रूना और अभिनव दोनों ब्रिगेडियर साहब से मिल आए थे। ब्रिग्रेडियर साहब ने जो बातें कहीं थीं और मँजू ने जो बातें कहीं थी। दोनों सच थी। यानी वो राँची झारखंड की रहने वाली थी। उसकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठ भूमि बहुत ही खराब थी। उसकी माँ भी रातू- रोड़ में लोगों के घरों में चौका और बर्तन का काम करके गुजारा करती थी। उसका बाप शराबी था। उसकी माँ के साथ मारपीट करता था। घरेलू हिंसा का शिकार दोनों माँ-बेटी होती थीं। लिहाजा मँजू उनके घर में चौका -बर्तन करके अपना पेट पालती थी। वो पिछले चार सालों से ब्रिगेडियर साहब के यहाँ काम कर रही थी। और भी बहुत सी बातें ब्रिगेडियर साहब बता रहे थे। कह रहे थे कि उनके घर में विदेशों से आई ना जाने कितनी मँहगी- मँहगी शराब की बोतलें पड़ी रहतीं हैं । उनकी मिसेज जो अब दिवंगत हो गईं थीं के ना जाने कितने सारे गहने, कपड़े वैसे ही वार्डरोब में पड़े रहते हैं। लेकिन मँजू ताकती भी नहीं थी, उधर। कारण की उसको बस और बस सुरक्षा चाहिए थी। मँजू मेरे घर में मेरी बेटी की तरह रहती है । मैनें कई बार कहा भी कि बेटी तुझे जो कपड़े और जेवर पसंँद हों अपने पास रख ले। आखिर अब हमारे यहांँ इसको पहनने और ओढ़ने वाला कौन है। जो मन हो खा- पी। इसको अपना ही घर समझ। मँजू में कोई दोष नहीं है। मैनें उसका पासपोर्ट का आवेदन भी दे रखा है। उसको अपने साथ लंदन ले जाऊँगा।

रोज गेट तक आनेवाली और कोई भी सामान जैसे खाने के लिए भात या कच्चा चावल देने की पेशकश या कंबल देने की पेशकश करने की बात पर भी जो लड़की तैयार नहीं हुई थी। उसको हमदर्दी और प्यार की जरूरत थी। रूना ने ये सब बातें अभिनव को बताई थीं अभिनव भी मँजू से हमदर्दी रखता था। रूना बताती कि मँजू बेचारी बहुत ही असहाय और गरीब लड़की है। इसलिए भी मँजू की हमें मदद करनी चाहिए। इधर रूना दिन भर के कामों से थक जाती थी। अभिनव दिन भर दफ्तर में काम करता था। और सप्ताह- सप्ताह भर घर नहीं लौटता था। तब रूना को खाली घर काटने को दौड़ता। वो बात करने के लिए किसी की आस देखती। ये सब बातों को जानकर अभिनव ने रूना को ये कह दिया था कि जब ब्रिगेडियर साहब ने मँजू की गारंटी दी है तो वो मँजू को रख ले काम पर। और इस तरह रूना के पास मँजू रहने लगी थी। पहाड़ पर का जीवण आसान नहीं होता है।रूना अक्सर कभी दूध तो कभी राशन का सामान लेने नीचे आती। ऊपर से नीचे उतरने और चढ़ने में उसके कस- बल ढ़ीले पड़ जाते थे। ऐसा प्राय: ही होता था। किसी- ना- किसी काम से उसको प्राय: नीचे आना -जाना होता ही था। मँजू सुबह- सुबह आती और घर के झाड़ू -बर्तन करती। फिर कपड़े धोकर खाना बना देती थी। दिनेश का फाइनल एग्जाम आ गया था। रूना उसके पेपर की तैयारी करवाती। खाना बनाने और ऊपर के कामों के लिए समय ही नहीं मिलता था। अब उसका सारा फोकस दिनेश की पढ़ाई पर था।

अब रूना आश्वस्त हो चुकी थी कि मँजू कोईआपराधिक प्रवृत्ति की लड़की नहीं है। उसका बैक -ग्राऊँड भी ठीक था। इस तरह मँजू नियम से रोज आने लगी। छ: हजार रूपये महीनें पर बात तय हो गई थी।

इधर कुछ दिनों से मँजू नहीं आ रही थी। शायद ब्रिगेडियर साहब के लंदन जाने का समय हो गया था। मँजू उनके पैकिंग और उनको लंदन भेजने की तैयारी में जुटी हो। लेकिन जब पँद्रह -बीस दिनों के बाद भी वो नहीं आई तो उसको चिंता होने लगी। लेकिन इधर दिनेश की परीक्षा का ख्याल आता तो रूना, मँजू को भूल जाती।

एक सुबह वो उठी तो देखा कि ग्रिल पर कोई खड़ा है। उसने आवाज देकर पूछा -" कौन है वहाँ। "

"बीबीजी मैं हूँ। "
"मैं कौन, तुम्हारा कोई नाम नहीं है। "
"मैं ध्रुपद। "
"कौन ध्रुपद मैं तुमको नहीं जानती। "
"ध्रुपद। " रूना ने दिमाग पर जोर दिया। नाम तो सुना -सुना सा लग रहा था।
रूना ने दरवाजा भेड़ दिया था। ध्रुपद मुड़ने ही वाला था तभी उसको मँजू की याद आ गई। अरे ये ध्रुपद तो मँजू के मामा का नाम था ।
"अरे, सुनो ध्रुपद तुम्हारा नाम है। तुम मँजू के मामा हो। "
"हाँ बीबीजी, मैं ध्रुपद मँजू का मामा हूँ। "
रूना ने ध्रुपद को डपटा -" मँजू क्यों नहीं आ रही है काम पर। पैसे तो पिछले महीने उसको दे दिए थे। उसका केवल दो सौ रूपये निकलता है। आकर कहना ले जाए। "
"बीबीजी मँजू के साथ बहुत बड़ा हादसा हुआ है। बहुत बड़ा हादसा । एकटक बस दीवार घूरती रहती है। किसी को नहीं पहचानती। बस एक ही दिशा में देखती रहती है। कुछ बोलती ही नहीं। कुछ खाती- पीती नहीं बस एकटक दीवार को घूरती रहती है ."
"ब्रिगेडियर साहब के जाने के बाद से वो अपने बाप के पास राँची चली गई थी। उसको अपने शराबी पति से डर लगता था। लिहाजा अपने बाप के पास सुरक्षित रहेगी ऐसा सोचकर मैनें ही उसको कहा था कि बिटिया ब्रिगेडियर साहब तो अब नहीं हैं। इसलिए अब तेरी हिफाजत तेरे घर में ही होगी। बेटा समय खराब चल रहा है। कहीं बाहर रहना ठीक नहीं है। उसको मैं ही खुद राँची छोड़कर यहाँ आ गया था। मैं इधर आया और अभी सप्ताह भर भी नहीं बीता था कि ये हादसा हो गया। "
रूना का कलेजा किसी अनिष्ट की आशंका से काँप उठा, बोली -" क्या हुआ मँजू का पति मर गया। "
"नहीं बीबीजी नहीं मैं आपको किस मुँह से और कैसे बताऊँ। "
रूना संभावनाओं पर विचार करती हुई बोली -" फिर क्या उसके पिताजी मर गए। "
"नहीं बीबीजी नहीं ऐसे शैतान लोगों को भला मौत कहाँ आती है। उसके जैसा हैवान बाप भगवान् किसी को भी ना दे। उसने अपनी ही बेटी की अस्मत लूट ली। वो रोज दारू पीकर आता था। दोपहर में मँजू की माँ काम करने कहीं बाहर गई थी। कमीने ने अपनी ही बेटी के इज्जत को तार- तार कर दिया। "
ध्रुपद पछाड़ खा -खाकर रोए जा रहा था। ध्रुपद इस घटना के लिए अपने आप को जैसे जिम्मेदार मान रहा था।
ध्रुपद -" बीबीजी मैं उसको अपने साथ रख लेता। कहीं और काम पर लगा देता तो ठीक रहता। बेचारी की अस्मत तो बची रहती। "

रूना को अफसोस हो रहा था। अपने व्यहवार पर। आदमी का अपने अधीनस्थ से सिर्फ और सिर्फ रूपये का व्यहवार थोड़ी ही होता है। इंसानियत भी तो कोई चीज होती है। उसको अपने व्यहवार पर शर्मिंदगी महसूस हुई। एक बार तो रूना को अपने इंसान होने पर भी यकीन ना हुआ। कहाँ तो वो अभी अक्खड़ बनकर ध्रुपद को डाँट रही थी। मँजू को नौकर समझते हुए उसके काम पर ना आने के कारण उस पर बरस रही थी। और कहाँ तो उसको अब मँजू और ध्रुपद से सहानुभूति हो रही थी। रूना को जैसे अपने आप से घिन आ रही थी।

फिर वो सोचने लगी। मँजू के बाप के बारे में कि आखिर वो कितना घटिया आदमी है। जो उसने ऐसी दरिंदगी अपनी ही बच्ची के साथ की है।
"बीबीजी आप चलेंगी मँजू से मिलने। उसको देखने। "
रूना को याद आय। जब मँजू ने उसको " दीदी " कहकर पुकारा था।
रूना की आँखें भर आईं -" कहाँ भर्ती है मँजू। "
"मिलिट्री अस्पताल में। ब्रिगेडियर साहब लंदन से चल पड़े हैं। शाम तक आ आ जाएँगे। "
रूना ने स्कूटी निकाली और ध्रुपद को पीछे बिठाया। और वे लोग मिलिट्री अस्पताल करीब घँटे भर बाद पहुँच गए।

रूना ने मँजू को देखा तो उसकी चीख निकल गई। दरिंदे ने चेहरे और छातियों को नोंच दिया था। संघर्ष के सबूत साफ -साफ दिखाई दे रहे थे। उसके होंठ बुरी तरह सूजे हुए थे। गले पर दाँतों से काटने के निशान थे। हाथा- पाई के कारण कुहनियाँ नुची हुई थीं। बाँहों पर नाखूनों के जहाँ- तहाँ निशान पड़े थे।

रूना जोर -जोर से रोने लगी। उसकी हिचकियाँ बँध गईं। सारे मरीज और उनसे मिलने आए लोग अब रूना को देख रहे थे।
"मँजू ए मँजू कैसी है मेरी बच्ची। कैसे तेरा ये हाल हो गया रे। मरी अपने घर क्यों गई। मेरे घर आ जाती। कम -से- कम मुझसे एक बार कह कर तो देखा होता। "
रूना के अवचेतन से ये आवाज आई -" तुम्हारे घर में मर्द नहीं हैं क्या ? "

सहसा इस चेत ने रूना को दूने वेग से रोने पर मजबूर कर दिया। रूना सोचने लगी। जब औरत अपने बाप -भाईयों के बीच सुरक्षित नहीं है। तो वो भला और कहाँ सुरक्षित रह सकती है। हर जगह तो मर्द हैं। ये दुनिया ऐसे ही दरिंदे मर्दों से भरी हुई है।
"मँजू, ए मँजू री इधर आ मुझे बता मुझे। किसने क्या किया है तेरे साथ। खत्म कर दूँगी उसको फूलन देवी की तरह। काट कर अलग कर दूँगी उसका सिर धड़ से। "
रूना बोले जा रही थी। और रोए जा रही थी।
नर्स ने आकर उनको डपटा -" अरे आप लोग बाहर जाईए। क्यों बार -बार आप लोग चले आते हैं, मरीज को तँग करने। इनकी हालत अभी ठीक नहीं है।
रूणा और ध्रुपद उसी स्कूटी से घर लौट आए।

* * * * *

तब से वैसे ही वो दो सौ रूपये डब्बे में धरे थे। जो मँजू को देने थे। पता नहीं कब आएगी मँजू उसको लेने। रूना को ऐसा लगता था कि वो जल्दी ही ठीक होकर लौटेगी। और अपने दो सौ रूपये ले जाएगी।

* * * * *

"मम्मी ओ मम्मी कहाँ खोई हो। मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है। जल्दी से खाना दो। " दिनेश की आवाज सुनकर रूना अतीत के सुरंग से वापस वर्तमान की ठोस जमीन पर गिरी।
"अरे तुम इतनी जल्दी आ गए स्कूल से। "
"जल्दी नहीं है मम्मी, दो बज गए है़। देख लो घड़ी। "
"अरे हाँ बेटा सच में दो बज गए हैं। मुझे तो समय का भान ही ना रहा। बेटा तुम हाँथ- मुँह धोकर बैठो। अभी खाना लगाती हूँ। "
खाना देकर फिर वो धूप में आकर बैठ गई। सुबह से ही उसको ठंढ़ लग रही थी। उसने देखा आसमान में पतंगें उड़ रही थी। और सब -एक दूसरे से जैसे आगे निकल जाने की चाह में दौड़ लगा रही थी ।
एक दिन ठीक होकर लौट आई थी, मँजू। वो ब्रिगेडियर साहब के साथ लंदन जा रही थी।
उस दिन भी वो पहले दिन की तरह गेट पर आकर खड़ी हो गई थी । रूना की नजर पड़ी तो हाथ पकड़कर अँदर ले आयी।
बातों का सिलसिला चल निकला।
"कैसी है री तू। "
"ठीक हूँ, दीदी। देख लो सामने। "
"' दीदी जा रहीं हूँ लंदन। ब्रिगेडियर साहब की तबीयत ठीक नहीं रहती। अब एक पिता की तरह उनकी सेवा इतना सालों तक की है। अब वे मुझे छोड़ते ही नहीं। खासकर उस घटना के बाद। "
रूना ने कुरेदना ठीक नहीं समझा। फिर भी बोली -" उस हैवान को जेल भेजा कि नहीं। "
"अब क्या करूँगी उनको जेल भेजकर। मेरा गया तो लौटेगा नहीं। माफ कर दिया उनको। आखिर मेरे पिता हैं। उनको जो करना था वो कर चुके। ये तो अपने -अपने कर्म हैं। जो जैसा करेगा, वो वैसा भरेगा। यहाँ तो नहीं लेकिन‌ वहाँ भगवान् इंसाफ करेंगें। "
कहते- कहते, मँजू की आँखों से मोतियों की लड़ियाँ बहने लगीं।
" तू तो बड़ी महान है री। कोई पुन्नी आत्मा है री किसी जन्म की। "
"आखिरी बार मिली उस हैवान से। "
"मैं उसका चेहारा भी नहीं देखना चाहती। "
रूना की रूलाई फूट गई एक बेटी अपने पिता के बारे मे ऐसा कह रही थी।
"ठहर तेरे दो सौ रूपये पड़े हैं। आई है तो लेती जा अपने पैसे। "
"रहने दो दीदी बच्चों को मिठाई खिला देना। मैं जल्दी में हूँ। फ्लाईट छूट जाएगी। वैसे भी लंदन में रूपया नहीं चलता है। कभी वापस आई तो ले लूँगीं। "
रूना पैसे लेने अँदर चली गई। पैसे लेकर आई तो मँजू जा चुकी थी।
रूना के मुँह से निकला -" जुग जुग जियो बेटी। खुश रहो जहाँ भी रहो! "

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