गीत और गोंद वाला गुरुदेव : किरण विश्नोई
Geet Aur Gond Wala Gurudev : Kiran Vishnoi
गीत पाँचवीं कक्षा की, एक तेज-तर्रार और थोड़ी शरारती लड़की थी।
उसका सिद्धांत था—
“दुनिया में दो ही लोग मज़े में रहते हैं — एक बच्चे और दूसरे वो लोग जो बच्चों जैसा सोचते हैं।”
इसीलिए वह हर बात में बच्चों की मन:स्थिति समझ लेती थी।
लेकिन स्कूल वाले उसे “ज्यादा दिमाग लगाती है” वाली कैटेगरी में डाल चुके थे।
एक दिन स्कूल में अचानक अफरा-तफरी मच गई—
किसी ने क्लास टीचर की मेज़ पर गोंद से ‘WELCOME’ लिख दिया था!
टीचर नाराज़:
“क्लास में कौन शरारत कर रहा है?”
सारे बच्चे डर के मारे चुप।
पर गीत का दिमाग तुरंत घूम गया—
“टीचर जी, जो भी करेगा, उसके हाथ पर गोंद ज़रूर लगी होगी!”
बच्चे हँस पड़े।
टीचर ने शक की निगाह से सबके हाथ देखे।
अचानक पता चला—गोंद किसी के हाथ पर नहीं, बल्कि एक बच्चे कान्हा के जूतों पर लगी थी।
कान्हा घबरा गया, रोने ही वाला था।
गीत बोली—“मैडम, कान्हा ने शरारत नहीं की होगी… वो तो नये जूते पहनकर आया है, गोंद शायद मार्केट तक से लगी होगी।”
टीचर ने पूछा—“तुम्हें कैसे पता?”
गीत हँसकर:
“मैडम, अगर बच्चा शरारत करता तो जूते नहीं, हाथ गंदे होते!”
बच्चे ठहाका लगाने लगे।
अगले दिन बात सामने आई कि “WELCOME” तो सफाई वाले हरिया ने मज़ाक में लिखा था ताकि बच्चे खुश हों।
हरिया बोला—
“मैंने सोचा इन बच्चों को हँसी आएगी… पर गलती से मैडम आ गईं।”
गीत ने वहीं सीख दी—
“जिसके इरादे ठीक हों, उसकी गलती भी बुरी नहीं लगती। और जिसे ठुकराया जाए, वह बच्चा क्या, बड़ा भी डर जाता है।”
टीचर चुप रह गईं।
क्लास में एक और बच्चा था—अभि।
वह हर सवाल पर “मैं नहीं जानता” कह देता था।
सब उसे “Slow Motion” बुलाते।
गीत ने नोटिस किया कि अभि की कॉपी के पन्नों पर छोटे-छोटे पर्वत, पेड़, सूरज बने रहते।
वह बोली—
“टीचर जी, ये पढ़ाई में कमजोर नहीं, बस इसकी Creativity मजबूत है।”
टीचर ने पहली बार अभि की ड्राइंग देखी।
अगले दिन अभि को स्कूल की आर्ट टीम में ले लिया गया।
और देखते-देखते वही बच्चा सर्कल बनाकर पहाड़ बना देता और पूरे स्कूल को वाह! करवा देता था।
गीत हंसकर बोली—
“हर बच्चा अलग किताब है, बस सही पन्ना खोलना आना चाहिए।”
घर पर गीत का छोटा भाई रोहन रोज़ जूतियाँ उल्टी-सुल्टी पहन लेता।
मम्मी रोज़ डांटती—
“कितनी बार कहा है सही पैर में सही जूता!”
गीत ने रोहन को समझाने का नया तरीका निकाला।
वह दोनों जूतों पर फेविकोल से छोटी-छोटी स्माइली चिपका देती—
एक पर ‘LEFT’ की जीभ निकालती मुस्कान, दूसरे पर ‘RIGHT’ की शर्माती मुस्कान।
रोहन हँसकर जूते पहनता। आज तक उसने गलत नहीं पहना।
गीत बोली—
“डाँट से डर बस बढ़ता है, खेल से सीख पक्की होती है।”
स्कूल में “अच्छे व्यवहार और रचनात्मक सोच” पर स्पीच प्रतियोगिता थी।
गीत मंच पर आई।
उसने कहा—
“बच्चे फूल नहीं हैं जिन्हें एक जैसा खिलाया जाए।
वे तो रंगीन पतंगें हैं,
हर एक की उड़ान अलग होती है।
हम उन्हें डाँटकर नहीं,
समझकर उड़ना सिखाते हैं।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
टीचर भी शर्माते हुए बोलीं—
“गीत, आज तुमने हम बड़ों को भी बच्चा बनकर सोचना सीखा दिया।”
गीत फिर अपनी स्टाइल में मुस्कुराई—
“मैडम, जब बड़े बच्चे बन जाते हैं, तभी बच्चें बड़े बन पाते हैं।
हर बच्चा अलग तरीके से सीखता है—उसे तुलना से नहीं, समझ से बढ़ावा मिलता है।
डाँट डर बनाती है, खेल सीख बनाता है।
बच्चों पर निर्णय से पहले उनके मन को पढ़ना ज़रूरी है।
रचनात्मकता को दोष नहीं, दिशा चाहिए।
पूरा सदन गीत की बुद्धिमता पर तालियां बजा रहा था l