गाँव का खंडहर सामुदायिक भवन (व्यंग्य रचना) : डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’

Gaanv Ka Khandhar Samudayik Bhawan (Hindi Satire) : Dr. Mukesh Garg Aseemit

हे पथिक, ज़रा ठहर!

हाँ, तू ही… वही जो इस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर अपनी रीढ़ को हिलाता-डुलाता जा रहा है। सड़क पर तेरा ध्यान है, पर मेरे पर कोई नज़र नहीं—मैं, गाँव का सामुदायिक भवन, जो अब सामुदायिक कम और समस्याओं का भंडार ज़्यादा बन चुका हूँ।

तेरी गलती नहीं, मुझे भवन कहने का साहस तो मेरे निर्माता तक नहीं कर पाए—दीवारें ऐसी कि कुत्ता भी सहारा लेकर अपने अतिआवश्यक कर्म करना चाहे तो डरे , छत ऐसी कि सूरज भी लाज से मुँह फेर ले। पेंट? अरे मित्र , इतना उखड़ा हुआ कि लगता है जैसे बरसों पहले किसी चित्रकार ने अपनी असफल पेंटिंग यहाँ धोकर सूखने डाल दी हो।

अभी दस साल पहले ही तो पैदा हुआ था मैं—एकदम सरकारी गर्भ से। गाँव के प्रधान ने अपने मुंहबोले भाई को ठेका दिया, कमीशन की चटनी बनाई, इंजीनियर के गाल पर घी लगाया और देखते-देखते मैं खड़ा हो गया—दूसरे दर्जे की ईंट, तीसरे दर्जे का पेंट और चौथे दर्जे की नीयत लेकर।

उद्घाटन वाले दिन ही मेरी एक दीवार भरभराकर गिर पड़ी थी। मंत्री जी फीता काटने आए थे, खुद घबराकर कट लिए । सरपंच जी ने उसी दिन मुझे लतियाकर कहा—“शर्म नहीं आती, एक दिन भी इज़्ज़त नहीं रख सकते!”

बदन मेरा टूटा था, गुस्सा मजदूर पर निकाला। ठेकेदार महाराज आराम से पान चबाते रहे और वो मजदूर जिसकी मजदूरी से बीड़ी-चाय तक काटी जाती थी, वो बेचारा मेरे मलबे की तरह किनारे पड़ा सुनता रहा।

मौत का एक दिन मयस्सर नहीं होता ,वह तो उसी दिन से शुरू हो जाती है जिस दिन जीवन जन्म लेता है —मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ -फ़ाइलों में हर साल दो बार मरम्मत, हकीकत में हर महीने दो ईंटें कम होती गयी ।

बारिश में मेरी छत छलनी हो जाती, पर बच्चे इसे “सस्ता वाटर पार्क” समझकर भीतर खेलकूद करते।

मेरी खिड़कियाँ, नल, सांकल, रेलिंग… गाँव के नशेबाज़ों के लिए ‘स्टार्टअप कैपिटल’ बन गईं। कोई भी उठाकर कबाड़ी को बेच आता।

बिजली बचत अभियान के तहत मेरे एकमात्र पंखे और बल्ब भी सरपंच जी के घर शिफ्ट कर दिए गए। और मीटर? किसी नशेड़ी ने भांग में उड़ा दिया—अब मैं बिजली का बिल भी पैदा नहीं करता, बस अंधेरा मेरी नियति ।

एक बार नसबंदी शिविर लगाने का प्रस्ताव आया था, पर पीएचसी के बाबू ने सोचा—“ये खंडहर? मरीज भाग जाएँगे!”

आँगनबाड़ी वाली ने भी मुझे दूध, पाउडर, गोली जैसा ज़िम्मेदार काम न दिया—वो सब उसके घर में सुरक्षित सड़ते रहे।

पर गाँव में अवैध रूप से अंकुरित प्रेम कहानियों को मुझ पर अंधा भरोसा था —गाँव के प्रेमियों का मैं मुख्यालय बन गया। यहाँ इश्क़ की शुरुआत होती, कभी-कभी चप्पलों की बरसात में इसका दुखांत भी।

शाम होते-होते चार नशेड़ी ‘आत्माएँ’ मेरे आहाते में जमा हो जातीं—दारू की खाली बोतलें और पाउच मुझे रिटर्न गिफ्ट देकर जातीं। गाँव की कबाड़ी वाली का धंधा तो मैं चलाता हूँ, ये तो तय है।

मेरी दीवारों पर पिकासो की आत्मा उतर आयी है —जर्दा-पीक की ऐसी छींटाकशी कि कोई इसे “गाँव का ग्रैफिती आर्ट” समझ ले। प्रेमी जोड़ों की शायरियाँ—“लव यू जान प्रीतो”, “खून से लिखता हूँ”—ने मुझे गाँव का शायराना खंडहर बना दिया है।

एक बार बैंडवाले भी शरण लेने आ गए थे—दरअसल गाँव वालों ने बीच गाँव में उनकी बैंड बजा दी , तो मैंने एक माह तक उनकी कान-फोड़ू रिहर्सल झेली। दीवारें अब भी हिलती हैं उस सदमे से।

बुढ़िया बतासो ने मेरे बारे में अफवाह फैलाई कि मैं भूतों का घर हूँ—सरपंच के खानदान का कोई पूर्वज रात में टहलता है यहाँ। बच्चे डरते कम, उम्मीद से ज़्यादा आते हैं—भूत दिखे तो सेल्फी लेकर रील बना लें!

फिर भी मैं इतना निठल्ला भी नहीं जैसे किसी घर का बुजुर्ग l लघु शंका के लिए मैं हमेशा हाज़िर हूँ। पहले दीवार पर लिखा था—“यहाँ अवश्य मूत्रदान करें।” तब कोई नहीं आता था। किसी रचनात्मक दिमाग़ ने ‘अवश्य’ काटकर ‘न’ जोड़ दिया—और तब से दीवार दिन में बीस बार तरबतर होती है। कम से कम कुछ ठंडी छींटें मेरी गर्म देह को राहत देती हैं।

दीर्घ शंका के लिए वाशरूम भी है, बस किवाड़ नहीं, नल नहीं, पानी नहीं—हाँ, दारू की बोतल है, उसमें भरकर काम चला ले।

टंकी का क्या? वो तो आंधी में उखड़कर सीधे सरपंच के आँगन में गिरी—उन्होंने उसे “ईश्वरीय संकेत” मानकर घर में ही फिट करवा लिया।

सुना है खंडहर अब हेरीटेज कहलाते हैं—मैं भी गाँव की विरासत बनना चाहता हूँ।

ढहने में तो महारत हासिल है, बस कोई सुन ले तो शायद मेरा उद्धार भी नालंदा-सा हो जाए।

और पथिक…
अब तू जा सकता है।
पर जाते-जाते सुन ले—

इस टूटे चबूतरे पर कई सपनों ने दम तोड़ा होगा,
इस खिड़की के आगे कितने ही ख्वाब बोझ से झुके होंगे।

इन जर्जर दीवारों में भी किसी का एक छोटा-सा शहर बसता है— और मैं… वही शहर, बस आख़िरी साँसों पर टिका।

हे पथिक, ज़रा ठहर… कभी लौटकर भी आना!

  • मुख्य पृष्ठ : डॉ. मुकेश गर्ग ‘असीमित’ की गद्य कृतियां
  • मुख्य पृष्ठ : संपूर्ण हिंदी कहानियां, नाटक, उपन्यास और अन्य गद्य कृतियां