फ़िरकापरस्ती (कहानी) : अनवर सुहैल

Firkaprasti (Story in Hindi) : Anwar Suhail

गुल्लू भाई किचन के बाहर पिछवाड़े आंगन में जाकर बीड़ी फूंक रहे थे। अपनी बांस-बल्ली की तरह सूखी बदरंग पिंडलियों को खबर-खबर खजुआते चंदू हरवाह ने पूछा। “का देर है अब्ब?” गुल्लू भाई ने गहरा सांस भरकर बताया-- “और तो सब तैयार है, बस हुकुम हो तो पूड़ियां तल कर गरमा-गरम परोस दी जाएं।“

समय काफी होता जा रहा है। मौसम बड़ा गुमसुम सा है। बहुत अजीब लग रहा है। आशंकाओं से मन बिलबिला रहा है। पता नहीं क्या हो गया है मेहमानों को जो कि अपनी खुसपुसाहटों से मुक्ति नहीं पा रहे हैं। जाने क्या मसला आ फंसा है? लगभग तय ही तो था कि छेकौवा की सिर्फ रस्म होगी और यदि मन बन गया तो दिन-तारीख की धराई भी हो जायेगी।

सूरज अब ढलान पर जाना चाहता है। दो के ऊपर बज रहे होंगे। बाप रे बाप! पता नहीं क्या खिचड़ी पक रही है। जो इन लोगों के बीच रज़ामंदी के आसार नज़र नहीं आते।

सुबह सात बजे से मेहमानों का इंतेज़ार करते-करते करीब ग्यारह बजे बोलेरो गाड़ी से वे लोग पहुंचे थे।

सवा सौ किलोमीटर दूर विश्रामपुर से सफ़र तय करके आए हैं भाई लोग, सो थकावट तो होगी ही। दिक्कत ये है कि गाँव की बनावट कुछ ऐसी है कि बराहीम’चा के घर तक दुपहिया गाड़ियां ही आ पाती हैं। सड़क से हटकर पीपल के पेड़ के नीचे चौरस जगह है, उसके आगे संकरी गली है, सो बोलेरो को उन लोगों ने पीपल की छांह तले खड़ा कर दिया था।

पैदल आए थे सब दरवाज़े तक।

आगे-आगे तीन दढ़ियल आए, जिनमें एक बुजुर्ग और दो अधेड़ थे। सूरत- शकल से खांटी देहाती मुसलमान। बुजुर्ग तो ठीक किन्तु अधेड़ दोनों शक्ल से खुराफ़ाती नज़र आ रहे थे। एक नंबर के जड़ या कहें कि दकियानूस से दिखलाई देते थे। उनके पीछे दो अधेड़ बिना दाढ़ी वाले, फिर तीन नौजवान और फिर सबसे पीछे दो बुर्केवालियां। यानी कुल दस लोग।

बुजुर्ग लड़के के दादा हैं।
एक अधेड़ लड़के का बाप और दूसरा चाचा।
बिना दाढ़ी वाले दोनों अधेड़ लड़के के मामा हैं।
तीन नौजवानों में दो लड़के छोटे भाई थे और तीसरा लड़के का हिन्दू दोस्त, रवि।
यही नाम था उसका।

गुल्लू भाई को उसी के लिए आलू का चोखा तैयार करने का आदेश मिला था।

बुर्केवालियों में एक लड़के की मां और दूजी खाला है।

यानी टीम इस स्तर की थी कि किसी तरह के निर्णय के लिए उन्हें कहीं और से राय - मशविरा का बहाना बनाने की ज़रूरत नहीं थी। जो भी निर्णय होना है उसके लिए ये लोग पर्याप्त हैं।

मर्दों का ईस्तेकबाल बराहीम’चा और इरफ़ान मास्साब ने तथा औरतों का चच्ची ने किया। बराहीम’चा की सेहत अक्सर खराब ही रहती है, सो वह मेहमानों से अलैक-सलैक करके अपने हुजरे में जा घुसे। वैसे भी उन्हें दुनियादारी से कम ही वास्ता रहता है। हां, गुल्लू भाई ने सोचा ज़रूर कि ऐसे अवसर पर नात-हित को याद करना चाहिए। हो सकता है कि रिश्तेदारी मे एक लड़की दूसरे ज़ात के लड़के के साथ भाग गई है, सो चच्ची न चाहती हों कि कोई हील-हुज्जत हो। वैसे भी समाज मे खेल बिगाड़कर मज़ा लेने वालों की कमी कहां है?

मेहमानों की संख्या देख गुल्लू भाई ने चैन की सांस ली थी। अनुमान के अनुसार ही लोग आए थे।

वैसे बराहीम’चा और चच्ची ने ख़ातिर-तवज्जो के लिए कोई क़सर न रख छोड़ी थी। इरफ़ान मास्साब भी कई दिनों से इस आयोजन की सफलता के लिए दौड़-धूप कर रहे थे।

प्रोग्राम के मुताबिक मेहमानों को आंगन मे गुलाब की बगिया के पास ले जाया गया, जहां पानी की टंकी और सेप्टिक-टैंक वाला बाथरूम है। ताज़ादम होने के बाद मेहमानों को बड़े कमरे में लाकर बिठाया गया।

औरतों का सारा इंतेज़ाम अंदर ही था।

नाश्ते की प्लेट पहले ही तैयार कर ली गई थी। थाल में सजाकर सभी को नाश्ता और ठंडा पेश किया गया।

एक छोटी प्लेट में पान की गिलौरियां, तम्बाखू,ज़र्दा, सौंफ-सुपारी, लौंग-इलाईची और सिगरेट का पैकेट रखा हुआ था।

मेहमान शायद भूखे थे सो नाश्ता मिलते ही वे टूट पड़े।

गुल्लू भाई जनाना-मर्दाना दोनों मुहल्लों में दख़ल रखते हैं। चच्ची को पुकारते गुल्लू भाई जनानखाने में जा घुसे।

चच्ची ने उन्हें बुलवाया था।

गुल्लू भाई को देख बुर्केवालियों ने चेहरे पर नकाब डालना चाहा तो चच्ची उन लोगों से बोलीं --
-“अपना खानसामा है गुल्लू भाई, इरफ़ान के अब्बा के दोस्त का लड़का।”

गुल्लू भाई ने उन औरतों को सलाम किया और वहीं दरी पर बैठ गए। लड़के की मां ने सलमा बिटिया को पहले ही देख लिया था, किन्तु उनकी बहिन यानी लड़के की खाला पहली बार यहां आई थीं। औरतों की तरफ से लगभग बात फ़ाईनल थी। देखिए, मर्द क्या निर्णय लेते हैं। वैसे वे लोग तो सगाई की तैयारी के साथ आए हैं।

चच्ची मेहमान औरतों की ख़िदमत में बिछी हुई थीं।

अनुमान ये किया गया था कि पहले सगाई की रस्म हो जाए, उसके बाद साथ मिलकर दावत का लुत्फ़ उठाया जाए।

चच्ची ने गुल्लू भाई से पूछा---"तुम्हारी तैयारी पूरी हो चुकी है न?”

गुल्लू भाई ने ईत्मीनान से सिर हिलाया और उनका ज़ेहन रसोई के तैयार खाने की तरफ चला गया।

ख़स्सी का शोरबेदार गोश्त, टिकिया कबाब, मछली के तले टुकड़े, अंडा-करी, दालचा, पुलाव, पूड़ी, रायता, पापड़, सलाद और अचार। इतनी भरपूर तैयारी के लिए ही बराहीम'चा और चच्ची ने गुल्लू भाई को याद किया था।

गुल्लू भाई यानी गुलाम रसूल खानसामा के हाथ में जादू है। ऐसा खाना तैयार करते कि लोग अहा, सुभानल्लाह, माशा-अल्लाह कहते नहीं थकते।

जब दोपहर के डेढ़ बजे तो गुल्लू भाई चिंतित हो उठे।

खाने का कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं कर रहा था। उन्होंने बीड़ी सुलगाई और फूंक मारते हुए सोचने लगे कि सगाई-शादी का मामला ज़रा पेचीदा होता है। सम्बंध बनाने से पूर्व दोनों पक्ष एक-दूसरे के बारे में अच्छी तरह पड़ताल करते हैं। भले ही शादी के बाद या निकाह के दौरान दोनों पार्टियों में सर-फुटौवल क्यों न हो जाए!

अब सलमा बिटिया काफी पढ़ी-लिखी है। बीएससी पास है। अगर वह किसी दूसरे घर में पैदा हुई होती तो ज़रूर वहां आगे पढ़ाई ज़ारी रखी जाती और खूब पढ़-लिख कर सलमा किसी अच्छी जगह नौकरी कर रही होती। चच्ची की ज़िद के कारण तो सलमा आगे न पढ़ पाई। इरफ़ान मास्साब ने भी अपने तर्इं काफी कोशिशें कीं। चच्ची के आगे उनकी भी दाल न गली।

अपने समाज में लड़कियों की पढ़ाई पर लोग कहां ध्यान देते हैं। लड़की को घूरते रहेंगे स्त्री-पुरुष कि कहीं बदनामी न हो जाए इससे पूर्व लड़की को ससुराल भेज दिया जाए।

गुल्लू भाई सोच रहे थे कि वो जो सलमा बिटिया की सहेली है न वो दांत वाले डॉक्टर की बेटी, सुना है कि बिलासपुर में जाकर आगे की पढ़ाई पढ़ रही थी, आजकल तहसीलदार बन गई है।
हमारे समाज में कहाँ इतना सब्र, कहाँ इतनी अक्कल!

चंदू हरवाह सुबह से खट रहा था। अब उसके पेट में चूहे नाचने लगे तो उसने खिसियाकर गुल्लू भाई से कहा---“हम्में खाना मिल जा, तो कहीं छिप-छिपाकर खा लें। अब भूख बर्दास्त नहीं होती।"

तभी इरफ़ान मास्साब आ गए।

नाटे क़द के अध्यापक इरफ़ान मास्साब काफ़ी व्यवहारिक युवक हैं। मौजूदा दौर के मुताबिक एकदम चालू पुर्जा, लेकिन उनके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं।

गुल्लू भाई ने उनकी तरफ़ सवालिया निगाह डाली।

इरफ़ान मास्साब ने गुल्लू भाई से पूछा---“ अपने डॉक्टर क़ादरी का घर कहां है?”

गुल्लू भाई अचकचाए कि डॉक्टर क़ादरी के घर के बारे में इरफ़ान मास्साब काहे सवाल पूछ रहे हैं, पूछा---"सब ख़ैरियत तो है न?”

इरफ़ान मास्साब बेहद हड़बड़ाए हुए थे---“अरे गुल्लू भाई, जब हम लड़का देखने गए थे तो वहां इस तरह की कोई बात न थी और यहां आकर ये लोग सुन्नी-वहाबी, अकीदा-बदअकीदा का राग अलाप रहे हैं। अपने सुन्नी जमात की मस्जिद के सदर डॉक्टर क़ादरी को ये लोग जानते हैं। सो तस्दीक के लिए उन्हें बुलाना चाहता हूं। आगे अल्लाह की मर्ज़ी"

गुल्लू भाई का माथा ठनका।

दाढ़ीदार और बेदाढ़ीदार मेहमानों के रंग-रूप देख उन्हें शक हुआ था कि ये लोग इतने सरल नहीं हैं, जितने कि दिखलाई पड़ते हैं। देहाती लोग तो और बदमाश होते हैं। किसी रुके हुए पानी के तालाब जैसे गंदे और बदबूदार।।।

गुल्लू भाई ने इरफ़ान मास्साब को डॉक्टर क़ादरी के घर का पता बताया।

फिर पूछा--"तब खाना कब तक होगा?”

इरफ़ान मास्साब ने माकूल जवाब न दिया—“छान-बीन में मुतमईन होने के बाद ही वे लोग खाना खाएंगे। देखो क्या होता है, अभी तो मसला अटका हुआ है।“

इरफ़ान मास्साब झटके से बाहर निकल गए।

गुल्लू भाई ने चंदू हरवाह को चुपचाप एक थाली में खाना निकाल कर दिया और अंदर आंगन में जा पहुंचे। देखा, बड़े कमरे में खुसुर-पुसुर हो रही है। अंदर जनानखाने में औरतें मुंह बनाए बैठी हैं और चच्ची के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही हैं।

चच्ची आंचल सर पर रखे उसकी तरफ आर्इं।
गुल्लू भाई ने उनकी तरफ देखा।

चच्ची के चेहरे पर गुस्से का भाव आया और आंखें नम हो गर्इं कि जैसे अब बूँदें टपक जाएँ। चच्ची ने गुल्लू भाई को पीछे रसोई की तरफ चलने को कहा।

एकांत में उन्होंने गुल्लू भाई से कहा---“देखा, जईसन अल्ला-रसूल की मरजी हो। विसरामपुर में तो अइसन कउनो बात नहीं उठे रहीस। पहिले खबर कर दिए रहते कि ये लीला करेंगे तो इनको घर में काहे घुसने देते। अरे पढ़ी-लिखी लड़की, नमाज़-रोज़ा की पाबंद लड़की है अपनी सलमा। दान-दहेज भी कम नहीं दे रहे, फिर ई नवा मसला कहां आ गवा कि हम लोग वहाबी हैं। का हो गुल्लू भाई, हम लोग वहाबी लगते हैं?”

गुल्लू भाई सुन्नी-वहाबी मसले की पेचीदगी जानते थे, सो वह क्या जवाब देते। जब तक बरेलवी मौलानाओं के पैमाना पर खरा न उतरे कोई मुसलमान खुद को सुन्नी कह ही नहीं सकता।

चच्ची कहे जा रही थीं---“आज कोतमा बाजार है, मुहल्ले के लोग तो दुकान लगाए जा चुके होईहें। बची होंगी घर की मेहररूएं। अईसन करा कि गुल्लू भाई, तनि धुनियन के हियां जाके देखा तो सही कि इसमाईल भाई मिल जाएं। उन्हें संग लेते चले अईहा। बता दिहा कि इरफ़ान के अब्बा के घर सुन्नी-वहाबी वाले मसला उलझिस है। चच्ची आपको तसदीक खातिर बुलवाईन हैं।“

घर में सुबह से खुशी का माहौल था, जो अब तनाव और आशंका के भंवर में डूब-उतरा रहा है।

गुल्लू भाई जानते हैं कि बराहीम 'चा का परिवार वहाबी नहीं है। जहां तक देवबंदी होने का आरोप है तो इस आरोप में कोई दम नहीं। इतना फ़ातिहा-दरूद तो बरेलवी लोग भी अपने घरों में नहीं करते होंगे।

बराहीम'चा की सुन्नियत पर सवाल खडा करने बेमानी है। जाने कब से बराहीम'चा के घर में ग्यारहवी- शरीफ़ के मौके़ पर महफ़िले-मीलाद के साथ आम-दावत का इंतेज़ाम हर साल किया जाता है। चच्ची चांद की हर ग्यारहवीं तारीख़ को बड़े पीर साहब के नाम से फ़ातिहा पढ़वाती हैं। चच्चा भी बरेलवी अक़ीदे वालों की मस्जिद में नमाज़ अदा करने जाते हैं। हां, दादाजान ज़रूर देवबंदी लोगों की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते थे लेकिन देवबंदी भी तो मुसलमान हैं। उन्हें खामखां वहाबी कहकर पुकारते हैं अपने को खांटी सुन्नी कहने वाले मुसलमान।

गुल्लू भाई गम्भीरता से सोच रहे थे कि इन बरेलवी मौलानाओं को किसने अधिकार दे दिया कि वे जिसे चाहें वहाबी-देवबंदी घोषित करके उसका हुक्का-पानी बंद कर दें।

गुल्लू भाई रसोई छोड़कर आंगन में आए।

देखा दोनों नौजवान मेहमान दीवार से सटे, गुटके का पाउच अपने खुले मुंह में डाल रहे हैं। अंदर बैठकी में बुज़ुर्गों की भुनुर-भुनुर की आवाज़ों से असंतोष का बोध हो रहा है।

तभी इरफ़ान मास्साब अपने साथ डॉक्टर क़ादरी को ले आए। छोटे से क़स्बे में कहां एमबीबीएस वाले ओरिजिनल डॉक्टर मिलें। यहां तो बीएएमएस, यूनानी, आयुर्वेदिक और शर्तिया ईलाज वाले चांदसी नीम-हकीमों का बोलबाला है। उनकी समाज में अच्छी पकड़ है। समाज में लोगों की आर्थिक स्थिति लचर-पचार होने के कारण इन नकली पेशेवरों की स्थानीय राजनीति एवम् धार्मिक संस्थाओं में काफी दख़ल है।

डॉक्टर क़ादरी कलकत्ता से जाने कौन सी डाक्टरी पढ़ कर इस छोटे से क़स्बे में अपनी आजीविका चला रहे हैं। खपरैल की छत और मिट्टी की दीवाल वाली एक कोठरी में उनका क्लीनिक है। ‘जनता-क्लीनिक’। कोठरी के बाहर हरे रंग का पर्दा लटकता रहता है। साध्य- असाध्य तमाम रोगों का ईलाज डॉक्टर क़ादरी करते हैं। ज़रूरत पड़ने पर झाड़-फूंक भी कर लिया करते हैं।
यानी रोग और रोगी जिससे मान जाए, हर सम्भव प्रयास करते हैं।

वैसे वह रिफरल डॉक्टर ही हैं, कोई मर्ज़ उनके बूते के बाहर का हुआ तो पास के कस्बे के डॉक्टर अग्रवाल को रिफर कर देते हैं। इस रिफरल के लिए वहां से कमीशन मिल जाता है।

डॉक्टर क़ादरी गढ़वा-पलामू के रहने वाले हैं। खांटी टकाटक सुन्नी मुसलमान। अपने को सुन्नियत का आईना बताते हैं। बेहद तराशी हुई खसखसी दाढ़ी, बीच में मांग, बालों में लगाईं गई मेंहदी के कारण ललछौंहे बाल और लम्बी नाक वाला गंदुमी चेहरा। डॉक्टर क़ादरी स्थानीय मदीना- मस्जिद के सेक्रेटरी हैं। जहां मदरसा-क़ादरिया चलाया जाता है।

इस नगर में एक और मदरसा पहले से है। नगर की सबसे पुरानी जामा मस्जिद के प्रबंधन के साथ यह मदरसा और एक यतीमखाना भी यहाँ है। इस जामा मस्जिद में संयोग से दारुल उलूम देवबंद से शिक्षित मौलाना और ईमाम हुआ करते हैं । आज़ादी से पूर्व यह मस्जिद कच्चे मकान में चालू हुई थी। फिर यू पी, बिहार से आये मुसलमानों ने छोटे छोटे काम धंधे से थोडा-थोडा चंदा इकठ्ठा करके इस मस्जिद के लिए धनराशी जोड़ी। कच्छ से आये धनाड्य गुजराती मुसलमान बिना संतान के मर गए। उन्होंने अपनी ज़मीनें स्थानीय अंजुमन कमिटी को वक्फ कर दी। इस तरह उस ज़मीन पर एक भव्य मस्जिद निर्माण का संकल्प लिया गया और एक रोज़ वह भव्य मस्जिद और यतीमखाना बन कर तैयार भी हुआ।

नगर की आबादी बढ़ने लगी। मुख्य बाज़ार क्षेत्र की मस्जिद से दूर दराज़ के मुसलमानों को आने में दिक्कतें होने लगीं। इसके साथ एक और फितना नगर में ज़ोर पकड़ने लगा कि मुख्य जामा मस्जिद वहाबियों के चंगुल में फंस गई है और यदि मुसलमानों को अपना ईमान और अकीदा बचाए रखना है तो अपनी एक अलग से मस्जिद बनाई जाए।

इस इरादे से अमूमन रेलवे के कर्मचारी, धुनिया, टायर पंचर वाले मुसलमान और दर्जी, पेंटर आदि लोग जामा मस्जिद से हट गए और एक छोटी सी मस्जिद में झारखण्ड से आये बरेलवी अकीदे वाले मौलवियों के साथ अलग नमाज़ अदा करने लगे।

हर जुमा की नमाज़ अदा करने आए नमाज़ियों से ज्यादा से ज्यादा इमदाद की अपील मौलाना करते हैं। इस नश्वर संसार मे दान की गई छोटी सी राषि के बदले जन्नत में खूबसूरत महल का प्रलोभन होता है। ग़रीब मुसलमान पेट काटकर इस दान-यज्ञ में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

डॉक्टर क़ादरी के आने से चच्ची को कुछ सुकून मिला।

गुल्लू भाई ने डॉक्टर क़ादरी को सलाम किया और धुनिया टोला के लि, निकल पड़े।

साईकिल में हवा कम थी, फिर भी मौक़े की नज़ाक़त देख गुल्लू भाई ने हवा की परवाह न की। जल्द ही वह धुनिया टोला जा पहुंचे। इसमाईल भाई घर पर नहीं थे। उनकी रजाई गद्दे की दुकान चौक पर है।

मरता क्या न करता, गुल्लू भाई साईकिल को बेरहमी से घसीटते हुए चौक पहुंचे। इसमाईल भाई दुकान पर ही मिल गए।

चौखाने वाली तहमद और आसमानी कमीज़ पर टोपी खपका, बकरा-दाढ़ी के इंसान इसमाईल भाई दुकान की तख्त पर विराजमान थे।

गुल्लू भाई ने उन्हे सलाम कर बराहीम'चा के घर के हालात से आगाह किया। इसमाईल भाई तत्काल उठ खड़े हुए---“ मियां गुल्लू इस क़स्बे में कौन सुन्नी है कौन वहाबी, ये बताना ज़रा मुश्किल है। इरफ़ान के अब्बा का पता नहीं लेकिन हां, ये सच है कि इरफ़ान मास्साब ज़रूर सुन्नियों में उठते-बैठते हैं।“

वापसी में गुल्लू भाई जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाने लगे।

लेकिन इसमाईल भाई उतना तेज़ नहीं चल पा रहे थे। उन्होंने राह चलते एक क़िस्सा छेड़ दिया-
-- “जानते हो गुल्लू भाई, इसी मसले पर मेरे बड़े भाई ने अपनी बीवी को तलाक दे दिया था। साले वहाबी हमें धोखे में डालकर उसका निकाह किए थे। ये देवबंदी वहाबी बड़े शातिर और बदअक़ीदा होते हैं। इनके नमाज़, रोज़ा और तस्बीहात के कारण कोई भी आसानी से इनके जाल में फंस सकता है। इनके दिल में मेरे मौला व आक़ा, सरकारे दो आलम रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिए कोई मुहब्बत नहीं होती। ये पैग़म्बरे-ईस्लाम को अपना बड़ा भाई मानते हैं और हमारी-तुम्हारी तरह का एक इंसान समझते हैं।“

गुल्लू भाई से न रहा गया—“ लेकिन भाईजान, दरूद- शरीफ़ तो ये लोग भी पढ़ते हैं। मीलाद वगैरा भी करवाते हैं। अजमेर- शरीफ़ जाते हैं। फिर उन पर लानत-मलामत क्यों किया जाता है?”

इसमाईल भाई भड़क उठे---“ धोखा देते हैं ये लोग, मेरे पैगम्बर हुजूर रसूल पाक के दुश्मन हैं ये देवबंदी, समझे। इनके साथ नर्मियत के साथ पेश न आया जाए और रोटी-बेटी के रिश्ते से यक़ीनन बचा जाए। इनके यहां का खाना हराम। इनके साथ उठना-बैठना हराम। ये अगर सलाम करें तो जवाब न दो। इसीलिए आजकल बिना सही तस्दीक के रिश्तेदारी नहीं करना चाहिए।"

इसमाईल भाई के मन में जाने कितना ग़लाज़त भरा था देवबंदियों के ख़िलाफ़।

गुल्लू भाई ने सोचा कि गै़र समझते हैं कि इन कटुअन में कितनी एकता होती है और यहां मुसलमान शिया-सुन्नी, सुन्नी-वहाबी, देवबंदी-बरेलवी, अशराफ़-पसमांदा, शेख़-सैयद, मुगल- पठान आदि कितने फ़िरके़ में बंटे हुए हैं। ये लोग एक दूसरे से बेइंतेहा नफ़रत करते हैं और मौक़ा पाएं तो जान के दुश्मन भी बन जाते हैं।

गुल्लू भाई को अपने ससुर के जीवन में गुज़रा हादसा याद हो आया।।।

पांच बरस पूर्व गुल्लू भाई की सास मरी थीं।

सास मरहूमा उनके ससुर की दूसरी बीवी थीं लेकिन अल्लाह उन्हें करवट-करवट जन्नत बख़्शे कि वह बहुत मुहब्बती थीं। वे मुस्लिम नहीं थीं, बल्कि आदिवासी थीं। निकाह के बाद से उन्होंने इस्लाम की मोटी-मोटी बातों पर पूरी श्रद्धा से अमल किया और जन्मना मुसलमानों से उनका अक़ीदा कहीं अच्छा था। रमजान के रोज़े रखतीं और मुहर्रम में मन्नती ताजिया रख्वातीं।

ससुर साहब सत्तर साल के थे। दरम्याना क़द-काठी, सामान्य स्वास्थ्य, मेहनती बदन उम्र के कारण कमर थोड़ा झुकी हुई, लेकिन आवाज़ में पुरानी खनक बरकरार। वह एक किसान थे। आंगन के बीच सास की लाश रखी थी।

एक कोने में अगरबत्ती और लोहबान जल रहा था, जिसके धुंए और खुशबू से माहौल गमगीन और रहस्यमय सा बन गया था। आसपास ग़मज़दा पड़ोसी बैठे बेआवाज़ बातें कर रहे थे। एक कोने में औरतें बैठ कर चने के दानों पर कलमा-तैयबा, दरूद शरीफ़ वग़ैरह पढ़ रही थीं। कुछ औरतें कलाम-पाक का पाठ कर रही थीं। साले साहब मिट्टी के इंतेज़ाम में मशगूल थे।

तभी नगर की जामा मस्जिद से वहां के मुखिया हाजी मजीद भाई आए। उनके साथ चंद मर्द और कुछ बुर्केवालियां थीं।

हाजी मजीद भाई का समाज में बड़ा रसूख था। नगर में उनकी कपड़े की दो दुकानें और एक दुकान हार्डवेयर की थी।

हाजी मजीद भाई अपनी छोटी सी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए गुल्लू भाई की सास की लाश के पास आए और उन्हें सलाम किया।

फिर उन्होंने फ़रमाया---"अल्लाह ने अपनी चीज़ वापस ले ली। ईमान की हालत में मरहूमा को अल्लाह ने अपने पास बुलाया ये कितनी अच्छी बात है। उसकी मर्जी के आगे इंसान कुछ नहीं कर सकता। कुरान-मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है 'कुल्लू नफ़सिन ज़ायकतुल मौत' यानी कि हर इंसान को मौत का स्वाद चखना है। सबका यही हश्र होना है। अल्लाह आपको ग़म सहने और सब्र करने की तौफ़ीक़ अता करे, आमीन!"

ससुर साहब चुप ही रहे।

वैसे हाजी मजीद भाई ससुर साहब के लंगोटिया यार थे। हां, उम्र के साथ इंसान में तब्दीलियां होती हैं। कोई पूरी तरह दुनियादार हो जाता है और कोई दीनदार और कई दोनों नाव में सफलतापूर्वक पांव जमाकर अपनी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। हाजी मजीद भाई ऐसे ही कारोबारी और दीनदार आदमी थे।

उन्हीं की संगत में आकर ससुर साहब देवबंदी लोगों की तब्लीग-जमात के साथ उठते-बैठते थे। पहले-पहल नगर में एक ही मस्जिद थी। जिसके इमाम देवबंद से तालीमयाफ्ता हुआ करते थे। इमाम साहब एक परहेज़गार आदमी थे। लोगों को अल्लाह की इबादत के लिए तैयार करते थे और अंधविश्वास से दूर रहने की नसीहतें किया करते थे।

कुछ अरसे बाद नगर में बरेलवी फ़िरके के मुसलमानों ने क़दम रखा। उनमें हकीम सिराज और घड़ीसाज़ क़ादिर प्रमुख थे। उन लोगों ने ये प्रचार करना शरू किया कि देवबंदी इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं, क्योंकि वह इमाम सुन्नी नहीं बल्कि वहाबी है। वहाबी लोग काफ़िरों से भी बदतर होते हैं। देवबंदियों के साथ मेल-जोल, खान-पान और रिश्तेदारी से ईमान जाता रहता है।

इस पैगाम का असर कुछ ऐसे मुसलमानों पर पड़ा जो अस्थाई कारोबारी और छोटी नौकरियों में थे, उन लोगों ने पुरानी मस्जिद के समानांतर एक नई मस्जिद तैयार करने का अहद किया। पहले वे हकीम सिराज के घर नमाज़ पढ़ते। फिर उनकी तादाद बढ़ने लगी। आपस में चंदा करके उन लोगों ने दूसरी मस्जिद बनाई। वहां साल में एक बार ईद-मीलादुन्नबी के मौके पर जलसे का आयोजन होता। बाहर से बरेलवी अक़ीदे के मौलाना और शायर बुलवाए जाते। गैरों से भी जलसे के लिए चंदा मांगा जाता।

कुछ सालों बाद किसी ने किसी मज़ार से एक र्इंट लाकर तालाब के किनारे वीराने में एक दरगाह बना दी।

पहले तो नगर-वासियों ने उधर ध्यान न दिया, लेकिन धीरे-धीरे मज़ार के आस-पास का इलाक़ा आबाद होने लगा।

हर जुमेरात को वहां झाड़-फूंक, फ़ातिहा-दरूद, भूत-प्रेत-जिन्न आदि से मुक्ति के कार्यक्रम बाक़ायदा होने लगे। साल में एक बार वहां उर्स होने लगा। जहां बाहर से क़व्वाल बुलाए जाने लगे।

नगर में अधकचरे लोगों के बीच आस्था और अध्यात्म का वह एक केंद्र बन गया।

इस नगर की एक विडम्बना और भी है।

गुल्लू भाई के चचेरे भाई बरकत मियां कसाई थे। नगर के पहले-पहल कसाई-चिकवा। बरकत भाई खुद को कुरैशी बताते थे। कुरैश यानी पैगम्बर साहब का अरब में इज्ज़तदार कबीला। नगर में हिन्दू-मुसलमान और सुन्नी-वहाबी प्रकरण के कारण उनका धंधा चौपट हुआ था।

हुआ ये कि जब केंद्र में मण्डल-कमण्डल का ज़ोर था। हिन्दूवादी संगठनों ने रामलला र्इंट पूजन यात्राएं निकालनी शुरू की थीं। बाबरी-मस्जिद को विवादास्पद-ढांचा का नाम मीडिया ने दे दिया था। देश के मुसलमानो की समझ में न आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है, क्योंकि वैसे भी जो जिन्दा मस्जिदें थीं वे सभी नमाज़ियों के नाम पर आंसू बहा रही थीं। फिर एक विवादास्पद मस्जिद के लिए कुछ लोग क्यों जी-जान से आंदोलन छेड़ रहे हैं?

इसी बीच नगर के मांसाहारी हिन्दुओं ने बैठक कर के ये निर्णय लिया कि हम यदि मांस-भक्षण करते ही हैं तो हमारी अपनी अलग दुकान होनी चाहिए। मुसलमान कसाईयों का बहिष्कार किया जाए। सोमारू लोहार ने "झटका' वाले मांस की एक दुकान डाल ली। राजू श्रीवास ने झटका चिकन की दूकान खोल ली।

इससे बरकत मियां कसाई की बिक्री प्रभावित हुई।
रही-सही कसर नगर के खांटी सुन्नियों ने पूरी कर दी।

बरकत मियां कसाई देवबंदी ख़्यालात के थे।

बरेलवी सुन्नी मौलानाओं ने फ़तवा दे दिया कि बरकत मियां की दुकान से सुन्नी भाई गोश्त न खरीदें। कारण कि बकरत मियां बदअक़ीदा हैं। उनके द्वारा जिबह किया गया बकरा सुन्नियों के लिए हराम है।

जब तक किसी सुन्नी कसाई की दुकान न खुल जाए, तब तक सुन्नी भाई ये एहतराम ज़रूर करें कि गोश्त खरीदने से पहले बकरा खुद या फिर किसी सुन्नी मौलाना से जिबह करवाएं।
फिर ऐसा ही हुआ।

बरेलवी अक़ीदे के लोग उस आदेश के बाद बरकत मियां की दुकान पर आते तो दुनिया भर की जिरह करते और फिर खुद या कि किसी मौलाना के हाथों बकरा जिबह करवाकर उसका गोश्त खरीदते।

जल्द ही बरकत मियां की दुकान के बगल में शौकत भाई ने अपनी दुकान डाल ली। ये खांटी-सुन्नियों की गोश्त की दुकान हो गई।

कुल मिला कर इस झगड़े में बरकत मियां कसाई की आमदनी घट कर बहुत कम हो गई। फिर तंग आकर उन्होंने आस-पास के गांव-क़स्बों के साप्ताहिक हाट-बाजार में घूम-घूम कर आलू- प्याज, लहसुन-अदरक आदि सूखी सब्ज़यों की दुकान लगानी शुरू कर दी।

निकाह के पहले गुल्लू भाई की मरहूमा सास का नाम जमुना बाई था। निकाह के समय उन्हें कलमा पढ़वाया गया था और नया नाम रखा गया था जैबुन्निसा।

ससुर साहब का दूसरा निकाह पुरानी मस्जिद के ईमाम साहब ने पढ़वाया था। तब्लीग-जमात के लोगों ने उनके इस क़दम का स्वागत किया था।

हकीम सिराज और घड़ीसाज़ क़ादिर ससुर साहब के घर आकर पुरानी मस्जिद के मुसलमानों के खिलाफ़ उनके मन में ज़हर घोला करते थे। इसमें वे सफल भी हुए।

नतीजतन ससुर साहब ने पुरानी देवबंदी मस्जिद में नमाज़ पढ़ना बंद कर दिया।
लेकिन तब्लीगी-जमात के लोगों में उनका उठना-बैठना बदस्तूर ज़ारी रहा।
यदा-कदा आर्थिक सहयोग वह दोनों अक़ीदे में करते रहे।

एक दिन हकीम सिराज ने उन्हें घेरा कि आपका निकाह हुआ ही नहीं है। आपको निकाह दुबारा पढ़वाना होगा। इसके लिए हकीम सिराज ने खांटी सुन्नियत का पैग़ाम का सारांश सुनाया---
"देवबंदी लोग काफ़िरों से बदतर होते हैं, इसीलिए उनसे निकाह का खु़त्बा या जनाज़े की नमाज़ न पढ़वाई जाए।"

सुनकर ससुर साहब सकते में आ गए।

उनका निकाह तो देवबंदी मौलाना ने पढ़वाया था।

खिचड़ी दाढ़ी खुजलाते हुए ससुर साहब ने सफाई दी--- "अब तो निकाह हुए काफी दिन हो गए। मसला देखकर बताएं कि कोई राह निकल आए।"

हकीम सिराज ने ससुर साहब को समझाया---"आपका निकाह हुआ ही कहां, इस तरह की ज़िन्दगी तो हराम है। आपको निकाह दुबारा पढ़वाना ही होगा, तब जाकर निजात मिलेगी।"

ससुर साहब ने उनके दबाव में आकर बरेलवी मौलाना की उपस्थिति में सुन्नी तरीके से दुबारा निकाह पढ़वाया था।

गुल्लू भाई ने महसूस किया कि हाजी मजीद भाई की मौजूदगी से हकीम सिराज ख़फ़ा थे।

उन्हेांने गमगीन ससुर को मसला-मसायल का हवाला दिया--- " वहाबी-देवबंदियों से जनाजे की नमाज़ पढ़वाना हराम है और यह गुनाह भी है। उन बददीनों के लिए इसालो-सवाब की दुआ करना या उनके लिए बख्शीश की दुआ करना गुनाह है। फिर उन्हें अपने आसपास फटकने देना भी तो गुनाह का सबब बनेगा।"

घड़ीसाज़ क़ादिर ने भी हकीम सिराज के सुर में सुर मिलाया--- "देखिए, आला।हज़रत ने फ़रमाया है कि देवबंदी लोग मुसलमान हरगिज़ नहीं हैं। उनसे नफ़रत करना और उनसे दूर रहना ज़रूरी है। उनसे दोस्ती हराम है। इसलिए चचा, आप पुरानी बातों को भूलकर सोचिए कि आप किस तरफ़ हैं। जनाज़े की नमाज़ अगर देवबंदियों से पढ़वाना है तो फिर मान लीजिए कि आपकी बीवी की रूह को निजात न मिलेगी।"

ससुर साहब समझ गए।

उन्होंने रोते हुए हाजी मजीद भाई से बात की ---"मजीद भाई, कहा-सुनी अल्लाह और उसका रसूल माफ़ करे। आप मेहरबानी करके अब यहां किसी काम में दिलचस्पी न लें। जनाजे़ की नमाज़ हकीम सिराज भाई पढ़वाएंगे। आप दूर ही रहें तो अच्छा। क्या करूं, जब मैंने पुरानी मस्जिद के इमाम से अपना निकाह पढ़वाया था तो इन लोगों ने कहा था कि निकाह हुआ ही नहीं। तब बीवी जिन्दा थी, सो निकाह दुबारा पढ़वाकर तसल्ली कर ली। अब तो वह मर गई, जनाज़े की नमाज़ दुबारा पढ़वाने के लिए वह कहां आएगी, मैं तो कहीं का न रहूंगा मजीद भाई!"

गुल्लू भाई ने जो समस्या उस दिन ससुर साहब के घर देखी, आज यहां सगाई के ऐन वक्त पर वही समस्या आ खड़ी हुई थी।

इस्माईल भाई को साथ लिए जब गुल्लू भाई घर में दाख़िल हुए तो वहां तनाव का माहौल था। तख्त पर तकिया लगा, मदीना-मस्जिद के इमाम बैठे थे। सामने कुर्सियों की दो पंक्तियां थीं। कूलर और सीलिंग फैन पूरी ताकत से चल रहा था। एक तरफ मेहमान बैठे थे और दूसरी तरफ घर के लोग। तख्त के एक-एक कोने पर इरफान मास्साब और बराहीम'चा सिर झुकाए बैठे थे। दूसरी तरफ कुर्सियों पर डॉक्टर क़ादरी, सुन्नी जमात के सेक्रेटरी मुस्तफ़ा बैठे थे।

दो कुर्सियां खाली थीं।
एक पर इसमाईल भाई बैठ गए।

गुल्लू भाई बाहर आंगन में आए तो चच्ची ने इशारे से पूछा कि कुछ बात बनी?

चच्ची गुल्लू भाई को लेकर पीछे रसोई तरफ गर्इं और कहा---- "उधर से आई औरतें अच्छी हैं। उन लोगों ने लड़की पसंद कर डाली है। घर तो पसंद ही है। हम लोगों का बात-ब्योहार उन्हें ठीक लगे है। लेकिन औरतों की बात, ई मरदन के कहां सुनाई पड़त है। देखा तो, आगे का होत है? वैसे ई तो तय है कि मरद नहिंए मानेंगे। आगे अल्ला-रसूल की मरज़ी!"

गुल्लू भाई ने चच्ची को ढाढ़स बंधाई और हॉल के अंदर चले आए। इसमाईल भाई के बगल में एक खाली कुर्सी पर बैठ गए।

मदीना मस्जिद के इमाम जिन्हें लोग हज़रतजी के नाम से पुकारते हैं, गुरू गम्भीर वाणी में फ़रमा रहे थे--- "इस क़स्बे में चूंकि सुन्नियत की हवा चलने से पहले वहाबियों ने अपनी जड़ें जमा ली थीं, इसलिए अवाम गुमराही का शिकार हो गया था।"

इतना कह कर उन्होंने मजमे पर असरदार निगाह डाली।

हज़रतजी के सिर पर हरी पगड़ी थी।

काली शेरवानी और सफेद दाढ़ी में उनका व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली लग रहा था।
वे बोल रहे थे--- "मेरी जानकारी है कि इरफ़ान मास्साब का घर सुन्नी जमात से ताल्लुक रखता है और इंसान के दिलों की बात तो अल्लाह ही बेहतर जानता है।"

इरफ़ान मास्साब का हौसला बढ़ा--- "हो गई तसल्ली आप लोगों को। हज़रतजी के हाथों हमारे घर में ग्यारहवीं-शरीफ़ के मौक़े पर मीलाद-फ़ातिहा होता है। क़स्बे के ज्यादातर मुसलमान डेग का तबर्रूक पाते हैं। हम लोग खांटी सुन्नी हैं भाई।"

लेकिन मेहमानों ने कुछ न कहा।

उनकी आंखों और चेहरों पर शक के बादल साफ़ दिखलाई पड़ रहे थे।

इरफ़ान मास्साब ने इसमाईल भाई को उम्मीद से निहारा और मेहमानों से उनका परिचय कराया।

इसमाईल भाई ने खंखारकर गला साफ किया--- "मैं किसी को धोखे में नहीं रखना चाहता। आला हज़रत का भी यही फ़रमान है कि जो शख़्स अल्लाह और रसूल की शान में गुस्ताख़ी करे तो अवाम को चाहिए कि उस गुस्ताख़ से दोस्ती न करे अगरचे वह गुस्ताख़ आपका बाप, भाई, पीर या उस्ताद ही क्यों न हो! मैं जानता हूं कि इरफ़ान मास्साब खांटी सुन्नी हैं। इरफ़ान

मास्साब के अब्बा माना कि सुन्नी जमात से जुड़े हैं लेकिन उनके तआल्लुकात आज भी वहाबियों से हैं। आगे जैसा आप लोग वाजिब समझें।"

मेहमानों में से एक भुनभुनाया----"हम यहां इरफ़ान मास्साब की बहिन से नहीं बल्कि इबराहीम भाई की बेटी से रिश्ता करने आए हैं।"

उनका ये भी तर्क वज़नदार था।

बराहीम'चा अब वहां कैसे बैठे रह सकते थे। वह उठ खड़े हुए।

उनका चेहरा आवेश से तमतमा गया था।

लग रहा था कि वह कुछ अनर्गल बकना चाह रहे हों, लेकिन महफ़िल के आदाब को ध्यान में रखकर वह चुपचाप बाहर निकल गए।

इरफ़ान मास्साब मायूसी से अपने आखिरी हमराह डॉक्टर क़ादरी की तरफ़ मुतवज्जो हुए। डॉक्टर क़ादरी ने कुर्सी पर पहलू बदल और डॉक्टरी रूतबे के साथ कहा---- "मैं इस क़स्बे में गुज़िश्ता दस सालों से हूं और यही जानता हूं कि इरफ़ान मास्साब के घर का तआल्लुक सुन्नी जमात से है। हर साल इनके घर ग्यारहवीं-शरीफ़ के मौके पर पूरे जोशो-ख़रोश के साथ मीलाद और देग होता है।"

इतना कहकर डॉक्टर कादरी रूके।

मेहमानों के चेहरों पर थोड़ा भी नर्मियत नज़र न आ रही थी।

दाढ़ीदार बुजुर्ग, जो लड़के का बाप था, उसने कहा---- "आप लोगों की बात सुनकर इतनी तो तसल्ली हुई कि इस घर में हम लोगों ने जो कुछ खाया वह मकरूह, बेकार नहीं हुआ। हां, रिश्ते की बाबत हम विसरामपुर जाकर अपने लोगों में मशविरा करने के बाद ख़बर करेंगे।"

इरफ़ान मास्साब की आंखें नम हो आर्इं।

कहां वे लोग आए थे सगाई की रस्म अदा करने और कहां तोहमतों का बोझ लाद कर निकल भागना चाहते हैं।

उन्होंने रूंधे गले से हज़रतजी की तरफ़ मुख़ातिब होकर कहा--- "अब अल्लाह-रसूल की मर्ज़ी के आगे किसका बस चलता है। मेरी इल्तजा है कि आप सब हाथ धो लें ताकि दस्तरख़्वान बिछाया जाए।"

अचानक गुल्लू भाई को गुस्सा आ गया।

बराहीम'चा और चच्ची की इतनी बड़ी बेईज़्ज़ती उनसे बर्दाश्त न हुई।

गुल्लू भाई अचानक चीख़ने लगे---"मैं एक अदना सा इंसान हूं। आप लोगों के सामने मेरी औक़ात क्या? फ़क़त एक अदना सा खानसामा। लेकिन बराहीम'चा के मुझपर और इस क़स्बे के तमाम मुसलमानों पर बड़े एहसानात हैं। इरफ़ान मास्साब मेरे छोटे भाई की तरह हैं। सलमा बिटिया को मैंने गोद में खिलाया है। उस पर भी मेरा हक़ बनता है और इस बिना पर मैं कहता हूं कि अब आप लोग बराए-मेहरबानी यहां का खाना खाकर अपना ईमान ख़राब न करें। हां, सलमा कुंआरी भले रह जाए लेकिन आप जैसे बेदिमाग़ कठमुल्लाओं के घर हम अपनी बहन ब्याहेंगे ही नहीं।"

सारी महफ़िल को जैसे सांप सूंघ गया।

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