फ़लक (कहानी): मंगला रामचंद्रन

Falak (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran

इस मौसम में चिड़ियों का ज़ोर-ज़ोर से चहकना और किलकारी भरना कुछ अधिक ही हो जाता है। सौम्या के लिए ये बात कतई नई नहीं है। उसे जब से याद है वो चिड़ियों के लिए मिट्टी के सकोरों में पानी और दाने रखती आ रही है। न जाने गौरेया की कितनी पीढ़ी अब तक जन्म ले चुकी होंगी। आखिर इन परिंदों की कुल जमा उम्र होती ही कितनी है। सौम्या ने न जाने कितनी बार माता चिड़िया द्वारा अपने चूजों को उड़ने के लिए प्रेरित करता दृश्य देखा है। कई बार कुछ चूजों को उड़ना सीखाने के लिए इतना शोर मचाती कि लगता ना जाने क्या अनर्थ हो गया है। बस, चंद घंटों के बाद वो चूजाना जाने कैसे उड़ जाता और उसकी मां भी उड़ जाती। बस पसरी रह जाती एक गूंज और उसका सन्नाटा।

सौम्या की आंखें थोड़े वक्त के लिए नन्हीं चिड़िया को ढूँढने का प्रयत्न करती हुई अपनी पुरानी स्थिति की अभ्यस्त हो जाती। पर उस दिन स्थिति सामान्य नहीं थी। वो चूजा जिस तरह अलग-अलग जगहों पर दुबक रहा था उससे सौम्या का कौतुहल बढ़ गया। मां कपड़े सुखाने की रस्सी पर बैठी पूरी ताकत से चहक रही थी या कह सकते हैं चीख रही थी। उसकी भाशा भले ही समझ न आ रही हो पर उसमें क्रोध और खीझ का पुट साफ झलक रहा था। नन्हा चूजा कभी बाल्टी के पीछे तो कभी उसके अंदर बैठकर इतना शांत रहता मानों छुपम-छुपाई खेल रहा हो। मां उसे ढूँढ-ढूँढ कर कुछ समझा रही थी पर वो टस से मस न हो। मानों वो उड़ने के लिए पैदा ही न हुआ हो। सांझ होते-होते मां चिड़िया थक-हार कर उड़ कर चली गई।

सौम्या अपने छूटे कार्यों पर ध्यान देने लगी। काम करते-करते ही अनायास उसका मन गुज़रे वर्षों की ओर चला गया। एक बार मन जो भटका तो उसकी रास पकड़ में कहां आती ? रास पकड़ में आई तब तक वों दस-बारह वर्ष पीछे चली गई। तब प्रणव आठ-नौ वर्ष का था और ऋषभ उससे मात्र दो वर्ष छोटा। पति की ठीक-ठाक नौकरी, सास-ससुर का सामान्य स्नेह, एक मध्यमवर्गीय खुशहाल परिवार कह सकते हैं। सौम्या घर के लगभग हर विभाग को सुचारू रूप से संभालती थी। ये भी कह सकते हैं कि बिना सौम्या की मदद के घर का कोई भी कार्य सुचारू रूप से चल ही नहीं सकता था। घर के बुजुर्ग भी सौम्या को अपना सबसे बड़ा सहारा मानते थे। तभी कुछ ऐसा हुआ कि सबकी नज़र में सौम्या खलनायिका सी लगने लगी। जैसा कि आज सौम्या को मां चिड़िया चीखने-चिल्लाने पर लगने लगी थी।

सौम्या सांझ के बाद प्रणव और ऋषभ दोनों को लेकर पढ़ाने बैठती थी। प्रणव प्रथम संतान थी और उस समय सौम्या के पास पर्याप्त वक्त हुआ करता था सो पढ़ाई पर काफी ध्यान दे पाई। ऋषभ के समय उसका स्वास्थ्य कुछ खराब रहा सो बच्चा शारीरिक रूप से भी कुछ कमज़ोर पैदा हुआ। सौम्या की जिम्मेदारी भी बढ़ गई थी और हाथ में जो समय था उसका गणित भी गड़बड़ा गया था। दोनों बच्चों को लेकर पढ़ाने बैठती तो प्रणव तो बड़ी आसानी से अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता था। वो एक प्रतिभाशाली छात्र था जो कक्षा में प्रथम तीन स्थानों पर रहा करता था। ऋषभ को हर विशय को समझने में समय भी लगता था और होम वर्क पूरा करने में काफी देर हो जाती। गणित में तो खास कर वो ऐसी भूलें या चूक कर जाता कि सौम्या का पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता। सिर्फ उसका पारा ही नहीं उसका स्वर भी आरोह के अंतिम ‘सा‘ पर पहुँच जाता। सौम्या की डांट, ऋषभ का रोना धोना, उस रोने को देख सौम्या का और अधिक खीझना बस इन्हीं सब के बीच ऋषभ की पढ़ाई पूरी होती। कभी-कभी बच्चा रो-धोकर बिना खाना खाये ही सो जाता। सौम्या का मन और खराब हो जाता।

उसके सास-ससुर दोनों को ऋषभ का रोना और सौम्या का उस को बेवकूफ, कूप मंडूक, बुद्धू आदि विशेषणों से नवाजना तनिक भी गंवारा ना होता।

शुरू-शुरू में तो सभी को यही लगता रहा कि किसी तरह पढ़ाई पूरी हो, होमवर्क समाप्त हो और सब मिलकर साथ खाना खायें। पर धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा कि किसी अखाड़े की तैयारी हो रही हो। प्रणव किसी सवाल का हल पूछता और सौम्या ऋषभ को कुछ समझाने या डांटने-डपटने में लगी होती। प्रणव को अपने समय के बेकार जाने की चिंता होती। आखिर एक दिन वो चिढ़ कर बोल ही दिया - ‘मम्मी, आप तो बस ऋषभ को पढ़ाईये, मैं खुद से पढ़ लूँगा।‘

सौम्या को लगा ये उसकी हार है। भला ये हुआ कि उसके पति शौर्य ने उसको समझाया - ‘प्रणव की बात गलत नहीं है। कब तक स्पून-फीडिंग करना चाहोगी। वैसे भी वो होशियार बच्चा है। पढ़ाई हो जाने के बाद अंतिम रूप से तुम एक बार चेक कर लेना।‘

सौम्या को असमंजस में पड़ा देखकर शौर्य बोला - ‘ये कितना अच्छा रहेगा कि तुम ऋषभ पर पूरा ध्यान दे सकती हो।‘

सौम्या को उस समय तो तसल्ली मिली या नहीं समझ नहीं आया। हां पर कुछ समय बाद प्रणव में अवश्य बदलाव आया था। उसका बढ़ा हुआ आत्म विश्वास सबको नज़र आ रहा था। पढ़ाई में ध्यान केन्द्रित कर स्वयं कार्य करने से समय भी बच रहा था।

ऋषभ का ये हाल था कि वो छोटे-छोटे सवाल-जवाब के लिए भी मम्मी की राह देखा करता था। सौम्या इसे भी अपनी नाकाबिलियत मान कर उदास थी। दोनों भाईयों के परीक्षाफल में भी बड़ा फर्क देखकर आश्चर्य में पढ़ जाती। मनही मन उसे डर लगता कि ऋषभ का भविष्य अंधकारमय तो नहीं हो जायेगा। इस छोटी उम्र में ट्यूशन भी नहीं लगवाना चाहती थी।

सौम्या की उदासी का एक बहुत बड़ा कारण ये भी था कि प्रणव को पढ़ाते हुए जो खुषी या आनंद का अहसास उसे होता था वो भी उससे छिन गया। हालांकि ऋषभ के मार्क्स पहले की अपेक्षा काफी सुधर गये थे। पर सौम्या तो प्रणव से तुलना किया करती थी और निराश हो जाती थी। सौम्या के ससुर ने उसे समझाया - ‘बेटा तुम ऋषभ की तुलना प्रणव से कभी मत करना। पहले की अपेक्षा उसमें जो सुधार हुआ है उसे देखो और उसके लिए उसकी पीठ थपथपाओ। फिर देखना उसमें कितनी तेजी से सुधार आता है।‘

उसकी सास ने बस इतना कहा - ‘एक ही मां के सारे बच्चे एक जैसे कहां होते हैं ? मानव जाति ही नहीं पशु- पक्षी, पेड़-पौधे सबके साथ ऐसा ही है।

सौम्या की उलझन भरी नज़रों को देखकर वो आगे बोलने लगी - अब परिंदों के नन्हों को ही देखो, पंख तो सबको मिल जाते है, एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। पर सारे बच्चे एक साथ घोंसला कहाँ छोड़ पाते हैं। तीन बच्चों में दो तो बड़ी जल्दी आसमान में उड़ान भरने लगते हैं मानों मां के पेट से ही उड़ना सीख कर आये हों। तीसरे बच्चे को कभी-कभी मां की डांट, समझाईश सभी कुछ सहनी पड़ती है। उसके बाद ही वो समझ पाता है, कि उसे पैदाइषी पंख क्यों मिले हैं।

सौम्या उनकी बात समझ रही थी पर ऋषभ के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाह रही थी। उस पर तो बस एक जिद सी सवार थी कि ऋषभ को प्रणव के समकक्ष लाना है। सौम्या की यह जिद एक तरह से जूनून में बदल गई थी। जाने अनजाने वो हर समय ऋषभ के पीछे पड़ी रहती, कभी कुछ याद करने कभी खुद पढ़ाने के लिए। बच्चा त्रस्त हो जाता, रोने-रोने को हो जाता तो और डांट पड़ती। पूरा माहौल शोर-शराबे से भर जाता था।

आज मां चिड़िया अपने बच्चे पर उड़ने के लिए इतना दबाव डालना सौम्या को अपने उन दिनों की हालत का प्रतिबिंब लग रहा था। सौम्या भी तो उन दिनों इसी तरह खीझ कर चिल्लाया करती थी।

रात बिस्तर में जाने से पहले उसने दुबके हुए चूजे को देखा और बेंत की टोकरी को उस पर उल्टा ढँक दिया। रात भर सुरक्षित रहेगा। जब तक नींद नहीं आई वो ऋषभ और चूजे के बीच समानता करते हुए अपने आपको रोक नहीं पाई। कभी सोचती कि उसने ऋषभ पर इतना दबाव डाल कर अच्छा ही किया तभी तो वो स्कॉलरशिप लेकर उच्च-शिक्षा प्राप्त कर रहा है। अगले ही क्षण सोचती कि उसने व्यर्थ में ‘स्पून फीडिंग‘ की इसीलिए उसे उड़ान भरने में देर हुई। प्रातः होते ही सौम्या कुछ हड़बड़ाहट के साथ जगी। सबसे पहले चूजे के ऊपर से टोकरी हटा दी।

मां चिड़िया फिर आ गई। महीन सी रेशमी आवाज़ में चहकती रही। चूजा कुछ ऊँचाई तक उड़ा और बालकनी की रेलिंग पर बैठ गया। अब मां चिड़िया की रेशमी आवाज़ शोर में बदलती जा रही थी। पर उस दिन चिड़िया का चूजे को डांटना-फटकारना और शोर बहुत लंबा नहीं खिंचा। सौम्या देखने आई - अरे, अभी तो यहीं बैठा था, लगा कि फिर दुबक जायेगा, और ये क्या! सौम्या की आंखों के सामने ही वो नन्हा अचानक खुले में ये जा - वो जा ----

ये एक सामान्य घटना थी जो प्रकृति में न जाने कितने अनगिनत बार घट चुकी होगी। पर सौम्या को उसमें छुपे रहस्य, अर्थ और ना जाने क्या-क्या तो समझ आ रहा था। सास-ससुर की कही हुई उन बातों को वो महज उसे दिलासा देने के लिए कहा मानती थी। उनमें छुपे गूढ़ अर्थ तो उसे अब समझ आ रहे हैं। बारहवीं के परीक्षाफल आने पर ऋषभ ने मजाक में उससे पूछा - ‘मम्मी, अब तो आपका वो बेवकूफ, बुद्धू बेटा होशियार हो गया ना; या आपको मेरे मार्क्स कम लग रहे हैं ?

सौम्या ने प्यार से उसके गाल थपथपाये और सजल आंखों से स्वयं को कोसा था कि उसे कितना डांटा फटकारा था।

‘आपने मेरे भले का सोच कर ही तो वो सब किया। फिर आपने उसके लिए मेहनत भी तो कितनी की थी। पर आपने क्या वो (quote) उदाहरण नहीं पढ़ा जो हमारे पूर्व राष्ट्रपति, मिसाईल मैन ने दिया था।‘

सौम्या का डॉ. अब्दुल कलाम के प्रति श्रद्धापूर्ण स्नेह को ऋषभ जानता था सो माहौल को सामान्य बनाने के लिए उसने ये बात कही।

‘बता, क्या कहा था उन्होंने?‘ यही कि ‘Some of the brightest minds in the country can be found on the last benche of the classroom.

फिर माहौल सामान्य होने में जरा भी देर न लगी।

वैसे तो ऋषभ छठवीं-सातवीं कक्षा से ही प्रतिभाशाली छात्र माना जाने लगा था। वो मात्र पढ़ाई तक सीमित न होकर दूसरी एक्टीविटिज (extra curicullar) में भी बहुत अच्छा कर रहा था। तब जाकर सौम्या को लगा कि बच्चे का सही विकास तो यही है। प्रणव को तो वो मात्र पढ़ाई-पढ़ाई के लिए ही कहा करती थी।

माता मानव की हो या परिंदों की उद्देश्य तो यही होता है कि बच्चे को पंख और उड़ान भरने का हौसला देना। फर्क यही होता है कि पक्षी अपने चूजों को उड़ना सिखा कर खुले आसमान में छोड़ देते हैं, इसके साथ उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है।

सौम्या सोचती रह जाती है कि मानव ऐसा क्यों नहीं कर पाता। बच्चा उड़ान भरने लगे ये काफी नहीं है। हर बच्चे का फलक अलग तरह का, विभिन्न तरह का होता है। बच्चे के अनुसार फलक जुटाना माता-पिता की ही तो जिम्मेदारी है।

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