फकीरा (हिंदी कहानी) : महेश केशरी
Fakira (Hindi Story) : Mahesh Keshri
ठंड काफी बढ़ गयी थी। प्लेटफॉर्म पर अब इक्का -दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे। अब झाल मूढ़ी बेचने वाले , खोमचा वाले और कैंटीन में पूड़ी-भाजी , बेचने वालों में से कोई मौजूद नहीं था। धीरे धीरे दुकानों में तालों के बंद होने की आवाजें थोड़ी - थोड़ी देर पर सुनाई पड़ रहीं थी । कुछ चाय वाले और, समोसे के खोमचे वाले प्लेटफॉर्म पर ऊँघ रहे थे। एक फकीर वहीं बैठा था। उसका नाम टोटन था। एक चाय वाला उस टोटन फकीर के पास ही रेंडी पर चाय बेच रहा था। प्लेटफॉर्म से हटकर थोड़ी दूरी पर , एक लड़का बहुत देर से प्लेटफॉर्म पर बैठा था। वो बीच - बीच में कभी -कभी उठकर थोड़ा सा टहलता और फिर वापस आकर बेंच पर बैठ जाता। टोटन फकीर उस लड़के को देखता फिर वापस चिलम सुलगाकर पीने लगता। लड़के के चेहरे पर एक बेचारगी चंस्पा थी। कभी- कभी उसके चेहरे पर बैचैनी भी दिखाई देती। लड़के को देखकर ऐसा लगता था कि वो बहुत बैचैन सा है।एक ऊहा-पोह या बैचैनी उसके चेहरे पर साफ साफ दिखाई दे रही थी।
तभी एक पैसेंजर ट्रेन उस प्लेटफॉर्म पर से गुजरी। और वो लड़का आनन -फानन में ट्रेन के आगे कूद गया। लेकिन उस कूदते हुए लड़के को धुनका और चाय के टपरी वाले बिंदेश्वरी चाचा ने दौड़कर पकड़ लिया था। ये एक कस्बाई स्टेशन था। रात में बारह बजे के बाद वहाँ बहुत कम ट्रेनें आती थी। कुछ ट्रेनें थी । जो रात के एक - डेढ़ बजे भी आती थी। कुछ ट्रेनें सुबह तीन - चार बजे भी आतीं थी। लेकिन ज्यादातर खोमचे वाले और चाय पकौड़े वाले दस- ग्यारह बजते - बजते ही अपने अपने घरों की तरफ चले जाते थे। दो लोग ही इस प्लेटफॉर्म पर सारी रात बिताते। इसमें चाय बेचने वाले बिंदेश्वरी चाचा और फकीर टोटन ही थे।
लड़का शायद देर रात के होने का इंतजार कर रहा था। या शायद सबके चले जाने का इंतजार कर रहा था। ताकि वो समय देखकर आसानी से ट्रेन के आगे आकर कूद सके। या शायद अकेले में आकर ही मरने के बारे में सोच रहा था। वो सोच रहा था कि उसकी मौत को कोई ना देखे। या वो किसी के द्वारा बचा ना लिया जाये।
दरअसल वो लड़का एक कस्बे का था। कस्बे में ही पढ़ा- लिखा था। वो नौकरियों के बारे में सोचता था। वो पहले सोचता था।कि बहुत बढिया से पढ़ने के बाद तो नौकरी मिल ही जायेगी। लेकिन देश में हालात बेहद खराब थे। कहीं सिर छुपाने की जगह नहीं थी। हर तरफ शहर जल रहा था। आये दिन मस्जिदों में मँदिर निकल आते। शहर अशांत हो जाता। तब बहुत दिनों तक इंटरनेट बँद हो जाता। शहर में लोगों के भीड़ लगाने, या एक जगह जमा होने पर पाबंदी लग जाती। रोजगार तब तेजी से छिन जाते। शहर में धारा एक सौ चव्वालिस लगा दी जाती। पुलिस के सायरनों की आवाज तब दिन - रात गूँजती। कहीं से सायरन बजता। कहीं ये अफवाह फैलती मिलती। कि इधर , इतने मरे। उधर इतने जख्मी हुए। उन्हीं दिनों उसने एक किराये का दुकान लिया था। शुरू - शुरु में उसकी दुकानदारी बहुत बढिया थी। तब शहर में इस तरह के बवाल नहीं हुआ करते थे। अमन-चैन से लोग जीवण जी रहे थे। फिर पाँच साल ऐसे ही गुजर गये। लोगों से दिल मिले तो व्यवहार भी बढ़ा। लोग उधार बाकी भी लेने लगे। इस तरह उस लड़के का ढ़ेर सारा पैसा मार्केट में उधारी के तौर पर फँस गया। इधर मार्केटिंग और ऑनलाईन कंपनियों का दौर चरम पर था।डोर - टू - डोर डिलीवरी के युग की शुरुआत थी। कम -से - कम दामों में लोग अपना श्रम बेचने को तैयार थे।
ई- कॉमर्स कंपनियों ने सस्ते में अपना सामान बेचना शुरू कर दिया था। अब लड़के के दुकान पर दुकानदारी बहुत कम होने लगी। इधर मजहबी झगड़ों के कारण शहर अक्सर बँद रहने लगे । मकान मालिक के पास कुछ चुनिंदा दुकानें थीं। उसके जीने- खाने का आसरा भी इन दुकानों को छोड़कर दूसरा कुछ नहीं था। वो भी मँहगाई से परेशान था। एक दिन लड़के से बोला कि भाई किराया अब चार हजार की जगह आठ हजार रूपये लगेगा।
लड़के का दिमाग सुन्न हो गया। वो समझ नहीं पा रहा था। कि जब पहले हालत अच्छे थे। तो दुकान में कमाई पँद्रह - सोलह हजार हो जाया करती थी। किसी तरह वो दुकान और स्टाफ को मिलाकर दुकान चला रहा था। रही सही कसर उधारी वालों ने पुरी कर दी थी। दो तीन-लाख की देनदारी अब उस लड़के पर चढ़ आई थी। लड़का परेशान था। उधर महाजन पैसों के लिये तगादा करने लगे थे । इधर उधारी का उसका खुद का पैसा मुहल्ले वालों ने रख लिया था। लड़का बहुत परेशान रहने लगा।वो घर में होता या बाहर कहीं होता , तो उसे बार - बार फोन आते। बार - बार लोग अपने - अपने पैसों के लिये तगादा करते। सुबह शाम फोन की टिंगटिंग बजती घँटी से वो परेशान हो गया था। जो वक्त -बे- वक्त , समय - असमय उसका पीछा करती रहती ।
अक्सर उसे महाजन के फोन आते।उसकी रातों की नींद जाती रही थी। वो सामान निकालते वक्त। या किसी से बात करते वक्त। या कहीं आते - जाते वक्त जैसे कहीं अपने आप में खोया रहता। वक्त- बे -वक्त के तगादे के कारण वो परेशान सा रहता। एक स्थायी तनाव ने उसके ऊपर कब्जा जमा लिया था। किसी के कुछ पूछने पर वो बस मुस्कुरा कर रह जाता।
वो अब ज्यादा सवालों के जबाब हाँ- हूँ में ही देता था । फिर मकान मालिक का हर दो- तीन- साल में किराया और बढ़ाना पड़ेगा इसको लेकर तगादे आने लगे। भाड़ा नौ - दस हजार हो गया था। लड़के ने अपना स्टाफ भी हटा दिया था। ज्यादातर काम वो अपने से ही करता था । स्टाफ की कमी के कारण और बढ़ते तनाव के कारण वो अब बीमार रहने लगा। अब दुकान भी बहुत कम खुलने लगी थी। बिजनस बहुत खराब हो गया था। वो कई बार सोचता की इस दुकान को कहीं और ले जाये। और ले जाकर कहीं दुसरी जगह शिफ्ट कर दे । फिर उसे पास का विशाल शहर याद आता। तेजी से बढ़ती दुकानें नजर आतीं । बड़े दुकानों के एडवांस बहुत ज्यादा थे। दस -दस , बीस - बीस लाख रूपये दुकानों के एडवांस थे। फिर ,भाड़ा भी दस- बीस हजार से कम नहीं था। वो छोटा पूँजी वाला दुकानदार था। पाँच- छह लाख उसके दुकान की पूँजी थी। करीब तीन -चार लाख रूपये तो उसके उधारी में फँस गये थे। इधर कुछ सालों में चीजें बहुत तेजी से बदलीं थी। गाँव- कस्बों के दुकानों को रिनोवेट किया जा रहा था। दुकान के मालिक पुराने दुकानों को तोड़कर बड़ा सा मॉलनुमा दुकान बनाने लगे थे। पुरानी दुकानों को शहर में जैसे तोड़ने और बनाने का ट्रेंड सा चल पड़ा था। नयी दुकानों के नये - नये एडवांस माँगे जाने लगे थे । फिर से नये भाड़े का चलन होने लगा था। पुराने दुकानदारों को हटाया जाने लगा। जो लोग नया एडवांस देकर नया दुकान ले सकते थे। उन्होंने नया दुकान ले लिया था। जो ना ले सके। वो दूसरे कामों में लग गये। अब नये दुकानदारों की एक नयी फौज तैयार हो गयी थी। जिनको अपने ग्राहकों से नमस्कार-प्रणाम , दुआ -सलाम से कोई मतलब नहीं था। बस केवल बिजनस और बिजनस होना चाहिए था। वंशी चाचा की चाय दुकान जहाँ दुकानदारों और ग्राहकों की भीड़ जुटती थी। वो अतिक्रमण के कारण हटा दी गयी थी। अब ग्राहक , दुकानदारों के हँसी - ठठ्ठे और मजाक की बातें सुने लोगों को एक अरसा हो गया था। लड़के को भी हर तीन- चार साल में किराया बढ़ाने को लेकर तगादे मिलते रहते। वो सबसे ज्यादा दुकान के बढ़ते खर्चों से परेशान था। बढ़ते भाड़े के बारे में जब वो सोचता। तो उसको खाना गले से नीचे नहीं उतरता। इधर उसके मकान मालिक ने भी उसके दुकान को तोड़ने और फिर बड़ा करने की बात कही थी। नया एडवांस भी लगेगा ऐसा उसके मकान मालिक ने कह रखा था। अब लड़के के पास कोई चारा भी नहीं था। उसने महीने भर का समय लिया। और धीरे - धीरे सब सामान को बेचकर दुकान खाली करने लगा। इस बीच वो लोगों को उधार दिये रूपयों का तगादा भी करने लगा था। लेकिन, तगादा करने के बाद भी उसे पैसे नहीं मिलते। उसके पास बहुत से ग्राहक आते और जरुरी चीजों के बाबत पूछते। उसके दुकान से अब ग्राहक भी लौटने लगे थे। ग्राहकों को खाली हाथ लौटते देखकर लड़के को बहुत दु:ख होता। लेकिन वो कर भी क्या सकता था। चीजें उसके हाथ से बहुत बाहर निकल गयीं थी। अब दस लाख रुपये का एडवांस और पँद्रह - बीस हजार का किराया उसके बस की बात नहीं थी। कुछ लोग पूछते , भैया सामान नहीं मँगवा रहे हो। दुकान खाली कर रहे हो क्या ? लड़का बहाना करता। नहीं भाई नया शॉप बनने वाला है। मेरे दुकान का भी नया फर्नीचर बनेगा। इसीलिए माल खाली कर रहा हूँ। एक रात वो सारा फर्नीचर दुकान में छोड़कर मुंबई भाग गया था। वो अब दुकानदार नहीं था। उसकी दुकान छिन गई थी। अब वो साबुन फैक्ट्री मे़ काम करने वाला मजदूर बन गया था। वो दस हजार रूपये में अब साबुन फैक्ट्री में काम करने लगा था।
इसके बाद भी परेशानी कम नहीं हुई थी। मुंबई में वो दो साल रहा।ठेकेदार उसको लेकर मुंबई गया था। दस की जगह उसको आठ हजार रुपये सैलरी मिलती थी। यहाँ भी सिर छुपाने की जगह नहीं मिल रही थी। आमदनी से ज्यादा खर्चा।दो तीन साल काम किया। लेकिन सोचा कहीं फिर कोई चाय पान की छोटी- मोटी दुकान डाल ली जाये। लिहाजा पैसों की जरूरत आन पड़ी। जब पी. एफ . फँड में जमा पैसों की बाबत कंपनी से जानना चाहा। तो कंपनी से पता चला पी. एफ. का पैसा लेकर ठेकेदार भाग गया। जब लड़के ने कंपनी के मुलाजिमों से पूछा तो सब ने हाथ खड़े कर लिये। लड़के ने दुकान जरूर बँद कर दी थी। लेकिन महाजनों के फोन उसको आते थे। वो फोन नहीं उठाता था। उसने तीन चार सालों के बाद भी अपना वही पुराना नंबर रखा हुआ था। वो नहीं चाहता था। कि लोग उसको बेईमान समझें। लोगों ने उसका भी पैसा डूबाया था। लेकिन वो किससे माँगे अपना पैसा। कस्बा छोड़े हुए उसे अरसा हो गया था। ये जो पुराने बकायादारों के
फोन उसके पास आते थे। इससे उसको पुराने दिन याद आते थे। उसको लगता कि ये महाजन नहीं भूत हैं। जो उसका पीछा कर रहें हैं। और उसको लगता कि वो उनसे तभी पीछा छुड़ा सकता है । जब वो अपनी इहलीला समाप्त कर ले !
पटरी पर से प्लेटफॉर्म पर उठाकर लाये , हुए उस लड़के को लगभग दो घँटे बीत चुके थे। प्लेटफॉर्म पर कूदने की वजह से उसका पोर - पोर दु:ख रहा था। जगह जगह से उसको चोटें आईं हुई थीं।
बिंदेश्वरी चाचा , ने पूछा - "बाबू पटरी पर काहे कूद गये थे। अच्छे भले तो दिखने में तो हो। कुछ काम धाम कर लेते। ये आत्महत्या करने की खूब सूझी तुम्हें भला ! मेरा शरीर देखो कैसा बूढ़ा हूँ । लेकिन ठान लिया है , जब तक प्रभू की माया नहीं होगी। तब तक धरती पर रहूँगा।"
वातावरण में नि:स्तबधता पसरी हुई थी।
लड़का चुप था।
"चाय पियोगे ? "बिंदेश्वरी चाचा ने पूछा।
इस बार भी चुप्पी छाई रही।
बिंदेश्वरी चाचा ने चाय का कप लड़के की तरफ बढ़ाया।
लड़के ने धीरे से हाथ बढ़ाकर चाय ले लिया।
चाय पीकर लड़के के शरीर में गर्मी आ गई थी। चाय से उसे बहुत राहत महसूस हुई।
बूढ़ा का एक नाती था, धुनका , बोला - "भैया , आपको चोट लगी है। आपके लिये हल्दी - दूध ले आता हूँ। आपको आराम मिलेगा।"
"तुम , मुझे जानते हो ? "इस बार लड़के की आवाज उन लोगोंं ने सुनी।
बिंदेश्वरी चाचा -"मदद करने के लिए किसी को एक- दूसरे का जानना जरूरी है , क्या बाबू ? ये इंसानियत का रिश्ता है , बाबू। हम लोग देहात के लोग हैं। ट्रेन अभी आपको कुचलने से थोड़ी दूर थी। आप हमें दिख गये। इसलिए हम तुम्हें उठाकर ले आये। तनी देर और हो जाती तो तुम ना बचते , बाबू। वो तो परमेश्वर की कृपा रही। कि ट्रेन को विलंब हो गया।"
"इस वक्त दूध कहाँ मिलेगा। "लड़के ने पूछा।
धुनका - "यहीं खटाल है , भैया हम लोगों का। भैंस का दूध निकालते और बेचते हैं। और जो बच जाता है। उससे स्टेशन पर चाय बेचते हैं।"
"मेरे पास दूध के पैसे नहीं हैं। "लड़का बोला।
"तो मुझसे ले , लो। "ये आवाज धूरे के पास से आई थी। ये टोटन फकीर की आवाज थी।
लड़का चौंका। उसने आवाज की दिशा में देखा। धूरे में आग धधक रही थी। माघ की कडकडती हुई ठंड। ठंड से पोर - पोर अकड़ा जाता था। लेकिन टोटन वहीं धूरे में आग जलाये खुद को सेंके जा रहा था।
"तुमसे ले लूँ , क्यों? क्या मेरे दिन ऐसे गये बीते हैं। कि एक फकीर से पैसे ले लूँ।मेरे अभी ऐसे दिन नहीं आये हैं। जो तुमसे पैसे ले लूँ।"
लड़के ने हिकारत की नजर से टोटन को देखा।
"तुम्हारे दिन सचमुच में गये - बीते हैं। तभी तो तुम ट्रेन के आगे कूदे। नहीं देखो मैं कैसा हाथ से और पैर से अपंग हूँ। लेकिन कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचा। मुझसे ज्यादा तुम्हारा कुछ भी नहीं लुटा होगा। बँटवारे के समय मेरे दोनों लड़के मारे गये। मेरी बीबी उसी बँटवारे में मर गई। मेरे पास जीने के लिए कोई कारण नहीं था। फिर भी मैनें इस ईश्वर के दिये हुए जीवण को जिया और जी रहा हूँ।
और तुमसे तुम्हारा क्या मतलब है ? इस गलत फहमी में ना रहना बेटा। ये टोटन फकीर का डेरा है, बेटा। शहर के बड़े - बड़े लोग इस दर पर माथा टेकने आते हैं । इस डेरे के आशीर्वाद के बिना यहाँ का कोई बड़ा काज-परोजन नहीं होता। चाहे जच्चा-हो या बच्चा। या कोई नई ब्याहता।सबको इस पीर का आशीर्वाद मिलता है।
दरअसल वो मुझसे आशीर्वाद नहीं लेते। मैं , तो माध्यम हूँ। सब वो करवाता है। ऊपर वाला। मैं तो निमित्त हूँ। तुम मुझे हिकारत से मत देखो बेटा।"
टोटन फकीर के चेहरे पर एक दिव्य ज्योति चमक रही थी। उस आभा में टोटन का चेहरा देखते ही बनता था। लगा साक्षात् भगवान् ने अवतार ले लिया हो। लड़का टोटन के दिव्य आँखों का बहुत देर तक सामना ना कर सका।
फिर बोला -"तुम फकीर होकर इसे बुरा नहीं मानते। फकीरी भी भला कोई पेशा है। दूसरे के रहमों करम पर पलना। हुँह .."
लड़के के स्वर में नफरत झलक रही थी।
टोटन ने धूरे से चिमटे के सहारे आग की एक चिंगारी उठाई। और चिलम सुलगाया फिर नथूँने के सहारे - धुँआ छोड़ते हुए बोला -"मैं , किसी से कभी कुछ नहीं माँगता। देने वाले अपनी मर्जी से मेरे पास कुछ ना कुछ छोड़ कर चले जाते हैं। फिर उन परिंदों के बारे में तुम क्या कहोगे जो अलस्सुबह ही धरती पर दाना चुगने निकल जाते हैं। उस दाने को किसने बनाया। क्या किसान दाना बना सकता है। नहीं किसान दाने को खेत में बोता है। उसमें खाद - पानी डालता है। उसको संरक्षण देता है। क्या तुम ये कह सकते हो।या ये बता सकते हो। कि बीज से अनाज कैसे बन जाता है? किसान बीज थोड़ी ही बनाता है। या अनाज थोड़ी ही पैदा करता है। क्या किसान के पास ताकत है। कि वो बीज से अनाज पैदा कर ले। बहुत गहराई से सोचोगे तो नहीं। वो फसलों को बो जरूर देता है। लेकिन वो बारिश से इल्तिजा करता है। कि वो उसके खेतों में बरसे। दरअसल बारिश से इल्तिजा नहीं करता। वो भगवान की उपासना - अराधना करता है। कि उसकी फसल तभी अच्छी होगी। जब बारिश अच्छी होगी। बारिश , धूप , हवा , पानी सब मालिक के हाथ में है। बड़ा से बडा आदमी। राजा - महराजा सब अपने प्रियजनों के अच्छे होने कि या उनके सलामती से रहने का आशीर्वाद उसी ऊपर वाले से माँगते हैं। फिर , कौन किसको देता है? तुम ही बताओ। फिर इस दुनिया में फकीर कौन है? सब- के -सब लोग तो फकीर ही हैं। जब सब लोग माँगते हैं। तो इस तरह से देखा जाये। तो दुनिया के सारे लोग फकीर ही हैं।
इसको और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। हम ये कह सकते हैं । कि पानी या ऋतुएँ अनाज को पैदा करतीं हैं। नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसान , बीज , खाद , पानी , ऋतुएँ, ये माध्यम हैं। तो क्या किसान अपने आपको ये मान ले। कि चिंडियाँ का पेट वो भरता है। नहीं चिंड़ियाँ खाती है। इसलिए खेत में फसल होती है। अब मान लो खाने वाले ही ना होंगें। तो फसलों का क्या होगा। ईश्वर उसको क्यों पैदा करेगा?
इसी तरह धन की तीन गतियाँ है। भोग , दान और क्षय। तुम्हें तो पता है। यदि हम धन का उपभोग ना करें। या दान ना करें। तो वो नष्ट हो जायेगा। अब जो धन तुम्हारा है ही नहीं। उसे तुम्हें ईश्वर ने दिया है। तो तुम गरीब - गुरबों , दीन - दुखियों, असहायों , रोगियों की उस धन से मदद करो। मैं कोई उठाईगिर का काम नहीं करता। फिर मुझे अपने पेशे से शर्म क्यों आनी चाहिए ?"
इस बार लड़के को कोई जबाब नहीं सूझ रहा था। वो सोच रहा था। सच तो है। ये फकीर ठीक कह रहा है। दुनियावी चीजों को अगर हम देखें। तो सबके लिए ईश्वर ने कुछ ना कुछ व्यवस्था कर रखी है। जमीन के ऊपर भी जमीन के नीचे भी। धरती के बहुत नीचे जहाँ बहुत ठंड है। समुंद्र की गहराई में। जहाँ असंख्य छोटे -छोटे जीव रहते हैं। आपके पास कितना भी पैसा हो। वहाँ तक खाना-पानी नहीं ले जा सकते। कारण वहाँ पानी का दबाव बहुत ज्यादा होता है। नारियल के भीतर पानी , मूँगफली के अँदर दाने ,सीप के अँदर मोती। चट्टानों पर उगे पेंड। पाताल की गहराई से लेकर आकाश की ऊँचाई तक हर जगह ईश्वर ने सब छोटे बड़े जीवों के खाने- पीने के लिये व्यवस्था कर रखी है। ये सारी चीजें किसकी हैं। क्या कोई धरती पर का राजा है , जो ये कह सकता हो कि ये मेरी है । नहीं ये सब उसी नियंता की बनाई हुई चीजें हैं। जिसे हम अपनी - अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं।"
लड़के ने टोटन फकीर को टटोला - "तुम फिर से सोच लो जो कह रहे हो। क्या ये फकीरी का पेशे सही है। जो तुम कर रहे हो। इसमें तुम्हारा खुद का आत्मसम्मान भला कहाँ है ?"
टोटन-"तुम किस आत्मसम्मान की बात करते हो। वही जो दुनियावी लोग जीते हैं। ये तुम्हारे अँदर की कुँठा है। जो ऐसा बोल रहे हो । दूसरों से नफरत करने का एक और खेमेंबंदी करना। नफरत के लिये वर्गीकरण। ये तुम्हारी कुँठा नहीं है, तो और क्या है ? अमीर - गरीब , छोटा - बड़ा , काला - गोरा , नाटा - मोटा , दुबला - पतला। ये जो लोगों को लोग उपनाम देते हैं। अपनी कुँठा या भडास निकालने का जरिया ही तो है । ये दर असल उनकी कुँठायें हैं। संविधान के मुताबिक मुझे भी वोट , देने का उतना ही अधिकार है। जितना कि तुम्हें, या देश के किसी और नागरिक को है। मैं , भी इस देश का नागरिक हूँ। मेरा वजूद भी इस देश में वैसा ही जैसा देश के प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री मंत्री जी का है। मेरे लिये भी वो स्कूल, अस्पताल, न्यायालय भी वैसे ही काम करेंगे। जैसा कि तुम्हारे लिये। या देश के दूसरे नागरिकों के लिए। फिर मैं भला तुमसे अलग कैसे हूँ ?
आत्मसम्मान जीवण से बड़ा नहीं होता। ईश्वर की दी हुई जिंदगी हमें हर हाल में जीनी चाहिए। तुम उन सम्मानित लोगों की बात कर रहे हो ना। जो शहर के सफेदपोश हैं। जिनके चेहरे जितने साफ दिखाई देते हैं। दरअसल वो उतने हैं नहीं। दूसरों को दबाना। दूसरों की संपत्ति को हथियाना। एक - दूसरे से ईर्ष्या -द्वेष रखना। क्या ऐसे लोगों को तुम ठीक समझते हो। जो सांसारिकता में धँसे कुँठित लोग हैं।
चीजों को भूलना सीखो। फर्ज करो किसी ने तुमको गाली दे दी। तो क्या तुम प्रतिशोध की आग में आजीवण जलते रहोगे। तुम बदला लेने के लिये अपना जीवण होम कर दोगे। अपशब्द कहने वाले का क्या गया। कुछ नहीं। लेकिन तुम अपना जीवण तनाव में भरकर क्यों नष्ट कर रहे हो। किसी ने कुछ अपशब्द कह दिये। तो क्या इन चीजों से तुम्हारा जीवण नष्ट हो गया। और ये चीजें क्षणिक थी। इन चीजों को लेकर जीवण भर नहीं बैठा जा सकता । नदी की तरह बनो। समस्या के बीच से रास्ता बनाकर निकल जाओ। रूको गए तो सड़ांध पैदा होने लगेगी।"
टोटन ने धूरे को दिखाते हुए, लड़के से पूछा - "देखो ये क्या है।"
"धूर। "- लड़के ने कहा।
"ये जो पूरी जिंदगी हम ईर्ष्या -द्वेष के बीच जीते हैं। इसी धूर में मिलने के लिए जीते हैं।"
"इस धूर में तुम कितना हो ?"
लड़का टोटन की तरफ देख रहा था।
टोटन ने चुटकी भर राख उठाई -"ये तुम नहीं हो।"
चुटकी की राख उसने जमीन पर फैला दी।
टोटन बोला -"इसमें से कोई कण उठा लो।"
"ये कैसे हो सकता है। ये तो बहुत छोटा है।"
"इसमें से तुम एक कण नहीं उठा सकते। और चले हो जीवण को समेटने!हमारा जीवण धूर के कण जितना ही तो है। तुम इस धूर कण की तरह ही हो। जिसमें से चाह कर भी तुम खुद को नहीं ढूँढ सकते। फिर जो तुम्हारे हाथ में है। उसकी परवाह करो। जो तुम्हारे बस मे नहीं है। उसकी चिंता क्यों करते हो ?"
टोटन ने दुबारा चिलम का कश लिया। इस बार धुँआ नाक की जगह मुँह से छोड़ा -"तुम किस आत्मसम्मान कि बात करते हो। अच्छा तुम ये बताओ कि जब तुम साँस लेते हो। तो जो हवा तुम लेते हो। वो तुम्हें कौन देता है? क्या तुमने उसे खरीदा है? मान लो तर्क दे सकते हो। कि हाँ मैं ऑक्सीजन के सिलेंडर खरीद कर हवा ले सकता हूँ। फिर भी वो तुम्हारा नहीं है। क्योंकि ये हवा भी ईश्वर की बनाई हुई है। ये पेंड जो हैं। हजारों सालों से हैं। सिलेंडर बाद में बने। उन्हें स्टोर करने वाली तकनीक बाद में आई। और किस आत्मसम्मान कि तुम बात करते हो। इसी दुनिया में ऐसे - ऐसे लोग भी हैं। जो एक का ग्यारह करने में लगे हुए हैं। उनकी भूख इतनी बड़ी है, कि पूछो ही मत। मैं कम -से- कम वो तो नहीं करता। मैं जो हूँ। बस वही हूँ। फिर शहर के लोग बड़े -बड़े लोग, कारपोरेट्स कोई शुभ काम करना हो तो एक बार मेरा आशीर्वाद लेने जरूर आते हैं। इतना यश और मान -सम्मान इस फकीरी ने मुझे दिया है। फिर शर्म जैसी कौन सी बात है। बाटी खाओगे ? हाँ मेरे पास बहुत कुछ तो नहीं है। गर्मा - गर्म बाटी और लहसन की चटनी है। टोटन धूरे पर कुछ बाटियाँ उलट - पुलट कर रहा था।
लड़के ने दिन भर से कुछ नहीं खाया था। उसे अब तेज भूख भी लग आई थी।
टोटन ने चार बाटी निकाल कर धुनका को आवाज लगाई। थोड़ी देर बाद एक साफ प्लेट में चार बाटी और लहसुन की चटनी का प्लेट धुनका लड़के को पकड़ा कर चला गया । बाटियाँ सचमुच में बहुत स्वादिष्ट बनीं थीं। लड़के ने खाना खाया। और वहीं धूरे पर सो गया। गर्म अलाव की तपिश ने लड़के को गर्म करना शुरू कर दिया था। टोटन फकीर को किसी ने नया कंबल दान किया था। टोटन ने वो कंबल लड़के के शरीर पर डाल दिया। अलाव की चटक लकड़ियों के चटकने की आवाज देर रात तक गूँजती रही थी।
सुबह के बाद अब दिन भी निकल आया था । वो इस वक्त बिंदेश्वरी चाचा के घर पर आ गया था। रात में ही बिंदेश्वरी चाचा और धुनका ऑटो से उठाकर उसको क्वार्टर पर ले आये थे। पूरा दिन निकल चुका था। लड़का पूरा दिन सोता रहा था। कुछ तो बीमारी ने और कुछ तो रात वाली घटना ने उसको बहुत कमजोर कर दिया था। प्लेट फॉर्म पर गिरने से उसे बहुत चोट भी आई थी।
ठंड की वजह से धुँधलका बहुत जल्दी गहरा गया था।
धुनका , बिंदेश्वरी चाचा से बोला -"आज तो स्टेशन पर बहुत कम ग्राहक आये। लगता है , ठंड की वजह से पैसेंजर भी कम ही सफर कर रहें हैं , आजकल । सारा- का -सारा माल ही बचा रह गया।"
"होता - है , बेटा। कभी - कभी ऐसा भी होता है। "बिंदेश्वरी चाचा , जैसे धुनका को दिलासा देते हुए बोले।
सिगड़ी पर खिचड़ी या कोई दलिया बन रही थी। उसने देखा बिंदेश्वरी चाचा बार - बार खिचड़ी को थोड़ी - थोड़ी देर पर चला रहे थे। धुनका पास में पड़ा आलू जिससे गर्मा- गर्म भाप निकल रही थी। उसको कपड़े से पकड़ - पकड़ कर छील रहा था। बीच - बीच में वो गर्म आलू को छीलते समय जब आलू ज्यादा गर्म लगता , तो मुँह से फूँक - फूँककर ठँढा करने का भी यत्न करता।
धुनका ने बिंदेश्वरी से ऐसे ही पूछ लिया -"नाना , कभी ऐसा हुआ है, कि दुकान में कुछ ना बिका हो।"
"हाँ ,बेटा ऐसा बहुत बार हुआ है। बहुत पहले जब यहाँ स्टेशन नहीं हुआ करता था। या केवल मालगाड़ी ही चलती थी। या जब इक्का- दुक्का पैसेंजर ट्रेनें ही चलती थी। उस समय मेरे बाबा यहाँ काम करते थे। उस समय हम लोग भात, दाल , सब्जी की छोड़ो। सुथनी , शकरकंदा सीझाकर खाते थे। बहुत बुरा समय था। हम लोगों ने सब देखा है , बेटा। अच्छा दौर भी और खराब दौर भी।"
धुनका -"अच्छा नाना इससे भी खराब समय अगर आया तो क्या करेंगे ?"
"अच्छा खराब समय कुछ नहीं होता है, बेटा। खराब समय में भी अगर हमारे पास धैर्य हो तो वो निकल जाता है। तुमने राजाओं के आत्महत्या करने के बहुत से किस्से सुने होंगे। संपन्न आदमी भी वक्त के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या कर लेता है। ऐसे कठिन समय में उसका आत्मविश्वास डोल जाता है। जिस आदमी के पास आत्मविश्वास की कमी होती है। ऐसा वही लोग करते हैं। मैनें ऐसे लोगों की भी कहानियाँ सुनी है । जो विषम- से -विषम परिस्थितियों में भी नहीं घबराये।
बल्कि उसका डटकर सामना किया। इसमें कुछ साहसिक नाविकों की कहानियाँ भी थीं। जो कई महीनों तक बंजर - वीरान टापूओं पर अकेले फँसे रहे। बिना खाना- पानी के। बाद में वो सकुशल अपने घर लौट आये। जानते हो कैसे ? आत्मविश्वास के सहारे। । कुछ लोग पढ़ -लिखकर कामयाब बनने के लिये होटलों में जूठे बर्तन धोते रहे। जूठन खाकर गुजारा किया। कार साफ किया। बाहर फुटपाथ पर सोकर अपना खराब समय निकाला। इसी आत्मविश्वास के सहारे। और बाद में खराब परिस्थितयों से बाहर भी निकले। और आगे जाकर कामयाब इंसान भी बने। खराब परिस्थियों के बावजूद भी अपनी जिंदगी में बेहतर मुकाम हासिल किया। मैं बहुत बड़े -बड़े और मजबूत आदमियों को भी जानता हूँ। जिन्होंने थोड़ी सी विषम परिस्थितियों में ही घबराकर आत्महत्या कर ली । बहुत से लोगों ने अपनी सुझ-बूझ और होशियारी से अपना जीवण बचा लिया । बहुत से लोग अपनी जान दे देते हैं। लेकिन मैं फिर भी यही कहूँगा। कि जान देना कायरता है। दुनिया में कायर लोग ही जान देते हैं ! जो लोग मजबूत होते हैं। वो परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करते हैं ।
धुनका- "मान लो महीनों ऐसा ही चले। कुछ ना बिके। तब क्या करोगे?"
बिंदेश्वर चाचा - "जो है , उससे ही काम चलाया जायेगा। यहीं कहीं खेती- बारी करेंगे। धान- गेंहूँ , उगायेंगे। उससे तो काम चल ही जायेगा। सालों ऐसा हुआ। तब कहीं जाकर बाहर काम करेंगे।"
"मजदूरी करोगे ? "धुनका चिहाया।
"यानी , दुकानदारी , से सीधे मजदूरी।"
"मजदूरी में भला क्या बुराई है। ये जो दुनिया की सबसे नामी गिरामी इमारतें हैं। पुल - पुलिया हैं। उनको दुनिया के मजदूरों ने ही तो बनाया है। मजदूरी करने में कैसी लाज। सुना नहीं है। श्रममेव जयते। श्रम की जीत होती है / या श्रम की है, जय होती है।"
"बाहर भी कही काम ना मिला तब क्या करेंगें ?"
"नाव बनायेंगे। मछलियाँ पकड़ेंगे। उसको बेचेंगे। दुनिया संभावनाओं से भरी हुई है ... वो कहीं खाली नहीं है।"
"दुनिया संभावनाओं से भरी हुई है।"
सहसा लड़के के मुँह से निकला। दिमाग के सारे जाले यकायक साफ हो गये थे। वो अब मेहनत करेगा।आत्महत्या नहीं !