एक गधे की आत्मकथा (उपन्यास) : कृष्ण चन्दर

Ek Gadhe Ki Aatmkatha (Novel in Hindi) : Krishen Chander

1. इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा

महानुभाव ! मैं न तो कोई साधु संन्यासी हूं, न कोई महात्मा-धर्मात्मा। न श्री 108 स्वामी गहम गहमानन्द का चेला हूं, न जड़ी बूटियों वाला सूफी गुरमुखसिंह मझेला हूं। न मैं वैद्य हूं, न कोई डाक्टर। न कोई फिल्म स्टार हूं, न राजनीतिज्ञ। मैं तो केवल एक गधा हूं, जिसे बचपन के दुष्कर्मों के कारण समाचार पत्र पढ़ने का घातक रोग लग गया था। होते-होते यह रोग यहां तक बढ़ा कि मैंने ईंटें ढोने का काम छोड़कर केवल समाचार-पत्र पढ़ना आरम्भ कर दिया। उन दिनों मेरा मालिक धब्बू कुम्हार था, जो बाराबंकी में रहता था। (जहां के गधे बहुत प्रसिद्ध हैं) और सैयद करामतअली शाह बार एट ला की कोठी पर ईंटें ढोने का काम करता था। सैयद करामतअली शाह लखनऊ के एक माने हुए बैरिस्टर थे, और अपने पैतृक नगर बाराबंकी में एक आलीशान कोठी स्वयं अपनी निगरानी में बनवा रहे थे। सैयद साहब को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था।

 इसलिए अपनी कोठी का जो भाग उन्होंने सबसे पहले बनवाया, वह उनकी लाइब्रेरी का हाल तथा रीडिंग-रूम था, जिसमें वह प्रातःकाल आकर बैठ जाते। वह बाहर बरामदे में कुर्सी डालकर समाचार पत्र पढ़ते और ईंटें ढोने वालों की निगरानी भी करते रहते। उन्हीं दिनों मुझे समाचार पत्र पढ़ने का चस्का पड़ा। होता अधिकतर यों था कि इधर मैंने एक उठती हुई दीवार के नीचे ईंटें फेंकीं, उधर भागता हुआ रीडिंग-रूम की ओर चला गया। बैरिस्टर साहब समाचार पढ़ने में इतने लीन होते कि उन्हें मेरे आने की खबर तक न होती और मैं उनके पीछे खड़ा होकर समाचार-पत्र का अध्ययन शुरू कर देता। बढ़ते-बढ़ते यह शौक यहां तक बढ़ा कि बहुधा मैं बैरिस्टर साहब से पहले ही समाचार पत्र पढ़ने पहुँच जाता। बल्कि प्रायः ऐसा भी हुआ है कि समाचार-पत्र का पहला पन्ना मैं पढ़ रहा हूं और वह सिनेमा के विज्ञापनों वाले पन्ने मुलाहिज़ा फरमा रहे हैं। मैं कह रहा हूं-ओह ! ईडन, आइजन हावर, बुल्गानिन फिर मुलाकात करेंगे और वह कह रहे हैं-अहा !

 हज़रतगंज में दिलीप कुमार और निम्मी की नई फिल्म आ रही है। मैं कह रहा हूं-चः चः ! सिकंदरिया की हवाई दुर्घटना में बारह मुसाफिर मर गए ! और वह कह रहे हैं-बाप रे बाप ! सोने का भाव फिर बढ़ गया है। बस, इसी प्रकार हमारा यह सिलसिला चलता रहता, यहां तक कि मेरा मालिक ईंटें गिनकर और मिस्त्री के हवाले करके वापस आ जाता और मेरी पीठ पर ज़ोर से एक कोड़ा मारकर मुझे ईंटें ढोने के लिए ले जाता, लेकिन बैरिस्टर साहब मुझे कुछ न कहते। दूसरे फेरे में जब मैं वापस आता, तो वह स्वयं समाचार पत्र का अगला पन्ना उठाकर मुझे दे देते और यदि मैं पूरा पढ़ चुका होता, तो भीतर लाइब्रेरी से कोई पुस्तक निकाल लाते और ज़ोर-ज़ोर से पढ़ना शुरू कर देते। यह जो मैं पढ़ना और बोलना सीख गया हूं, तो इसे सैयद साहब का ही चमत्कार समझिए या उनकी कृपादृष्टि, क्योंकि सैयद साहब को समाचार पत्र पढ़ते हुए उन पर टिप्पणी करने की बुरी आदत थी। यहां जिस स्थान पर वह कोठी बनवा रहे थे, उन्हें कोई व्यक्ति ऐसा न मिला, जिससे वह ऐसी बहस कर सकते। यहां प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने काम में व्यस्त था।

 बस, मैं एक गधा उन्हें मिला। परन्तु इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। वास्तव में वह केवल बातचीत करना चाहते थे। किसी से अपने मन की बातें कहना चाहते थे। गधे की बजाय एक खरगोश भी उनकी संगति में रहता तो महापण्डित बन जाता। सैयद साहब मेरे प्रति बड़ा स्नेह प्रकट करते थे और प्रायः कहा करते थे, ‘‘अफसोस, तुम गधे हो, अगर आदमी के बच्चे होते, तो मैं तुम्हें अपना बेटा बना लेता !’’ सैयद साहब के कोई सन्तान न थी। खैर साहब ! करनी भगवान की यह हुई कि एक दिन सैयद करामतअली शाह की कोठी तैयार हो गई और मेरे मालिक को और मुझे भी वहां के काम से छुट्टी मिल गई फिर उसी रात धब्बू कुम्हार ने ताड़ी पीकर मुझे डंडे से खूब पीटा और घर से बाहर निकाल दिया और खाने के लिए घास भी न दी। मेरा दोष यह बताया कि मैं ईंटें कम ढोता था और समाचार पत्र अधिक पढ़ता था, और कहा-मुझे ईंटें ढोने वाला गधा चाहिए, समाचार पत्र पढ़ने वाला गधा नहीं चाहिए।

रात भर भूखा प्यासा मैं धब्बू कुम्हार के घर के बाहर शीत में ठिठुरता रहा। मैंने निश्चय कर लिया कि दिन निकलते ही सैयद करामतअली शाह की कोठी पर जाऊंगा और उनसे कहूंगा कि ईंटें ढोने पर नहीं तो पुस्तकें ढोने पर ही मुझे नौकर रख लीजिए। शेक्सपियर से लेकर बेढब मूज़ी तक मैंने प्रत्येक लेखक की पुस्तकें पढ़ी हैं, और जो कुछ मैं उन लेखकों के सम्बन्ध में जानता हूं, वह कोई दूसरा गधा नहीं जा सकता। मुझे पूरी आशा थी कि सैयद साहब तुरन्त मुझे रख लेंगे, लेकिन भाग्य की बात देखिए कि जब मैं सैयद साहब की कोठी पर पहुंचा तो मालूम हुआ कि रातों रात कोठी पर फसादियों ने हमला किया और सैयद करामतअली शाह को अपनी जान बचाकर पाकिस्तान भागना पड़ा।

 फसादियों में लाहौर के गंडासिंह फल विक्रेता भी थे, जिनकी लाहौरी दरवाजे के बाहर फलों की बहुत बड़ी दुकान और माडल टाउन में एक आलीशान कोठी थी। इस हिसाब से एक अलीशान कोठी उन्हें यहां भी मिलनी चाहिए थी, सो भगवान की कृपा से उन्हें सैयद करामतअली शाह की नई बनी बनायी कोठी मिल गई। जब मैं वहां पहुंचा तो गंडासिंह लाइब्रेरी की समस्त पुस्तकें एक-एक करके बाहर फेंक रहे थे और लाइब्रेरी को फलों से भर रहे थे। यह शेक्सपियर का सेट गया और तरबूज़ों का टोकरा भीतर आया ! ये गालिब के दीवान बाहर फेंके गए और महीलाबाद के आम भीतर रखे गए ! यह खलील जिबरान गए और खरबूजे आए ! थोड़े समय के बाद सब पुस्तकें बाहर थीं और सब फल भीतर। अफलातून के स्थान पर आलू बुखारे, सुकरात के स्थान पर सीताफल ! जोश के स्थान पर जामुन मोमिन के स्थान पर मोसम्बी, शेली के स्थान पर शहतूत, कीट्स के स्थान पर ककड़ियां, सुकरात के स्थान पर बादाम, कृश्न चन्दर के स्थान पर केले और ल. अहमद के स्थान पर लीमू भरे हुए थे।

 पुस्तकों की यह दुर्गत देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए और मैं एक-एक करके उठाकर अपनी पीठ पर लादने लगा। इतने में गंडासिंह अपनी फलों की लाइब्रेरी से बाहर निकल आए और एक नौकर से कहने लगे-इस गधे की पीठ पर सारी पुस्तकें लाद दो और एक फेरे में न जाएं तो आठ-दस फेरे करके ये सब पुस्तकें एक लारी में भरकर लखनऊ ले जाओ और नखास में बेंच डालो। अतएव गंडासिंह के नौकर ने ऐसा ही किया। मैं दिन भर पुस्तकें लाद लादकर लारी तक पहुंचाता रहा और जब शाम हो गई और अन्तिम पुस्तक भी लारी तक पहुंच गई, तब कहीं गंडासिंह के नौकर ने मुझे छोड़ा। मेरी पीठ पर उसने ज़ोर का एक कोड़ा जमाया और मुझे लात मार कर वहां से भगा दिया। मैंने सोचा-जिस शहर में पुस्तकों तथा महापण्डितों का ऐसा अनादर होता हो, वहां रहना ठीक नहीं। इसलिए मैंने वहां से प्रस्थान करने का संकल्प कर दिया। अपने शहर के दरो दीवार पर हसरत भरी निगाह डाली, घास के दो चार तिनके तोड़कर मुंह में रखे और दिल्ली की ओर चल खड़ा हुआ। सोचा दिल्ली स्वतंत्र भारत की राजधानी भी है और कला, विद्या राज्यों तथा राजनीति का केन्द्र भी। वहां किसी न किसी प्रकार गुज़ारा हो जाएगा।

2. करना प्रस्थान गधे का बाराबंकी से और जाना दिल्ली तथा वर्णन उस सुन्दर नगरी का ।

उन दिनों दिल्ली चलो का नारा प्रत्येक छोटे बड़े व्यक्ति की जबान पर था। और एक तरह से मैं भी इसी नारे से प्रभावित होकर दिल्ली जा रहा था। परन्तु यह मालूम न था कि रास्ते में क्या विपत्ति आएगी। रास्ते में एक स्थान पर मैंने देखा, एक मुसलमान बढ़ई शरअई दाढ़ी रखे हुए एक छोटी सी गठरी बगल में दबाए, एक छोटे से गांव से भागकर सड़क पर आ रहा था। मैंने सहानुभूति प्रकट करते हुए उसे अपनी पीठ पर सवार कर लिया और तेज़-तेज़ कदमों से चलने लगा, ताकि उस गांव के फसादी उसका पीछा न कर सकें। और हुआ भी यही, मैं बहुत आगे निकल गया और मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुआ कि चलो, मेरे कारण एक निर्दोष की जान बच गई। इतने में क्या देखता हूं कि बहुत से फसादी रास्ता रोके खड़े हैं।
एक फसादी ने हमारी ओर देखकर कहा-देखो, इस बदमाश मुसलमान को ! न जाने किस बेचारे हिन्दू का गधा चुराए लिए जा रहा है।  मुसलमान बढ़ई ने अपनी जान बचाने के लिए बहुत कुछ कहा, मगर किसी ने एक न सुनी। उसे फसादियों ने मौत के घाट उतार दिया। मुझे एक फसादी ने बांध लिया औए अपने घर की ओर चला।

जब हम आगे बढ़े तो रास्ते में मुसलमानों के कुछ गांव पड़ते थे। यहां पर-कुछ एक दूसरी ओर के फसादी आगे बढ़े। एक ने कहा-देखो, यह बेचारा गधा किसी मुसलमान का मालूम होता है, जिसे यह हिन्दू फसादी घेरे लिए जा रहा है। उस बेचारे ने भी अपनी जान बचाने के लिए बहुत कुछ कहा लेकिन किसी ने एक न सुनी और उसका सफाया हो गया और मैं एक मौलवी साहब के हिस्से में आया, जो मुझे उसी रस्सी से पकड़कर अपनी मस्जिद की ओर ले चले। रास्ते में मैंने मौलवी साहब के आगे बहुत अनुनय विनय की :
मैं-हज़रत ! मुझे छोड़ दीजिए।
मौलवी-यह कैसे हो सकता है ? तुम माले-गनीमत हो।

मैं-हुजूर ! मैं माले गनीमत नहीं हूं। गनीमत यह है कि मैं एक गधा हूं वरना अब तक मारा गया होता।
मौलवी-अच्छा, यह बताओ, तुम हिन्दू हो या मुसलमान ? फिर हम फैसला करेंगे।
मैं-हुजूर, न मैं हिन्दू हूं न मुसलमान। मैं तो बस एक गधा हूं और गधे का कोई मज़हब नहीं होता।
मौलवी-मेरे सवाल का ठीक-ठीक जवाब दो। मैं-ठीक ही तो कह रहा हूं। एक मुसलमान या तो हिन्दू गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा मुसलमान या हिन्दू नहीं हो सकता।

मौलवी-तू बहुत बदमाश मालूम होता है। हम घर जाकर तुझे ठीक करेंगे। मौलवी साहब ने मुझे मस्जिद के बाहर एक खूंटे से बांध दिया और स्वयं भीतर चले गए। मैंने मौका गनीमत जाना और रस्सी तोड़कर वहां से निकल भागा। ऐसा भाग, ऐसा भागा कि मीलों तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब मैंने यह निश्चय कर लिया कि इन संकीर्ण हृदय व्यक्तियों के झगड़े से एक गधे का क्या सम्बन्ध ! अब मैं न किसी हिन्दू की सहायता करूंगा, न मुसलमान की अतएव अब मैं दिन भर किसी वृक्ष की घनी छाया में पड़ा रहता या किसी जंगल अथवा मैदान में घास चरता रहता और रात होने पर अपनी यात्रा शुरू कर देता। इस प्रकार चलते-चलते बड़ी मुश्किल से कहीं छह सात महीनों के बाद दिल्ली पहुंचा। दिल्ली के भूगोल का वर्णन संक्षिप्त रूप से करता हूं, ताकि दिल्ली आने वाले यात्री मेरी जानकारी से पर्याप्त लाभ उठा सकें और धोखा न खाएं।

3. दिल्ली का भूगोल

इसके पूर्व में शरणार्थी, पश्चिम में शरणार्थी, दक्षिण में शरणार्थी और उत्तर में शरणार्थी बसते हैं। बीच में भारत की राजधानी है और इसमें स्थान-स्थान पर सिनेमा के अतिरिक्त नपुंसकता की विभिन्न औषधियों और शक्तिवर्धक गोलियों के विज्ञापन लगे हुए हैं, जिससे यहां की सभ्यता तथा संस्कृति की महानता का अनुभव होता है। एक बार मैं चांदनी चौक से गुज़र रहा था कि मैंने एक सुन्दर युवती को देखा, जो तांगे में बैठी पायदान पर पांव रखे अपनी सुन्दरता के नशे में डूबी चली जा रही थी और पायदान पर विज्ञापन चिपका हुआ था, असली शक्तिवर्धक गोली इन्द्रसिंह जलेबी वाले से खरीदिए !’ मैं इस दृश्य के तीखे व्यंग्य से प्रभावित हुए बिना न रह सका और बीच चांदनी चौक में खड़ा होकर कहकहा लगाने लगा। लोग राह चलते-चलते रुक गए और एक गधे को बीच सड़क में कहकहा लगाते देखकर हंसने लगे।

 वे बेचारे मेरी धृष्ट आवाज पर हंस रहे थे और मैं उनकी धृष्ट सभ्यता पर कहकहे लगा रहा था। इतने में एक पुलिस के संतरी ने मुझे डण्डा मारकर टाउन हाल की ओर ढकेल दिया। इन लोगों को मालूम नहीं कि कभी-कभी गधे भी इन्सानों पर हंस सकते हैं।

दिल्ली में आने वालों को यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली में प्रवेश करने के बहुत से दरवाज़े हैं। दिल्ली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, तुर्कमान दरवाज़ा इत्यादि। परन्तु आप दिल्ली में इनमें से किसी दरवाज़े के रास्ते भीतर नहीं आ सकते। क्योंकि इन दरवाज़ों के भीतर प्रायः गायें, भैंसें, बैल बैठे रहते हैं या फिर पुलिसवाले चारपाइयां बिछाए ऊंघते रहते हैं। हां, इन दरवाज़ों के दायें-बायें बहुत सी सड़के बनी हुई हैं, जिन पर चलकर आप दिल्ली में प्रवेश कर सकते हैं। अंग्रेजों ने दिल्ली में भी एक इंडिया गेट बनाया है, लेकिन इस गेट से भी गुज़रने का कोई रास्ता नहीं है। दरवाजे के ईर्द-गिर्द घूम-फिरकर जाना पड़ता है। संभव है, दिल्ली के घरों में भी थोड़े दिनों में ऐसे दरवाज़े लग जाएं; फिर लोग खिड़कियों में से कूदकर घरों में प्रवेश किया करेंगे।

दिल्ली में नई दिल्ली है और नई दिल्ली में कनाटप्लेस है। कनाटप्लेस बड़ी सुन्दर जगह है। शाम के समय मैंने देखा कि लोग लोहे के गधों पर सवार होकर इसकी गोल सड़कों पर घूम रहे हैं। यह लोहे का गधा हमसे तेज़ भाग सकता है, परन्तु हमारी तरह आवाज़ नहीं निकाल सकता। यहां पर मैंने बहुत से लोगों को भेड़ की खाल के बालों के कपड़े पहने हुए देखा है। स्त्रियां अपने मुँह और नाखून रंगती हैं, और अपने बालों को इस प्रकार ऊंचा करके बांधती हैं कि दूर से वे बिल्कुल गधे के कान मालूम होते हैं। अर्थात् इन लोगों को गधे बनने का कितना शौक है, यह आज मालूम हुआ।
कनाटप्लेस से टहलता हुआ मैं इंडिया गेट चला गया। यहां चारों ओर बड़ी सुन्दर घास बिछी थी और उसकी दूब तो अत्यंत स्वादिष्ट थी। मैं दो तीन दिन से भूखा तो था ही, बड़े मजे से मुंह मार-मारकर चरने लगा। इतने में एक ज़ोर का डंडा मेरी पीठ पर पड़ा। मैंने घबराकर देखा, एक पुलिस का सिपाही क्रोध भरे स्वर में कह रहा था:
‘‘यह कमबख्त गधा यहां कैसे घुस आया ?’’

मैंने पलटकर कहा, ‘‘क्यों भाई, क्या गधों को नई दिल्ली में आने की मनाही है ?’’
मुझे बोलता देखकर वह सटपटा गया। शायद उसने आज तक किसी गधे को बोलते नहीं सुना था। फटी-फटी आंखों से मेरी ओर देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसका आश्चर्य कुछ कम हुआ, तो मुझे रस्सी में खींचकर थाने ले चला। थाने में ले जाकर उसने मुझे कान्स्टेबल के सामने जा खड़ा किया।
हेड कान्स्टेबल ने बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखकर कहा, ‘‘इसे यहां क्यों लाए हो, रामसिंह ?’’
रामसिंह ने कहा, हुजूर ! यह एक गधा है।’’
‘‘गधा तो है, यह तो मैं भी देख रहा हूं, मगर तुम इसे यहां क्यों लाए हो ?’’
‘‘हुजूर, यह इंडिया गेट पर घास चर रहा था।’’

‘‘अरे, घास चर रहा था तो क्या हुआ ! तुम्हारी बुद्धि तो कहीं घास चरने नहीं चली गई ? इसे यहां क्यों लाए ? लेकर जाकर कांजी हाउस में बंद कर देते। इस बेज़बान जानवर को थाने में लाने की क्या ज़रूरत थी।’’
रामसिंह ने रुकते-रुकते मेरी ओर विजयी दृष्टि से देखकर कहा, ‘‘हुजूर यह बेजबान नहीं है, यह बोलता है !’’ अबकी हेड कान्स्टेबल बहुत हैरान हुआ, लेकिन पहले तो उसे विश्वास न आया; फिर बोला, ‘‘रामसिंह तुम्हारा दिमाग तो ठीक है।’’
‘‘नहीं, यह बिलकुल ठीक कहता है, हेड कान्स्टेबल साहिब !’’ मैंने धीरे से सिर हिलाकर कहा।

हेड कान्स्टेबल अपनी सीट से उछला, मानो उसने कोई भूत देख लिया हो। वास्तव में उसका आश्चर्य अनुचित भी नहीं था, क्योंकि नई दिल्ली में ऐसे तो बहुत लोग होंगे जो इन्सान होकर गधों की तरह बातें करते हों लेकिन एक ऐसा गधा, जो गधा होकर इन्सानों की सी बात करे, हेड कान्स्टेबल ने आज तक देखा सुना न था। इसलिए बेचारा चकरा गया। उसकी समझा में न आया कि क्या करे। आखिर सोच-सोचकर उसने रोजनामचा खोला और रपट दर्ज़ करने लगा।
उसने मुझसे पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम ’’
‘‘गधा।’’
‘‘बाप का नाम ?’’
‘‘गधा।’’
‘‘दादा का नाम ?’’
‘‘गधा।’’
‘‘यह क्या बकवास है ?’’ हेड कान्स्टेबल ने क्रोधपूर्वक कहा, ‘‘सबका एक ही नाम है ! यह कैसे हो सकता है। अब मुझे देखो, मेरा नाम ज्योतिसिंह है।
मेरे बाप का नाम प्यारेलाल था। मेरे दादा का नाम जीवनदास था। हमारे यहां नाम बदलते रहते हैं। तुम ज़रूर झूठ बोलते हो।’’

ज्योतिसिंह मुझे सुन्देह की नज़रों से देखने लगा।
मैंने कहा, ‘‘हुजूर ! मैं झूठ नहीं बोलता, सच कहता हूं कि हमारे यहां नाम नहीं बदलते। जो बाप का नाम होता है, वही बेटे का, वही पोते का।’’
‘‘इसके क्या लाभ ?’’ ज्योतिसिंह ने पूछा।
‘‘इससे वंशावली मिलाने में सुविधा होती है। उदाहरणस्वरूप क्या आप मुझे अपने परदादा के परदादा का नाम बता सकते हैं ?’’ मैंने ज्योतिसिंह से पूछा।

‘‘नहीं।’’ ज्योतिसिंह ने अफसोस प्रकट किया।
‘‘मगर मैं बता सकता हूं। आपके यहां वह आदमी बड़ा खानदानी समझा जाता है, जो आप से चार सौ, छह सौ आठ सौ, सोलह सौ साल पहले के अपने पुरखे का नाम बता सके। देखिए, मैं आपको आज से सोलह सौ क्या, सोलह लाख साल पहले के अपने पुरखे का नाम बता बताता हूं-श्री गधा ! बोलिए, फिर क्या हम गधे आपसे बेहतर खानदान के हुए या नहीं ?’’
ज्योतिसिंह ने बड़े ध्यान से मेरी ओर देखा। उसका सन्देह और बढ़ गया। उसने धीमे स्वर में रामसिंह के कान में कानाफूसी करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह शख्स बड़ा खतरनाक मालूम होता है। हो न हो, यह कोई विदेशी जासूस है, जो गधे के लिबास में नई दिल्ली के चक्कर लगा रहा है !’’

रामसिंह ने कहा, ‘‘हुजूर ! मैं तो समझता हूं, इसकी खाल उतरवा कर देखना चाहिए, भीतर से खुफिया जासूस निकल आएगा। फिर हम इसे फौरन गिरफ्तार कर लेंगे।’’
ज्योतिसिंह ने कहा, ‘‘तुम बिल्कुल ठीक कहते हो। लेकिन इसके लिए सब इन्सपेक्टर चाननराम की आज्ञा लेना बहुत जरूरी है। चलो, इसे उनके सामने ले चलें।’’
मेरे कान में भी कुछ भनक पड़ गई थी, लेकिन मैं कान लपेटे चुप रहा और उन दोनों के साथ भीतर के कमरे में सब इन्सपेक्टर चाननराम के सामने चला। चाननराम की मूंछें बिच्छू के डंक की तरह खड़ी थीं और उसका सुर्ख चेहरा हर समय तमतमाया रहता था। चाननराम को आज तक किसी ने हंसते या मुस्कराते हुए नहीं देखा था, इसलिए लोग उसे एक योग्य पुलिस अफसर समझते थे। चाननराम ने उनकी पूरी बात सुनकर मेरी ओर घूरकर देखा और कहा, ‘हूं ! तो तुम पाकिस्तान के जासूस हो ?’’

मैं चुप रहा।
चाननराम ने ज़ोर से मेज में मुक्का मारकर कहा, ‘‘समझ गया, तुम रूस के एजेण्ट हो।’’
मैं फिर भी चुप रहा।
चाननराम ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘कमबख्त ! बदमाश ! कम्युनिस्ट ! मैं तुम्हारी हड्डी-पसली एक कर दूंगा, वरना जल्दी बताओ तुम कौन हो ?’’
यह कहकर चाननराम मुझे मुक्कों, लातों और ठोकरों से मारने लगा। मारते-मारते जब वह बिल्कुल बेदम हो गया तो मैंने ज़ोर से एक दर्द भरी आवाज़ की। आवाज़ करते ही वह रुक गया और पहले मेरी ओर आश्चर्य से देखकर और फिर अत्यन्त क्रोध से ज्योतिसिंह और रामसिंह की ओर देखकर बोला, ‘‘अरे, यह तो बिलकुल गधा है। और तुम कहते हो, यह कोई विदेशी जासूस है। तुम मुझसे मज़ाक करते हो, मैं अभी तुमको डिसमिस करता हूं।’
रामसिंह और ज्योतिसिंह दोनों भय से थरथर कांपने लगे। हाथ जोड़कर बोले, ‘‘हुजूर ! अभी यह बाहर के कमरे में बोल रहा था। साफ-साफ बोल रहा था ! बिलकुल इन्सानों की तरह।’’

‘‘तुमने सपना देखा होगा या काम करते-करते तुम्हारा दिमाग खराब हो गया होगा। जाओ, इस गधे को मेरे सामने से ले जाओ ओर कांजी-हाउस में बन्द कर दो। अगर तीन चार दिन में इसका मालिक न आए तो नीलाम कर देना।’’
मैं खुशी-खुशी बाहर आया। मेरी चाल काम कर गई। अगर मैं बोलता तो वे लोग निश्चय ही मेरी खाल उधेड़कर देखते कि भीतर कौन है ?
इसके बाद तीन-चार दिन तो क्या एक हफ्ते तक कोई मालिक न आया। फिर मुझे नीलाम कर दिया गया। अबके मुझे रामू धोबी ने खरीद लिया जो यमुनापार कृष्णनगर में रहता था।

4. जाना यमुनापार रामू धोबी के घर और मुलाकात करना गधे का म्युनिसिपल कमेटी के मुहर्रिर से

रामू धोबी किसी ज़माने में मोहल्ला सुईवालान में रहता था, लेकिन जब उसके बहुत से ग्राहक पाकिस्तान जा बसे और जो शेष रह गए वे इतने निर्धन हो गए कि स्वयं अपने हाथों कपड़े धोने लगे, तो रामू धोबी भी वहां से निकलकर यहां यमुनापार कृष्णनगर में आ बसा। यहां मुझे बहुत बड़ा परिश्रम करना पड़ा। रामू सुबह उठते ही कपड़ों की गठरियां मेरी पीठ पर लादकर चल देता और यमुना के किनारे पानी में खड़ा होकर ‘छुआ छू’ शुरू कर देता। दोपहर को उसकी पत्नी खाना लेकर आती थी और कुछ धुले हुए कपड़े मेरी पीठ पर लादकर लोहा करने ले जाती थी।

मैं दिन भर यमुना किनारे घास चरता रहता या पुल पर से गुज़रते लोगों को देखता रहता। दिन ढले रामू फिर मेरी पीठ पर कपड़े लादकर और स्वयं भी सवार होकर वापस घर चला आता और मुझे एक खूंटे से बांधकर, मेरे सामने घास डालकर थका हारा चारपाई पर पड़ जाता। सुबह से शाम तक कुछ इसी प्रकार जीवन व्यतीत होता था-एक खूंटे से दूसरे खूंटे तक; घर से घाट और घाट से वापस घर तक। बीच में न कोई पुस्तक आती, न ही कोई समाचार-पत्र। संसार में क्या हो रहा है ? विज्ञान किसे कहते हैं ? सिनेमा क्या होता है ?

सभ्यता तथा संस्कृति, नृत्य तथा सौन्दर्य, इन सब बातों से मेरा तथा रामू का जीवन बिल्कुल खाली था। मैं तो खैर एक गधा था, लेकिन मैं देख रहा था कि रामू और उसके घर वाले और उसके कमरे के आस-पास रहने वाले लगभग एक सा जीवन बिल्कुल मेरे जैसा जीवन व्यतीत करते थे। कितने अच्छे, अच्छे कपड़े उन लोगों के यहां से धुलने को आते थे! सुन्दर छींटे, सुकोमल फूलदार के और बादलों की तरह उड़ते हए दुपट्टे। लेकिन रामू की पत्नी या उसकी बेटी के लिए एक भी कपड़ा ऐसा नहीं था। शाम को जब जमुना से लौटते तो प्रतिदिन सड़क के किनारे एक नये बने हुए सिनेमा के बाहर दर्शकों की भीड़ देखते, लेकिन रामू केवल सिनेमा के सुन्दर विज्ञापनों को देखकर और एक आह भरकर आगे बढ़ जाता । उसका जी तो चाहता था कि प्रतिदिन सिनेमा देखे और उसके साथ-साथ दूसरे धोबियों का भी यही जी चाहता था लेकिन जब वे अपनी जेब में इतने पैसे देखते कि या तो टिकट आ जाए या आटा, तो विवश होकर आटा ले आते। कभी-कभी कोई मनचला आटा छोड़कर सिनेमा का टिकट खरीद लेता तो उस दिन घर में बड़ा हंगामा होता था। एक बार रामू ने भी ऐसा ही किया था। उस दिन न केवल उसने ताड़ी पी बल्कि सिनेमा का टिकट भी खरीद लिया। वह मुझे अपने एक मित्र तांगे वाले के हवाले करके भीतर चला गया था।

सिनेमा हाल के बाहर तीन चार तांगे खड़े थे, जिनके घोड़े हिनहिनाकर एकदूसरे से बातचीत कर रहे थे, एक घोड़ा, जिसका रंग मुश्की था और माथा सफेद और जो किसी प्राइवेट तांगे का घोड़ा था और इसलिए जरा अभिमानी दिखाई देता था; दुसरे तांगे के घोड़े से कह रहा था, "मेरा मालिक मार-धाड़ की फिल्में बहुत पसन्द करता है। ऐसी फिल्म देखकर जब बाहर निकलता है तो खूब जोरों से तांगा चलाने लगता है। मुझे याद है, एक बार सिनेमा से वापस आते हुए उसने भरे बाजार में मुझे सरपट दौड़ाना शुरू कर दिया, जैसा कि उसने फिल्म में देखा था। कई आदमी घायल हो गये थे और एक बच्चा अस्पताल में मर भी गया था। लेकिन मेरा मालिक बहत अमीर है। किसी न किसी तरह उसने साबित कर दिया कि वह शराब के नशे में धुत था, इसलिए केवल जुर्माना देकर छूट गया।" "दूसरा घोड़ा बोला, "मेरे तांगे पर दो औरतें आई हैं। वे केवल यह देखने आई हैं कि मधुबाला ने कौन-से फैशन के कपड़े पहने हैं। बल्कि एक औरत ने तो अपने बटुवे में से पेंसिल और कागज निकालकर दूसरी औरत को दिखाया कि वह किस तरह हाल के अन्दर बैठे-बैठे मधुबाला के नये पहनावे का नमूना उतारेगी।"

तीसरा घोड़ा बोला, "मेरा मालिक बड़ा इज्जतदार है। वह हफ्ते में एक दिन यहां अपनी प्रेमिका को, जो एक गरीब कपड़ा रंगने वाले की बीवी है, सिनेमा दिखाने लाता है। वह अगर चाहे तो उसे नई दिल्ली के अच्छे से अच्छे सिनेमा में ले जा सकता है। मगर उसे अपनी इज्जत का बहुत ख्याल है।" मैंने झिझककर (क्योंकि वे बड़ी ऊंची जाति के घोड़े थे) मगर जरा साहस करके उन घोड़ों की बातचीत में भाग लेते हुए पूछ ही लिया, “क्यों जी, यह सिनेमा क्या होता है?"

मेरा प्रश्न सुनकर उन तीनों घोड़ों ने बड़ी घृणा से मेरी ओर देखा, जैसे कहना चाहते हो- 'गधा ही है न आखिर इसके दूसरे ही क्षण वे तीनों हिनहिनाकर हंस पड़े और मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बिना फिर अपनी बातों में लीन हो गए।

मुश्की घोड़े ने घण्टी की आवाज सुनकर कहा, “इण्टरवल हो रहा है शायद।"
जब सिनेमा समाप्त हो गया तो रामू धोबी ताड़ी के नशे में बेसुध मेरी पीठ पर लदा हआ उसी नई फिल्म के गीत गाता हआ, जो अभी-अभी उसने देखी थी, घर की ओर चला। इससे पहले वह मुझे घर का रास्ता बताता था; आज मुझे बताना पड़ा। कई बार तो रामू गिरते-गिरते बचा। आखिर किसी न किसी प्रकार मैं उसे सम्भालकर घर ले गया, जहां उसकी यह हालत देखकर उसकी पत्नी ने उसकी खूब मरम्मत की, क्योंकि रामू की फिजूलखर्ची के कारण आज घर में चूल्हा नहीं सुलगा था और बच्चे भूख से बिलख-बिलखकर सो गये थे। पति-पत्नी में खूब लड़ाई हुई।

पत्नी कह रही थी, "तुमने ताड़ी क्यों पी? सिनेमा क्यों देखा? जानते नहीं थे, यह सब कुछ करोगे तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा?" और रामू हाथ हिलाहिलाकर, सिर झुका-झुकाकर कह रहा था, “खूब जानता था मगर मजबूर था। दिमाग में हर रोज कपड़े इस तरह छुआ-छू करते हैं कि मालूम होता है, दिमाग इनके शोर से फट जाएगा। ऐसे वक्त में ताड़ी पीने को जी चाहता है, ताकि वह शोर सुनाई न दे। सिनेमा क्या हर रोज देखता हूँ? कसम ले लो, आज छः महीने बाद गया हूं-बिल्कुल मजबूर होकर। जी चाहता था। इस गन्दी गली की मोरियों की बू सूंघते-सूंघते परेशान हो गया, इसलिए वहां चला गया। क्या बुरा किया? वहां एक सुन्दर घर देखा। सुन्दर कपड़े, सुन्दर नाच, साफ-सुथरे बच्चे। औरतें ऐसी जो हमारे मुहल्ले में तो नजर ही नहीं आती।" रामू की पत्नी ने जोर से एक धप जमाई, "मुआ! घर भर को भूखा रखकर तमाशा देखता है।"

रामूने कहा, "मैं भी तो भूखा रहा हूं। सच कहता हूं, पेट की भूख बुरी बला है। लेकिन कभी-कभी कोई दूसरी भूख भी ऐसी जाग पड़ती है कि रहा नहीं जाता। क्या हुआ जो धोबी हं। आखिर हूं तो इन्सान ही। पेट की भूख के सिवा और भी भूख लगती है; ऐसी कि मन भीतर ही भीतर भट्टी की तरह सुलगने लगता है।"

उस रात मुझे घास नहीं मिली। मगर मैं स्वयं भूखा रहकर भी सोचने लगा कि रामू ठीक कहता है। रामू कोई मेरी तरह गधा तो है नहीं, जिसे केवल कपड़े ढोने और दो वक्त के चारे से ही काम हो। रामू आखिर एक इन्सान है, जिसे पेट की भूख के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की भूखों से वास्ता पड़ता है। अच्छे कपड़े की भूख, सुन्दर आकृति देखने की भूख, सुन्दर क्षितिज देखने की भूख। कई बार जमुना के किनारे घास चरते-चरते मैंने जमुना के पानी में सूरज के सोने को घुलते हुए देखा है और उसके असीम सौन्दर्य से उन्मत्त भी हुआ हूं लेकिन मैंने यह भी देखा है कि ठीक उसी समय बेचारा रामू गर्दन झुकाएँ कमर तक पानी में डूबा हुआ, उस क्षितिज के सौन्दर्य से विमुख हो कपड़ों को बराबर कूट रहा है...और उसे बिल्कुल मालूम नहीं कि उसके आस-पास सौन्दर्य का कितना बड़ा भण्डार लुटा जा रहा है। मैं एक गधा होकर इस सौन्दर्य से प्रभावित हो सकता हूं, लेकिन रामू एक मनुष्य होकर भी इससे आनन्दित नहीं हो सकता। आश्चर्य है, इस जीवन में, इस समाज में, आज भी लाखों-करोड़ों मनुष्यों के जीवन गधों से भी तुच्छ हैं।

उस रात मुझे स्वयं भूखा रहकर इस प्रकार के बहुत से ख्याल आए लेकिन इसके बाद बहुत दिनों तक वहां टिकने को न मिला। ऐसा नहीं कि मैंने बिना जाने-बूझे वहाँ से भाग जाने का प्रयत्न किया हो; हालांकि वहां मुझे बहुत कष्ट था-एक तो समाचार-पत्र पढ़ने को नहीं मिलता था; कई दिनों से किसी पुस्तक की शक्ल तक नहीं देखी थी। जमुनापार आमतौर पर जिन लोगों से वास्ता पड़ता था, वे स्वयं इतने निर्धन थे कि पुस्तकें नहीं खरीद सकते थे। बहुत से लोग मूढ और अनपढ़ थे। यहां प्रायः गाली-गलौज, झगड़ा आदि होता रहता था। धोबियों के मोहल्ले में, जहां मैं रहता था, प्रतिदिन किसी न किसी बात पर लड़ाई होती थी। क्रोध धोबी के गधे पर उतरता था या फिर अपने बीवी-बच्चों पर। दोष किसका होता था? शायद उन परिस्थितियों का, जिन्होंने अच्छे-भले मनुष्य को पशु बना दिया था। अब आप परिस्थितियों को डण्डे से तो नहीं पीट सकते। यह हिंसा होगी। तो चलिए, घर के गधे को ही पीट लीजिए। कानून आपको इसकी आज्ञा देता है। रामू के यहां, प्रत्यक्ष है, मुझ जैसे पढ़े-लिखे गधे को बहुत कष्ट झेलने पड़े। फिर भी मैंने उसका साथ नहीं छोड़ा; क्योंकि रामू एक दैयानतदार धोबी था। सुबह से शाम तक घर चलाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न करता था। ऐसे व्यक्ति का साथ छोड़ने को जी नहीं चाहता था। मगर करनी भगवान् की यह हुई कि एक दिन रामू जमुना में कपड़े धो रहा था, एक मगरमच्छ ने उसकी टाँग खींच ली। रामू ने अपने आपको छुड़ाने की बहुत कोशिश की। दोपहर का समय था। पुल के ऊपर से सैकड़ों मुसाफिर गुजर रहे थे। एक रेलगाड़ी गुजर रही थी। पुलिस के सन्तरी भी पुल के नाके पर खड़े थे। रामू ने बहुतेरा शोर मचाया, लेकिन मगरमच्छ ने एक न सुनी। वह रामू को घसीटकर गहरे पानी में ले गया।

रामू के ग्राहकों को रामू के मरने का अफसोस तो जरूर हुआ, लेकिन कपड़ों के खो जाने का उससे भी अधिक हुआ, क्योंकि रामू और मगरमच्छ की लड़ाई में बहुत-से कपड़े नदी में बह गए थे। कई एक ग्राहकों ने तो रस्मी अफसोस के तुरन्त बाद रामू की पत्नी से कपड़ों के लिए तकरार शुरू कर दी-'रामू बहुत अच्छा धोबी था, मगर हमारी 'शिफान' की साड़ी कौन-सी बुरी थी। और वह नई, साटन की सलवार जो अभी-अभी गुलजार टेलर मास्टर से सिलवाई थी, कहां है वह? जरा वह मैले कपड़ों की गठरी तो खोलो!

मुझे उन लोगों की वह हालत देखकर बहत दुःख हुआ। हम गधों में भी यदि कोई मर जाता है, तो हम उसके बीवी-बच्चों से ऐसा व्यवहार नहीं करते।

कुछ दिनों में ही रामूकी पत्नी और उसके तीन बच्चों की हालत बिगड़ गई। उसके घर में खाने को कुछ नहीं था। फाके पर फाके लग रहे थे। धोबी मोहल्ले के सरपंच ने, जो एक समय रामू की नौजवान पत्नी पर आंख रखता था, थोड़ा-सा आटा और दाल रामू के घर भिजवा दिया। शाम को वह स्वयं भी ताड़ी पीकर आ गया और रामू की पत्नी से कहने लगा कि वह उसके घर चली चले।

रामू की पत्नी ने उसे खूब फटकारा, गालियां देकर घर से निकाल दिया और सिर पकड़कर रोने लगी। मैंने उसे दिलासा देते हए कहा, "मालकिन! घबराती क्यों हो? सब ठीक हो जाएगा।"

रामू की पत्नी ने जब मुझे बोलते हुए सुना तो पहले तो उसे विश्वास न आया, पर जब मैंने वही बात दोबारा कही तो आश्चर्य से उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, क्योंकि नई दिल्ली से आने के बाद आज तक मैंने किसी मनुष्य से उसकी बोली में बात नहीं की थी और रामू के यहां तो इस प्रकार की बातचीत का प्रश्न ही पैदा न हो सकता था। लेकिन अब, जब रामू की पत्नी ने मुझे मनुष्य की तरह बात करते हए सुना, तो बिल्कुल घबरा गई। आखिर बड़ी मुश्किल से मैंने किसी न किसी प्रकार समझाया कि इसमें कोई विशेष बात नहीं है। यह कोई चमत्कार नहीं है। विशेष परिस्थितियां थीं, जिनमें मैंने मनुष्यों की बोली सीख ली।

मैंने रामू की पत्नी से कहा, “मालकिन! बेशक मैं गधा हूं, लेकिन इतने दिनों तक तुम्हारे घर का नमक खाया है। अब तुम चिन्ता न करो। तुम घर में इन तीनों बच्चों को लेकर बैठो। मैं बाहर जाता हूं और देखता हूं, क्या हो सकता है।"

"अब क्या हो सकता है?" रामू की पत्नी ने कहा, "कोई मदद नहीं करेगा। हम गरीब आदमी है।"

“गरीब हैं तो क्या हुआ," मैंने किंचित् गौरव से कहा, "अब राज्य हमारा है। जीवन हमारा है। समाज हमारा है। अब हम स्वतन्त्र है; जो चाहे कर सकते हैं। तुम चिन्ता न करो। अवश्य ही कुछ न कुछ हो जाएगा। मैं आज ही तुम्हारी सहायता के लिए म्युनिसिपल कमेटी में प्रार्थना-पत्र लेकर जाता हूं।"

कृष्णनगर की म्युनिसिपल कमेटी का मुहर्रिर अपने एक मित्र और हेडक्लर्क के साथ मेज पर रजिस्टर रखे और रजिस्टर पर ताश के पते फैलाए विचित्र प्रकार के मूड में बैठा था। मैं धीरे से उसके पीछे जा खड़ा हुआ और धीमे से बोला, "हजूर, बड़ी मुसीबत है।"

वे लोग ताश खेलने में इतने मगन थे कि उन्होंने सब सुनी अनसुनी कर दी। केवल मुहर्रिर ने, शायद यह समझकर कि मैं उसका कोई मित्र हूं जो उसके पीछे खड़ा खेल देख-देखकर सहानुभूति प्रकट कर रहा था, मेरी ओर देखे बिना कहा, "हां भाई, देखो न अजीब मुसीबत है, कोई चाल समझ में नहीं आती। अगर यह (अपने पते की ओर संकेत करके) फेंकता हूं तो रंग कट जाएगा और अगर यह (दूसरा पता दिखाकर) चलता हूं तो इससे बड़ा पता अभी तक नहीं निकला और अगर यह (तीसरा पत्ता दिखाकर) चलता हूं...."

मैंने बात काटकर कहा, "वह रामू धोबी मर गया।" "मरने दो यार," मुहर्रिर ने क्रोध से चिल्लाकर कहा, "यहां अपना हुक्म का बादशाह मरा जा रहा है, तुम धोबी को चीख रहे हो।" फिर एकाएक वह मेरी ओर मुड़ा और अपने पीछे किसी मनुष्य की बजाय एक गधे को खड़ा पाया, तो एकदम लाल-पीला होकर चपरासी से बोला, "अब क्या गधे भी हमारे दफ्तर में घुसने लगे? निकालो इस कम्बख्त को बाहर!"

चपरासी ने डण्डा मारकर मुझे बाहर निकाल दिया। वे लोग फिर ताश खेलने लगे। मैं फिर थोड़ी देर के बाद म्यूनिसिपल कमेटी के मुहर्रिर के पास जा खड़ा हुआ। धीरे से दोनों लम्बे कान जोड़कर उसे नमस्ते की और बड़े दु:खभरे स्वर में कहा, "हजूर, वह रामू धोबी...."

मुहर्रिर ने मुड़कर मुझे देखा। वह कुछ ऐसा बदमाश आदमी था कि जो बोलते गधे से भी प्रभावित न हुआ। ऐसा मालूम होता था जैसे जीवन भर बोलते गधों ही से उसका पाला पड़ता रहा है। उसने मेरी ओर देखकर बड़े रौबीले स्वर में कहा, "जल्दी बोलो, क्या काम है?"

"निवेदन यह है माई-बाप, कि सेवक रामू धोबी का गधा है। राम धोबी तीन दिन हुए जमुना घाट पर कपड़े धोते-धोते एक मगरमच्छ के हमले का शिकार हो गया। उसकी बीवी और बच्चे भूखे हैं।"

"तो मैं क्या कर सकता हूँ?" मुहर्रिर ने चिल्लाकर कहा, "मैंने कोई अनाथालय नहीं खोल रखा!"

मैंने कहा, "हजूर, घाट पर धोबियों से टैक्स लेते हैं। पुल पर से जब कोई गधा या बैल याँ कोई और जानवर सामान उठाए गुजरता है, तो आप उससे चुंगी लेते हैं। आप इतने सारे महसूल और कस्टम वसूल करते हैं और एक गरीब धोबी के भूखे बीवी-बच्चों के लिए कोई प्रबन्ध नहीं कर सकते?"
"क्यों प्रबन्ध करें? धोबी को मगरमच्छ ने मारा है, हमने नहीं।"

"वाह! यह भी खूब रही! और वह जो आप घाट का टैक्स वसूल करते हैं, वह किसलिए? घाट-टैक्स आप वसूल करें और फिर अगर उसी घाट पर कोई धोबी किसी मगरमच्छ का शिकार हो जाए तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? हम कहां जाकर हर्जाना वसूल करेंगे, क्योंकि अगर म्युनिसिपल कमेटी घाट का टैक्स लेती है तो मगरमच्छ से बचाव का प्रबन्ध भी उसको करना पड़ेगा।"

मुहर्रिर बड़ा चालाक था। बोला, धोबियों को चाहिए, दरिया में रहकर मगरमच्छ से वैर मोल न लें, वरना उनका वही हाल होगा, जो रामू धोबी का हुआ।"
मैंने कहा, "आप बात तो उड़ाइये नहीं, साफ-साफ बताइये, आप इस मामले में क्या कर सकते हैं?"

मुहर्रिर ने देखा, मैं किसी तरह उसका पीछा छोड़ने पर तैयार नहीं, तो उसने जरा नर्म होकर कहा, "भाई, जहां यह घटना हुई है, वह इलाका हमारे इलाके में नहीं है। जमुना का घाट तो दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के पास है। दिल्ली शहर टाउनहाल में जाओ-चलो भाई पत्ता।"

वे लोग ताश खेलने में लीन हो गये और मैंने जमुनापार जाने की ठान ली।
पुल पार करते समय सन्तरी ने मुझे रोका। बोला, “ओ आवारागर्द गधे। किधर जाता है।"
"टाउनहाल।" मैंने कट से उत्तर दिया। "तेरा मालिक कहां है?" सन्तरी ने मुझे घूरकर पूछा। मैंने कहा,
“मेरा मालिक कोई नहीं है। आज से मैं आजाद हूँ।"
सन्तरी बोला, "यह कैसे हो सकता है? आजादी का मलतब यह थोड़े ही है कि मालकियत भी खत्म हो गई। तेरा कोई न कोई मालिक जरूर होगा, जिसका तू हुक्म मानता है।"
मैंने पूछा, “अच्छा बता तेरा मालिक कौन है, जिसका तू हुक्म मानता है।"
"हेड कान्स्टेबल।"
"और हेड कान्स्टेबल का मालिक कौन है?"

"इन्स्पेक्टर" सन्तरी ने बिगड़कर कहा, "और कौन हो सकता है? इन्स्पेक्टर से ऊपर डी. एस. पी., डी. एस. पी. से ऊपर सुपरिण्टेण्डेण्ट पुलिस। इस तरह यह सिलसिला वजीर तक है।"
"वजीर का मालिक कौन है?"
“वजीर को स्टेट बैंक से तनख्वाह मिलती है, इसलिए स्टेट बैंक उससे बड़ा हुआ।"
“और स्टेट बैंक से बड़ा कौन है?"
"स्टेट बैंक में रुपया होता है न," सन्तरी ने क्रोध से कहा, "इतना भी नहीं समझते, स्टेट बैंक से बड़ा रुपया हुआ।"
"अच्छा, तो रुपये से बड़ा कौन है?"

"रुपये से बड़ा कौन है?" सन्तरी ने मेरा प्रश्न सुनकर सिर खुजलाया। कुछ क्षणों तक चुप रहा, फिर मेरी ओर देखकर बोला, "रुपये से बड़ा कौन है, यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया। तुम बता सकते हो?" सन्तरी ने मुझसे पूछा।

"मैंने कहा, "मैं तो एक गधा हूँ। इस कठिन प्रश्न का उत्तर कैसे दे सकता हूँ? हां, अगर तुम मुझे टाउनहाल जाने दो-क्योंकि मैं रामू धोबी की विधवा पत्नी के सम्बन्ध में रुपये की सहायता के लिए वहां जा रहा हूँ-वहां जाकर अगर मुझे पता चल गया कि रुपये से बड़ा कौन है, तो तुम्हें वापस आकर जरूर बता दूंगा।"

"जरूर?" सन्तरी ने बड़ी अधीरता से पूछा।
“जरूर," मैंने वायदा करते हुए कहा, "मगर तुम इतने बेचैन क्यों नजर आते हो?"
सन्तरी ने कहा, “क्योंकि अगर मुझे पता चल जाए कि रुपये से बड़ा कौन है, तो मैं उसके यहां नौकरी कर लूंगा।"

"आदमी होशियार मालूम होते हो।" मैंने सन्तरी की प्रशंसा करते हए कहा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ जमुना के इस पार आ रहा। घण्टों भटकने के बाद आखिर टाउनहाल मिल ही गया। टाउनहाल के भीतर घुसते ही मैंने सोचा कि अब किसी छोटे-मोटे मुहर्रिर या क्लर्क से बातचीत करने में समय नष्ट नहीं करूंगा। सीधे चलकर कमेटी के चेयरमैन से मिल लेना चाहिए और अब के रौब डालने के लिए अंग्रेजी में बात करना ठीक होगा। यह सोचकर मैं सीधे इन्क्वायरी में घुस गया और क्लर्क से बड़ी मंजी हुई अंग्रेजी में बात करते हुए पूछा, "चेयरमैन साहब का दफ्तर किधर है?"

इन्क्वायरी क्लर्क एक गधे को अंग्रेजी बोलते देखकर भौंचक्का रह गया। तुरन्त अपनी सीट पर से उठकर खड़ा हुआ और बड़े सभ्य स्वर में बोला, "हजूरा पन्द्रह नम्बर का कमरा है। ऊपर लिफ्ट से चले जाइए।" उसने एक चपरासी मेरे साथ कर दिया। चपरासी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा तो सही, मगर चुप रहा। चपरासी ने मुझे लिफ्टमैन के हवाले किया। लिफ्टमैन ने बड़ी शिष्टतापूर्वक लिफ्ट का दरवाजा खोला।
मैंने लिफ्ट में प्रवेश करते हए देखा, लिफ्ट के भीतर लिखा था, 'छः व्यक्तियों के लिए'। लेकिन उस समय मैं अकेला ही उसमें सफर कर रहा था। लिफ्टमैन ने बाकी आदमियों को बाहर ही रोक दिया था। जीवन में पहली बार-मुझे अनुभव हआ कि एक गधा बराबर है छः आदमियों के। लिफ्टमैन ने ऊपर जाकर लिफ्ट रोकी। मैं सीधा दुलती चलता हआ चेयरमैन के दफ्तर के बाहर पहुंच गया और बाहर बैठे चपरासी से बड़े रौबीले स्वर में बोला, "साहब से कहो, मिस्टर डंकी ऑफ बाराबंकी पधारे हैं।

5. मुलाकात करना गधे का दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के चेयरमैन से और क्रुद्ध होना चेयरमैन का और बुलाया जाना फायर बिग्रेड इंजन का

चपरासी का संकेत पाते ही मैं कमरे के भीतर चला गया और जोर से 'गुडमार्निग' झाड़ दी। मुझे भय था कि यदि हिन्दुस्तानी भाषा में बातचीत की तो बिल्कुल गधा समझा जाऊंगा। दिल्ली के दफ्तरों के संक्षिप्त अनुभव से मैं जान गया था कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी यहां अंग्रेजी भाषा का राज्य है। आप जब तक उर्दू या हिन्दी में बातचीत करते रहेंगे, दफ्तर के लोग ध्यान नहीं देंगे, लेकिन ज्योंही अंग्रेजी दांत दिखाएंगे त्योंही पलटकर आपकी बात सुनेंगे, जैसे आप सीधे ननिहाल से चले आ रहे हों; और बात सुनते समय ऐसी मोहिनी मुस्कराहट उनके चेहरे पर होगी जैसे काम आपको उनसे नहीं, उन्हें आपसे है।

चेयरमैन साहब का रंग सांवला, कद नाटा और चेहरा बड़ा गम्भीर था। उनकी आंखों से ऐसी चालाकी और दूरदर्शिता टपकती थी जो कम से कम पांच-छ: इलेक्शन लड़ने के बाद ही आंखों में आ सकती है। आदमी बड़े घाघ थे, इसलिए एक गधे को कमरे में आते देखकर केवल क्षण भर के लिए चौंके फिर तुरन्त सम्भल गए और इस प्रकार बातचीत करने लगे, जैसे आयुभर अंग्रेजी बोलने वाले गधों से ही उन्हें काम पड़ता रहा हो।

"तशरीफ रखिये।" उन्होंने मुस्कराकर कहा। मैंने कहा, “अगर मैं तशरीफ रखूंगा, तो आपकी यह आरामकुर्सी टूट जाएगी, इसलिए खड़ा ही रहूँगा।"

चेयरमैन साहब मुस्कराए क्योंकि मैंने ठीक बात कही थी। क्षणभर के बाद फिर बोले, "आपको यह स्वांग भरने की क्या जरूरत थी! आप सीधे-सादे कपड़ों में भी मेरे पास आ सकते थे।” मैंने कहा, “हुजूर यह स्वांग नहीं वास्तविकता है।"

“खैर, अपना-अपना शौक है।" चेयरमैन ने किंचित कुद्ध होकर कहा, "मैं कौन होता हूँ बोलने वाला और जब से यहां दिल्ली में एक महाशय ने दिन में लालटेन और घण्टी लेकर इलेक्शन लड़ा है, मैंने हर प्रकार का आक्षेप करना छोड़ दिया है। आप भी चाहें तो गधे का स्वरूप धरकर इलेक्शन लड़ सकते हैं। अगर इस तरह आपको अधिक वोट मिलते हैं तो क्या हानि है?"

मैंने कहा, "हजूर ! मैं कोई बहरूपिया नहीं है। सचमुच एक गधा हूं। मेरी बात का विश्वास कीजिए।"
चेयरमैन साहब को और भी विश्वास नहीं आया। बोले, “छोड़िए इन बातों को। मैं आज तक छः इलेक्शन लड़ चुका हूं और कभी हार नहीं खाई। मैं सब जानता हूं। खैर, आप बताइये आपकौन-से वार्ड से आए हैं?" "जी अभी तो कृष्णनगर घाट से आ रहा हूं।"

"तुम!" चेयरमैन ने सिर हिलाकर कहा और अपनी चंदिया के गिर्द सफेद बालों पर इस तरह हाथ फेरा, जिस तरह फिल्म 'गृहस्थी' में दुखिया बाप किसी विपत्ति में घिर जाने पर फेरता है: "तो आप कृष्णनगर वार्ड से खड़े हए हैं। अच्छा बताइये, कौन-सी पार्टी ने आपको खड़ा किया है-कांग्रेस ने, जनसंघ ने, प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी ने, कम्युनिस्टों ने मेरा मतलब यह है कि आप किस पार्टी के उम्मीदवार हैं?"

मैंने कहा, "जी, मैं तो आपकी कृपादृष्टि का उम्मीदवार हूँ।" चेयरमैन साहब मुस्कराए। समझ गए, किसी बहुत चालाक आदमी से पाला पड़ा है। बोले, “अब आप बनिए नहीं। साफ-साफ बताइए, क्या काम है? अगर मुझसे कुछ हो सका, तो जरूर करूंगा। मगर एक शर्त है। अगर आप इलेक्शन जीत गए तो चाय की पार्टी...."

“देखिए....." मैंने टोकना चाहा, लेकिन वे बोलते ही चले गए, "चाहे किसी पार्टी की ओर से जीतें, चेयरमैन के पद के लिए वोट मुझी को देना होगा। लाइए हाथ, लाला सन्तरामजी!" उन्होंने हाथ मांगा। मैंने अपना कान आगे बढ़ाया। चेयरमैन साहब ने जोर से मेरा कान दबाया तो उन्हें मालूम हुआ कि यह तो सचमुच गधे का कान है। किसी बहरूपिये का लिबास नहीं है। बहुत घबराए। सिगार उनके मंह से छूटकर मेज पर कागजों में जा गिरा। दूसरे ही क्षण कागजों में आग लग गई।

"देखिए," मैंने क्षमा याचना करते हुए कहा, “मैं तो कब से कह रहा हूं, मैं एक गधा हूँ। मगर आप मेरी सुनते ही नहीं।"
चेयरमैन ने आग बुझाते हुए क्रोधवश कहा, "मैं आपको लाला सन्तराम समझा था-कृष्णनगर का कांसी उम्मीदवार।" मैंने पूछा, "क्या मैं आपको लाला सन्तराम दिखाई देता हूं?"

वे बोले, "कुछ लोग बाहर से गधे दिखाई देते हैं, कुछ लोग भीतर से गधे होते हैं। मैंने समझा, सम्भव है, आप भीतर-बाहर दोनों ओर से गधे हों तो मुझे अपनी चेयरमैनशिप के लिए बहुत जल्दी वोट मिल जाएगा। लेकिन ओह! तुमने मेरा कितना समय नष्ट किया है!"
मैंने कहा, “आपने मेरी बात तो सुनी नहीं। मैं तो यहां रामु धोबी के गरीब बीवी-बच्चों ...."

चेयरमैन ने घण्टी बजाते हुए कहा, "इस समय तुम मुझसे कोई बात न करो, चाहे दिल्ली के सारे धोबी मर जाएं। देखते नहीं हो; कैसी आग लगी है?"

आग सचमुच भड़क रही थी। चेयरमैन ने घण्टी बजाई। जल्दी से फायर ब्रिगेड वालों को टेलीफान करवाया। मैंने भी कमरे से बाहर निकलकर, बरामदे में खड़े होकर हांक लगाई। थोड़े समय के बाद ही टन-टन की आवाजों के साथ फायर ब्रिगेड के दो इंज्जन आ पहुंचे। उन लोगों ने सबसे पहले तो मुझे वहां से लात मारकर निकाला, फिर ऑग बुझाने लगे। मैंने सोचा, यहां रहूँगा तो सम्भव है आग लगाने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया जाऊं। तुरन्त वहां से सरपट भागा और सीढ़ियों के नीचे आकर दम लिया क्योंकि अब लिफ्ट काम नहीं कर रही थी। नीचे आकर इन्क्वायरी में एक बूढे परन्तु अत्यन्त हितैषी क्लर्क से जान-पहचान हुई। उसे रामू की पूरी कथा सुनाई। बूढे क्लर्क की आंखों में आंसू आ गए। उसने अत्याचारी समाज, क्रूर जीवन-व्यवस्था और पूंजीवाद को लाखों गालियां सुनाने के बाद धीमे से मेरे कान में कहा, "अगर तुम दो रुपये मुझे दो तो मैं तुम्हारा प्रार्थनापत्र लिखकर पुनर्वास-विभाग के दफ्तर में सहायता के लिए भिजवाए देता हूँ ।"

मैंने कहा, "मैं तो धोबी का गधा हूँ-न घर का न घाट का। मेरे पास दो रुपये कहां? और फिर तुम जानते हो, दो रुपये में दो मन घास आती है, छः सेर बाजरा, तीन सेर चावल।"

"लेकिन दमे का एक ही इंजेक्शन आता है।" क्लर्क ने बड़ी उदासीनता से खांसते हुए कहा, “और मुझे दमे का रोग है। हर रोज एक इंजेक्शन लेना पड़ता है । बूढा क्लर्क उदासीनतापूर्वक खांसता रहा और मैं वहां से सटक आया।

6. निराश होकर लौटना गधे का म्युनिसिपल कमेटी से और जाना पुनर्वास-विभाग के दफ्तर में और मुलाकात करना एक अलौकिक सुन्दरी से

पूछते-पूछते आखिर मैं पुनर्वास के दफ्तर में पहुंच ही गया। दफ्तर में घुसते ही एक बहुत बड़ा सजा हुआ कमरा नजर आया, जिसके बीचोंबीच एक बहुत बड़ी तिपाई पर एक बड़े गुलदान में सुन्दर फूल खिले हुए थे। एक कोने में टेलीफोन एक्सचेंज लगा था, जिसके पास एक अत्यन्त सुन्दर लड़की अपने नाखून रंगने में लीन थी। टेलीफोन एक्सचेंज की मेज पर लिपिस्टिक और क्रीमपाउडर की डिबियां इस प्रकार बिखरी पड़ी थीं कि मैंने सोचा, मैं गलती से पुनर्वास के दफ्तर में आने के बजाय मैक्स फैक्टर की दुकान में घुस आया हूं। अतएव क्षमा मांगकर मैं वापस लौटने को था कि लड़की ने अपनी बड़ी-बड़ी पलकें उठाकर बड़ी प्यारी नजरों से मेरी ओर देखते हुए कहा, “यस प्लीज!"

मैंने झिझकते हुए कहा “मैं सहायता के लिए आया हूं।"
लड़की ने स्विच दबाया। टेलीफोन पर बोली, "रामलुभाया! एक आदमी तुमसे मिलने आया है।"

टेलीफोन बिगड़ा हुआ था या जाने क्या बात थी, जो कुछ भी हो, सुनने वाले और सुनाने वाले दोनों की आवाजें टेलीफोन पर स्पष्ट सुनाई दे रहीं थीं। जब लड़की ने रामलुभाया से कहा कि एक आदमी तुमसे मिलना चाहता है तो उधर से आवाज आई,"मैं इस समय लस्सी पी रहा हूँ, उसे फर्स्ट क्लर्क के पास भेज दो।"
लड़की ने अपने होंठों पर लिपिस्टिक लगाई और फर्स्ट क्लर्क को टेलीफोन किया।
"कौन?" उधर से आवाज आई। "मैं हूँ निर्मला।"
"हाय मेरी जान!" फर्स्ट क्लर्क ने उधर से मैंस की तरह आह भरी। "सुनो।" निर्मला बोली, "एक बेचारा गरीब...."

फर्स्ट क्लर्क ने कहा, "यहां सभी गरीब आते हैं। तुम सुनाओ, तुम्हारी आवाज इतनी प्यारी क्यों है? जी चाहता है, सुनता ही चला जाऊं। निर्मला! निम्मी!! आज शाम को सिनेमा...."

लड़की ने टेलीफोन बन्द कर दिया। उसके बाद उसने अपने गालों पर गाजा लगाया और अब के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट को टेलीफोन किया। डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट ने कहा "नहीं, मिस निर्मला! इस समय मेरे पास कोहार्ट के शरणार्थी सरदार दरबारासिंह, मिलिट्री काण्ट्रैक्टर बैठे हैं। बेचारों का सब कुछ लुट गया। इस समय इनके एक लाख के क्लेम की पड़ताल कर रहा हूं। उन्हें आगे किसी दूसरे के पास भेज दो। मैं तो इस समय बहुत मसरूफ हूँ।"
"बहुत अच्छा," कहकर लड़की स्विच गिराने वाली थी कि उधर से आवाज आई "हैलो निर्मला!" “जी!" "भई, वह साड़ी तुम्हें पसन्द आई?" डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट पूछ रहा था। "जी, वही पहने हुए हूं!" निर्मला जरा शोखी से बोली और स्विच गिरा दिया। उसके बाद आईने में उसने अपना मुंह देखा, मुस्कराई, चेहरे पर पाउडर लगाया और स्विच दबाकर सुपरिण्टेण्डेण्ट को टेलीफोन किया।

"जी देखिए," लड़की बोली। उधर से आवाज आई, "हाय किस तरह देखूँ तुमको। टेलीफोन पर तुमको कैसे देखें, यहां आ जाओ ना?"
निर्मला खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली, "एक गरीब आदमी सहायता के लिए...."

"अरे हम भी तो किसी की सहायता के पात्र हैं।" सुपरिण्टेण्डेण्ट उधर से इन्द्र-सभा के स्टाइल में बोला। निर्मला ने जरा बनकर और तनकर कहा,
"देखिए, यह दफ्तर का समय है और...."

"तुमने खूब याद दिलाया," सुपरिण्टेण्डेण्ट उधर से बोला, "अभी-अभी दफ्तर में हुक्म आया है कि दफ्तर में काम करने वाली औरतें अगर शादी करेंगी तो उन्हें किसी समय भी नौकरी से अलग किया जा सकता है। बोलो, अब क्या कहती हो?"
निर्मला बोली, "मैंने शादी का इरादा छोड़ दिया है।" उधर से सुपरिण्टेण्डेण्ट ने सन्तोष का सांस लिया। बोला, “वह फिलिप्स का रेडियो सेट...."
“जी धन्यवादा मिल गया। मगर आप दो मिनट के लिए इस गरीब से बात कर लीजिए।"
"कौन है?"
"एक गधा।"

सुपरिण्टेण्डेण्ट ने जोर का एक कहकहा लगाया, "तुम भी खूब मजाक करती हो! खैर, भेज दो उसे भीतर। अगर गधा न हुआ तो भी उसके दोनों कान खींचकर उसे गधा बना दूंगा।"

"जाइए," लड़की ने एक नाखून मुंह में दबाते हए मेरी ओर बड़ी चंचल नजरों से देखते हए कहा, कुछ इस प्रकार कि यदि गधे की बजाय मैं आदमी होता तो अवश्य ही उस पर आशिक हो जाता।

सुपरिटेंडेंट मुझे देखकर पहले तो खूब हंसा, फिर उसने टेलीफोन उठाकर निर्मला के इस क्रियात्मक मज़ाक की प्रशंसा की। फिर वह ज़रा आगे आया और मेरा कान पकड़कर बोला, "बोलिए मिस्टर डंकी ! अब मैं क्यों न आपको लात मारकर दफ्तर से बाहर निकाल दूं?" मैंने कहा, "आप मुझे नहीं निकाल सकते। इसलिए कि मैं आपके पास एक प्रार्थना-पत्र लेकर आया हूं।"

सुपरिटेंडेंट आश्चर्यवश लगभग मूर्छित हो गया। आखिर बड़ी कठिनाई से बोला, "फिर कहिए, फिर कहिए, आप क्या कह रहे हैं ?" मैंने दुहराया।

आखिर बड़ी मुश्किल से यह बात उसकी समझ में आई कि मैं सचमुच बोलता हूं। कहने लगा, "आपकी वार्ता-शैली तो मुझसे भी अच्छी है।"
"इसलिए कि मैं लखनऊ के आस-पास का हूं और आप शायद पंजाब के हैं ?"
“जी हां", सुपरिटेंडेंट बोला, "मैं पिंड दादन खां का हूँ।" कुछ देर चुप रहने के बाद बोला, “फरमाइए, क्या काम है ?"
"देखिए', मैंने कहा, "मैं सहायता मांगने आया हूँ।" "आप शरणार्थी हैं" "नहीं तो।
"तो फिर आप यहां क्या करने आए हैं।"
सुपरिटेंडेंट ने ज़रा खफा होकर कहा। "सहायता के लिए आया हूं."
"यहाँ केवल शरणार्थियों की सहायता की जाती है, जो पाकिस्तान से लुट-लुटाकर आए हैं।"
"और अगर कोई हिन्दुस्तान में ही लुट जाए तो वह सहायता के लिए कहां जाए?"

“यह तो मैं नहीं बता सकता।" सुपरिटेंडेंट ने और भी खफा होकर कहा, "कम से कम इस विभाग में तो आप नहीं आ सकते, कोई और घर देखिए।"
सुपरिटेंडेंट ने घंटी बजाई। चपरासी ने मुझे बाहर निकाल दिया।
बाहर निकलते हुए फिर मुझे वही अलौकिक सुन्दरी मिल गई। मुझे निराश देखकर बोली, "क्यों, काम नहीं बना ?"
मैंने पूरी बात कह सुनाई।

बोली, “सुपरिटेंडेंट ठीक कहता है। तुम अगर पाकिस्तान से आए होते, तो चाहे गधे ही क्यों न होते, तुम्हें यहां से सहायता मिल जाती। अब तुम्हें डिपार्टमेंट ऑफ लेबर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज में जाना पड़ेगा।"
"कहां पर है ?"

उस अलौकिक सुन्दरी ने दयावश मुझे पूरा पता दे दिया और मैं धन्यवाद कहकर पुनर्वास-विभाग से निकला और लम्बे-लम्बे डग भरता मजदूरों के विभाग की ओर चला गया।

7. जाना गधे का डिपार्टमेंट ऑफ लेबर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज़ में और मुलाकात करना श्री पी. क्यू. रंगाचारी और वाई, जेड. सुब्रह्मण्यम से

पी. क्यू. रंगाचारी तमिलनाडु का रहने वाला था, संस्कृत बनारसी पण्डितों की तरह बोलता था और अंग्रेज़ी आक्सफोर्ड के प्रोफेसरों जैसी: हिन्दी, हिन्दी-साहित्य सम्मेलन के जोशीले भाषणकर्ताओं की-सी और उर्दू मौलाना अबुलकलाम आज़ाद जैसी। वह दस भाषाएं जानता था और दस और सीख रहा था। उसने अपना जीवन एक साधारण क्लर्क के रूप में शुरू किया था। आज वह डिपार्टमेंट ऑफ लेबर एण्ड इण्डस्ट्रीज़ में डिप्टी सेक्रेट्री के पद पर विराजमान था। प्रत्येक मामले में मीन-मेख निकालने में वह ऐसा सिद्धहस्त था कि उसके शासनकाल में हर फाइल दस वर्ष तक विभिन्न दफ्तरों और मेज़ों के चक्कर लगाती थी, और जब तक उसकी तरक्की न हो जाए, फाइल भी आगे तरक्की नहीं कर सकती थी। अपने इसी कानूनी मीन-मेख के कारण वह डिप्टी सेक्रेट्री के पद पर पहुंचा था और अब ज्वायंट सेक्रेट्री बनने के स्वप्न देख रहा था-हो जाएगा। पी. क्यू. रंगाचारी जैसे व्यक्ति कभी नहीं रुक सकते। उनके दफ्तर की सारी फाइलें रुक जाएं लेकिन वे स्वयं कभी नहीं रुक सकते।

पी. क्यू. रंगाचारी ने बड़े ध्यान से और बड़े धैर्य से मेरा प्रार्थना-पत्र पढ़ा। कागज़ पर पेंसिल से कुछ लिखता रहा। आखिर जब सब सुन चुका तो उसने अपने मित्र ज्वायंट सेक्रेट्री वाई. जेड. सुब्रह्मण्यम् को बुलाया जो उसी की तरह तमिलनाडु का रहने वाला था और पच्चीस भाषाओं, दस पूंजीपतियों और दो मंत्रियों को बहुत अच्छी तरह जानता था।

पी. क्यू. रंगाचारी ने कहा, “वाई.जेड. ! सुनो, यह बड़ी कठिन समस्या है।"

"क्या ?" वाई.जेड. सुब्रह्मण्यम् मेरी ओर बड़े ध्यान से देखते हुए बोला। "एक धोबी मर गया है और यह उसका गधा हमसे हरजाना मांगता है।"
"फिर"

रंगाचारी बोला, "कानून की दृष्टि से एक गधा किसी विभाग में प्रार्थना-पत्र नहीं दे सकता और हम उसके प्रार्थना-पत्र का कोई नोटिस नहीं ले सकते, क्योंकि गधा इन्सान नहीं है। और अदालत इन्सानों की बात सुनती है, गधों की नहीं।"

मैंने कहा, "बात मेरी घास की नहीं है, आपकी बुद्धि की है। रामू की बीवी और बच्चे भूखे हैं। क्यों...? अगर सरकार उस धोबी-घाट की ठीक तरह से रक्षा करती तो आज वह यों न मरता।"

वाई.जेड. सुब्रह्मण्यम ने कहा, “हां, पी.क्यू., इस बात पर विचार करो। यों सोचो कि यह प्रार्थना-पत्र, जिस पर राम की बीवी का अंगूठा लगवाया जा सकता है, स्वीकार किया जा सकता है-फिर?"

पी.क्यू. बोला, "फिर दूसरी बात पर विचार करो। मान लिया कि एक गधा धोबी के कुटुम्ब का सरपरस्त बन सकता है। हमने बड़े-बड़े कुटुम्बों में इससे बड़े गधों को सरपरस्त बनते देखा है। यह तो मुझे पढ़ा-लिखा गधा मालूम होता है, लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या यह धोबी मजदूर है?"
"कदापि नहीं!"

वाई.जेड. सुब्रह्मण्यम ने सिर हिलाकर कहा। मैंने कहा, “धोबी अगर मजदूर नहीं तो क्या है? बेचारा सुबह से शाम तक आठ घण्टे की बजाय बारह घण्टे काम करता है, तब जाकर उसे दो वक्त की रोटी नसीब होती है।"

"लेबर एक्ट की धारा इक्यावन के अनसार मजदूर वह है, जो कारखाने में काम करे। क्या तुम धोबी घाट को करखाना कह सकते हो, सुब्रह्मण्यम?"

"कदापि नहीं, रंगाचारी! यह धोबी तो मजदूर हो ही नहीं सकता। इसलिए न इसे हर्जाना मिल सकता है, न प्रावीडेण्ट फंड न सहायतास्वरूप कुछ रुपया किसी खाते में से दिया जा सकता है, न कोई मुकदमा खड़ा हो सकता है।"

"तो फिर?" रंगाचारी सुब्रह्मण्यम् का मुंह देखने लगा और सुब्रह्मण्यम् रंगाचारी का और मैं उन दोनों का।

एकाएक उन दोनों के मन में एक ही विचार आया और वे दोनों प्रसन्नतावश उछल पड़े। मैं भी प्रसन्नतावश उछल पड़ा कि अब बेचारे रामू धोबी की फैमिली का कुछ भला हो जाएगा।

"मगर एक बात विचार करने की और है," रंगाचारी बोला, "अगर यह धोबी मजदूर नहीं है, तो फिर कौन है? इसकी कानुनी हैसियत स्पष्ट होनी चाहिए। नहीं तो धोबी प्रतिदिन घाट पर मरते रहेंगे और हमारे लिए विपत्ति खड़ी करते रहेंगे।"

सुब्रह्मण्यम् बोला, "मेरे विचार में इस गधे का प्रार्थना-पत्र करने फाइल चला देनी चाहिए।" रंगाचारी ने मेरे हाथ से प्रार्थना-पत्र ले लिया। मैंने उसके दोनों हाथ अपने दोनों कानों में लेकर कहा, “धन्यवाद रंगाचारी महोदय! हजार बार, लाख बार धन्यवाद। आपने एक गरीब धोबी के बीवी-बच्चों को मरने से बचा लिया। मैं इस प्रार्थना-पत्र का फैसला सुनने कब आऊं?"

रंगाचारी ने सुब्रह्मण्यम् की ओर देखा, सुब्रह्मण्यम् ने रंगाचारी की ओर। आखिरकार रंगाचारी बोला"फाइल तो आज ही चलनी शुरू तो जाएगी, तीसरे दर्जे के क्लर्क से पहले दर्जे के क्लर्क तक आएगी। फिर हर मेज पर इसकी नोटिंग होगी। फर्स्ट क्लके से डिप्टी सपरिण्टेण्डेण्ट तक और डिप्टी सपरिण्टेण्डेण्ट से पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट तक प्रत्येक व्यक्ति अपनी राय देगा। यह राय चलते-चलते मेंजों पर से गुजरती हई मेरे पास आएगी। मैं डिप्टी सेक्रेटरी हूँ । मेरे पास से ज्वायंट सेक्रेटरी के पास जाएगी। ज्वायंट सेक्रेटरी से फर्स्ट सेक्रेटरी के पास। फर्स्ट सेक्रेटरी उसे डिप्टी मिनिस्टर के पास ले जाएगा। मगर समस्या बड़ी टेढ़ी है। प्रश्न राम धोबी के मर जाने का इतना नहीं है; प्रश्न यह है कि धोबी मजदूर हो सकता या नहीं? सम्भव है, इस सम्बन्ध में कामर्स मिनिस्ट्री से निर्णय कराने की आवश्यकता पड़े । फिर यह प्रश्न भी है कि अगर धोबी मजदूर है, तो मोची मजूदर क्यों नहीं? कुम्हार मजूदर क्यों नहीं? अगर एक रामू को हर्जाना मिलेगा तो लाखों-करोड़ों के लिए स्टेट बैंक कहां से हर्जाना लाएगा! इसके लिए फिनान्स डिपार्टमेण्ट से भी पूछना पड़ेगा। सम्भव है, फिनान्स डिपार्टमेण्ट इस मूल प्रश्न को प्रधानमन्त्री के सामने रखे और प्रधानमन्त्री पार्लीयामेण्ट में इस प्रश्न को रखें। सम्भव है, इस प्रश्न पर हमारे विधान की किसी धारा में परिवर्तन भी हो जाय।" रंगाचारी ने अपनी उँगलियों पर गिनते हुए मुझसे कहा, "मेरे विचार में अगर तुम दस साल के बाद आओ तो उस समय तक इस फाइल का कोई न कोई फैसला जरूर हो जाएगा।"

"तब तक राम के बीवी-बच्चे क्या करें?" रंगाचारी ने कहा, "हम विवश हैं, कानून के हाथों बिल्कुल विवश है; यों हमारी पूरी-पूरी सहानुभूति तुम्हारे साथ है।"

सुब्रह्मण्यम् बोला, "मैं समझता हूँ, रंगाचारी, समस्या वास्तव में यह नहीं है कि धोबी मजदूर है या नहीं। वास्तविक समस्या यह है कि राम को किसने मारा?"
"एक मगरमच्छ ने!" मैंने क्रोध से चिल्लाकर कहा।

बूढ़े क्लर्क के मूर्खतापूर्ण चेहरे पर एक विचित्र-सी मुस्कराहट आई: बोला. "एक धोबी ने एक मछली को खा लिया है, तो क्या हआ? बहुत से धोबी मछली खाते हैं। न खाएं तो हमारा यह डिपार्टमेण्ट कैसे चलें?"

मैंने कहा, “धोबी ने नहीं, मगरमच्छ ने धोबी को खा लिया है।" वह बोला, "धोबी ने नहीं,मगरमच्छ ने मछली को खाया है? अच्छा!

अच्छा! तो इसमें शिकायत की क्या बात है? बहुत से मगरमच्छ मछलियां खाते हैं; न खाएं तो जिन्दा कैसे रहें?"
मैंने जोर से चिल्लाकर कहा, “सुनो, मछली नहीं मगरमच्छ।" वह बोला, "अच्छा, एक मगरमच्छ।"
मैंने उसे समझाते हुए कहा, “और एक धोबी। याद रखो एक धोबी, एक मगरमच्छ।"

वह बोला, “एक धोबी, एक मगरमच्छ, आगे चलो।" मैंने कहा, "वह धोबी घाट पर कपड़े धोता था।" वह बोला, "अच्छे कपड़े धोता था?"

मैंने चिल्लाकर कहा, "अच्छे धोता था या बुरे धोता था, तुम्हें इससे क्या मतलब?"

वह बोला, "मेरा धोबी बहुत बुरे कपड़े धोता है। अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारे धोबी को...." मैंने सटपटाकर कहा, “तुम पूरी बात नहीं सुनोगे?"

वह बोला, “अच्छा सुनाओ। एक धोबी, एक मगरमच्छ। वह धोबी घाट पर कपड़े धोता था, फिर?" मैंने कहा, "इतने में एक मगरमच्छ आया, उसने धोबी की टांग पकड़ी।" "क्या पकडी? जरा ऊंचा बोलो.मैं कम सुनता हूँ ।" "टांग! टांग!" मैंने चिल्लाकर कहा। “मुर्गी की?" क्लर्क खुशी से चिल्लाया। "मुर्गी की नहीं, धोबी की टांग।"

"धोबी की टांग मैंने कभी नहीं खाई।" बूढे क्लर्क ने शोक प्रकट करते हुए कहा, "कैसी होती है?"

मैंने बिल्कुल झल्लाकर कहा, “मैंने धोबी की टांग नहीं खाई। मगरमच्छ आया। जब बेचारा धोबी कपड़े धो रहा था, वह पकड़कर धोबी को खा गया। समझे?"

"हां। हां। अब समझ गया। क्लर्क ने सिर हिलाकर कहा, "धोबी कपड़े धोता था। इतने में मगरमच्छ आया और धोबी के कपड़े खा गया।" मैंने उसकी ओर बड़े क्रोध से देखा और अगली खिड़की की ओर बढ़ गया। यहां पर अधेड़ आयु का एक एंग्लो-इण्डियन अपने गंजे सिर पर नीली नाड़ियों का उभरा हआ जाल लपेटे बैठा था। उसकी नाक से मालूम होता था कि इस समय भी थोड़ी-सी पिए हुए है। बड़ी शिष्टतापूर्वक मुझे मिला। कहने लगा-
"फर्माइए! मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?"

मैंने दिल में सोचा, कहीं यह भी बूढ़े क्लर्क की तरह गड़बड़ा न जाए, इसलिए बहुत धीरे-धीरे पूरा वृत्तान्त सुनाऊंगा। मैंने कहा, "सुनिए! एक मगरमच्छ है।"

'एंग्लो-इण्डियन महोदय की आंखें चमक उठीं। बोला, "हां, किधर है?" मैंने कहा, "जमुना घाट पर।" वह बोला, "जमुना पर तो बहुत से घाट हैं, मगर वह कहां है?"

एंग्लो-इण्डियन महोदय सब कुछ नोट करता जाता था। मैंने सोचा, अब मुझे अपने मतलब का व्यक्ति मिल गया। मन-ही-मन मैंने भगवान के गुण गाए। मैंने कहा
"कृष्णनगर के पास। रेल के पुल के नीचे।" एंग्लो-इण्डियन ने नोट करके पूछा, “कितना लम्बा-चौड़ा है?"
"क्या, घाट?
"घाट नहीं, मगरमच्छ।" एंग्लो-इण्डियन बोला।
मैंने कहा, "मैंने देखा तो नहीं, मगर लोग कहते हैं तीस फुट से कम नहीं था।"

"हां," एंग्लो-इण्डियन की ऑखें और भी चमक उठीं। अब तो उसके गाल भी चमक रहे थे, "तीस फुट, वाह! वाह!! क्या तुम मुझे उस स्थान पर ले जा सकते हो?"

"हां, ले जा सकता हूँ ।" "हम साथ में अपनी राइफल ले चलेंगे।" वह प्रोग्राम बनाते हुए बोला। "राइफल किसलिए?"

"मगरमच्छ के शिकार के लिए।" एंग्लो-इण्डियन मेरी ओर आश्चर्य से देखकर बोला, "तुम मगरमच्छ के शिकार के लिए ही आए थे न!"

मैंने कहा, "नहीं। बात यह है कि उस मगरमच्छ ने एक धोबी को खा लिया है। उसके बीवी-बच्चों की सहायता के लिए मैं यहां...."

"ओह!" एंग्लो-इण्डियन का दिल बुझ गया। उसकी आंखों की चमक भी बुझ गई। बिल्कुल कारोबारी और दफ्तरी स्वर में बोला "मैं मगरमच्छ का शिकार तो कर सकता हूँ , मगर रामू के लिए कुछ नहीं कर सकता। सारी! हमारे विभाग से धोबियों का कोई सम्बन्ध नहीं।"

मैंने बिल्कुल तंग आकर कहा, "तो मैं कहां जाऊं? तुम्हारे विभाग से धोबियों का कोई सम्बन्ध नहीं और किसी दूसरे विभाग का मगरमच्छों से कोई सम्बन्ध नहीं, तो फिर उसका सम्बन्ध किससे है? यह कैसे पता चल सकता है?

एंग्लो-इण्डियन ने बड़े ध्यान से और बड़ी सहानुभूति से मेरी ओर देखा और पछा। "क्या तुम मरने वाले के सम्बन्धी हो?" "नहीं, मैं तो बस उसका गधा हूं।"

"फिर भी इतनी सहानुभूति जताते हो!" एंग्लो-इण्डियन मेरी ओर चौकना होकर देखने लगा। “देखो, मैं तुम्हें मशवरा देता हं। आजकल के जमाने में किसी से इतनी सहानुभूति करना खतरे से खाली नहीं है।"

मैंने कहा, “तुम मुझे यह मशवरा न दो, यह बताओ कि मेरी प्रार्थना कौन सुनेगा?"

एंग्लो-इण्डियन सोच में पड़ गया और पेंसिल चबाने लगा। पेंसिल चबाते-चबाते बोला-

"मामला मगरमच्छ का है। मगरमच्छ का अदालत से कोई सम्बन्ध नहीं, वरना तम इस कत्ल के सिलसिले में अदालत में जा सकते थे। मगरमच्छ का सम्बन्धे चिड़ियाघर से अवश्य है। तुम चाहो तो चिड़ियाघर जा सकते हो। मगर चिड़ियाघर वाले क्या करेंगे? उनके यहां पहले से बहत से मगरमच्छ मौजूद हैं। फिर चिड़ियाघर वालों का धोबी से क्या सम्बन्ध है? चिडियाघर के जानवर कपड़े तो पहनते ही नहीं।"

"हां," एकाएक वह प्रसन्नता से उछल पडा और अब के मैंने उसके चेहरे पर वही प्रफुल्लता देखी जो कुछ समय पूर्व मैं रंगाचारी और सुब्रह्मण्यम् के चेहरे पर देख आया था।

वह बोला, “एक तरकीब समझ में आई है।"

"क्या ?"

"सुनो! धोबी का सम्बन्ध साबुन से है और साबुन के आयात-निर्यात का सम्बन्ध कामर्स डिपार्टमेण्ट में हैं। फिर धोबी का सम्बन्ध कपड़ों से है और कपड़ों का सम्बन्ध फिर कामर्स डिपार्टमेण्ट से है। देखो! तुम सीधे कामर्स मन्त्री के पास चले जाओ। उसके सामने रामू धोबी की पूरी विपदा रख दो। अगर वह चाहता होगा कि धोबी कपड़े धो-धोकर फाइते रहें और इस प्रकार लोग नये-नये कपड़े पहनने पर विवश होते रहें, तो वह इस सम्बन्ध में अवश्य तुम्हारी सहायता करेगा।"

8. जाना गधे का मनसुखलाल, कामर्स मिनिस्टर, की कोठी पर और बयान करना रामू की दुःखगाथा और दिलासा देना कामर्स मिनिस्टर का तथा उल्लेख उसकोठी का-

मित्रो! मैं उस कोठी का उल्लेख करूं, जो चारों ओर से सुन्दर बाग-बगीचों से घिरी हुई थी। पेड़ों की शाखाएं फलों से लदी झुकी जाती थीं और सड़कों के किनारे-किनारे ऐसे रंगीन फूल खिले थे कि आंखों में, मुझ गधे की आंखों में भी ठण्डक पड़ती थी और लॉन पर ऐसी हरी-हरी सुगन्धित घास थी कि अगर एक सौ गधे भी हर रोज चरते रहें तो भी कभी समाप्त न हो। न जाने यह मन्त्री की कोठी के भीतर इतनी उम्दा घास क्यों होती है! जाने इसका सम्बन्ध मन्त्री से है या किसी गधे से! मगर मैंने तो इन आलीशन कोठियों के भीतर अपने सिवा कोई गधा नहीं देखा। दिल को बहुत दुःख हआ कि इतनी उम्दा घास केवल मनुष्य के पांव तले रौंदी जाती है और किसी काम नहीं आती। सच है, अभी इस संसार में मोटर वालों का राज है, गधे वालों का राज नहीं-जैसे कुम्हार का, धोबी का, मोची का, घसियारे का अर्थात् उन समस्त लोगों का जो गधे रखते हैं, अन्यथा घास का यों अनादर न होता। खैर, आपको मझ गधे से या घास से क्या मतलब? आपको तो केवल इस कथा से मतलब है, सो कहता हं-जब मैं मन्त्री महोदय की कोठी के भीतर पहुंचा तो वे लाल पत्थर से बने एक छोटे-से फव्वारे के इर्द-गिर्द टहल रहे थे। उनके बच्चे लॉन पर कलाबाजियां खा रहे थे और सामने बरामदे में दो औरतें फूलदार साड़ियां सुखाने के लिए रस्सी पर टांग रही थीं। अर्थात् बड़ा सुन्दर दृश्य था। मैंने मनसुखलालजी को दोनों कान जोड़कर नमस्कार किया, जिसका उत्तर उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बड़ी नमता से दिया। वे अपनी धोती की लांग ठीक करते हुए बोले, “सों छे!"

मैंने कहा, "मुझे जुकाम नहीं है।"

वे क्षमा मांगते हए बोले, “मैंने आपको अपने देश अहमदाबाद का समझा था।"

मैंने कहा, “जी नहीं, मैं तो उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं।" वे बोले, "अच्छा, वह जो बिहार से आगे है न?"

मैंने कहा, "जी हां, अगर आप बिहार से इधर आएं तो आगे आता है और इधर से बिहार जाएं तो पहले आता है।"

मनसुखलालजी हंसने लगे। बोले, “तुम रंग रूप से गधे दिखाई देते हो, मगर हो नहीं, भाई साहब।"

मैंने कहा, नहीं भाई साहब! मैं वाकई गधा हूं। विश्वास न हो तो मेरे कान ऐंठकर देख लीजिए।"

मनसुखलालजी ने मेरे कान ऐंठे तब जाकर उन्हें विश्वास आया। बोले, “अब कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?"

मैंने कहा, "मनसुखलालजी! मुझे अपने लिए तो घास का एक तिनका भी नहीं चाहिए। मैं रामू धोबी के सम्बन्ध में आया हूं।" और फिर रामू धोबी का पूरा किस्सा बयान कर दिया।

यह बात मैं यहां सबके सामने स्पष्ट रूप से कहंगा कि मनसखलालजी का व्यवहार मुझसे अत्यन्त शिष्टतापूर्ण था। कहीं एक बार भी उन्होंने मुझ पर यह प्रकट नहीं होने दिया कि वे किसी मनुष्य से नहीं किसी गधे से बात कर रहे हैं, लेकिन इन सब बातों के बावजद उनका उत्तर इन्कार में था। कहने लगे-

भाई! अगर मामला केवल साबन का होता, अर्थात धोबियों को साबन सस्ते दामों पर मिलने का प्रश्न होता, तो मैं इस पर विचार कर सकता था। यदि प्रश्न यह होता कि धोबियों को कलफ लगाने के लिए पाउडर महंगा मिलता है तो मैं उस पर इयटी कम कर सकता था। यदि धोबियों को यह शिकायत होती कि मिलों से जो कपड़ा आता है वह इतना नाकस होता है कि दो-चार बार पत्थर पर कूटने से फट जाता है, तो या तो मैं कारखाने वालों को ताड़ना कर सकता था कि वे मोटा कपड़ा बुर्ने, या धोबियों को कपड़ा कूटने के लिए नर्म पत्थर सप्लाई कर सकता था। मगर यहां प्रश्न बिल्कुल दूसरा है। यहां प्रश्न यह है कि एक गरीब धोबी मर गया है। उसके बीवी-बच्च्चे दीन, दरिद्र तथा भूखे हैं। वे कोई काम नहीं जानते। कोई उनका अभिभावक नहीं है। अब वे लोग करें तो क्या करें? यह समस्या ऐसी है जिसका समाधान कोई बड़े से बड़ा मन्त्री भी नहीं कर सकता।"

"क्यों ?"

मनसुखलालजी इधर-उधर देखकर बोले, “यह हमारी केन्द्रीय सरकार की मूल समस्या है। इसका समाधान सिवाय हमारे प्रधानमन्त्री के और कोई नहीं कर सकता।"

"तो क्या आपका मतलब है..." मैंने आश्चर्य से अपने दोनों कान जोड़कर पूछा, "तो क्या आपका मतलब है, मुझे इस काम के लिए....” मैंने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

मनसुखलाल ने धीरे से सिर हिलाकर कहा, "हां, तुम्हें इस काम के लिए पण्डित जवाहरलाल नेहरू के पास जाना होगा।"

9. जाना गधे का प्रधानमन्त्री की कोठी पर और मुलाकात करना पण्डित जवाहरलाल नेहरू से और खफा होना बाग के मालीका-

मैंने लोगों से सुन रखा था कि पण्डितजी से मुलाकात का समय सुबह साढ़े सात-आठ बजे से पहले का है। उसके बाद जो मुलाकातियों का तांता शुरू होता है तो फिर किसी समय भी एक-आध मिनट के लिए बात करना असम्भव होता है। यही सोचकर मैं उस दिन रात भर जागता और विभिन्न रास्तों से घूम-फिरकर पण्डितजी की कोठी तक पहुंचने का प्रयत्न करता रहा। कोई छ: बजे के लगभग मैं उनकी कोठी के बाहर था। सन्तरियों ने मेरी ओर लापरवाही से ताका। शायद मैं उन्हें बिल्कुल मामूली गधा नजर आया होऊंगा। पहले तो मैं दीवार से लगकर धीरे-धीरे घास चरता रहा और धीरे-धीरे दरवाजे की ओर सरकता रहा। जब मैं दरवाजे के बिल्कुल निकट पहुंच गया तो सन्तरियों ने हाथ उठाकर लापरवाही से मुझे डराया जैसे आम गधों को डराया जाता है। मैंने सारी स्कीम पहले से सोच रखी थी। उनके डराते ही मैंने कुछ यह प्रकट किया कि मैं बिल्कुल डर गया हूं। अतएव उछला और सीधा कोठी के भीतर हो लिया। सन्तरी मेरे पीछे भागे। वे पीछे-पीछे और मैं आगे-आगे। जब मैं बाग तक पहुंचा तो सन्तरियों ने एक गधे का वहां तक पीछा करना व्यर्थ समझकर माली को आवाज दे दी कि वह मुझ गधे को बाहर निकाल दे; और यह कहकर वे बाहर गेट पर जा खड़े हए, जहां ड्यूटी थी।

माली ने मुझे घूरकर दखा। उस समय वह एक खरपी लिए गलाब की झाड़ियों के इर्द-गिर्द की घास साफ कर रहा था। उसने जब अपना काम बढ़ते देखा तो उसे बहत क्रोध आया। चुपके से वह झाडियों के पास से उठा और भीतर अपने क्वॉर्टर से कोई मजबूत-सा डण्डा लेने चला गया। इतने में मैंने देखा कि पण्डितजी बाग के बीचों-बीच सड़क पर टहलते हुए गुलाब के पौधों की ओर जा रहे हैं। मैंने यह अवसर उचित समझा और हिरन की तरह एक चौकड़ी भरी और पण्डितजी के पीछे-पीछे हो लिया। मैंने धीमे से कहा, "पण्डितजी!"

पण्डितजी आश्चर्य से मेरी ओर मुड़े। जब उन्हें वहां कोई व्यक्ति दिखाई न दिया तो फिर आगे बढ़ने लगे।

मैंने फिर कहा, “पण्डितजी!"

अब पण्डितजी ने जरा तीखी चितवन से पीछे देखा और बोले, “मैं भूतों में विश्वास नहीं रखता।"

मैंने कहा, "विश्वास कीजिए, मैं भूत नहीं हूं, एक गधा हूं।"

जब पण्डितजी ने मुझे बोलते देखा तो उनका क्षण भर पहले का आश्चर्य हर्ष में परिवर्तित हो गया। बोले-

"मैंने इटली के एक गधे के बारे में पढ़ा था जो अलजबरे के प्रश्न तक हल कर सकता था लेकिन बोलने वाला गधा आज ही देखा। मनुष्य का विज्ञान क्या कुछ नहीं कर सकता! बोलो क्या चाहते हो? मेरे पास अधिक समय नहीं है।"

मैंने कहा, "आपसे पन्द्रह मिनट के लिए एक इण्टरव्यू चाहता हूं, सोचता है, कहीं आप इसलिए इन्कार न कर दें कि मैं एक गधा हूं।"

पण्डितजी हंसकर बोले, "मरे पास इण्टरव्यू के लिए एक से एक गधा आता है, एक और सही। क्या फर्क पड़ता है! शुरू करो।"

मैं शुरू करने वाला था कि इतने में माली दर से डण्डा लिए भागता हआ नजर आया। मैंने माली की ओर देखा, फिर पण्डितजी की ओर। पण्डितजी समझ गए। उन्होंने हाथ के इशारे से माली को रोक दिया और स्वयं टहलने लगे। मैंने रामू धोबी की दुःख भरी कहानी संक्षिप्त शब्दों में सुना दी। पण्डितजी बहुत प्रभावित हएँ। कहने लगे, "इस मामले में सरकार कुछ नहीं कर सकती, मगर मैं अपनी जेब से सौ रुपया दे सकता हूं।"

यह कहकर उन्होंने जेब से सौ रुपये का नोट निकाला और मेरे लम्बे कान के भीतर उड़स दिया।

मैंने कहा, "पण्डितजी! स्वर्गीय किदवई भी इसी प्रकार दान दिया करते थे। इससे सैकड़ों लोगों का भला तो जरूर हो जाता है लेकिन है तो दान ही।" बोले, "दान तो है।"

मैंने कहा, "दान बन्द होना चाहिए। हर भारतवासी का यह अधिकार होना चाहिए कि जब वह मरे तो उसके बाद राज्य उसके बीवी-बच्चों का निर्वाह का प्रबन्ध करे। स्वतन्त्रता के मूल सिद्धान्तों में से एक यह होना चाहिए।"

"सिद्धान्त तो ठीक है," पण्डितजी बोले, "लेकिन सिद्धान्तों को व्यवहार में लाने के लिए खून-पसीना एक करने की जरूरत है। इसके लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं। वैसे तुम्हारी तरह लोग क्रान्ति की बातें बहत करते हैं। लेकिन रामू धोबी की विधवा को पेंशन देने के लिए राष्ट्र के पास इससे कहीं अधिक राष्ट्रीय धन होना चाहिए, जितना आजकल उसके पास है। इस राष्ट्रीय धन को बढ़ाने के लिए हमने पंचवर्षीय योजना बनाई है, जिसके आधार पर देश-भर में काम हो रहा है, लेकिन लोगों में वह उत्साह नहीं जिसकी मुझे उनसे आशा थी।"

मैंने कहा, लोगों में आपके प्रति असीम आदर है। आपकी बताई गई योजनाओं से अत्यन्त लगाव है। आपका हर आदेश उनके सिर-माथे पर होता है। आप संसार भर में शान्ति स्थापित करने के लिए जो प्रयत्न कर रहे हैं, उनसे न केवल भारत के लोग बल्कि समस्त देशों के लोग आपसे स्नेह करने लगे हैं।"

पण्डितजी मुस्कराए, बोले, “गधे होने के बावजूद तुम बातें अच्छी बना लेते हो।"

मैंने कहा, "आज मैं संसार के एक महान राजनीतिज्ञ के सामने खड़ा है। जाने फिर कभी ऐसा अवसर मिले, न मिले। इसलिए क्यों न अपने मन की बात आपसे कह डालूं! पण्डितजी, आपकी वैदेशिक नीति की सफलता सर्वमान्य है। राष्ट्रीय जीवन में भी आपकी स्वदेश-भक्ति, जन-मित्रता और राष्टीय सेवा से इन्कार नहीं किया जा सकता। जो कोई ऐसा करेगा, मुँह की खाएगा। इस थोड़े से समय में ही आप भारत को जिस शिखर पर ले गए हैं. उससे आपके कन्धों की मजबूती का पता चलता है। लेकिन पण्डितजी क्या यह काफी है? एक राष्ट्र, एक बड़ा राष्ट्र, शूरवीर राष्ट्र, भारत जैसा राष्ट्र कब तक एक व्यक्ति के सहारे चलेगा? क्या आप विश्वास से कह सकते हैं कि यदि आपने अपने शासन में उचित परिवर्तन न किए तो आपके बाद भारत की वही दशा न होगी जो अशोक और अकबर के बाद हुई थी?"

"अशोक और अकबर बादशाह थे। आज भारत में जनतन्त्र है।" पण्डितजी ने मुझे याद दिलाया।

"केवल वोट से जनतन्त्र नहीं होता। आज भारत में जो राज्य हैं, मैं उसे अधिक से अधिक नेहरू के आत्मबलिदान के नाम से पुकार सकता है। आत्म बलिदान सदैव व्यक्तिगत होता है। वह केवल एक व्यक्ति की ओर देखता है और जब वह व्यक्ति....न रहे तो फिर क्या होगा? पण्डितजी! मुझे इससे बहुत भय आता है।"

"मैं इस प्रश्न का उत्तर पहले दे चुका हं।" पण्डितजी ने कहा, "मैं नहीं समझता कि मेरे प्यारे देश की जनता मेरे बाद कोई इतना बड़ा नेता उत्पन्न नहीं कर सकती, जो परिस्थितियों को सम्भाल सके। मुझे अपनी जनता पर भरोसा है।"

"आपका भरोसा अनुचित नहीं, लेकिन इसे व्यवहार में लाने के लिए, भारतीय जनता की रचनात्मक शक्तियों को जगाने के लिए क्या यह जरूरी नहीं है कि इसके लिए अभी से कदम उठाया जाए? क्षमा कीजिएगा पण्डितजी! मुझे आपके सरकारी अधिकारियों में कोई रामू धोबी, कोई जम्मन. चमार, कोई ढोंदू मिल-मजदूर नजर नहीं आता। कार वाले बहुत नजर आते हैं। गधे वाला एक भी नजर नहीं आता। अगर राष्ट्रीय धन को बढ़ाना है, अगर राष्ट्रीय योजनाओं को उत्तरोत्तर सफल बनाना है, अगर आप चाहते हैं कि देश को उन्नति दिन दूनी रात चौगुनी हो, तो इस राज्य-प्रणाली को बदलना होगाऊपर से नीचे तक। जनता के समस्त स्तरों को ऊपर से नीचे तक प्रतिनिधित्व देना पड़ेगा और एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें देश की पूरी जनता-पूंजीपतियों से कांग्रेसियों तक और कांग्रेसियों से साम्यवादियों तक सब शामिल हों। केवल ऐसी सरकार ही देश में उत्साह की लहर दौड़ा सकती है। आज जो काम दस या पन्द्रह वर्ष में, बहुत-सी आर्थिक हानि और बहुत-सी रिश्वतखोरी के साथ होता है, कम से कम हानि और कम से कम रिश्वतखोरी और कम से कम समय में पूरा हो जाएगा। काम की गति बहुत बढ़ जाएगी क्योंकि जनता हर स्तर पर राज्य-अधिकारियों में मौजूद होगी। इस समय मजदूरों से लेकर राज्य-मन्त्रियों तक की ऐसी संगठित सरकार की अत्यन्त आवश्यकता है।"

पण्डितजी मुस्कराए, बोले, "मैंने सोचा था, तुम मेरा इण्टरव्यू लोगे। मालूम होता है, तुम इण्टरव्यू लेने नहीं देने आए हो।"

मैं घबराकर चुप हो गया। बात सच कही थी उन्होंने।

मुझे चुप देखकर बोले, "नहीं-नहीं, कहो-कहो, मैं तो हमेशा से विद्यार्थी रहा हूँ। एक गधे से भी कुछ न कुछ सीख सकता हूं।"

"मैंने कहा, "मैं आपको क्या सिखाऊंगा! सूरज के सामने चिराग क्या जलेगा। लेकिन मैं चूंकि एक गरीब आदमी का गरीब गधा हूं। जीवन भर भूख का शिकार रहा हूं, मुझे मालूम है कि जो दर्द आपके दिल में मौजूद है, वह हमारी दशा को, हमारी प्रतिदिन की दशा को देखकर ही आपके दिल में पैदा होता है। इसलिए जो बात आप कहते हैं, वह मानो हमारे दिल से निकलती है। लेकिन मुसीबत यह है कि आपके और हमारे बीच जो बाड़ लगाई गई है, जो मशीनरी खड़ी की गई है, वह अत्यन्त प्रतिक्रियावादी, मन्द गति से चलने वाली, बल्कि प्रायः आपकी अवज्ञा करने वाली है। इसलिए इस मशीनरी के भीतर जो शक्तियां काम करती हैं, वह हमारे विचारों की विरोधी हैं। अब तक जो काम होता है, वह आपके भय से होता है। यदि अभी से इसके लिए प्रबन्ध न हुआ तो जब आप हमारे बीच न होंगे उस समय यह भय भी नहीं रहेगा और वे लोग अपनी मनमानी कर गुजरेंगे।"

"तुम्हारा मतलब मेरे साथियों से है?"

मैंने कहा, "जो साथी आपने लिए हैं जो आपकी 'सेकण्ड लाइन ऑफ डिफेन्स' है, ये आयु में और नेतृत्व में आपसे भी बहुत बूढ़े हैं और शायद आपसे बहुत पहले भुगत जायेंगे। मगर मेरा मतलब उन लोगों से नहीं है, मेरा मतलब एक संगठित राष्ट्रीय सरकार की स्थापना से है। केवल ऐसी सरकार ही आगामी बीस-तीस वर्ष में भारत को आगे ले जा सकती है, जिसमें पूरे का पूरा राष्ट्र अपने विभिन्न वर्गों तथा तत्वों के साथ राष्ट्रीय हित तथा उन्नति के लिए सम्मिलित हो।"

पण्डितजी ने कहा, "मैं नहीं मानता कि सरकार की मशीनरी मेरा साथ नहीं देती, कोई उदाहरण दो।"

मैंने कहा, "जितने उदाहरण चाहे ले लीजिए। आप अपनी योजना में प्राइवेट सेक्टर को कम और पब्लिक सेक्टर को अधिक रखना चाहते हैं, मगर प्राइवेट सेक्टर बढ़ रहा है और प्राइवेट सेक्टर में भी विदेशी धन बढ़ रहा है। जूट, चाय, बैंक-धन के अतिरिक्त अभी-अभी पच्चीस करोड़ रुपये की लागत से दो तेल की रिफाइनरियां खुली हैं।"

"हम उन पर पूरा कंट्रोल करेंगे।" पण्डितजी ने क्रोध से कहा।

"अगर एंग्लो-ईरान कम्पनी की तरह हमारा हाल हुआ तो ? कहीं ऐसा न हो कि उसे कंट्रोल करते-करते हमारा प्रधानमंत्री भी डाक्टर मुसद्दिक की तरह क्षीण हो जाए।"

"तुम बिलकुल गधे हो। पण्डितजी ने क्रुद्ध होकर कहा, "तुम पुराने क्लासिकल क्रांतिकारियों की-सी बातें करते हो। भारत की विशेष परिस्थितियां नहीं देखते। यहां की जनता की विशेष मनोवृत्ति का अध्ययन नहीं करते। इनकी शांतिप्रियता तथा अहिंसा के प्रति गहरे प्रेम के प्रमाण नहीं देखते। यहां भारत में, काम धीरे-धीरे होगा। धीरे-धीरे समाज का ढांचा बदलेगा। धीरे-धीरे राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का रूप बदलेगा। धीरे-धीरे इनमें सामाजिक लचक उत्पन्न होगी, जो एक माडर्न समाज की विशेषता है। यह सब काम एक दिन में नहीं हो सकता। भारत में क्रांतिवादी शक्तियां भारत के विशेष राष्ट्रीय स्वभाव में समाकर और रच-बसकर ऊपर उभरेंगी। बाहर का पैबंद नहीं लगेगा। मैं तुमसे साफ-साफ कहे देता हूं, गधे ! धीरे-धीरे सब काम होगा।"

"तब तक रामू की बीवी का क्या होगा ? उन बच्चों का क्या होगा, जिन्हें इस देश में नौकरी नहीं मिलती, काम नहीं मिलता, जो विवश होकर इस देश से बाहर चले जाते हैं। फिर इस देश की बढ़ती हुई बेकारी का क्या होगा? हर प्रदेश के आंकड़े देखिए: अभी थोड़े दिन हुए उत्तर प्रदेश की सरकार ने स्वीकार किया था कि उसके प्रदेश में बेकारी बढ़ रही है।"

"मेरे पास कोई छू-मन्तर नहीं है कि एक दिन में भारत की दशा बदल डालूँ। ऐसा आज तक किसी देश में नहीं हुआ है। पच्चीस-तीस साल से पहले देश की दशा इतनी जल्दी नहीं बदल सकती। हर देश का इतिहास यही कहता है। खून-पसीना एक कर देने से राष्ट्रीय धन तथा शक्ति बढ़ती है।" फिर मेरी पीठ पर हाथ रखकर बोले, “तूने पन्द्रह मिनट से अधिक ले लिए। अब मैं जाता हूं।"

मैंने कहा, "पंडितजी ! आपसे एक निवेदन है। सम्भव है इंग्लैंड में आपने गधों की सवारी की हो, लेकिन भारत में तो मैंने नहीं सना कि आप गधे की पीठ पर सवार हुए हों। मेरा अहोभाग्य होगा अगर आप..."

पण्डितजी ने मुझे अपना वाक्य पूरा नहीं करने दिया। उचककर मेरी पीठ पर बैठ गए और कुछ समय तक मुझे बाग के इर्द-गिर्द ऐसा दौड़ाया, ऐसा दौड़ाया कि मेरी सांस फूल गयी। आखिर मैंने हार मान ली, "भगवान के लिए, पण्डितजी, अब तो उतर जाइए।" मैंने बार-बार कहा।

वह हँसकर एकदम उतर पड़े, “अब बता ! मन्द गति से चलने वाला कौन है ?"

इसके बाद वह मेरी ओर से मुड़े और मैंने देखा कि बरामदे में कुछ विदेशी दूत और दो-एक फोटोग्राफर टहल रहे थे और पण्डितजी की गधे की सवारी करने के फोटो ले रहे थे। दो-एक सेक्रेटरी लोग बड़ी परेशानी से टहल रहे थे। नेहरूजी मेरी पीठ थपकाकर उधर चले गए। जाते-जाते मुझसे कह गए, “उस धोबिन को वह सौ का नोट ज़रूर पहुंचा देना।"

मैं बड़े गौरव से दुलकी चाल चलता हुआ पण्डितजी की कोठी से बाहर निकला। क्यों न हो, आखिर भारत के प्रधानमंत्री से मुलाकात करके आया था-बाहर आते ही मुझे प्रेस के नुमाइन्दों और फोटोग्राफरों ने घेर लिया।

10. घेर लेना गधे को प्रेस के नुमाइन्दों का और लेकर जाना उसे कांस्टीट्यूशन क्लब में और उल्लेख गधे की प्रेस कांफ्रेंस का-

प्रधानमंत्री की कोठी से बाहर निकलते ही मैंने अपने-आपको संसार का अत्यन्त प्रसिद्ध गधा पाया। क्षण-भर पहले में एक अत्यन्त अप्रसिद्ध गधा था, जो सड़कों पर प्रार्थना-पत्र लिए मारा-मारा फिरता था। लेकिन प्रधानमंत्री से भेंट होते ही मानो मेरा भाग्य बदल गया। जब मैं कोठी से बाहर निकला तो दरवाजे के बाहर प्रेस के नुमाइन्दों और फोटोग्राफरों का एक समूह जुटा था। तिल धरने को जगह न थी। मेरे फोटो पर फोटो लिए जा रहे थे। आखिर वे लोग मुझे घेर-धारकर कांस्टीट्यूशन क्लब ले गए, ताकि मेरा इंटरव्यू लें।

कांस्टीट्यूशन क्लब में प्रेस के नुमाइन्दों ने मुझ पर प्रश्नों की बौछार कर डाली।

"प्रधानमंत्री से आपकी क्या-क्या बातें हुई?" एक नुमाइन्दे ने पूछा।

मैंने कहा, "कुछ घास के बारे में, कुछ गुलाब के फूलों के बारे में।"

दूसरा नुमाइन्दा बोला, “आप हमें उड़ा रहे हैं। साफ-साफ बताइए न; किस विषय पर बातचीत हुई।"

लेकिन मैं कहां उनकी बातों में आने वाला था। मैंने कहा, "कुछ धोबियों के बारे में, कुछ उनके गधों के बारे में, कुछ नई नसल के गधों के बारे में, जो आजकल भारत में तैयार हो रहे हैं।"

तीसरा नुमाइन्दा बोला, "विलायती गधों के बारे में भी कोई चर्चा हुई ?"

मैंने कहा, "हां ! जब पण्डितजी विलायत में पढ़ते थे तो अक्सर गधों की सवारी किया करते थे। उन दिनों उन्हें हर्टफोर्डशायर के गधे बहुत पसन्द थे।"

प्रेस के नुमाइन्दों की पेन्सिलें बराबर चल रही थीं लेकिन साफ मालूम होता था कि जिस बात की उन्हें मुझसे आशा थी, वह पूरी नहीं हो रही थी। मुझे उन बेचारों पर बहुत दया आई। आखिर मुझे घोषणा करनी पड़ी।

"माननीय महिलाओं तथा सज्जनों ! (क्योंकि प्रेस के नुमाइन्दों में कई महिलाएं भी थीं) आपको यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होगी कि भारत में मैं वह अकेला गधा हूं, जिसे आज पण्डित जवाहरलाल नेहरू को अपनी पीठ पर सवार करने का गौरव प्राप्त हुआ है।"

यह घोषणा सुनते ही बहुत-से नुमाइन्दे प्रसन्नतावश उछल पड़े। उन्हें अपने समाचार-पत्र के लिए पहले पन्ने की हेडलाइन मिल गई थी। मैं कल्पना ही कल्पना में समाचार पत्रों की हेडलाइनें तैरती हुई देखने लगा। इतने में किसी ने मुझे कान से झंझोड़कर चौंका दिया। यह अमरीकी पत्रिका 'लाइफ' का नुमाइन्दा था। उसके साथ 'न्यूयार्क टाइम्स', 'लन्दन टाइम्स' और 'मानचेस्टर गार्जियन' के नुमाइन्दे भी मौजूद थे।

'लाइफ' का नुमाइन्दा बोला, “हे मिस्टर ! तुम तो हमारे फ्रांसिस से भी बढ़ गए !"

"फ्रांसिस कौन है ?"

"बोलने वाला खच्चर है। मैट्रोगोल्डबिन मेयर की फिल्मों में काम करता है, लेकिन उसे कभी यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका कि संसार के किसी महान नीतिज्ञ से भेंट कर सके।"

"न्यूयार्क टाइम्स" के नुमाइन्दे ने 'लाइफ' के नुमाइन्दे को कोट के कालर से पकड़कर कहा, “हे भाई ! मैं तुमसे कहता हूं, अगर हमारे फ्रांसिस का और इस भारतीय गधे का साझा इण्टरव्यू लिया जाए और उसे अमेरिका के टेलीविज़न पर प्रसारित किया जाए तो...."

'लाइफ' का नुमाइन्दा यह अछूती तजबीज़ सुनकर खुशी से उछल पड़ा। बोला, "अभी केबल-तार करता हूं कि वे लोग फ्रांसिस को चार्टर्ड हवाई जहाज़ द्वारा भारत भेज दें। भगवान साक्षी है, मज़ा आ जाएगा।"

'मानचेस्टर गार्जियन' के नुमाइन्दे ने ज़रा कटु स्वर में कहा, “मगर भई, ज़रा इसके राजनैतिक विचार तो मालूम कर लें। बड़ा काइयां गधा मालूम होता है।"

'लन्दन टाइम्स' के नुमाइन्दे ने रायल कमीशन के किसी सदस्य की तरह बोलते हुए कहा, "ऐ मिस्टर डंकी ! व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंध में तुम्हारे क्या विचार हैं ?"

मैंने कहा, "हर गधे को घास चरने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।"

“और co-existence (सह-अस्तित्व) के सम्बन्ध में ?"

मैंने कहा, "हर गधे को चाहिए कि स्वयं भी जिए और दूसरों को भी जीने दे। कम से कम गधे तो इस नियम का पालन करते हैं, मैं मनुष्यों की बात नहीं करता।"

“जातीय भेद-भाव के सम्बन्ध में तुम्हारे क्या विचार हैं ?"

मैंने कहा, "हम गधों में किसी प्रकार का जातीय भेद-भाव नहीं है। गधा काले बालों वाला हो या भूरे बालों वाला, उसका माथा सफेद हो या काला, उसकी खाल धारीदार हो या बेधारीदार, हमारे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे समाज में सब गधे बराबर हैं।"

"समाज में सब गधे बराबर हैं।" मानचेस्टर गार्जियन' के नुमाइन्दे ने इस दिलचस्पी से न्यूयार्क टाइम्स' और 'लाइफ' के नुमाइन्दों की ओर देखा जैसे कह रहा हो, “देखो! मैं तुमसे कहता नहीं था, पहले इसके विचार मालूम कर लो।"

'लाइफ' वाले ने 'न्यूयार्क टाइम्स' वाले से कहा, "मेरे विचार में अब फ्रांसिस को बुलाने का कोई लाभ नहीं है।"

'मानचेस्टर गार्जियन' के नुमाइन्दे ने पूछा, "महाशय! यह पूर्व और पश्चिम में जो ठण्डा युद्ध छिड़ा हुआ है, उसके सम्बन्ध में भी तो मुंह से फूल झाड़िए।"

मैंने कहा, "हम गधों में कभी कोई ठण्डा या गर्म युद्ध नहीं होता। वास्तव में हम गधे लोग, जैसा कि आप मनुष्यों को मालूम होगा, युदध से घोर घृणा करते हैं। आपने प्रायः देखा होगा, घास के एक ही प्लाट पर दर्जनों गधे एक साथ चरते हैं और कभी कोई लड़ाई नहीं होती। हमारी समझ में नहीं आता, आखिर मनुष्य इस तरह एक साथ क्यों नहीं चर सकते! फिर आपने यह भी देखा होगा कि विभिन्न रंगों तथा जातियों वाले गधे मिल-जुलकर ईटें ढोते हैं और एक नया मकान बनाने में सहायता करते हैं। अब मेरी समझ में नहीं आता कि तुम मनुष्य, विभिन्न रंगों तथा जातियों वाले मनुष्य, क्यों मिलजुलकर एक नया कारखाना या एक नया संसार नहीं बना सकते?"

"और पञ्चशील के सम्बन्ध में?"

इस पर 'लन्दन टाइम्स' के नुमाइन्दे ने घृणा से मुंह मोड़कर 'मानचेस्टर गार्जियन' के नुमाइन्दे से कहा, "पूछना बेकार है। इस गधे पर नेहरू का जादू चल चुका है। अच्छा हुआ कि यह गधा बांडुंग कान्फ्रेंस में नहीं था, वरना जाने क्या उपद्रव मचाता!"

वे तीनों मुझे छोड़कर चले गए।

उनके जाने के बाद और बहुत से प्रश्न हुए-विभिन्न विषयों पर जिनका उत्तर देने का मैंने पूरा प्रयत्न किया अर्थात् जहाँ तक गधे से उत्तर बन सकता था।

यह प्रेस कान्फ्रेंस कोई डेढ घण्टे तक जारी रही। उसके बाद सब नुमाइन्दे अपनी-अपनी रिपोर्ट देने अपने दफ्तरों को चले गए, क्योंकि आज उन्हें एक नया शोशा हाथ आया था। इतनी लम्बी-चौड़ी कान्फ्रेंस के बाद मैं भी पसीने से लथ-पथ था और थक गया था। मैंने सोचा कि राम की विधवा के घर जाने से पहले जमुना में नहाना चाहिए, तबीयत हल्की हो जाएगी और थकावट भी दूर हो जाएगी। यह सोचकर मैं कान्स्टीट्यूशन क्लब से बाहर निकला कि एक भारी-भरकम लेकिन नाटे कद के आदमी ने जो एक बहुत उम्दा धोती और बहुत उम्दा सफेद अचकन पहने हुए था, मुझे सम्बोधित करते हुए कहा- 'क्षमा कीजिए, आप ही वे गधे हैं, बोलने वाले गधे, जिन्हें हमारे प्रधानमन्त्री से एक स्पेशल इण्टरव्यू मिला है?"

"जी हां।"

नाटे कद के आदमी ने मुझे सिर पांव तक देखा। कुछ देर चुप रहा, फिर मानो अपने आपको सम्भालकर बोला, “अगर कष्ट न हो तो इस समय का खाना गरीबखाने पर खाइए। मेरी कोठी यहां कान्स्टीट्यूशन क्लब से बहुत निकट है-बरजूटिया महल।"

"मगर यहां से कैसे चलेंगे?" मैंने एक जंभाई लेकर पूछा, “मैं बहुत थका हुआ हूँ"

"मेरे पास एक व्यूक गाड़ी है आप शायद उसमें न आ सकें, इसलिए मैं एक शेवरले लारी आपके लिए लेता आया हूँ।"

जीवन में पहली बार मैंने शेवरले लारी में सफर किया। भाई, यह लोहे का गधा खूब होता है!

बरजूटिया महल सचमुच एक महल की तरह सजा हुआ था। जिस सोफे पर ले जाकर मुझे बिठाया गया, वह इतना बड़ा था कि उस पर दो गधे आसानी से आराम कर सकते थे।

बरजूटिया महल में 'तशरीफ रखवाए' जाने के बाद बरजूटिया ने बड़े आदरपूर्वक झुककर मुझसे कहा, "अब आप क्या पीएंगे? लेमन, स्क्वैश या शर्बत रुहअफजा?"

मैंने कहा, "मैं थोड़ी सी घास खाऊंगा।"

बरजूटिया ने बड़ी गम्भीरता से घण्टी बजाई, जैसे आयु भर मेहमानों को घास खिलाना उसका नियम रहा हो। उसके बाद उसने अपने नौकर को कुछ आदेश दिया।

थोड़े समय के बाद जब नौकर ने फिर कमरे में प्रवेश किया तो मैं क्या देखता हूं कि चांदी की एक बड़ी सुन्दर ट्रे में हरी-हरी सुगन्धित दूब धुली-धुलाई रखी है। बड़ी बारीक कटी हुई घास थी, जिसके खाने से दांतों को जरा भी कष्ट नहीं होता था। घास खाने के बाद नौकर नम्बर 2 ने चांदी की एक बाल्टी में मुझे पानी प्रस्तुत किया। रेफ्रीजरेटर का ठण्डा किया हुआ पानी था, जिसमें जाने कितनी सुगन्धियां और शर्बत मिले हुए थे। जब मैं पानी पी चुका तो नौकर नम्बर 3 ने सफेद तौलिये से मेरा मुंह साफ किया।

नौकर नम्बर 4 ने आकर पूछा, "आप कौन-सा पान नोश फर्माएंगे, सादा या क्वाम वाला?"

मैंने कहा, "क्वाम बेहतर रहेगा; लेकिन देखना, क्वाम खास लखनऊ का हो वरना सारा मजा किरकिरा हो जाएगा।"

इतना कह चुकने के बाद मैं सेठ बरजूटिया की ओर मुड़ा और उनसे पूछना पड़ा, "आपने इतना कष्ट किसलिए किया?"

सेठ बरजूटिया ने अपनी कुर्सी जरा आगे सरका ली और मेरी ओर ध्यान से देखकर बोला, "श्रीमानजी! साफ-साफ कह दूं?"

"बिल्कुल साफ-साफ कहिए।" मैंने आग्रहपूर्वक कहा।

"तो बात यह है," सेठ बरजूटिया ने मेरे और करीब आते हुए कहा, "मैं उस प्रेस कान्फ्रेंस में मौजूद था। उस समय मैंने अनुमान लगाया था कि आप

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