Dali Nahin Phoolti Gulsher Khan Shaani

डाली नहीं फूलती गुलशेर ख़ाँ शानी

फटे हुए बाँस का जमीन में पटकने का स्वर गली से पार हुआ कि रात के तीसरे पहर का सन्नाटा अपने को जरा सा झटककर फिर गली में बैठ गया। लेट-लेटे ही सबीना ने अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर सिरहाने दबी ओढ़नी खींची और बेशुमार शिकनों और सलवटों समेत कंधे पर डाल ली।
दीवार में कील से अटके छोटे-से बेड-लैंप की उजाड़ सूरत वाली रोशनी बड़ी मुश्किल से बाहर झाँकती थी। उसकी परछाई तक भी कमरे का दूसरा कोना नहीं छू पाती, उसे क्या दिखेगा कि कौन है और कौन नहीं? दूसरी ओर बाजी की खाट की ओर लगी हुई मसहरी के भीतर भी पहले-पहल कुछ नहीं दिखा लेकिन गौर से देखने पर यकीन करना पड़ा कि हालाँकि बाजी की मसहरी बराबर लगी थी, बेबी भी बराबर सो रही थी लेकिन बगल में बाजी न थीं।
लम्हा-भर भी न गुजरा था कि सबीहा को बाजू के कमरे में सोए यूनूस भाईजान की याद आई और होंठों ही में मुस्कराते-मुस्कराते सबीहा के जिस्म में काँटे उग आए और वह काँप कर रह गई, 'हाय अल्लाह, बाजी को तो बुखार है न!'
गली का सन्नाटा एकाएक फिर टूटा।
बाजू वाले मकान के सामने सेहरी के लिए जगाने वाले कोई बड़ी अच्छी-सी नात पढ़ रहे थे। उनकी उँगलियों में फँसे काँच के छोटे-छोटे टुकड़ों से गले के सोज में डूबा और घुला-मिला एक अजीब और थरथराता जो संगीत पैदा होता, वह खूब अच्छा लगता, सच, खूब ही अच्छा लगता। दो मोटी, भारी पर मीठी आवाजें एक साथ उठतीं, सन्नाटे को खँगालती, रात के अँधेरे आँचल की सलवटों को मेंटती... मेंटती और कहीं बिछल जाती...।
उठते-उठते ही सबीहा फिर लेट गई। बाहर की आहट लेने पर लगा कि अभी तो बहुत रात बाकी है। इन लोगों का भी क्या है? बहुत-से घरों में फेरी दे पाने की लालच में रात के बारह बजते ही निकल पड़ते हैं। उनकी बला से अगर कोई आधी रात को ही उठकर सेहरी कर रोजा रख ले।
काँच वाले अभी सबीहा के घर के आगे ही निकले थे कि चौराहे पर रोज की तरह मुट्टों की आवाज गूँजी। रमजान के महीने में सेहरी के लिए जगाने वाले और लोगों की तरह सड़क पर बाँस पटकती हुई मुट्टो भी चलती थी लेकिन किसी के मकान के आगे रुककर वह कभी कुछ नहीं पढ़ती। बस गली में एक बार आकर ऊँची और मोटी आवाज में अचानक जोर से पुकार उठती थी-
डाली झुकी हुई ई ई ई
पत्ते झुके हुए ए ए ए
झुके हुए पाँचों फूल।
बरसों हो गए इसके सिवाय मुट्टो से लोगों ने और कुछ नहीं सुना। वह मिसरा किस शेर का था, उसके क्या मानी हुए, और मुट्टो उसे ही हमेशा क्यों दुहराया करती थीं, यह कोई नहीं जानता। किसी ने जाने की कोशिश भी शायद न की। पहले जब मुट्टो कस्बे में नई-नई आई थी, और जरा जवान-सी थी तो कुठ मनचलों ने इस मिसरे का बड़ा भद्दा, ऊटपटाँग और गलत मतलब निकालकर लोगों के बीच फैलाया था। कुछ दिनों खूब अटकलबाजियाँ चलीं और अँधेरे में बहुत-से तीर फेंके गए।
वैसे मुट्टो इतना पुरानी और मशहूर थी कि उसे न जानने वाला इस शहर का नया गिना जाता था। कौन-सा ऐसा घर था जहाँ मुट्टो की आवश्यकता न पड़ी हो? खुशी की बात हो या गम की, मुट्टो को बुलाए बिना औरतों का काम नहीं निकल पाता था। है भी वह हरफनमौला। कभी छटी-छिल्ले की दावत लेकर भटकती, कभी ब्याह के मंडप में मिरासिनों की अगुवा बनी ढोलक पर थाप देती दिखाई देती तो कभी आर्तनाद-पुकार और रोने-पीटने के बीच सिर झुकाए आहिस्ते-आहिस्ते किसी जनाजे को नुसल देती नजर आती। उसका न एक काम था और न एक ठौर।
माँगने वालों और फकीरों का कस्बे में एक अलग-सा मुहल्ला था लेकिन मुट्टो उनके बीच कभी नही रही। सब लोगों से अलग-थलग कस्बे की घनी आबादी से हटकर किसी अँधेरी-अँधेरी कोठरी में ही वह पड़ी रहती। बरसों से अकेली, सुनसान और उदास। (सिवाय उन कुछ दिनों तक जबकि कहीं से एक बीमार-बीमार सा युवक आकर उनके साथ रहने लगा था और वह दिखाई तक न देती थी।)
सबीहा के बासी होंठों पर एक दर्द-घिरी रेखा काँपी-सरकी और मुट्टो की सारी तस्वीर आकर निगाहों के सामने खड़ी हो गई। एक खास और अनोखा व्यक्तित्व है मुट्टो का। उम्र से लगभग 36 की होगी, रंग जरा गहरा काला, इकहरा जिस्म (दुबली कही जाए तो ज्यादा सही हो) निहायत निर्भीकता और बेपरवाही से चलती-फिरती और हमेशा मर्दाना लिबाज में रहती (प्रायः कमीज और पायजामा पहनती और पाजामे को जरा चढ़ाकर नेफे के ऊपर कमर में खोंस लिया करती)
उस उम्र में हुलिए में भी जब तक वह मुट्टो के पास रहा, मुट्टो के बारे में लोगों ने कई तरह की बातों कहीं। ऐसे अवसर पर कहने और सुनने वालों को मुट्टो मुँह भर-भर गालियाँ देती -
'ऐ, क्या जमाना आ गया है, लोग उम्र और रिश्ता तक नहीं देखते? और मुट्टो कुँआरी है तो क्या उस मरझल्ले लौंडे के लिए मरेगी! ऐ, दीदे फूटें कहने वालों के, आग लगे उनकी जबान पर!'
उस युवक से मुट्टो का जो भी रिश्ता रहा हो, पर अब वो मरझल्ला भी नहीं रहा और मुट्टो फिर अकेली हो गई। एक ही लकीर में पिटी उसकी जिंदगी में जो एकाएक परिवर्तन आ गए थे, वह फिर उसी पुराने ठर्रे पर आ गया और पहले की तरह मुट्टो फिर से कभी कभार के जुमे-जुमेरात को दिखाई देने लगी। किसी ऐसे ही एक जुमे को मुट्टो को अपने घर के सामने देखकर सबीहा उत्सुकतावश स्वयं निकल आई। देखते ही धक-सी रह गई - मुट्टो क्या इतनी बूढ़ी हो गई है? कुछ यूँ लगा जैसे तीन-चार माह में ही मुट्टो दस बरस की जिंदगी जी कर खड़ी हो!
जब तक वह नजरों से ओझल न हो गई दहलीज पर खड़ी-खड़ी सबीहा उसे देखती रही। मन भीतर-बाहर से भीगकर रह गया -
'हाय, मुट्टो क्या कुँआरी ही मरेगी?'
बाजू वाले कमरे में नही, आँगन के बाथरूम से बाजी की आहट मिली। वहाँ के पत्थर पर बेपरवाही से रखा गया लोटा झनझना रहा था। युनूस भाईजान के कमरे में वैसी ही खामोशी थी - शायद अभी नहीं जागे। कदमों की आवाज और किवाड़ के सरकने के स्वर के साथ बाजी कमरे में लौटीं और बिना किसी ओर देखे थटी-थकाई और निढाल-सी अपने बिस्तर पर लेट गईं।
एक बार सबीहा का मन हुआ कि वह पुकार कर बाजी की तबीयत पूछ ले, लेकिन शब्द होंठों तक आकर ठिठक गए और अंत में हारते हुए दम साधकर उसने आँखें बंद कर लीं।
बाजी को क्या हो गया था? मन में ढेर-सा धुआँ सा लेके वह चुपचाप क्या सोचती रहती हैं? तबीयत अच्छी रहने पर भी अब बाजी नहीं मुस्करातीं। एक अजीब सी कुंठा में घुट-घुट कर रूखी और चिड़चिड़ी हो गई हैं। ब्याह के पहले वाली बाजी अब धीरे-धीरे करके आज सबीहा से कितनी दूर सरक गईं। उसे आश्चर्य होता है कि शादी होने के बाद लोग क्यों बदल जाते हैं।
पहले जब बाजी का ब्याह नहीं हुआ था और वह सबीहा के साथ इकट्ठे रहती थीं तब की बात युनूस भाईजान के यहाँ आने के बाद नहीं रही। दोनों के संबंधों क सारी ऊष्णता और माधुर्य कम होता इतना भर बच गया कि सबीहा बाजी की छोटी बहन है और कुछ नहीं।
अभी मुश्किल से एक साल ही बीता होगा कि एक दिन वह रस्सी बंधन भी कहीं भीतर से टूट गया। सबीहा को बाजी और युनूस भाईजान के सहारे बेसहारा करके उसके अब्बा ने एक रात चुपचाप आँखें मूँद लीं और कुछ ही महीनों में सबीहा यूँ हो गई जैसे दोनों में रक्त का संबंध न होकर मात्र परिचय ही हो और उस पर दया करके बाजी ने अपने घर में रहने को जगह भर दे दी हो।
धीरे-धीरे करके दोनों के बीच जाने कौन सा तनाव आकर बैठ गया कि आपस में संक्षिप्त और कारोबारी बातों के अलावा और किसी चीज के लिए जगह ही नहीं रही। अवकाश के क्षणों में दोनों ने अपने-अपने कमरों में चुपचाप लेटे हुए कितने घंटों के घंटे व्यर्थ गुजार दिए हैं, इसका लेखा-जोखा रखकर वह क्या करेगी? शायद सबीहा और बाजी को बाँधने वाली डोर कमल के नाल जैसी थी जो टूटने के बावजूद अपने सिरों से निकले चंद बारीक और नाजुक रेशों से जुड़ी होती थी।
बाजी की उस घुटन को सबीहा न समझती हो, ऐसी बात नहीं लेकिन समझ लेने भर से क्या होता? पहले-पहल बड़ी बहन के दूल्हे के नाते सबीहा युनूस भाई को अक्सर छेड़ती और हँस-हँस कर खूब मजाक करती थी। युनूस भाई भी उसके साथ गाहे-ब-गाहे खुलकर हँसते लेकिन बाजी को वह सब अच्छा नहीं लगा।
रात के खाने के बाद एक सिगरेट सुलगाकर युनूस भाई रेडियो के पास वाली ईजी-चेयर पर धुएँ और संगीत से घिरे-घिराए चुपचाप पड़े रहते हैं। इस वक्त अक्सर बाजी किचन में या तो खाने में लगी होतीं अथवा मूँदने-ढँकने में व्यस्त होती हैं। रोज के नियम के अनुसार सबीहा तब पानदान के सामने बैठ युनूस भाई के लिए पान लगाने में लग जाती है।
उस रात शाम को बूँदाबाँदी भी हो गई थी शायद इसीलिए उमस थी। पीछे का आँगन बहुत बड़ा है और अहाते की दीवार पर मधुमालती की बेल छा गई है। उसी के पास युनूस भाई ने रातरानी का पौधा लगाया है जो अब फूलने लगा है। गर्मी की रातों में जब रातरानी की हर टहनी खिलकर महकती है तो एक बे-खुद से नशे में मन की कई पर्तें उधड़-उधड़ जाती हैं। बरामदे की रोशनी युनूस भाई उसी अँधेरी और महकीली जगह काट डाले और चुपचाप लेटे रातरानी और मधुमालती की साँस पी रहे थे कि रेडियो वाले कमरे में से ढूँढ़ती हुई सबीहा पान लिए पहुँची।
युनूस की ऊँगलियों की सिगरेट आधी जल गई थी। गुल तक झाड़े बिना युनूस भाई आँखें बंद किए लेटे थे। आहट सुनकर उन्होंने चौंककर आँखें खोली और बड़े दर्द भरे लहजे में पुकारा 'सबीहा!' सबीहा चुपचाप पान रखकर जाने लगी कि युनूस ने उसकी ओढ़नी के छोर तक हाथ बढ़ाकर कहा 'सुनो।'
जाने क्यों सबीहा को लग रहा था कि रुकना ठीक न होगा, हँसकर बोली, 'भाईजान, क्या बहुत उदास हो?'
बरबस बिठाए जाने के कारण सबीहा अभी सँभल भी न पाई थी। दुपट्टा एक ओर काँधे से गिरकर जमीन पर आ गया था। वह छोर उठाकर काँधे से लेते हुए सिर बी न ढक पाई थी कि अचानक देखा बाजी आँगन तक आते-आते क्षणभर के लिए रुकीं, दोनों को देखा और वापस लौट गईं।
उसी क्षण सबीहा भी वहाँ से लौट आई लेकिन बाजी ने उसके बाद कई दिनों तक उससे बात ही न की। आहिस्ते-आहिस्ते उस रात की घटना आई-गई हो गई। न तो बाजी ने कुछ पूछा और न ही सबीहा का साहस हुआ कि कोई सफाई दे सके; हालाँकि वह एक क्षण के लिए भी यह भूल नहीं पाई कि बाजी उसे ओछी समझकर भीतर ही भीतर बेहद नफरत करती हैं।
अक्सर मुहल्ले, पड़ोस वाले, रिश्तेदारों या मिलने-जुलने वालों से प्रायः सबीहा के व्यवहार, काम-काज, स्वभाव और चाल-चलन आदि की ढेर सारी शिकायतें बाजी करतीं -
'ऐ, सच कहती हूँ फूफी, लौडिया के रंग-ढंग कुछ अच्छे नहीं दिखते। किसी दिन खानदान के मुँह पर कालिख न पोत जाए तो कहना। अरे, बहन ही हुई तो क्या हुआ?'
फूफी, खाला, चाची या आपा तब दिली अफसोस जाहिर करतीं, नए जमाने कोसतीं और अपने जमाने के साथ अपनी जवानी, काम-काज और सलीकेमंदी की चर्चा के बाद आहिस्ते से कहतीं, 'एक बात बहू-खुदा ने दुनिया में कीड़े-पतंगे की जोड़ी बना भेजी है। इसे कहीं दे-ले क्यों नहीं देती?'
ऐसे अवसर पर बाजी के चेहरे का रंग उड़ जाता, अचानक बात तोड़कर बाजी उठ जातीं, 'यह जानें, शायद इन्हें अपनी छाती पर पीपल नहीं दिखाई देता।...'
पड़ोस के ताहिर अली साहब शायद उठ गए हैं, लगातार उनकी खाँसी की आवाज आ रही है। मुहल्ले वाले ताहिर साहब को पसंद नहीं करते और खास तौर पर ऊँगलियाँ चटका-चटका कर गालियाँ देती हैं। ताहिर अली साहब अपनी पचास से अधिक की उम्र, सफेद बर्फ सी दाढ़ी और दिन-रात के रोजे-नमाज के बावजूद मुहल्लेवालों का विश्वास नहीं जीत पाए। लोगों का काम शायद इधर-उधर और शायद बेबुनियाद बातें बकना ही होता है। आदमी लाख गिर जाए मगर भला बाप-बेटी के रिश्ते में कोई खोट हो सकता है? इस बात पर कौन विश्वास करेगा? ताहिर अली ने जान-बूझ कर अपनी बेटी को ब्याह में नहीं दे, रोक रखा है?
युनूस भाई के कमरे से एकाएक खाट छोड़कर उठ खड़े होने की और फिर दरवाजे का पल्ला सरकाकर निकलने की आवाज हुई। जल्दी-जल्दी में पाँवों में चप्पलें डालते हुए और लगभग घसीटते हुए युनूस भाई अपने कमरे से निकले और आँगन की ओर बढ़ गए।
सबीहा हड़बड़ाकर उठी और किचन में घुस गई।
सेहरी के बाद और नीयत बाँधने से पहले एक सिगरेट सुलगाए युनूस भाई आँगन में टहलते रहते हैं और उस समय तक टहलते रहते हैं जब तक कि आँख न खुल जाए और पूर्वी क्षितिज में रंग-बिरंगे बादलों की ढकी-ढकाई किरणों की धुँधली परछाइयाँ रातरानी के बासी फूलों, मोगरे की नऊ कलियों और मधुमालती की ताजा पंखुरियों की महक के सात-साथ उजागर न कर दे।
किचन से निकलकर सबीहा कमरे में आई। बाजी की आँख लग गई थी। उनकी मसहरी का पल्ला जरा सा खुल गया था - शायद मच्छर घुस रहे हों। कोई भी मौसम हो, बाजी बिना मसहरी के सो नहीं पातीं और एक भी मच्छर मसहरी के भीतर आ जाए तो उन्हें नींद नहीं आती।
कई दिनों के घटे हुए चाँद की मद्धिम रोशनी पासे के जंगले के सुराखों से टूटकर बाजी के शरीर पर पड़ रही थी। चाँदनी के नन्हें-नन्हें टुकड़ों में लिपटा बाजी का जिस्म उस समय बहुत अच्छा लग रहा था। हालाँकि बाजी का चेहरा नहीं दिख रहा था। लेकिन सबीहा चोरों की तरह सुन्न हाथ-पाँव लिए बड़ी देर तक देखती रही फिर बाहर निकल आई।
निहायत फीकी सी चाँदनी गुलाब की अनफूली और बाँझ टहनियों, मधुमालती की सुहागिन बेल, मोगरे के महकते हुए चेहरों और रातरानी की खुशबू-भूलती नन्हीं डालियों पर मुर्दा हो गई थी। सुबह होगी तो उन झरे हुए फूलों को कचरे के साथ समेट कर स्वयं सबीहा फेंक आएगी। उतरती और बिखरती रात कभी-कभी कितनी परेशानहाल और उदास हो जाती है।
बस, एक छाया-सी होकर सबीहा चुपचाप और ठंडे और आहिस्ता कदमों से युनूस भाई के पास-बहुत पास जाकर खड़ी हो गई। कई पल खड़ी रही। युनूस ने पलटकर एक बार सबीहा को देखा फिर दूसरी तरफ देखते हुए यूँ सिगरेट फूँकने लगा जैसे सबीहा के आने की वह बात जानता रह हो। सबीहा बोली, 'बाजी सो गई हैं।'
उधर ही आँखें गढ़ाए युनूस ने चुपचाप ऐसे हाँ कहा जिसका मतलब कवल सुनने की स्वीकृति भर होता है।
कुछ क्षणों बाद जरा चुप रहकर सबीहा अनायास बोली, 'एक बात पूछती हूँ भाईजान, क्या यह सच है कि बेंत की डालियाँ होती हैं, पत्ते होते हैं पर फूल नहीं होते?'
जरा आश्चर्य से सबीहा की ओर देखकर युनूस बोले 'मैंने बेंत का जंगल नहीं देखा है सबीहा।'
बिना एक पल रुके सबीहा ने कहा 'बाजी कहती हैं कि मैं तुम लोगों की छाती पर पीपल हूँ। शायद किसी दिन खानदान की नाक भी कटा दूँगी। अगर यह सच है तो मुझे उखाड़कर क्यों नहीं फेंक देते?'
युनूस शायद आज किसी बात का जवाब नहीं देंगे। बस बातें सुनते हैं, मुँह ताकते हैं और अँधेरे में देखने लगते हैं।
सबीहा की आवाज एकाएक रुँध गई, बड़ी कठिनाई से बोली, 'मुझसे ऐसी जिंदगी नहीं जिई जाती भाईजान - मुझे मार डालो। जिस दिन से मैं यहाँ आई हूँ, बाजी के मन में आग है। वह सीधे मुँह बात नहीं करतीं। लोगों से अपने बारे में इतना सुन चुकी हूँ कि अब अविश्वास करते भी नहीं बनता। महफिल-मजलिस में ताने-तिश्ने सुनने के बाद अब कहीं आने-जाने की भी हिम्मत नहीं कर पाती। ऐसे में किसी दिन क्या पागल नहीं हो जाऊँगी?'
बात काटकर अधीर से स्वर में युनूस ने पूछा, 'लोग क्या कहते हैं?'
सबीहा बोली, 'वही कहने आई हूँ। सुनकर मुझसे सच बात तो कहोगे न?'
युनूस आशंकित और भयभीत आँखों से सबीहा की तरफ देखने लगे।
अचानक पहली और धुँधली सुबह की सर्द हवा मधुमालती की बेल से होकर सरक आई और उसके साथ ही मुहल्ले की मसजिद से अजान की सदा उठने लगी।
'क्या यह झूठ है कि मेरे रिश्ते की बीसियों बातें आईं और तुमने उनमें कोई-न-कोई खोट निकालकर सबको टाल दिया?'
युनूस ने जवाब नहीं दिया।
'लोग कहते हैं कि तुम जान-बूझकर मेरी शादी नहीं करना चाहते क्योंकि तुम खुद मुझे चाहते हो, मुझमें दिलचस्पी रखते हो! लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि मैं तुम्हारे बच्चे की माँ तक बन चुकी हूँ...'
सबीहा ने दोनों हाथ से अपना मुँह ढक लिया और रोने लगी।
युनूस से कुछ बोला नहीं गया, बस पत्थर बने जहाँ के तहाँ खड़े रह गए। गली में खड़े तार के खंभे में हवा की वजह से शायद कोई चीज टकरा रही है... ठन... ठन...
अपने स्वर को बहुत कड़वा करके सहसा सबीहा फिर बोली, 'बाजी समझती है कि मैं यहीं घुट जाऊँगी। तुम सोचते होगे कि मैं जा ही कहाँ सकती हूँ, हैं न? अच्छा, मैं क्या मुट्टो से भी गई-बीती हो गई हूँ?'
परिहास के स्वर में युनूस ने कहा, 'देखता हूँ, किसी के साथ भाग जाने का तय करके आई हो।'
'हाँ'
'किसके साथ?'
'क्यों, तुम क्या मेरे साथ भागकर नहीं चलोगे? देखो तो, जो बात कई महीनों की कोशिश के बाद भी तुम नहीं कह पाए, वह मैंने एक पल में कह दी है...।' सबीहा बड़े अजीब स्वर में हँसी - 'गुनाह-सवाब की बात जाने दो' और 'बाजी सो रही हैं'। कहकर सबीहा ने सिर का आँचल हटाया, दुपट्टा खींचकर सीने से अलग किया और एक ओर फेंककर दो कदम युनूस के पास और बढ़ आई।
सबीहा को इतने पास से युनूस ने कभी नहीं देखा था। धुँधलके में भी सबीहा का चेहरा क्या दप-दप नहीं कर रहा था? कुछ क्षण हतप्रभ-से युनूस ताकते रहे फिर एकाएक पूरी शक्ति के साथ जरा परे हटकर एक जोर का तमाचा सबीहा के गाल पर लगा दिया और हाँफते हुए अवरुद्ध कंठ से बोले -
'छिः सबीहा तुम इतना गिर जाओगी, यह मैं नही जानता था।'
सबीहा अपनी जगह से हटी नहीं, जैसे कुछ भी न हुआ हो ऐसे बिल्कुल निर्विकार आँखों से युनूस को तकती रही।
युनूस वहाँ से सरके, एक ओर गिरा दुपट्टा उठाकर उन्होंने आहिस्ते से सबीहा के कंधों पर डाल दिया, थोड़ी देर चुपचाप उसे देखते रहे फिर तेजी से बाहर निकल आए।

 
 
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