गंगानगर के एक छोटे से गाँव में मुकेश नाम का किसान रहता था। मेहनती, ईमानदार और साफदिल इंसान। पर किस्मत हमेशा मेहरबान नहीं होती। खेत छोटे थे, परिवार बड़ा था और ऊपर से कर्ज़ का बोझ।
मुकेश की सबसे बड़ी चिंता उसकी बेटी सोनम थी।
सोनम, सुंदर, होशियार और संस्कारी लड़की थी। गाँव के लोग कहते –
“अरे मुकेश, तेरी बेटी तो हीरे जैसी है।”
लेकिन जब बात शादी की आती, तो हर कोई दहेज की चर्चा करता _
“लड़की अच्छी है, पर दहेज कितना देंगे?”
मुकेश यह सुनकर टूट जाता। उसकी आँखों में आँसू आ जाते। वह सोचता –
“जब बेटी की कीमत भी पैसों से लगती है तब रिश्ते भी बाज़ार में बिकते हैं ” l
एक दिन गाँव में खबर आई कि शहर का अमीर व्यापारी अपने बेटे की शादी के लिए लड़की ढूँढ रहा है। उसका बेटा पढ़ा-लिखा और आधुनिक था। सबने कहा –
“मुकेश ! तुम्हें उस रिश्ते के बारे में न सोचना चाहिए यह रिश्ता बड़ा ऊँचा है।”
मुकेश ने हिम्मत करके व्यापारी से बात की। व्यापारी ने मुस्कराकर कहा –
“देखो मुकेश , हम अमीरी गरीबी को नहीं मानते , हमे इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं है किंतु लड़के पर इतना खर्चा किया है तो पचास हज़ार नकद और सोने की चैन दहेज में चाहिए। वरना शादी नहीं होगी।”
मुकेश का चेहरा फीका पड़ गया।
वह घर आकर रात भर करवटें बदलता रहा। सोचता –
“बेटी की खुशियों के लिए कर्ज़ भी लेना पड़े तो ले लूँ…
पर क्या मैं अपनी सोनम को पैसे की दुल्हन बना दूँ?”
गाँव के स्कूल मास्टर बाबा तिवाड़ी जी बहुत सम्मानित व्यक्ति थे।
जब उन्हें यह खबर मिली तो वे मुकेश के घर पहुँचे।
उन्होंने कहा –
“मुकेश भाई, यह कैसी बात सोच रहे हो?
बेटी कोई बोझ नहीं है, और न ही कोई सौदा है।
जो लोग पैसों के बल पर रिश्ता करना चाहते हैं, वे इंसान नहीं, व्यापारी हैं।
सोनम की कीमत रुपये से नहीं, उसके संस्कार और गुणों से तय होगी।”
मुकेश ने आँखों में आँसू भरकर कहा –
“पर मास्टर जी… गरीब आदमी की बेटी है… अगर रिश्ता टूट गया तो लोग क्या कहेंगे?”
मास्टर जी ने दृढ़ स्वर में कहा –
“लोग तो हर हाल में कहेंगे। लेकिन याद रखना –
पैसों से खरीदी दुल्हन कभी सम्मान नहीं पाती।
बेटी को कभी भी शादी करके ऐसे घर मत भेजो जहाँ उसकी इज़्ज़त पैसे के तराज़ू में तोली जाए।”मुकेश को बात समझ आई। उसने मन ही मन ठान लिया –
“मैं बेटी को पैसे की दुल्हन नहीं बनने दूँगा।”
कुछ महीनों बाद, पास के गाँव से रिश्ता आया।
लड़का नवीन था, एक पुलिसमैन
सीधा-सादा, पढ़ा-लिखा और समझदार।
नवीन और उसके परिवार ने आते ही कहा –
“हमें दहेज नहीं चाहिए। हमें तो सिर्फ एक संस्कारी बेटी चाहिए।”
मुकेश की आँखें भर आईं। उसे विश्वास नहीं हुआ कि आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं।
उसने हाथ जोड़कर कहा –
“बेटा, तुमने मेरी बेटी का मान बढ़ाया है। तुमने दिखा दिया कि बेटी की कीमत रुपये से नहीं, उसके गुणों से है।”
शादी की तारीख तय हुई। गाँव में कोई दिखावा नहीं हुआ, न सोने के गहने, न नकद लेन-देन।
फिर भी शादी पूरे गाँव की सबसे बड़ी खुशी बनी।
सोनम दुल्हन बनी तो सबकी जुबान पर एक ही बात थी –
“देखो, यह है असली शादी। बेटी पैसों की दुल्हन नहीं, इज़्ज़त की दुल्हन है।”
नवीन ने सोनम का हाथ पकड़ते हुए कहा –
“मैं वादा करता हूँ कि तुम्हें कभी पैसों की कमी या इज़्ज़त की कमी महसूस नहीं होने दूँगा।
हम मिलकर प्यार और विश्वास से अपना घर बनाएँगे।”
मुकेश की आँखों से आँसू बह निकले, मगर इस बार आँसू दु: ख के नहीं, खुशी के थे।