गाय का सिर : यूक्रेन लोक-कथा
Cow’s Head : Lok-Katha (Ukraine)
ओक्साना अपने पिता, अपनी सौतेली माँ और अपनी सौतेली बहिन के साथ शहर के किनारे के एक छोटे से गाँव में रहती थी। ओक्साना की सौतेली माँ ओक्साना को बिल्कुल नहीं चाहती थी वह बस अपनी बेटी ओलीना को ही ज़्यादा प्यार करती थी।
अपने पिता की दूसरी शादी के जल्दी ही बाद ओक्साना को यह पता चल गया कि अब घर का सारा काम उसी के कन्धों पर आ पड़ा है जबकि ओलीना अपना सारा दिन आराम से गुजारती।
ओक्साना का पिता एक बहुत ही कम बोलने वाला आदमी था और अपनी पत्नी के सामने उसके खिलाफ नहीं बोल सकता था सो वह ओक्साना के लिये कुछ नहीं कर सकता था।
ओक्साना ओलीना के पुराने कपड़े पहनती थी। ठंड में काम करते करते उसके हाथ लाल हो जाते थे और फट जाते थे जबकि ओलीना अच्छे अच्छे कपड़े पहन कर पार्टियों में जाती रहती थी।
इस तरह से ओलीना आलसी भी होती जा रही थी और बिगड़ती भी जा रही थी।
एक साल जब जाड़ों में बरफ बहुत ज़्यादा पड़ रही थी तो ओक्साना के परिवार के पास पैसा खत्म हो गया। सो ओक्सना की सौतेली माँ ने ओक्साना के पिता से कहा कि वह ओक्साना को कहीं भेज दे क्योंकि वे दो लड़कियों को एक साथ नहीं रख सकते थे।
न चाहते हुए भी ओक्साना का पिता ओक्साना को वहाँ से भेजने पर राजी हो गया। वह उसको जंगल के काफी अन्दर एक घर में ले गया और वहाँ छोड़ आया।
ओक्साना बहुत डरी हुई थी क्योंकि वह जंगल राक्षसों से भरा हुआ था। लेकिन ओक्साना जानती थी कि उसको क्या करना है। वह उस मकान में अपनी एक छोटी सी पोटली ले कर घुसी।
उसको वहाँ पर एक आग जलाने की जगह मिल गयी, एक छोटी मेज दिखायी दे गयी और एक जंग लगा बरतन मिल गया। ओक्साना ने अपनी डबल रोटी, चाकू और चीज़ का टुकड़ा जो उसके पिता ने उसको चलते समय दिया था एक तरफ को रख दिया।
उसने अपना कम्बल आग जलाने की जगह के पास तह करके रख दिया। फिर उसने कुछ लकड़ियाँ इकठ्ठी कीं और आग जलायी।
ओक्साना जानती थी कि उसकी वह डबल रोटी और चीज़ सारे जाड़े तो चल नहीं पायेगी सो उसने पेड़ की पतली शाखाओं से एक जाल बनाया जिससे उसने एक जाड़े वाला खरगोश पकड़ा।
उसने बरफ खोद कर खाने के लिये कुछ जड़ें और बैरी ढूँढी। जब तक अँधेरा हुआ उसने थोड़ा सा बरफ पिघला कर पीने के लिये पानी भी बना लिया था।
सो ओक्साना ने आराम से खाया पिया और रात बिताने के लिये आग के पास लेट गयी। वह हवा के बहने की आवाज सुनती रही और यह सोचती रही कि वह जंगल से नहीं डरती।
आधी रात को दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। खट खट खट। उस अँधेरे मकान में वह आवाज गूँज गयी और ओक्साना अचानक ही जाग गयी।
उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा। उसको लगा कि बाहर कहीं कोई राक्षस न हो। वह आवाज फिर आयी – खट खट खट। सुन कर उसने अपना सिर कम्बल में छिपा लिया और प्रार्थना करने लगी कि इस समय जो भी बाहर है वह वहाँ से चला जाये।
खट खट खट। ओक्साना उठी। उसने पेड़ की एक शाख अपने हाथ में उठा ली और धीरे धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ी। घर की चिमनी से आती हुई हवा बड़ी अजीब सी आवाज कर रही थी।
उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था जैसे ही उसने बाहर झाँक कर देखा। फिर उसने नीचे देखा तो डर के मारे ओक्साना की एक ज़ोर की चीख निकल गयी और वह पीछे की तरफ हट गयी। डंडी उसके हाथ से छूट गयी।
वहाँ तो एक राक्षस खड़ा था – एक बुरी आत्मा। उसका कोई शरीर नहीं था। ओक्साना हकला कर बोली — “तुम कौन हो?”
वह बोला — “मैं गाय का सिर हूँ।”
ओक्साना ने फिर से देखा, हाँ वह तो सचमुच वही था। वह सिर भूरा था और उसके अजीब से सींग थे और डरावनी आँखें थीं।
गाय के सिर ने पूछा — “मुझे बहुत ठंड लग रही है और भूख भी। क्या मैं तुम्हारी आग के पास सो सकता हूँ?” उसकी आवाज ठंडी और मरी हुई सी थी।
ओक्साना ने अपने डर को हटाया और बोली — “हाँ हाँ क्यों नहीं।”
गाय का सिर बोला — “तुम मुझे दरवाजे से ऊपर उठाओ।” ओक्साना ने वैसा ही किया।
“अब तुम मुझे आग के पास रख दो।”
अब ओक्साना का डर निकल गया था और उसके दिल में उस राक्षस के लिये दया पैदा हो गयी थी। उसने उस सिर को दरवाजे से ऊपर उठाया और उसको आग के पास रख दिया।
गाय का सिर फिर बोला — “मुझे भूख लगी है। मुझे कुछ खिला दो।”
ओक्साना ने अपने थोड़े से खाने की तरफ देखा। उसके पास जो सूप था वह उसके सुबह के नाश्ते के लिये था पर वह उसने उसे उस गाय के सिर को पिला दिया।
“अब मैं सोऊँगा।” राक्षस की आवाज में ओक्साना के लिये नम्रता की कोई भावना नहीं थी फिर भी ओक्साना ने गाय के सिर को जितने आराम से रख सकती थी रखने की कोशिश की।
उसने अपना कम्बल भी गाय के सिर को ओढ़ा दिया था और खुद वह अपना कोट पहने ही एक ठंडे कोने में सिकुड़ी सी सो गयी थी।
सुबह को जब वह उठी तो गाय का सिर तो वहाँ से चला गया था पर जहाँ वह सोया था वहाँ एक बहुत बड़ा बक्सा रखा था जो बहुत सुन्दर सुन्दर पोशाकों से भरा हुआ था। और उन पोशाकों के नीचे बहुत सारा सोना और बहुत सारे जवाहरात थे।
ओक्साना तो उस सबको देखते ही आश्चर्य में पड़ गयी।
तभी उसके कानों में अपने पिता की आवाज पड़ी — “बेटी, मैं तुम्हें लेने आया हूँ।”
ओक्साना अपने पिता की आवाज सुन कर बहुत खुश हुई और बक्सा भूल कर अपने पिता से लिपट गयी। वह बोली — “आइये पिता जी।”
उसके पिता ने उसकी सौतेली माँ को किसी तरह इस बात पर मना लिया था कि वह ओक्साना को वापस घर ले आये। इसलिये वह ओक्साना को घर ले जाने के लिये आया था।
ओक्साना अपने पिता को घर के अन्दर ले गयी और बक्सा दिखाते हुए बोली — “देखिये पिता जी।”
फिर उसने अपने पिता को सब समझाया कि पिछली रात उसके साथ क्या क्या हुआ था।
उसका पिता उसको घर वापस ले गया। अपने गाँव में उसके अपने दया के बरताव की वजह से बड़ी इज़्ज़त हुई। कई लड़के उससे शादी की इच्छा से आने लगे सो जल्दी ही उसकी शादी भी हो गयी।
उसका खजाना देख कर ओक्साना की सौतेली माँ ने अपनी बेटी ओलीना को भी उस जंगल वाले मकान में भेजा और वहाँ एक रात गुजारने के लिये कहा। पर जब गाय का सिर वहाँ आया वह आलसी होने की वजह से उसकी सेवा नहीं कर सकी।
अगली सुबह उसके अपने कपड़े चिथड़ों में बदल चुके थे और जो कुछ उसके पास था वह भी सब मिट्टी में मिल गया था। पर ओक्साना काफी बड़ी उमर तक ज़िन्दा रही और खुशी से रही।
(साभार : सुषमा गुप्ता)