चुनौती (हिंदी कहानी) : महेश केशरी
Chunauti (Hindi Story) : Mahesh Keshri
सुबह- सुबह मुहल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि झाड़ियों में एक नवजात बच्ची मिली है। शायद रात मेंं इसे किसी ने फेंका दिया था । बीच -बीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी। पूरे मुहल्ले में चर्चा का आज का विषय ये लड़की ही थी।
पहली दूसरे से बोली - " ये जरूर किसी ना किसी का पाप है। पता नहीं कौन जात है। बड़ा खराब जमाना आ गया है। लोग बच्चे करके यहाँ -वहाँ फेंक दे रहें हैं।'
दूसरी ने पहली की हाँ-में-हाँ मिलाई -" जात छोड़ो पता नहीं किस धरम की है। "
मुनिया बेऔलाद थी। शादी के दस साल बाद भी कोई संतान उसको नहीं थी। पति ने छोड़ दिया था। किसी तरह लोगों के घर का चौका- बर्तन करके अपना पेट पालती थी। उसको इस बच्ची पर रहम आ गया। झटपट बच्ची को उठाकर गोद में ले लिया। उसको उस बच्ची पर दया आ गई थी।
नि:संतानता का दु:ख बहुत बड़ा दु:ख होता है। कोई पूछे उस दंपत्ति से जिसको औलाद नहीं हो रही हो। लेकिन मुनिया को तो दो दु:ख था। एक तो औलाद नहीं। दूसरा पति ने बाँझ होने का आरोप लगाकर उसको छोड़ दिया था। एक अकेली औरत समाज में कितने तरह की चुनौतियों से लड़ती है। ये भला मर्दों को क्या मालूम।
मुनिया को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था। लोग कुछ भी कहते हों। कोई बात नहीं। उसको परवाह नहीं है लोगों की। छोड़ने के समय पति ने उसको बाँझ होने की शर्त पर छोड़ दिया था। तब से इस अपराधबोध से जूझती आई थी, मुनिया। वो परित्यक्त होने के लिए पति को नहीं बल्कि अपने आपको कसूरवार मानती थी। वो औरत होने का सुख पाना चाहती थी। वो किसी के मुँह से माँ शब्द सुनने के लिए तरस गई थी।
मुनिया अवसाद में चली गई थी। मुनिया डॉक्टर के पास भी गई थी। डॉक्टरनी बाई बोली थी कि तेरे अँदर कोई कमी नहीं है। कमी तेरे मर्द में है। तू उसको लेकर डॉक्टर के पास जा। डॉक्टर बताएगा इसका इलाज।
फुलिया -" तुम इस पाप को पालोगी। पता नहीं किस कुल खानदान की है ये लड़की । किस जाति धरम की है। छी: फेंक दो इसे कचरे में। कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है। उसको लोग घर की शोभा नहीं बनाते। "
मुनिया बेऔलाद तो थी और औरत भी । उसका दिल मोम का था। माँ का दिल बहुत बड़ा होता है। मुनिया में इंसानियत भी थी। लिहाजा फुलिया को जबाब दिया -" देख फुलिया मैं जाति पाती को नहीं मानती। मैं धरम में भी विश्वास नहीं करती। मैं इंसानियत को मानती हूँ। फिर आदमी जाति-पाती और धर्म का होकर भी तो अधर्म करता है। जिसकी जैसी परवरिश होती है वो आदमी भी वैसा ही बनता है। मैं इसको अपने घर ले जाऊँगी। इसको ले जाकर पढ़ाऊँगी- लिखाऊँगी। अच्छे संस्कार दूँगी। फिर देखती हूँ कि कैसे ये बेराह चलती है। कैसे हाथ से बे हाथ होती है। सारा फल परवरिश और अच्छे संस्कारों का होता है।
फुलिया ने ललकारा -" सोच ले ये तूझे भारी भी पड़ सकता है। कहीं ऊँच- नीच कुछ हो गई तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था। हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया। लेकिन तेरी हिम्मत को दाद देनी पड़ेगी कि तुमने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है। फिर ये भी तो है कि तू चौका-बर्तन झाड़ू पोंछा करके कितना कमा लेगी। नहीं पाल पाएगी तू इसको। काहे जिद करती है। फेंक दे इसे वापस कूड़े में। मरती है तो मरने दे इसको। कोई सियार कुत्ता खा जाएगा। काहे किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है। देख रही है मँहगाई। तेरा दम निकल जाएगा इसको पढ़ाने- लिखाने, खिलाने- पिलाने में। फिर तेरा साथ देने वाला मरद भी तूझे छोड़ गया है। क्यों मुसीबत को गले मढ़ रही है। "
मुनिया अपने निश्चय पर अडिग खड़ी थी -" बोली माँ की ताकत का तुमको एहसास नहीं है। गरीब- से- गरीब माँ भी अपने बाल-बच्चों को रूखा- सूखा खिलाकर पालपोस ही लेती है। महिलाओं को हर चीज करना आता है। फिर तो ये और बड़ी बात होगी कि मैनें बिना किसी सहारे के इसको पाला है। अगर पति का सहारा लेकर बच्चों को पाला तो भला क्या पाला। फिर ये भी एक उदाहरण बन जाएगा कि कोई माँ बिना किसी सहयोग के भी किसी बच्ची की परवरिश कर सकती है। एक मिसाल मिलेगा समाज में लोगों को। फिर मेरे लिए भी तो ये एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पालकर दिखाऊँ ! ये काम करके जो आत्मविश्वास मेरे अँदर पैदा होगा। उसकी बात ही कुछ और होगी। "
" अच्छा तो तू अपनी परीक्षा कर रही है। और बच्ची का सहारा ले रही है। दूसरे के कँधे पर बँदूक रखकर निशाना लगा रही है। हम सब पूतों -भतारों वालियों को भी उकसा रही है। ऐसे उल्टे-सीधे कामों को करने के लिए। "
" देख फुलिया अँट- शँट मत बक। "
फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली- "सोच ले इससे मूर्खतापूर्ण फैसला कुछ नहीं होगा। लोग हँसेगें, तुम्हारा जीना हराम कर देंगें। तुम्हारे इस कदम से लोग तुझे अपने यहाँ नहीं बुलाएँगें। तेरा सामाजिक बहिष्कार भी हो सकता है। "
" सोच लिया है इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इंसानियत का रिश्ता जात-पात से ऊपर होता है। मेरे काम से लोगों को भी सीख मिलेगी, कि आदमी को हमेशा एक -दूसरे की मदद जाति- पाति से ऊपर उठकर करना चाहिए। समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है। फिर उसको कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है। जायज माँग होने पर वो समाज से लोहा भी ले सकती है। समाज के डर से किसी अच्छे काम को करने से पीछे नहीं हट सकती। आखिर सोच बदलने से ही तो समाज में बदलाव आता है। फिर समाज के डर से किसी को झाड़ियों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। फिर ये भी सोचती हूँ कि आखिर जिसको मजे करने थे उसने मजे कर लिए। लेकिन इसमें इस नन्हीं सी गुड़िया की क्या गलती। फर्ज कर तू इसी सड़क पर कहीं गिर जाए कोई दुर्घटना हो जाए। और तू लहुलूहान होकर सड़क पर पड़ी रहे। कोई तुझे उठाकर अस्पताल ना ले जाए। तू यहीं पड़े- पड़े मर जाए। लोग तुझसे तेरी जाति और धर्म के बारे में पूछने लगे। और किसी और जाति का होने की वजह से तुझे ऐसे ही यहाँ लोग मरने के लिए छोड़ दे तो तुझे कैसा लगेगा। फर्ज कर तू अस्पताल भी पहुँच जाए। और तेरी जाति की वजह से डॉक्टर तुझे देखने से मना कर दे। तो तू तो वैसे ही मर जाएगी। इसलिए तुझे मालूम होना चाहिए कि समाज में आदमी को आदमी का हमेशा मददगार होना चाहिए। "
लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था। लोग मुनिया को भला -बुरा कहते। लोगों ने मुनिया से संबंध- विच्छेद कर लिया था। मुनिया से अब लोग बात भी नहीं करते थे। समाज के लोग पहले की तरह अब उससे हँसते- बोलते तक ना थे। मुनिया से लोग कतराकर निकल जाते थे। मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी। उसका उद्देश्य अब बस इतना था, कि वो गुड़िया को किसी तरह से पढ़ा-लिखा कर कुछ बना दे।
बहुत से लोगों ने मुनिया को समझाया भी कि तू छोड़ दे ये कॉलोनी और कहीं किराए का दूसरा मकान ले कर रह। लेकिन मुनिया ने ये ठान लिया था, कि वो क्यों हटे पीछे कॉलोनी से। जब उसने ऐसा -वैसा कोई काम ही नहीं किया है। अच्छे काम को करने के लिए हिम्मत चाहिए , ताकत चाहिए। जो उसके पास थी। उसने किसी का कुछ चोरी थोड़े ही किया था। जो उसे किसी से डरना पड़े। धीरे- धीरे समय बीतता गया। गुडिया भी धीरे -धीरे बड़ी होती गई।
अब मुनिया को केवल बाहर का काम -धाम करना पड़ता था। गुड़िया अब बड़ी हो गई थी। वो आठवीं क्लास में पढ़ती थी। गुड़िया को मुनिया ने अच्छे संस्कार दिए थे। वो गुड़िया को हमेशा डाँट- डपट कर रखती थी। ताकि लड़की हाथ से बेहाथ ना हो जाए। उसकी परवरिश मुनिया बहुत अच्छे से कर रही थी। गुड़िया भी मेघावी और परिश्रमी लड़की थी। वो मुनिया की बातों को हमेशा मानती थी। मुनिया अब बूढ़ी हो रही थी। उसकी अवस्था अब जर्जर होने लगी थी। उसे केवल चिंता थी तो गुड़िया की और किसी बात की नहीं। गुड़िया समझदार होने के साथ साथ मेहनती भी थी। अब मुनिया से घर और बाहर दोनों जगहों का काम नहीं हो पाता था। लिहाजा वो और सब घरों के काम- काज तो कर लेती थी। लेकिन अपने घर आते-आते वो थककर निढ़ाल हो जाती थी। इसलिये गुड़िया ने घर के काम-काज को अब अपने जिम्मे ले लिया था। वो सुबह उठकर घर की पहले साफ - सफाई कर देती। फिर पानी भरकर ले आती। फिर बर्तन- बासन का काम निपटाती। अपने और मुनिया के लिए नाश्ता तैयार करती। फिर नहाकर खुद नाश्ता करती और स्कूल चली जाती।
गुड़िया आठवीं कक्षा पास कर गई थी। तभी एक दिन जब वो स्कूल से लौटी तो देखा माँ की हालत बेहद खराब है। अस्पताल में माँ को भर्ती करवाया लेकिन कमजोरी और जर्जर अवस्था के कारण मुनिया चल बसी। मुनिया की हसरत दिल में ही रह गई। मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुड़िया की जिंदगी ही बियाबान हो गई। उसकी दुनिया जैसे उजड़ गई थी। लेकिन कहते हैं ना का भगवान् सब दरवाजे एक साथ बँद नहीं करता। एक दरवाजा बँद करता है तो दूसरा खोल देता है।
मुनिया ने गुड़िया को लेकर सोचा था, कि पढ़ा- लिखाकर गुड़िया को वो कोई अफसर बना देगी। लेकिन ऐसा ना हो सका और मुनिया इस दुनिया से चल बसी। फुलिया और मुहल्ले की और औरतें मुनिया के बदले अब गुड़िया को ताने मारते कि इसकी माँ बड़ी आई थी अफसर बनाने। और खुद चली गई। बड़ा आदर्शवादी बनती थी। बहुत बड़ी -बड़ी बातें करती थी।
मुनिया की एक भतीजी थी शीतल । जो शहर में रहती थी। और एक बैंक में क्लर्क थी। उसका तलाक उसके काले रँग की वजह से हो गया था।जिस लड़के से उसकी शादी हुई थी। वो लड़का पियक्कड़ था। मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुड़िया की बाबत फोन पर सब बातें बता रखीं थीं। वो बता चुकी थी कि उसके अलावा गुड़िया का कोई भी अब इस दुनिया में नहीं है। अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वो गुड़िया की देखभाल करे। शीतल को गाँव आए करीब सप्ताह भर हो गया था। स्कूल की टी.सी. बनने में समय लग रहा था। इस बीच शीतल ने भी फुलिया के मुँह से मुनिया को लेकर बहुत सी बातें जो तँजिया लहजे में कह रखा था। वो बार -बार गुड़िया से कहती कि एक तो चली गई भगवान् के पास दूसरी आई है इसका नसीब बदलने।
गुड़िया को सप्ताह भर बाद टी.सी. मिल गई थी। वो शीतल के साथ शहर आ गई थी।
लेकिन शहर में आने के बाद भी उसको अपनी माँ का चेहरा नहीं भूलता था। गुड़िया को जब- जब माँ की याद आती तो उसकी आँखें भींगने लगती । वो गाँव से शहर तो आ गई थी। लेकिन गाँव की याद भूलती नहींं थी। गुड़िया को अपनी माँ का सपना नहीं भूलता था। अगर माँ जीवित होती तो एक बार तो गुड़िया अपने लक्ष्य से पीछे हट भी सकती थी। लेकिन माँ के सपनों को गुड़िया किसी भी हाल में पूरा करना चाहती थी। इधर शीतल और गुड़िया को फुलिया और मुहल्ले की औरतों की तँजिया बातें रातों को सोने ना देती। शीतल ने उस समय फुलिया और मुहल्ले की औरतों के तँज का कोई जबाब नहीं दिया था। उसको पता था कि उनको जबाब देने से बेहतर है कि सही वक्त का इंतजार किया जाए। सही वक्त जब आएगा तब वही उनको जबाब देगा। लिहाजा शीतल और गुड़िया सही वक्त का इंतजार करने लगे। शीतल ओर गुड़िया जितना फुलिया और मुहल्ले की औरतों की बाबत सोचते उनका मन उतना ही अशांत रहता। धीरे -धीरे समय बीतने लगा। हाँ उनके तँजिया लहजे ने आग में घी का काम किया था। गुड़िया और जोर-शोर से मेहनत करने लगी थी। ताकि वो फुलिया और मुहल्ले की औरतों को वक्त आने पर जबाब दे सके। लेकिन जैसे- जैसे वो अपने लक्ष्य के प्रति आगे बढ़ती जाती थी। उन दोनों को अपनी बेवकूफी का आभास होता जाता था। उनको अपना बचपना अब समझ में आने लगा था। उन दोनों को ये बात कई सालों बाद हास्यास्पद जान पड़ने लगी थी कि वो किन लोगों से अपना मुकाबला करना चाह रही थीं। उन लोगों से जो पति के हाथों रोज पिटती थीं। जिनके पति उनको रोज मार - मारकर से घर से बाहर निकाल देते थे। गुड़िया और शीतल जो मुहल्ले की ऐसी औरतों से एक समय में नफरत करतीं थीं। उनको अपनी बुद्धि पर दया आयी। वे लोग अनपढ़ औरतों से अपना मुकाबला कर रहीं थीं। जो दूसरों के रहमों -करम पर पलतीं थीं। अब गुड़िया और शीतल को उनपर दया आने लगी। वो सजा की नहीं बल्कि रहम की हकदार थीं। हम बराबर वालों से लड़ते हैं। जब हम अपने से बहुत छोटे लोगो से बड़े हो जाते हैं। जब हम उनकी कुँठा का कारण समझ लेते हैं। जब हमारा कद, हमारी सामाजिक हैसियत अपने से छोटे लोगों से बहुत बड़ी हो जाती है, तो हम अपनों से छोटे और कुँठित लोगों को क्षमा कर देते हैं।
अब गुड़िया यहाँ भी वही काम करती। सुबह उठकर झाड़ू - बर्तन , करके नहा धोकर नश्ता तैयार कर देती घर में काम करने के लिए कुछ था नहीं। शहर में गैस का कनेक्शन था। लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। पानी भरकर बाहर से नहीं लाना पड़ता था। लिहाजा गुड़िया का बहुत सा समय बच जाता था। अब वो और मन लगाकर पढ़ाई करने लगी थी। इधर शीतल को संदीप से तलाक के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था। गुड़िया के चले आने से उसका भी मन लगने लगा। उसने घर में रखा हुआ मेड भी हटा दिया था। काम कम होने की वजह से अब गुड़िया का काफी समय बच जाता था। लिहाजा वो आप-पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी। नौंवी में गुड़िया ने पूरे स्कूल में टॉप किया था। अब शीतल को भी विश्वास हो गया था कि एक- ना- एक दिन गुड़िया कुछ बहुत बड़ा करेगी। दसवीं की परीक्षा हुई। लेकिन इस बार उसका परीक्षा परिणाम बहुत बेहतर नहीं था। वो अपने स्कूल में प्रथम श्रेणी में पास हुई थी। गुड़िया घर आकर रोने लगी। तब शीतल ने उसको समझाया। बोली बेटा इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है। तुम ब्राइट स्टूडेंट हो। तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी। दिन बीतते रहे। और गुड़िया दिन -दोगुनी और रात -चौगुनी की रफ्तार से तरक्की करती रही। देखते देखते उसने नीट की परीक्षा भी पास कर ली। और एक सरकारी कॉलेज में उसे एडमिशन मिल गया। चार- पाँच साल की कड़ी मेहनत के बाद उसने एम. बी. बी. एस . भी पास कर लिया। अब वो एक डॉक्टर बन गई थी।
शीतल को भी गुड़िया पर भरोसा था। और गुड़िया उसके भरोसे पर खरी उतरी थी। आज शीतल ने अपनी बुआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था। शीतल ने इंसानियत के लिए तो गुड़िया की मदद की ही थी। उसका मदद करने के पीछे एक और कारण था। वो कारण था औरत को कमजोर समझने वाले लोगों को मुँहतोड़ जबाब देना। उसको संदीप को भी जबाब देना था। समाज को भी दिखाना था, कि बिना किसी पुरूष के किसी मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है। वो किसी के अधीन नहीं है। वो अपनी मर्जी की खुद मालिक है। वो जो चाहे सो कर सकती है। उसको ये बताना था कि जितना मजबूर और कमजोर औरत को लोग समझते हैं। वो नहीं है। ये बात उसने उसकी बुआ ने फिर वही बात गुड़िया ने भी साबित कर दिखाया था। आज इन तीनों महिलाओं ने समाज को करारा जबाब दिया था,कि देख लो समाज के ठेकदारों तुम जो पुरूष- पुरूष कहते नहीं अघाते। जिनको लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की कोई जगह नहीं है। उनको इन तीनों ने मुँहतोड़ जबाब दिया था।
करीब दस साल के बाद एक दिन गुड़िया की पोस्टिंग उसके गाँव में हुई थी। उसको पदोन्नति मिल गई थी। वो अब डॉक्टरों की सीनियर थी। अब वो सी. एम. ओ. थी। वो अब अस्पताल में मीटिंग एटेंड करती थी। एक दिन वो अपने केबिन में बैठी पर्ची पर कुछ दवाएँ लिख ही रही थी, कि नर्स ने अगले पशेंट का नाम पुकारा। पेशेंट नाम फुलिया था। नर्स ने जोर से दो बार फुलिया, फुलिया कहकर पुकारा। थोड़ी देर में गुड़िया के सामने उसके गाँव की वही फुलिया खड़ी थी। गुड़िया को तो एक-बारगी अपनी आँखों पर विश्वास ना हुआ।
गुड़िया ने इशारे से फुलिया को सामने की कुर्सी पर बैठने को कहा -" बैठिए। "
फुलिया ने इतने दिनों के बाद गुड़िया को देखा था तब भी वो पहचान गई। और रोते हुए बोली -" बेटी मुझे पहचाना मैं फुलिया। "
गुड़िया की भी आँखें भींगने लगी थीं -" हाँ चाची आपको कैसे नहीं पहचानूँगी। आपको मैं कभी भूल ही नहीं सकती। आपके कारण ही मैं आज यहाँ पर हूँ। "
"बेटी मुझे माफ कर दे। मुनिया के मुँह से निकली एक -एक बात सही थी। पाप- पुण्य कुछ नहीं होता। बल्कि इंसानियत से बड़ा कोई जाति कोई धर्म नहीं होता। मुनिया भले मेड थी। लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी। मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो। जैसा वो चाहती थी, वैसा ही तूझे बनाया। आज जीती तो कितना खुश होती। मेरा आशीर्वाद है बेटी तुझे। मैं फिर से एकबार माफी माँगती हूँ बेटी। मुझे माफ कर दे। मैं गलत थी मुनिया ही सही थी। परवरिश, इंसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है , बिटिया। आज अपनी आँखों से देख रही हूँ। "
फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई बोली -" ऐ मुनिया आशीर्वाद दे अपनी बेटी को। मैं अपनी गलती मानती हूँ। जहाँ भी तू है रे मुनिया मुझे क्षमा कर दे बहिन ! "
कहाँ तो गुड़िया, फुलिया को मिलने पर उसको और मुहल्ले की औरतों को खरी-खोटी सुनाना चाहती थी। और कहाँ वो भी फुलिया के सथ -साथ रोए जा रही थी!