छाते वाला बूढ़ा (ताइवान की लोक-कथा)

Chhate Wala Boodha (Taiwanese Folktale in Hindi)

एक था बूढ़ा आदमी। वह छोटे से शहर में अकेला रहता था। पहले अकेला नहीं था, पर धीरे-धीरे सब उसे छोड़ कर दूर-दूर चले गए थे। वह रहता था एक पुराने, टूटे-फूटे और छोटे मकान में। उसके घर में सब चीजें पुरानी थीं, खुद उसकी तरह। घर की पुरानी चीजों को वह फेंकता नहीं था, उन्हें इस्तेमाल करता रहता था, जैसे उसका छाता । छाता फट गया था। बारिश में जब बूढ़ा छाता लगाकर बाहर निकलता तो छाते के छेदों में से पानी टपकता ।

मोहल्ले वाले कहते - "बाबा, नया छाता ले लो न !”

बूढ़ा कहता - "मेरी तरह मेरा छाता भी बूढ़ा हो गया है । यह मेरा दोस्त है। इसे कैसे फेंक दूँ ।"

बूढ़े ने छेदों पर कपड़े के टुकड़े लगाकर सी दिया था। कहीं हरा, कहीं सफेद तो कहीं नीला । ऐसा विचित्र छाता तो शहर में किसी के पास नहीं था । लोग उसे देखकर कहते - 'लो आ गया बूढ़े छाते वाला बूढ़ा ।' सब उस पर हँसते तो बदले में बूढ़ा भी हँस देता । कहता - “हँसते रहा करो । हँसने से सेहत ठीक रहती है।"

एक दिन की बात है। बारिश हो रही थी । बूढ़ा छाता लगा कर निकला । छाते में से पानी की बूँदें टप टप टपक रही थीं। वह भीग गया। एकदम बेकार ! बूढ़े ने कहा और गुस्से से छाते को एक झाड़ी में फेंक दिया। फिर बारिश भीगता हुआ ही रास्ते पर चल दिया। लेकिन ज्यादा दूर तक नहीं जा सका । भीगने से बदन काँपने लगा । वह एक बरामदे में बैठ गया। अब वह सोच रहा था - 'छेद वाला सही पर छाते से कुछ बचाव तो होता ही था। मैंने छाते को क्यों फेंक दिया।'

बूढ़ा उस तरफ वापस चल दिया, जहाँ उसने छाता फेंका था । पर छाता नहीं मिला। न जाने कौन उठाकर ले गया था। किसी तरह लड़खड़ाता हुआ घर पहुँचा। उसे छाता खो जाने का बहुत दुख था । वह जोर-जोर से कहने लगा—“चोर को भी मेरा छाता मिला चुराने के लिए। अरे, वह तो किसी काम का नहीं था मेरी तरह।"

एकाएक बूढ़े को लगा जैसे कोई हँसा हो। वह चिल्लाया- "यह कौन हँस रहा है? हिम्मत है तो सामने आओ। मुझसे बात करो।" असल में बूढ़ा एकदम अकेला था। कोई भी नहीं बात करता था उससे। हाँ, सब मजाक जरूर उड़ाया करते थे उसका ।

हँसी फिर सुनाई दी, पर कोई दिखाई न दिया । सोच-सोचकर बूढ़ा परेशान हो गया । फिर न जाने कब उसे नींद आ गई। सपने में उसे अपना छाता हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया, फिर नींद टूट गई। एकदम अपने छाते का ध्यान आया । जैसे छाता नहीं, उसका कोई प्यारा दोस्त खो गया था ।

बूढ़ा घर से बाहर आया। तेज बारिश हो रही थी। तभी वह चौंक उठा। उसका छाता - दरवाजे के पास ही रखा था। हाँ, हाँ, उसी का छाता था । भला अपने प्यारे छाते को पहचानने में वह कैसे गलती कर सकता था। बूढ़े ने लपक कर छाते को उठा लिया। लेकिन यह क्या । छाते में बड़े-बड़े छेद थे। उसने जहाँ-जहाँ हरे लाल, नीले कपड़ों के पैबन्द लगाए थे, उन सभी को किसी ने उखाड़ कर फेंक दिया था ।

आखिर क्या मिला होगा चोर को ऐसा करके घर के बाहर खड़ा बूढ़ा यही सब सोचकर दुखी हो रहा था । उसने छाते को कई बार खोलकर देखा । उस पर हाथ फिराया। कई बार खोला और बन्द किया उसे । और तब उसे महसूस हुआ कि छाते के छेदों में से पानी नहीं गिर रहा है ।

‘कैसी अजीब बात है।' बूढ़े ने जैसे अपने आप से कहा, फिर तेज बारिश में अपना छेदों वाला छाता खोलकर खड़ा हो गया। अरे सच! जगह-जगह छेद होने पर भी पानी की एक भी बूँद नहीं टपक रही थी। जैसे किसी ने छेदों पर कोई ऐसा जादुई कपड़ा चिपका दिया था, जिसके आर-पार देखा जा सकता था ।

बारिश में छेदों वाला छाता लगाए खड़े बूढ़े को कई लोगों ने देखा। सबने यही समझा कि बूढ़ा सचमुच पागल हो गया है। तभी बूढ़ा चिल्लाया- "यह मेरा छाता नहीं है इसमें भूत घुस गया है।" और उसने उछालकर छाते को दूर फेंक दिया। फिर घर वापस चला गया। वह रो रहा था । आखिर यह हो क्या रहा था उसके साथ !

असल में वह करामात एक बौने की थी । वह उसी झाड़ी के नीचे जमीन में रहता था, जहाँ बूढ़े ने छाता फेंका था। बौने ने छाते के छेदों पर एक जादुई लेप लगा दिया था। इसी कारण पानी- छेदों के ऊपर ही रुक जाता था। वही बौना छाते की मरम्मत करने के बाद उसे बूढ़े को दरवाजे पर रख गया था । वह छिपकर बूढ़े को देख रहा था । बूढ़े को अदृश्य बौने की ही हँसी रह रहकर सुनाई देती थी।

बूढ़े द्वारा फेंके गए छाते को उठा लिया। उसके मुँह से निकला - “विचित्र बूढ़ा है। मैं भला इसकी मदद कैसे कर सकता हूँ। मैं सोचता था इसके मकान की छत पर भी वही जादुई लेप लगा दूँ जिससे बरसात में पानी अन्दर न गिरे । लेकिन नहीं, अगर मैंने ऐसा किया तो वह घर को भी 'भूत घर' समझकर कहीं चला जाएगा।

बौने ने छाते के छेदों पर लगा अपना जादुई लेप हटा दिया। फिर लाल, हरे, नीले, पीले कपड़ों के पुराने पैबंद वैसे ही लगा दिए जैसे बूढ़े ने लगा रखे थे। इसके बाद छाते को दरवाजे के बाहर रखकर वहाँ से चला गया।

दिन निकला, बारिश अब भी हो रही थी । बूढ़े की नींद खुली। वह आँखें मलता हुआ घर से बाहर निकला। उसने छाते को देखा तो लपककर उठा लिया। हाँ, यह मेरा छाता है। पहले वाला तो पता नहीं किसका था । जरूर किसी भूत का होगा। तभी तो उसके छेदों में से बारिश का पानी नहीं टपकता था । कहते बूढ़े ने छाता लगाया और रास्ते के बीचोबीच खड़ा हो गया । छाते के छेदों में से होकर पानी उसके सिर और बदन पर टपकने लगा। लेकिन इस बार बूढ़े ने छाते को बेकार नहीं कहा। उसे फेंका भी नहीं। वह खुशी से चीख रहा था - "मेरा छाता मिल गया, मेरा छाता मिल गया।"

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