चींटियों की एकता (बाल-कहानी) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Cheentiyon Ki Ekta (Hindi Children Story) : Jaychand Prajapati 'Jay'
एक बार जंगल के पास एक बड़ा सा लड्डू गिरा। वह इतना स्वादिष्ट और चमचमाता था कि आसपास की सारी चींटियाँ इकट्ठी हो गईं। "अरे वाह! यह लड्डू हमारा हो गया!" चींटियों ने खुशी से चहका। लेकिन समस्या यह थी कि लड्डू बहुत भारी था। कोई भी चींटी अकेले उसे हिला भी नहीं पा रही थी।
एक छोटी चींटी ने कहा, "मैं इसे खींच लूँगी!" पर वह फिसल गई। दूसरी ने बोला, "मैं तो इसे उछाल दूँगी!" लेकिन लड्डू हिला ही नहीं। तीसरी चींटी ने सोचा, "शायद इसे काट लूँ!" मगर उसके दाँत तक न पहुँचे। सारी चींटियाँ परेशान हो गईं। सब यही कह रही थीं, "क्या करें? यह लड्डू तो हमारा सपना बन गया!"
तभी एक बुजुर्ग चींटी आगे आई। उसकी दाढ़ी सफेद थी और आँखें चमक रही थीं। उसने कहा, "बच्चो, अलग-अलग कोशिश करने से कुछ नहीं होगा। एकता में शक्ति है! सब मिलकर एक साथ ताकत लगाओ। एक लाइन में खड़े हो जाओ और धीरे-धीरे खींचो।" चींटियों ने बुजुर्ग की बात मानी।
वे सब हाथों में हाथ डालकर लाइन बना लीं। "एक, दो, तीन... खींचो!" सबने चिल्लाया।वाह! लड्डू धीरे-धीरे हिलने लगा। फिर चल पड़ा। चींटियाँ हँसती-खेलती उसे अपने बिल तक ले आईं। वहाँ सबने मिलकर लड्डू का आनंद लिया। बुजुर्ग चींटी मुस्कुराई, "देखा, एकता से कोई भी काम नामुमकिन नहीं!"