चौक (कहानी) : गीतांजलि श्री

Chauk (Hindi Story) : Geetanjali Shree

ठीक-ठीक कह नहीं सकती कि क्या खास बात थी उन दिनों की, क्यों वे मुझे बार-बार याद आ जाते हैं ? कोई अजीब घटना या खयाल नहीं कि उसे एक संकेत मान के उस ट्रिप को लैंडमार्क क़रार कर दूँ। न कोई सत्य मिल गया था कि जिस पर उँगली रखकर कहूँ, उसके बाद से कुछ पहले जैसा न रहा। न तभी से यहाँ की घुटन से निजात मिल गई कि भागने की चाह पर उसे याद करूँ। बिलकुल मामूली सा वह ट्रिप, अनेक और मेरे ट्रिपों के बीच से अनायास ही अलग से झाँकने लगता है।

उस बार भी झूठ बोलकर भागी थी। यहाँ के हालात से, घिर्र-घिर्र जंग खायी घिर्री-सी घूमती दिनचर्या से। कुछ इतनी आस से देखती थीं अम्मा, जहाँ उनके सामने पड़ो की झूठ कहे बग़ैर मुझसे वहाँ से निकला न जाता। पापा भी देखते ही उठ बैठते और कहते क्यों आशू मुझे कहीं ले चल सकती हो ? अनी व्हेयर ? जस्ट फ़ॉर अ ड्राइव ? आई जस्ट वान्ट टु गेट आउट। वह इने-गिने जवाब मुझे देने पड़ते इस वक़्त ? इतनी धूप में ? शाम होने दीजिए। जिस पर वे कहते अरे शाम कभी नहीं होगी और फिर पेट में पलते बच्चे की तरह सिकुड़कर लेट जाते और आंखें बंद कर लेते। या मैं कहती, कक्कू दी और शंभू भइया को लौट आने दीजिए, उन्हें गाड़ी न चाहिए हो कहीं ! जिस पर वे कहते, अरे वो भी कभी नहीं लौटेंगे और लेट जाते। या फिर मैं कक्कू दी, भाभी, शंभू भइया से पूछ लेती और घुमा लाती पापा को कहीं, जिस पर शंभू भइया दिमाग़ पे ज़ोर डाल के कोई-न-कई काम, बाज़ार, पावर हाउस, पोस्ट ऑफिस का सोच लेते कि गाड़ी जा रही है तो कुछ निपटा आओ, यों ही क्यों पेट्रोल फुँके ! लौटने में मंदिर के सामने पापा हाथ जोड़ लेते, फिर हम घर आ जाते।

जब मैं झूठ बोलती कि किसी राइटर्स वर्कशाप में जाना है तो लगता कि अम्मा को छोड़कर, जो सबसे ज़्यादा सवाल करतीं, पर शक़ किसी जवाब पर नहीं करतीं, सब-शंभु भइया, भाभी, कक्कू दी, सुल्लू, नंदू, (नहीं, नंदू शायद नहीं, दस बरस का मस्तमौला नंदू नहीं)—बिना यकीन किए चुपचाप मुझे घूर रहे हैं। ग़ुस्सा आता। शंभु भइया और कक्कू दी का क्या, दोनों ऑफिस जाते हैं, उसी के सहारे दिन भर को बाहर निकल लेते हैं। उस पर भी क्या मालूम कभी झूठ बोलते हों, खासकर भइया जब भाभी को भी सरकारी दौर पे साथ, शहर के बाहर ले जाते हैं, नंदू को अम्मा की निगरानी में छोड़कर ? खैर मुझे तो झूठ बोलना ही होती और झूठ का नहीं तो इसका अपराधबोध सालता कि सबके सब फँसे हैं और मैं खिसक ली।

खिसक ली थी रटबिन के घर उस दफ़े। सारे हाहाकार को छोड़कर वहाँ के सन्नाटे में। पर नहीं, हाहाकार तो साथ चला आता है, बस दूर आकर वृत्त में सिमट जाता है, जिसको घेरे होता है उस जगह की दूरी का हलकापन और शांति। पर नहीं, कौन सा हाहाकार ? इस घर का जीवन शोर रहित ही है, बस बिना चिल्लाए सब एक-दूसरे से भाग रहे हैं और एक-दूसरे की राह में गिर-पड़ रहे हैं। अम्मा रसोई में जाकर रजिंदर से बोलेंगी, परवल देर तक भूनना और सूखे बनेंगे, तब तक भाभी जा के टमाटर और पानी डलवा देंगी। अम्मा कहेंगी, लो मना कर गई तुमने फिर बेस्वाद की सब्जी बना दी, भाभी कहेंगी, कुक्कू दी के दोस्त भी खाने पे रुकेंगे, लोग भी तो देखिए कितने होंगे खानेवाले ! नंदू रात का अलाप छेड़ेगा, मैं दादी के संग सोऊँगा और सुल्लू उसे डाँटेगी दादी को तकलीफ़ होगी, तब शंभू भइया अम्मा को डाँटेंगे, आप पापा के कमरे में सोइए तो उन्हें भी नींद आएगी और वहाँ नंदू जाना नहीं चाहेगा, और अम्मा कहेंगी नहीं, वहाँ मैं सो नहीं पाती क्योंकि ये रात भर हे भगवान, हे राम करते हैं। या ठक-ठक ज़मीन पर ठोकते हैं। और कक्कू दी भइया को डाँटेंगी कि अम्मा को जैसे अपनी नींद की चिंता ही नहीं करनी चाहिए ?

फिर नंदू भइया और दी, दोनों से डाँट खाएगा और थकन के मारे और ज़ोर से रोएगा और पापा जो दिन भर आँख बंद किए रहते हैं रात भर जगे रहेंगे और छड़ी पे लँगड़ाते आते रहेंगे, दरवाज़े से झाँकेंगे, कभी पंखा बंद कर देंगे, कभी लाइट जला देंगे और जब हम सब डाँटेंगे कि क्या कर रहे हैं, सोने दीजिए तो कहेंगे, देख रहा हूँ कि नंदू ठीक है, कोई मुझे कुछ बताता नहीं क्या हुआ पता भी नहीं लगेगा कोई बच्चे को मार दे, उठा ले जाए, तुम लोग देखती नहीं हो, इसकी माँ को हर मिनट इसके पास रहना चाहिए—भाभी और नंदू की एक संग बात करते ही वे नंदू को ‘आप’ के संबोधन में और भाभी को ‘तुम’ के में डाल देंगे—भाभी तड़ से उठेंगी और अपने बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेंगी। कक्कू दी पापा को वापस उनके बेडरूम पर पहुँचा के कहेंगी, हम अपना दरवाज़ा भीतर से बंद कर रहे हैं, नहीं तो आप तो सोने नहीं देंगे और पापा को छड़ी पर सिर टेक लगाए बैठा छोड़कर आ जाएँगी।

या सुल्लू फ़ोन पर बैठ जाएगी और भाभी आसपास चक्कर काटेंगी फिर शंभु भैया कहेंगे, बस भी करो सुल्लू। अम्मा मुझसे कहेंगी की शंभु भइया कह रहे थे, बिजली का इतना बिल क्यों आता है, तुम अपने कमरे में इलैक्ट्रिक कैटल क्यों चलाती हो,, बना तो देता है रजिंदर गैस पर चाय और मैं सुल्लू को डाँटूँगी, क्या स्कूल से आते ही माइकल जैक्सन, मैडोना अंड-फंड लगा लेती हो, धीमा करो। वो दरवाज़ा बंद कर देगी तो पापा आएँगे, खोलो, कभी अंदर से लॉक मत करो, कुछ हो जाए तो, और बंद करो रेडियो क्या गंदी चीज़ सुनती हो, वे भाभी के प्लेयर में बजती ग़ज़ल की आवाज़ पर कहेंगे। कक्कू दी नहा के निकलेंगी, और तार से नंदू और भइया के गीले कपड़े गुरचिया के कुरसी डाल देंगी और अपनी साड़ी इस छोर से इस छोर तक टाँग देंगी। भाभी दौड़ी आएँगी, कम-से-कम गंदी कुरसी पर मत डालो, रात कुत्ता इस पर बैठता है तुम्हें पता है ? मुझे नहीं पता, पता है, नहीं, हाँ, होगा।

और मैं पढ़ने बैठूँगी तो अम्मा आएँगी क्या पढ़ रही हो, छींकीं क्यों जुकाम हो रहा है क्या, और आज घर में रहोगी, ऐसे ही पूछ रही हूँ। लिखने बैठूँगी तो पापा आवाज़ देंगे मुझे तौलिया मिलेगी, इतनी देर हो रही है, इतना काम है, तैयार होऊँ और शंभु भइया डाँटेंगे, अम्मा इन्हें रुमाल दीजिए, फिर कुरते से नाक पोंछ रहे हैं, नंदू अंटी कर लो दादा से, नो वन कैन सिट निअर यू, यू आर सो डर्टी।

एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते। जैसे जब रॉबिन का फ़ोन आया, मैं दौड़ी, रजिंदर दौड़ा, नंदू दौड़ा, सुल्लू दौड़ा, शंभु भइया दौड़े और हमेशा की तरह पापा दौड़े। सबके सब क्या मेरा है, किसका है ? बीवीजी का, रजिंदर ने मुझे पकड़ाया। पापा वहीं बैठ गए, कौन है, क्या कह रहा है ? नंदू पिन-पिन करने लगा। उमंग का फोन आना है। शभु भइया ने इशारे शुरू किए, देर तक नहीं। अम्मा आईं और मुझ ही से पूछने लगीं। आशू कल जो तुम्हें गुलाबी चादर दी थी कहाँ है ? बाक़ी लोग आइसक्रीम को लेकर ज़ोर-ज़ोर से बहस करने लगे-रजिंदर ने फिर फ्रिज़ ऑफ कर दिया, सारी आइसक्रीम पिघल गयी। मैं खाऊँगा मेरा गला ठीक है, नंदू की टेर चली। पापा कान पर बैठे बड़बड़ा रहे थे—मुझे खाने पे क्यों नहीं मिली ? मैं एक कान दबाए, दूसरे से सुनने की मशक्कत कर रही थी, उस पर दिखाना यह था कि रॉबिन नहीं, किसी वर्कशॉप कार्यकर्ता से ऑफ़िशियल बात चल रही है।

हाँ-हाँ हाहाकार ही था। भागी मैं उससे, झूठ बोलकर, और साथ गया भी तो क्या, कम-से-कम अपने दायरे में जमा हो गया, एक जगह, शांति से घिरा।

शांति से बढ़कर था रॉबिन के घर में। शांति नहीं, सन्नाटा। शहर से दूर, खेतों से घिरा, इक्का-दुक्का मकानों के पास। पहुँचते ही बरसात गिरने लगी और ठंडक भरा सुकून मेरे दिल पर छा गया। कितना काम हो सकता है यहाँ, बस काम-ही-काम। पूरा झूठ भी नहीं बोल के आई थी, वर्कशॉप नहीं, पर काम ही करने आई हूँ। कब से पड़ी थी किताब पूरा होने को। कहाँ लोग प्रकाशक के पीछे पड़ते हैं कि जल्दी छाप दीजिए कहाँ मैं खुशनसीब कि प्रकाशक पीछे पड़ा था जल्दी करिए। अम्मा कहा करतीं, तुम क्यों उठ आती हो, सुबह से पीछेवाले कमरे में बंद हो जाओ, इतना बड़ा घर है, और लिखो। ज़रा ही देर में चाय लेकर आतीं कुछ बन रहा है, ताकि मैं कैटल न ऑन करूँ और मेरा हाथ अनायास ही उनकी निर्दोष नज़रों से पन्ने पर लिखे हर्फ़ों को छिपाने लगता। शंभु भइया ऑफ़िस जाते हुए खिड़की से झाँककर कह जाते फ़ोन हर वक़्त बिज़ी मत रखना और अम्मा को बुरा लग जाता आशू तुम बाहर से फ़ोन कर लिया करो।

 पर मैं ही तो नहीं करती ना ? हाँ, लेकिन लंबा-चौड़ा बिल आए, मशीन खराब हो, कुछ हो, तपाक़ से तुम्हारा नाम लगा देते हैं। पापा आ के छड़ी पर टेक दिए बैठ जाते। तब अम्मा कहतीं, चलिए यहाँ से चलें, यह काम कर रही है और पापा ज़िद में बैठे रहते। क्यों ? सिर मूठ पर बाँधे हाथों पे गिराए, आँखें मूँदे, और मैं कहती, रहने दीजिए। तब पापा आँखें आस से खोलते कैन यू टेक मी सम व्हेयर, एनी व्हेयर, इन द कार ? अभी, अम्मा डाँटतीं। पापा की हल्की भूरी आँखों में भीड़ होती, कमरे में निजी चीज़ों की परछाइयाँ, और वे लेट जाते। पास से और दूर से आवाज़ें आती रहतीं—कक्कू दी का रजिंदर को डपटना, अच्छा अब आप रबड़ की चप्पलें नहीं, चमड़े की सैंडल पहनेंगे। भाभी का प्रेसवाली को हड़काना, पहले मेरे कपड़े करो, अम्मा को क्या जल्दी है ? सुल्लू का स्कूल के लिए निकलते हुए कुछ चिटी-चिटी बैंग-बैंग चिल्ला के गाना। सुल्लू को विलायती बनना है—देखना दी, भूले से दो दिन के लिए कोई पहुँचा दे, फिर लौट के नहीं आऊँगी, वह हँस के हाँकती और मुझे उसके सोलह बरस के ठोस होते मूल्यों पर खूब खीज होने लगती। कक्कू दी को मेम साहब बने रहना है, शंभु भइया को सबकी डिसिप्लिन बनानी है, भाभी को घर खर्च का बेहद हिसाब रखना है, अम्मा को बच्चों में रहना है, पापा को पातों में। सबकी नज़र एक अलग दिशा में।

लेकिन रॉबिन के घर में इस सारे गोंजामेल से मुक्ति थी। सहज, साधारण, एक आम इनसान के लिए बना घर। एक पाँवदान था, जो सुबह दरवाज़ा खोलती तो भीगा हुआ मिलता और मैं सोचती कुक से कहूँगी सूखने को डाल दे, टाट हुआ जा रहा है, पर कुक के आने पर भूल जाती।

कोई भी ऐसी चीज़ नहीं थी जो यादों पर हावी हो जाए। घर की सज्जा याद करनी चाही तो टाट होता पाँवदान ही याद आया। न भीतर ऐसा था कि उसके तेवर आँखों में भुँक जाएँ, न बाहर नाटकीय दृश्य था कि यादों में खलबली पैदा करे। खाना भी सीधा सादा। अलबत्ता घर के पपीतों के कोफ़्ते बनाता था रॉबिन का कुक।

घर के फल-फूल की बात ही और होती है। पापा की आख़िरी पोस्टिंग मुरादाबाद में थी आज भी ड्राइव पे निकलते हैं तो कभी पल भर को उनकी आँखों में बाहर भागती चीजों की सूनी परछाईं लोप हो जाती है और कहीं उनके भीतर से निकली उजाले की शहतीर डोल जाती है—ये मुरादाबाद कैंटूनमेंट है ? अब तो मैंने जवाब भी देना बंद कर दिया है पर वे मुरादाबाद कहते हैं तो मुझे अमरूद याद आते हैं। उस साल की बारिश कम पड़ी थी और केकवा ने कह दिया कि अमरूद में कीड़े पड़ गए और सबने डालें नीचे खींच के ऊँचे उचक के फल तोड़ना बंद कर दिया। लदे अमरूदों को गिलहरी और तोते पट-पट गिराए जाएँ। कि सुल्लू आई दी ये कीड़ा है ? और हमने देखा कि पानी न मिलने से बीज फैले नहीं हैं गूदे में, उलटे बीच में एक कड़ी गुट्टी बन के पड़े हैं, पर कीड़ा-वीड़ा कुछ नहीं है, गदराया फल है, मीठा नहीं, पर ताजा-ताज़ा। तब हम भी टूट पड़े गिलहरी और तोतों के बैरी बन गए।

रॉबिन के घर अमरूद नहीं, मगर पपीते और नारियल के पेड़ थे और बारिश में उनकी छतरीदार पत्तियों की ओट में सड़क की ट्यूबलाइट पनियल-सी तिरमिराने लगती।

कुक ने अदब से बताया था साहब तो संडे को आएगा और आप जो चाहें मुझे कहिए, कोई तक़लीफ़ होगी तो साहब हम पर गुस्सा करेगा।

पर मुझे क्या तक़लीफ़, जब तक़लीफ़ों से भाग आई थी ? पहली किताब किसी झोंक में उस घर में पूरी कर दी, मगर अब के न होगी मुझे विश्वास था। लेकिन यहाँ-अकेला, मनभावन, मेरी स्पेस मेरी। न कोई उसमें घुस के उसे छेड़े, न अपनी सर्चलाइट मुझ पे निरंतर डाल के मेरे हाव-भाव का बारीक़ मुआइना करे-अब मैं हिली, अब ऊँघी, अब टकराएगी। कोई नहीं कहनेवाला ऊँघ रही हो, ठीक तो हो, फिर काम क्यों नहीं करती ? ऊँघो रात-दिन।

ऊँघती भी रही मैं शुरू के दिनों में। काग़ज़-कलम तैयार रख के। और जब कुक घंटी बजाता तो बेफ़िक्री से बदन डुलाती दरवाजा खोलने जाती।

लेकिन किताब वहाँ भी पूरी नहीं हुई। कुछ भी ऐसा नहीं हुआ कि अब याद करूँ, वहाँ ये हुआ। फिर भी वह ट्रिप मेरे ज़ेहन में अलग कोना लिये बैठी है। तब यह सोचती हूँ, कौन जाने इस मानव मन के रहस्य, किस ऊँघ से अवचेतन क्यों हिला ? चेतन तो बेख़बर है या फिर उस मामूली ट्रिप के मामूली दृश्यों को देख लेता है। शायद उन मामूली यादों को इसीलिए दोहरा रही हूँ कि धोखे से चेतन के पार शुरू होती अवचेतन की सीमा रेखा लाँघ ही जाऊँ, क्या पता ?

क्योंकि दूसरी किताब रो-धो के पूरी हुई इसी घर में, पहली की तरह ! और नंदू को फ़न है कि मैंने उसी के नाम के पात्र से उसी का कहा डायलॉग किताब में कहलवा दिया। गरमी में भइया-भाभी के ए. सी. रूम में सारी भीड़ कैंप बैड बैंप बैड खोल के सोती थी और उसी घिचपिच में कक्कू दी के नाक-सिकोड़ संवाद उँह-रेल-का-डब्बा-है-मैं-नहीं-सोती-यहाँ पर नंदू बोला था कि दादी भीड़ हो और रेल का डब्बा हो तो सोने में बड़ा मज़ा आता है ना ?

और मैंने रॉबिन के यहाँ सोचा था कि बारिश होती है तो नींद बड़ी अच्छी आती है। झमक के बरसात हो रही थी रात और दिन और जब न होती तो आसमान का बड़ा सा काला टुकड़ा छाया की तरह घर में एक तरफ़ से फिसलकर आता, दूसरी तरफ़ से निकल जाता। आई भी थी अच्छी नींद और कितनी नींद आती रही जैसे मानो अपने घर में मैं बरसों से सो न पाई हूँ। उठती, थोड़ा पढ़ती, फिर सो जाती। जब किताब के तीन-चार ही पेज बचे तो मैंने स्पीड और कम कर दी, ताकि पढ़ते रहने का स्वाद और लंबा हो जाए ! उठती, एक पैराग्राफ पढ़ती, फिर सो जाती।

लेकिन फिर बहुत सो ली और किताब भी पढ़ चुकी और मुझे नींद आनी बंद हो गई और जहाँ लिखने बैठती वहाँ खिड़की पर झुका नीम दीवार की तरह सिर पर गिरा आता लगने लगा ! मन होता कुक से कहूँ काट दो इसकी डालें. यह आसमान को रोक रहा है. मेरे स्पेस को घेर रहा है।

पर कुक से भी कुछ कहने का मन नहीं करता। सिर में दर्द रहने लगा था। कुक कहता मेमसाहब अदरख की चाय पीजिए आपको ठंड लग गई है। चाय अच्छी लगती, पर उस पे गुस्सा आता कि क्यों मेरा कुछ नोट करता है-चाहूँ तो क्यों न बुरा-सा मुँह बना के बैठी रहूँ ? इतना पारखी अपने को समझता है, जबकि मुझे ठंड-वंड नहीं नींद न आने से सिरदर्द हुआ।

तब मैं शहर गई कामपोज़ लेने और वहीं से घर फ़ोन मिलाया। सब ठीक थे, पर पापा की इंस्यूलिन को लेकर कन्फ्यूजन था-कभी अम्मा भी दे देतीं और भाभी भी, कभी एक-दूसरे के भरोसे कोई न देता। और तुम्हारा वर्कशॉप, अम्मा ने पूछा, तो मुझे भूला हुआ झूठ याद आया। हड़बड़ा के आठ-दस मिसरे और गढ़े। पापा तो दौड़े आए ही थे फ़ोन की घंटी पर, उनसे भी बात की। अच्छा मुरादाबाद में नहीं है वर्कशॉप ? नहीं, अमरूद भी नहीं हैं, मुझे हँसी आ गई। कोई मुझे कुछ बताता ही नहीं, कहीं ले ही नहीं जाता, उन्होंने शुरू किया। बस एनफ, शंभू भइया की आवाज़ आई और नंदू ने बताया कि बुआ ये साल मेरी लाइफ़ का सबसे कठिन साल है, इतना होमवर्क मिलता है, सच्ची। ओके, शंभू भइया ने फ़ोन लिया, डोंट वेस्ट मनी, बेस्ट ऑफ लक, बाय।

फिर मैं, जब बरसात थमती, शहर के चौक तक जाने लगी कि हवा लगे तो सिर दर्द टले, थकन लगे तो नींद आए। और चौक से नाहक घर की याद जुड़ जाती, और मैं फ़ोन करती।

चौक भी छोटे शहरों के चौक जैसा। एक पुराना घंटाघर, जरा सा एक घेरा जो पार्क बोला जाता और गुमटियाँ, भुट्टे, चाट, भेल, कोल्डड्रिंकवालों की। जब बाकी दुकानें बंद हो जाती तो पार्क आबाद रहता। सारा शहर वहाँ उमड़ा होता, गज़-गज़ भर की दूरी पर, ज़रा सी जगह में, ज़रा सी चीजों में मगन। प्रेमी जोड़े तक उस तिल भर की जगह में अपनी स्पेस सुरक्षित पाते। और मुझे हैरानी होती कि इनकी आँखों में भीतर की चमक ने बाहर की परछाइयों को आने ही नहीं दिया है।

यह सब भी याद आ रहा है, इसलिए बता रही हूँ, वरना क्या था इन शामों में ? हर शहर में ऐसे ही मेले लगते हैं, सज-धज के जनता चौक जाती है। और मैं उनके बीच भटटा या मँगफली खाती निकल जाती।

'और रॉबिन किस गाड़ी से आएँगे ?' सिरदर्द में खुद उठके दरवाज़ा खोलना भी खलने लगा था। 'मेरी वापसी का टिकट आया,' मैंने कुक से पूछा ?

रॉबिन रात को आया था। सुबह सामने के दरवाजे के पास गीली मिट्टी के निशान देखकर मैं खुश हो गई और पूरी केतली चाय बनाकर बैठ गई।

'उठे आप ?' मैंने कहा।

'उठीं आप ?' वह हँसा। ‘रात इतनी खटर-पटर की मगर नींद अच्छी पाई है!'

जो याद आ रहा है वही दोहरा रही हूँ। यों रॉबिन मेरे उतने भी आत्मीय मित्रों में नहीं। मेरा पाठक था और वही संबंध था। हमेशा कहता मैं तो भागा रहता हूँ अपने अकेले घर से, जब लिखने को जगह चाहिए आ जाओ। और उस बार मैं आ गई थी।

एक ही दिन हम साथ थे और भुट्टे खाने चौक गए, रॉबिन की गाड़ी में। दो मिनट गाड़ी से नीचे उतरे होंगे कि रॉबिन बेचैन होने लगा कि भागो इस बेहूदी भीड़ से और उसकी आँखों में बाहर की हर चीज़ का साया दहशत से सर्रा रहा था।

रॉबिन भागा था गाड़ी दौड़ाकर, नदी के किनारे, जहाँ कोई नहीं था। नदी बढ़ी हुई थी अपने ही पाट को लाँघकर और रॉबिन कह रहा था, लोग कितने बेवकूफ़ लगते हैं, लीडिंग रिडिक्युलस लाइव्स ऑफ़ पैटी परस्यूट।

हाँ, बारिश आई थी और हम भीग चुके थे तो सोचा, क्या है कुछ देर भीगते ही रहो। वहीं रेत पर बैठे-बैठे मैं उसे अपने घर के बारे में बताने . लगी जो बड़ा था, मगर तब भी भीड़ थी। रॉबिन ने सहज भाव से कहा था कि देखो घर जहाँ होगा वहीं घुटन होगी।

और अभी इसी पल मैं एक और बात यहाँ जोड रही हैं. क्योंकि अभी वह याद आ गई, हालाँकि यह बात तब की नहीं है, शायद उस ट्रिप की ही न हो। रॉबिन ने आँख ऊपर उठाई थी और उनमें सारे अक्स बाहर के थे-काले बरसते आसमान के, हवा में बनती कतारों के। यहाँ तक कि उनमें जो पानी भरा था वह भी बाहर से आया बारिश का पानी था। भीतर से सूनी नंगी थीं वे आँखें, बाहर के सायों से थिरकती दिखने के बावजूद। फिर उसने आँखें बंद कर लीं और पेट में पलते बच्चे की तरह सिकुड़कर लेट गया, क्योंकि पानी से चोट लग रही थी।

नीम-अँधेरे में मेरा हाथ उठा था कि हमदर्दी से उसकी बाँह छू लँ-किसी निपट अकेलेपन को. बाहर के सायों की घटन को. अंदर के सखे सोते को छू लूँ। मगर छूने के पहले मन हो गया कि उसे बहुत ज़ोर का थप्पड़ मारूँ-इस अकेले, दूर-दूर की स्पेस को अपनाए भीड़ से भागनेवाले रॉबिन को। और मैंने भी सहजता से सोचा था, किसी के प्रति हिकारत से भरना कितना आसान है।

उस दिन कुक ने फटकारा था। मेमसाहब को भिगा दिया साहब ने, ऐसे ही जुकाम रहता है इन्हें, पर मुझे बुरा नहीं लगा था।

रॉबिन अगले दिन चला गया अपने घर से। जल्दी ही मैं अपने घर लौटी, छोटे शहरों में अभी भी कभी मिल जानेवाले कागज़, लकड़ी, मिट्टी के डमरू, बाँसरी. जानवर आदि नंद के लिए लेकर। उसी रात नंद ने डामा किया-नहीं, मैं ही सोऊँगा दादी के पास, जाए बुआ वापस वर्कशॉप और मैंने डाँटा तो रात को शिकायत कर रहा था, बुआ गंदी हैं, कहती हैं, मैं ऐक्टिंग कर रहा हूँ और अम्मा पुचकारने लगीं, नहीं, बेटा कोई तुम अमिताभ बच्चन थोड़े ही हो जो ऐक्टिंग करोगे, पर बुआ गंदी नहीं हैं। हैं। नहीं हैं।

फिर और भी बार 'राइटर्स वर्कशॉप' में यहाँ-वहाँ भागी। लौटी। लौटी, भागी।

अब क्या हुआ था कि सोचूँ, उस बार यह हुआ और तब से सूरज पश्चिम से निकलने लगा ? बस नाहक बार-बार उस ट्रिप को याद करती हूँ और घर और चौक से गुज़रती हूँ और तब बरसात में लहलहाती, अपने ही पाट को तोड़ के लाँघती, भीतर की अनजान ललक से मचलती, बढ़ती नदी मझमें भर जाती है और कभी मैं शांत हो जाती हैं. कभी बेचैन, कभी फैल जाती हूँ अपनी ही सीमाओं से आगे, कभी रीती-रीती हो जाती हूँ, और कभी विलीन हो जाती हूँ, कुछ सोचने को बचती ही नहीं हूँ।