चंद्रकांता संतति (उपन्यास) खंड 1 - तीसरा भाग : देवकीनन्दन खत्री

Chandrakanta Santati (Novel) : Devaki Nandan Khatri

बयान - 1

पाठक समझ ही गये होंगे कि रामशिला के सामने फलगू नदी के बीच में भयानक टीले के ऊपर रहने वाले बाबाजी के सामने जो दो औरतें गई थीं वे माधवी और उसकी सखी तिलोत्तमा थीं। बाबाजी ने उन दोनों से वादा किया था कि तुम्हारी बात का जवाब कल देंगे इसलिए दूसरे दिन वे दोनों आधी रात के समय फिर बाबाजी के पास गईं। किवाड़ खटखटाते ही अंदर से बाबाजी ने दरवाजा खोल दिया और उन दोनों को बुलाकर अपने पास बैठाया।

बाबा - कहो माधवी अच्छी हो!

माधवी - अच्छी क्या रहूंगी, अपने किये को पछताती हूं!

बाबा - अब भी अपने को सम्हालो तो मैं वादा करता हूं कि राजा वीरेंद्रसिंह से कहकर तुम्हारा राज्य तुम्हें दिलवा दूंगा।

माधवी - अजी अब भीख मांगने की इच्छा नहीं होती, अब तो जहां तक बन पड़ेगा अपने दुश्मनों को मार के ही कलेजा ठंडा करूंगी और चाहे इसके लिए मेरी जान भी जाय तो कोई परवाह नहीं!

बाबा - अगर यही खयाल है तो तुम्हें अपने दीवान अग्निदत्त से बदला लेना चाहिए, वीरेंद्रसिंह के लड़कों ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा!

माधवी - आपका कहना ठीक है मगर मैंने जो कुछ सोच रखा है वही करूंगी। मैं अपना इरादा किसी तरह बदल नहीं सकती और इसमें आपको हर तरह से मेरी मदद करनी ही होगी।

बाबा - खैर, जिस तरह बनेगा मैं तुम्हारी मदद करूंगा मगर यह तो बताओ कि सिवाय मेरे इस समय और भी कोई तुम्हारा मददगार है या नहीं।

माधवी - कल तक तो मेरा मददगार कोई भी न था मगर आज मेरे कई मददगार पहुंच गये हैं और अब मेरा काम जरूर हो जायेगा इसमें शक नहीं है।

बाबा - कौन मददगार पहुंच गया है?

माधवी - मेरा भाई भीमसेन।

बाबा - शिवदत्त का लड़का भीमसेन!

माधवी - जी हां।

बाबा - तब तो तुम्हारा काम जरूर हो जायेगा।

माधवी - तो भी आपको मेरी मदद करनी ही होगी।

बाबा - मैं जरूर मदद करूंगा, जो कुछ कहो मैं तैयार हूं!

माधवी - कल भीमसेन उस मकान में जाने का उद्योग करेगा जिसमें किशोरी रहती है। उसने मौका पाते ही अपनी बहिन किशोरी को मार डालने की कसम खाई है। अगर कल वह उस मकान के अंदर किसी तरह जा सका तो जरूर ही किशोरी को मार डालेगा। फिर मुझे किसी तरह का तरद्दुद न रहेगा और न आपसे मदद लेने की ही जरूरत पड़ेगी लेकिन वह उस मकान के अंदर न जा सका तो जिस तरह हो आपको ऐसी कोई तरकीब करनी पड़ेगी जिससे किशोरी उस मकान को छोड़ दे।

बाबा - भरसक तो मेरी मदद की जरूरत ही न पड़ेगी।

माधवी - ऐसा न कहिए! अगर उस मकान में कमंद लगाने की जगह होती तब तो कोई बात ही न थी, अब तक मैं अपना काम निकाल लिए होती।

बाबा - हां, यह तो मैं भी जानता हूं कि तुम्हारे पिता ने उस मकान के बनवाने में बड़ी कारीगरी खर्च की है, मगर तो भी भीमसेन ने उसके अंदर जाने की कोई तरकीब सोची ही होगी।

माधवी - जी हां, देखना चाहिए कल क्या होता है।

बाबा - अच्छा, अब तुम परसों मुझसे जरूर मिलना, अगर तुम्हारा काम हो गया तो ठीक ही है नहीं तो चौथे दिन मैं सहज में ही तुम्हारा काम कर दूंगा।

''बहुत अच्छा'' कहकर माधवी वहां से उठी और अपनी सखी तिलोत्तमा को साथ लिये अपने डेरे पर चली आई।

माधवी के चले जाने पर थोड़ी देर तक बाबाजी कुछ सोचते रहे, इसके बाद कुटी के बाहर निकले और दो-चार दफे जोर से ताली बजाई। यकायक इधर-उधर पेड़ों की आड़ में से चार-पांच आदमी निकलकर बाबाजी के पास आये और एक ने बढ़कर पूछा, ''कहिये क्या हाल है'

बाबाजी ने कहा, ''आज अब तुम लोगों की कोई जरूरत नहीं है जहां चाहो चले जाओ, मगर कल एक घंटे जाते-जाते तुम लोग यहां जरूर जुट जाओ!''

एक - क्यों खैर तो है, मैं बिना कुछ हाल सुने जाने वाला नहीं!

बाबा - अच्छा तो फिर सुन लो कि कल क्या होगा और हम लोग क्या करेंगे।

सभों को लेकर बाबाजी कुटी के अंदर गये, किवाड़ बंद कर न मालूम क्या बातचीत करने लगे।

अब हम उसी मकान में पहुंचते हैं जिसमें किशोरी और किन्नरी का डेरा है या जहां इंद्रजीतसिंह को लेकर कमला गई है।

किशोरी के चिल्लाने की आवाज सुनकर किन्नरी हाथ में तलवार लिए बहुत जल्द नीचे उतर गई। कमला ने किवाड़ खटखटाया है, दरवाजा खोलना चाहिए इसका खयाल तो जाता रहा और इधर-उधर किशोरी को ढूंढ़ने लगी मगर इसे ढूंढ़ने में उसने ज्यादा देर न लगाई, दो ही चार दफे दालान और कोठरियों में घूमकर वह लौटी और सदर दरवाजा खोलकर कमला को मकान के अंदर कर लिया।

दरवाजा खुलने में देर हुई इसी से कमला समझ गई कि भीतर कुछ गोलमाल हुआ है। अंदर आते ही उसने पूछा, ''क्यों क्या हुआ' जिसके जवाब में बदहवास किन्नरी केवल इतना ही कह सकी, ''दरवाजा खोलने के लिए किशोरी नीचे उतरी मगर न मालूम चिल्लाकर कहां गायब हो गई।''

कमला ने इस बात का कुछ जवाब न दिया। उसने सबके पहले छत पर जाकर कुंअर इंद्रजीतसिंह को कमंद लगाने में मदद की। जब वे और तारासिंह ऊपर चढ़ आये तो उन दोनों को भी साथ ले वह नीचे आंगन में उतर आई और किन्नरी की तरह ही संक्षेप में किशोरी के गायब हो जाने का हाल कहकर इधर-उधर ढूंढ़ने लगी।

ये सब बातें थोड़ी ही देर में हो गईं और अंधेरा होने पर भी बात की बात में कमला ने नीचे की कुल कोठरियों में किशोरी को ढूंढ़ डाला, परेशान और बदहवास इंद्रजीतसिंह उसके साथ घूमते रहे।

ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कमला जब उस कोठरी में पहुंची जिसकी पीठ खंडहर की तरफ पड़ती थी तो यकायक चांदना मालूम पड़ा। भीतर घुसी, ओैर तुरंत निश्चय हो गया कि खंडहर की तरफ से कोई दीवार में सेंध लगाकर इस मकान के अंदर घुसा और यह आफत मचा गया। उस खुलासा सेंध की राह से ये चारों आदमी भी बाहर खंडहर में निकल गये और वहां एक विचित्र तमाशा देखा।

 

बयान - 2

शिवदत्तगढ़ में महाराज शिवदत्त बैठा हुआ बेफिक्री का हलुआ नहीं उड़ाता। सच पूछिये तो तमाम जमाने की फिक्र ने उसको आ घेरा है। वह दिन-रात सोचा ही करता है और उसके ऐयारों और जासूसों का दिन दौड़ते ही बीतता है। चुनार, गयाजी और राजगृही का हाल तो उसे रत्ती-रत्ती मालूम है क्योंकि इन तीनों जगहों की खबरें पहुंचाने के लिए उसने पूरा बंदोबस्त किया हुआ है। आज यह खबर पाकर कि गयाजी का राज्य राजा वीरेंद्रसिंह के कब्जे में आ गया, माधवी राज ही छोड़कर भाग गई, और किशोरी दीवान अग्निदत्त के हाथ फंसी हुई है, शिवदत्त घबड़ा उठा और तरह-तरह की बातें सोचने में इतना लीन हो गया कि तनोबदन की सुध जाती रही। किशोरी के ऊपर इसे इतना गुस्सा आया कि अगर वह यहां मौजूद होती तो अपने हाथ से टुकड़े-टुकड़े कर डालता। इस समय भी वह प्रण करके उठ खड़ा हुआ कि 'जब तक किशोरी के मरने की खबर न पाऊंगा अन्न न खाऊंगा' और सीधा महल में चला गया, हुक्म देता गया कि भीमसेन को हमारे पास भेज दो।

राजा शिवदत्त महल में जाकर अपनी रानी कलावती के पास बैठ गया। उसके चेहरे की उदासी और परेशानी का सबब जानने के लिए कलावती ने बहुत कुछ उद्योग किया मगर जब तक उसका लड़का भीमसेन महल में न गया उसने कलावती की बात का कुछ भी जवाब न दिया। मां-बाप के पास पहुंचते ही भीमसेन ने प्रणाम किया और पूछा, ''क्या आज्ञा होती है'

शिव - किशोरी के बारे में जो कुछ खबर आज पहुंची तुमने भी सुनी होगी!

भीम - जी हां।

शिव - अफसोस, फिर भी तुम्हें अपना मुंह दिखाते शर्म नहीं आती! न मालूम तुम्हारी बहादुरी किस दिन काम आयेगी और तुम किस दिन अपने को इस लायक बनाओगे कि मैं तुम्हें अपना लड़का समझूं!!

भीम - मुझे जो आज्ञा हो तैयार हूं।

शिव - मुझे उम्मीद नहीं कि तुम मेरी बात मानोगे।

भीम - मैं यज्ञोपवीत हाथ में लेकर कसम खाता हूं कि जब तक जान बाकी है उस काम के करने की पूरी कोशिश करूंगा जिसके लिए आप आज्ञा देंगे!

शिव - मेरा पहला हुक्म है कि किशोरी का सिर काटकर मेरे पास लाओ।

भीम - (कुछ सोच और ऊंची सांस लेकर) बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। और क्या हुक्म होता है

शिव - इसके बाद वीरेंद्रसिंह या उनके लड़कों में से जब तक किसी को मार न लो यहां मत आओ। यह न समझना कि यह काम मैं तुम्हारे ही सुपुर्द करता हूं। नहीं, मैं खुद आज इस शिवदत्तगढ़ को छोड़ूंगा और अपना कलेजा ठंडा करने के लिए पूरा उद्योग करूंगा। वीरेंद्रसिंह का चढ़ता प्रताप देखकर मुझे निश्चय हो गया कि लड़कर उन्हें किसी प्रकार नहीं जीत सकता इसलिए आज से मैं उनके साथ लड़ने का खयाल छोड़ देता हूं और उस ढंग पर चलता हूं जिसे ठग, चोर या डाकू लोग पसंद करते हैं।

भीम - अख्तियार आपको है जो चाहें करें। मुझे आज्ञा हो तो इसी समय चला जाऊं और जो कुछ हुक्म हुआ है उसे पूरा करने का उद्योग करूं!

शिव - अच्छा जाओ मगर यह कहो कि अपने साथ किस-किस को ले जाते हो

भीम - किसी को नहीं।

शिव - तब तुम कुछ न कर सकोगे। दो-तीन ऐयार और दस-बीस लड़कों को अपने साथ जरूर लेते जाओ।

भीम - आपके यहां ऐसा कौन ऐयार है जो वीरेंद्रसिंह के ऐयारों का मुकाबला करे और ऐसा कौन बहादुर है जो उन लोगों के सामने तलवार उठा सके!

शिव - तुम्हारा कहना ठीक है मगर तुम्हारे साथ गये हुए ऐयारों की कार्रवाई तब तक बहुत अच्छी होगी जब तक दुश्मनों को यह न मालूम हो जाय कि शिवदत्तगढ़ का कोई आया है! सिवाय इसके में बहादुर नाहरसिंह को तुम्हारे साथ भेजता हूं जिसका मुकाबला करने वाला वीरेंद्रसिंह की तरफ कोई नहीं है।

भीम - बेशक नाहरसिंह ऐसा ही है मगर मुश्किल तो यह है कि नाहरसिंह जितना बहादुर है उससे ज्यादा इस बात को देखता है कि अपने कौल का सच्चा रहे। उसका कहना है कि 'जिस दिन कोई बहादुर द्वंद्व-युद्ध में मुझे जीत लेगा उसी दिन मैं उसका हो जाऊंगा।' ईश्वर न करे कहीं ऐसी नौबत पहुंची तो वह उसी दिन से हम लोगों का दुश्मन हो जायगा।

शिव - यह सब तुम्हारा खयाल है, द्वंद्व-युद्ध में उसे वहां कोई जीतने वाला नहीं है।

भीम - अच्छा जो आज्ञा।

शिव - (खड़े होकर) चलो मैं इसी वक्त चलकर तुम्हारे जाने का बंदोबस्त कर देता हूं।

शिवदत्त और भीमसेन के बाहर चले जाने के बाद रानी कलावती ने जो बहुत देर से इन लोगों की बातें सुन-सुनकर गरम-गरम आंसू गिरा रही थी सिर उठाया और लंबी सांस लेकर कहा, ''हाय, अब तो जमाने का उलट-फेर ही दूसरा हुआ चाहता है। बेचारी किशोरी का क्या कसूर वह आप से आप तो चली ही नहीं गई उसने अपने आप तो कोई ऐसा काम किया ही नहीं जिससे उसकी इज्जत में फर्क आवे! हाय, किस कलेजे से भीमसेन अपनी बहिन को मारने का इरादा करेगा! मेरी जिंदगी अब व्यर्थ है क्योंकि बेचारी लड़की तो अब मारी ही जायेगी, भीमसेन भी वीरेंद्रसिंह से दुश्मनी करके अपनी जान नहीं बचा सकता, दूसरे उस लड़के का भरोसा ही क्या जो अपने हाथ से अपनी बहिन का सिर काटे। अगर इन सब बातों को भूल जाऊं और यही सोचकर बैठ रहूं कि मेरा सर्वस्व तो पति है मुझे लड़के-लड़कियों से क्या मतलब, तो भी नहीं बनता, क्योंकि वे भी डाकू-वृत्ति लिया चाहते हैं। इस अवस्था में वे किसी प्रकार का सुख नहीं पा सकते। फिर जीते जी अपने पति को दुख भोगते मैं कैसे देखूंगी हाय! वीरेंद्रसिंह! वही वीरेंद्रसिंह है जिसकी बदौलत मेरी जान बची थी, न मालूम बुर्देफरोशों की बदौलत मेरी क्या दुर्दशा होती! वही वीरेंद्रसिंह है जिसने कृपा कर मुझे अपने पति के पास खोह में भिजवा दिया था! वही वीरेंद्रसिंह है जिसने हम लोगों का कसूर एकदम माफ कर दिया था और चुनार की गद्दी लौटा देने को भी तैयार था। किस-किस बात की तरफ देखूं वीरेंद्रसिंह के बराबर धर्मात्मा तो कोई दुनिया में न होगा! फिर किसको दोष दूं, अपने पति को नहीं कभी नहीं, यह मेरे किए न होगा! यह सब दोष तो मेरे कर्मों ही का है। फिर जब भाग्य ही बुरे हैं तो ऐसे भाग्य को लेकर दुनिया में क्यों रहूं अपनी छुट्टी तो आप ही कर लेती हूं फिर मेरे पीछे क्या जाने क्या होगा इसकी खबर ही किसे है!''

रानी कलावती पागलों की तरह बहुत देर तक न जाने क्या-क्या सोचती रही, आखिर उठ खड़ी हुई और ताली का गुच्छा उठाकर अपना एक संदूक खोला। न मालूम उसमें से क्या निकालकर उसने अपने मुंह में रख लिया और पास ही पड़ी हुई सोने की सुराही में से जल निकालकर पीने के बाद कलम-दवात और कागज लेकर कुछ लिखने बैठ गई। लेख समाप्त होते-होते तक उसकी सखियां भी आ पहुंचीं। कलावती ने लिखे हुए कागज को लपेटकर अपनी एक सखी के हाथ में दिया और कहा, ''जब महाराज मुझे पूछें तो यह कागज उनके हाथ में दे देना। बस अब तुम लोग जाओ अपना काम करो, मैं इस समय सोना चाहती हूं, जब तक मैं खुद न उठूं खबरदार, मुझको कभी मत उठाना!''

हुक्म पाते ही उसकी लौंडियां वहां से हट गईं और रानी कलावती ने पलंग पर लेटकर आंचल से मुंह ढांप लिया।

दो ही पहर के बाद मालूम हो गया कि रानी कलावती सो गई, आज के लिए नहीं बल्कि वह हमेशा के लिए सो गई, अब वह किसी के जगाये नहीं जाग सकती।

शाम के वक्त जब महाराज शिवदत्त फिर महल में आये तो महारानी का लिखा कागज उनके हाथ में दिया गया। पढ़ते ही शिवदत्त दौड़ा हुआ उस कमरे में गया जिसमें कलावती सोई हुई थी। मुंह पर से कपड़ा हटाया, नब्ज देखी, और तुरंत लौटकर बाहर चला गया।

अब तो उसकी सखियों और लौंडियों को भी मालूम हो गया कि रानी कलावती हमेशा के लिए सो गईं। न मालूम बेचारी ने किन-किन बातों को सोचकर जान दे देना ही मुनासिब समझा। उसकी प्यारी सखियां जिन्हें वह जान से ज्यादे मानती थी पलंग के चारों तरफ जमा हो गईं और उसकी आखिरी सूरत देखने लगीं। भीमसेन चार घंटे पहले ही मुहिम पर रवाना हो चुका था। उसे अपनी प्यारी मां के मरने की कुछ खबर ही नहीं और यह सोचकर कि वह उदास और सुस्त होकर अपना काम न कर सकेगा, शिवदत्त ने भी कलावती के मरने की खबर उसके कान तक पहुंचने न दी।

 

बयान - 3

ऐयारों और थोड़े से लड़कों के सिवाय नाहरसिंह को साथ लिए हुए भीमसेन राजगृही की तरफ रवाना हुआ। उसका साथी नाहरसिंह बेशक लड़ाई के फन में बहुत ही जबर्दस्त था। उसे विश्वास था कि कोई अकेला आदमी लड़कर कभी मुझसे जीत नहीं सकता। भीमसेन भी अपने को ताकतवर और होशियार लगाता था मगर जब से लोभवश नाहरसिंह ने उसकी नौकरी कर ली और आजमाइश के तौर पर दो-चार दफे नाहरसिंह और भीमसेन से नकली लड़ाई हुई तब से भीमसेन को मालूम हो गया कि नाहरसिंह के सामने वह एक बच्चे के बराबर है। नाहरसिंह लड़ाई के फन में जितना होशियार और ताकतवर था उतना ही नेक और ईमानदार भी था और उसका यह प्रण करना बहुत ही मुनासिब था कि उसे जिस दिन जो कोई जीतेगा वह उसी दिन से उसकी ताबेदारी कबूल कर लेगा।

ये लोग पहले राजगृही में पहुंचे और एक गुप्त खोह में डेरा डालने के बाद भीमसेन ने ऐयारों को वहां का हाल मालूम करने के लिए मुस्तैद किया। दो ही दिन की कोशिश में ऐयारों ने कुल हाल वहां का मालूम कर लिया और भीमसेन ने जब यह सुना कि माधवी वहां मौजूद नहीं है तब बिना छेड़छाड़ मचाए गयाजी की तरफ कूच किया।

इस समय राजगृही को अपने कब्जे में कर लेना भीमसेन के लिए कोई बड़ी बात न थी, मगर इस खयाल से कि गयाजी में राजा वीरेंद्रसिंह की अमलदारी हो गई है राजगृही दखल करने से कोई फायदा न होगा और वीरेंद्रसिंह के मुकाबले में लड़कर भी जीतना बहुत ही मुश्किल है उसने राजगृही का खयाल छोड़ दिया। सिवाय इसके जाहिर होकर वह किसी तरह किशोरी को अपने कब्जे में कर भी नहीं सकता था, उसे लुक-छिपकर पहले किशोरी ही पर सफाई का हाथ दिखाना मंजूर था।

गयाजी के पास पहुंचते ही एक गुप्त और भयानक पहाड़ी में उन लोगों ने डेरा डाला और खबर लेने के लिए ऐयारों को रवाना किया। जिस तरह भीमसेन के ऐयार लोग घूम-घूमकर टोह लिया करते थे उसी तरह माधवी की सखी तिलोत्तमा भी अपना काम साधने के लिए भेष बदलकर चारों तरफ घूमा करती थी। इत्तिफाक से भीमसेन के ऐयारों की मुलाकात तिलोत्तमा से हो गई और बहुत जल्द माधवी की खबर भीमसेन को तथा भीमसेन की खबर माधवी को लग गई।

भीमसेन के साथ जितने लड़के थे उन सभों को खोह में ही छोड़ सिर्फ भीमसेन और नाहरसिंह को माधवी ने उस मकान में बुला लिया जिसका हाल हम ऊपर लिख चुके हैं।

आज किशोरी के घर में घुसकर आफत मचाने वाले ये ही भीमसेन और नाहरसिंह हैं। अपने ऐयारों की मदद से उस मकान के बगल वाले खंडहर में घुसकर भीमसेन ने उस मकान में सेंध लगाई और उस सेंध की राह नाहरसिंह ने अंदर जाकर जो कुछ किया पाठकों को मालूम ही है।

नाहरसिंह मकान के अंदर घुसकर उसी सेंध की राह किशोरी को लेकर बाहर निकल आया और उस बेचारी को जमीन पर गिराकर मालिक के हुक्म के मुताबिक उसे मार डालने पर मुस्तैद हुआ। मगर एक बेकसूर औरत पर इस तरह जुल्म करने का इरादा करते ही उस जवांमर्द का कलेजा दहल गया। वह किशोरी को जमीन पर रख दूर जा खड़ा हुआ और भीमसेन से जो मुंह पर नकाब डाले उस जगह मौजूद था बोला, ''लीजिए, इसके आगे जो कुछ करना है आप ही कीजिए। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती! मगर मैं आपको भी...!''

हाथ में खंजर लेकर भीमसेन फौरन बेचारी किशोरी की छाती पर जो उस समय डर के मारे बेहोश थी जा चढ़ा, साथ ही इसके किशोरी की बेहोशी भी जाती रही और उसने अपने को मौत के पंजे में फंसा हुआ पाया जैसे कि हम ऊपर लिख आये हैं।

भीमसेन ने खंजर उठाकर ज्यों ही किशोरी को मारना चाहा, पीछे से किसी ने उसकी कलाई थाम ली और खंजर लिये उसके मजबूत हाथ को बेबस कर दिया। भीमसेन ने फिरकर देखा तो एक साधु की सूरत नजर पड़ी। वह किशोरी को छोड़ उठ खड़ा हुआ और उसी खंजर से उसने साधु पर वार किया।

यह साधु वही है जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच में भयानक टीले पर रहता था जिसके पास मदद के लिए माधवी और तिलोत्तमा का जाना और उन्हीं के पास देवीसिंह का पहुंचना भी हम लिख आये हैं। इस समय साधु इस बात पर मुस्तैद दिखाई देता है कि जिस तरह बने इन दुष्टों के हाथों से बेचारी किशोरी को बचावे।

चांदनी रात में दूर खड़ा नाहरसिंह यह तमाशा देखता रहा मगर भीमसेन को साधु से जबर्दस्त समझकर मदद के लिए पास न आया। भीमसेन के चलाए हुए खंजर ने साधु का कुछ भी नुकसान न किया और उसने खंजर का वार बचाकर फुर्ती से भीमसेन के पीछे जा उसकी टांग पकड़कर इस ढंग से खींची कि भीमसेन किसी तरह सम्हल न सका और धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही साधु हट गया और बोला, ''उठ खड़ा हो और फिर आकर लड़!''

गुस्से में भरा हुआ भीमसेन उठ खड़ा हुआ और खंजर जमीन पर फेंक साधु से लिपट गया क्योंकि वह कुश्ती के फन में अपने को बहुत होशियार समझता था, मगर साधु से कुछ पेश न गई। थोड़ी ही देर में साधु ने भीमसेन को सुस्त कर दिया और कहा, ''जा मैं तुझे छोड़ देता हूं, अगर अपनी जिंदगी चाहता है तो अभी यहां से भाग जा।''

भीमसेन हैरान होकर साधु का मुंह देखता रह गया, कुछ जवाब न दे सका। जमीन पर पड़ी हुई बेचारी किशोरी यह कैफियत देख रही थी मगर डर के मारे न तो उससे उठा जाता था और न वह चिल्ला ही सकती थी।

भीमसेन को इस तरह बेदम देखकर नाहरसिंह से न रहा गया। वह झपटकर साधु के पास आया और ललकारकर बोला, ''अगर बहादुरी का दावा रखता है तो इधर आ। मैं समझ गया कि तू साधु नहीं बल्कि मक्कार है।''

साधु महाशय नाहरसिंह से भी उलझने को तैयार हो गये मगर ऐसी नौबत न आई क्योंकि उसी समय ढूंढ़ते हुए सेंध की राह से कुंअर इंद्रजीतसिंह और तारासिंह भी खंडहर में आ पहुंचे और उनके पीछे-पीछे किन्नरी और कमला भी आ मौजूद हुईं। कुंअर इंद्रजीतसिंह को देखते ही वे साधुराम तो हट गये और खंडहर की दीवार फांद न मालूम कहां चले गये। उधर एक पेड़ के पास गड़े हुए अपने नेजे को नाहरसिंह ने उखाड़ लिया और उसी से इंद्रजीतसिंह का मुकाबला किया। उधर तारासिंह ने उछलकर एक लात भीमसेन को ऐसी लगाई कि वह किसी तरह सम्हल न सका, तुरंत जमीन पर लोट गया। भीमसेन एक लात खाकर जमीन पर लोट जाने वाला न था मगर साधु के साथ लड़कर वह बदहवास और सुस्त हो रहा था इसलिए तारासिंह की लात से सम्हल न सका। तारासिंह ने भीमसेन की मुश्कें बांध लीं और उसे एक किनारे रख के नाहरसिंह की लड़ाई का तमाशा देखने लगा।

आधे घंटे तक नाहरसिंह और इंद्रजीतसिंह के बीच लड़ाई होती रही। इंद्रजीतसिंह की तलवार ने नाहरसिंह के नेजे को टुकड़े कर दिया और नाहरसिंह की ढाल पर बैठकर कुंअर इंद्रजीतसिंह की तलवार कब्जे से अलग हो गई। थोड़ी देर के लिए दोनों बहादुर ठहर गए। कुंअर इंद्रजीतसिंह की बहादुरी देख नाहरसिंह बहुत खुश हुआ और बोला -

नाहर - शाबाश! तुम्हारे ऐसा बहादुर मैंने आज तक नहीं देखा।

इंद्र - ईश्वर की सृष्टि में एक से एक बढ़के पड़े हैं, तुम्हारे या हमारे ऐसों की बात ही क्या है।

नाहर - आपका कहना बहुत ठीक है, मेरा प्रण क्या है आप जानते हैं

इंद्र - कह जाइए, अगर नहीं जानता हूं तो अब मालूम हो जायेगा।

नाहर - मैंने प्रण किया है कि जो कोई लड़कर मुझे जीतेगा मैं उसकी ताबेदारी कबूल करूंगा।

इंद्र - तुम्हारे ऐसे बहादुर का यह प्रण बेमुनासिब नहीं है। फिर आइए कुश्ती से निपटारा कर लिया जाय।

नाहर - बहुत अच्छा आइए!

दोनों में कुश्ती होने लगी। थोड़ी ही देर में कुंअर इंद्रजीतसिंह ने नाहरसिंह को जमीन पर दे मारा और पूछा, ''कहो अब क्या इरादा है'

नाहर - मैं ताबेदारी कबूल करता हूं।

इंद्रजीतसिंह उसकी छाती पर से उठ खड़े हुए और इधर-उधर देखने लगे। चारों तरफ सन्नाटा था। किशोरी, किन्नरी या कमला का कहीं पता नहीं, भीमसेन और उसके साथियों का भी (अगर कोई वहां हो) नाम-निशान नहीं, यहां तक कि अपने ऐयार तारासिंह की सूरत भी उन्हें दिखाई न दी।

इंद्र - यह क्या! चारों तरफ सन्नाटा क्यों छा गया

नाहर - ताज्जुब है! इसके पहले तो यहां कई आदमी थे, न मालूम वे सब कहां गए

इंद्र - तुम कौन हो और तुम्हारे साथ कौन था

नाहर - मैं आपका ताबेदार हूं, मेरे साथ शिवदत्तसिंह का लड़का भीमसेन और इसके पहले मैं उसका नौकर था, आशा है कि आप भी अपना परिचय मुझे देंगे।

इंद्र - मेरा नाम इंद्रजीतसिंह है।

नाहर - हैं!!

नाम सुनते ही नाहरसिंह उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला, ''मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं कि उसने मुझे आपकी ताबेदारी में सौंपा! यदि किसी दूसरे की ताबेदारी कबूल करनी पड़ती तो मुझे बड़ा दुख होता!''

नाहरसिंह ने सच्चे दिल से कुमार की ताबेदारी कबूल की। इसके बाद बड़ी देर तक दोनों बहादुर चारों तरफ घूम-घूमकर उन लोगों को ढूंढ़ते रहे मगर किसी का पता न लगा, हां एक पेड़ के नीचे भीमसेन दिखाई पड़ा जिसके हाथ-पैर कमंद से मजबूत बंधे हुए थे। भीमसेन ने पुकारकर कहा, ''क्यों नाहरसिंह! क्या मेरी मदद न करोगे'

नाहर - अब मैं तुम्हारा ताबेदार नहीं हूं।

इंद्र - (भीमसेन से) तुम्हें किसने बांधा?

भीम - मैं पहचानता तो नहीं मगर इतना कह सकता हूं कि आपके साथी ने।

इंद्र - और वह बाबाजी कहां चले गये?

भीम - क्या मालूम?

इतने में ही खंडहर की दीवार फांदकर आते हुए तारासिंह भी दिखाई पड़े। इंद्रजीतसिंह घबड़ाए हुए उनकी तरफ बढ़े और पूछा, ''तुम कहां चले गये थे'

तारा - जिस समय हम लोग यहां आये थे एक बाबाजी भी इस जगह मौजूद थे मगर न मालूम कहां चले गये! मैं एक आदमी की मुश्कें बांध रहा था कि उसी समय (हाथ का इशारा करके) उस झाड़ी में छिपे कई आदमी बाहर निकले और किशोरी को जबर्दस्ती उठाकर उसी तरफ ले चले। उन लोगों को जाते देख किन्नरी और कमला भी उसी तरफ लपकीं। मैंने यह सोचकर कि कहीं ऐसा न हो कि आपको लड़ाई के समय धोखा देकर वह आदमी पीछे से आप पर वार करे झटपट उसकी मुश्कें बांधी और फिर मैं भी उसी तरफ लपका जिधर वे लोग गये थे। वहां कोने में खुली हुई खिड़की नजर आई, मैं यह सोच उस खिड़की के बाहर गया कि बेशक इसी राह से वे लोग निकल गये होंगे।

इंद्र - फिर कुछ पता लगा

तारा - कुछ भी नहीं, न मालूम वे लोग किधर गायब हो गये! मैं आपको लड़ते हुए छोड़ गया था इसलिए तुरंत लौट आया। अब आप घर चलिए, आपको पहुंचाकर मैं उन लोगों को खोज निकालूंगा। (नाहरसिंह की तरफ इशारा करके) इनसे क्या निपटारा हुआ

इंद्र - इन्होंने मेरी ताबेदारी कबूल कर ली।

तारा - सो तो ठीक है, मगर दुश्मन का...

नाहर - आप इन सब बातों को न सोचिये, ईश्वर चाहेगा तो आप मुझे बेईमान कभी न पावेंगे!

तारा - ईश्वर ऐसा ही करे!

रात की अंधेरी बिल्कुल जाती रही और अच्छी तरह सबेरा हो गया, मुहल्ले के कई आदमी उस खिड़की की राह खंडहर में चले आये और अपने राजा को वहां पा हैरान हो देखने लगे। कुंअर इंद्रजीतसिंह, तारासिंह और नाहरसिंह अपने साथ भीमसेन को लिए हुए महल में पहुंचे और इंद्रजीतसिंह ने सब हाल अपने भाई आनंदसिंह से कहा।

आज रात की वारदात ने दोनों कुमारों को हद से ज्यादे तरद्दुद में डाल दिया। किन्नरी और किशोरी के इस तरह मिलकर भी पुनः गायब हो जाने से दोनों ही पहले से ज्यादा उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

 

बयान - 4

आधी रात का समय है और सन्नाटे की हवा चल रही है। बिल्लौर की तरह खूबी पैदा करने वाली चांदनी आशिकमिजाजों को सदा ही भली मालूम होती है लेकिन आज सर्दी ने उन्हें भी पस्त कर दिया, यह हिम्मत नहीं पड़ती कि जरा मैदान में निकलें और इस चांदनी की बहार लें मगर घर में बैठे दरवाजे की तरफ देखा करने और उसांसें लेने से होता ही क्या है। मर्दानगी कोई और ही चीज है, इश्क किसी दूसरी ही वस्तु का नाम है, तो भी इश्क के मारे हुए माशूक की नागिन-सी जुल्फों से अपने को डसाना ही जवांमर्दी समझते हैं और दिलबर की तिरछी निगाहों से अपने कलेजे को छलनी बनाने में बहादुरी मानते हैं। मगर वे लोग जो सच्चे बहादुर हैं घर बैठे 'ओफ' करना पसंद नहीं करते और समय पड़ने पर तलवार को ही अपना माशूक मानते हैं। देखिये इस सर्दी और ऐसे भयानक स्थान में भी एक सच्चे बहादुर को किसी पेड़ की आड़ में बैठ जाना भी बुरा मालूम होता है।

अब रात पहर भर से भी कम बाकी है। एक पहाड़ी के ऊपर जिसकी ऊंचाई बहुत ज्यादे नहीं तो इतनी कम भी नहीं है कि बिना दम लिए एक ही दौड़ में कोई ऊपर चढ़ जाये, एक आदमी मुंह पर नकाब डाले काले कपड़े से तमाम बदन को छिपाये इधर-उधर टहल रहा है। चारों तरफ सन्नाटा है, कोई उसे पहचानने वाला यहां मौजूद नहीं, शायद इसी खयाल से उसने नकाब उलट दी और कुछ देर के लिए खड़े होकर मैदान की तरफ देखने लगा।

इस पहाड़ी के बगल में एक दूसरी पहाड़ी है जिसकी जड़ इस पहाड़ी से मिली हुई है। मालूम होता है कि एक पहाड़ी के दो टुकड़े हो गए हैं। बीच में डाकुओं और लुटेरों के आने-जाने लायक रास्ता है जिसे भयानक दर्रा कहना मुनासिब जान पड़ता है। इस आदमी की निगाह घड़ी-घड़ी उस दर्रे की तरफ दौड़ती और सन्नाटा पाकर मैदान की तरफ घूम जाती है जिससे मालूम होता है कि उसकी आंखें किसी ऐसे को ढूंढ़ रही हैं जिसके आने की इस समय पूरी उम्मीद है।

टहलते - टहलते उसे बहुत देर हो गई, पूरब तरफ आसमान पर कुछ-कुछ सफेदी फैलने लगी जिसे देख यह कुछ घबड़ाया-सा हो गया और दस कदम आगे बढ़कर मैदान की तरफ देखने लगा, साथ ही इसके चौंका और धीरे से बोल उठा, ''आ पहुंचे!''

उस आदमी ने धीरे से सीटी बजाई। इधर-उधर चट्टानों की आड़ में छिपे हुए दस-बारह आदमी निकल आये जिन्हें देख वह हुकूमत के तौर पर बोला, ''देखो वे लोग आ पहुंचे, अब बहुत जल्द नीचे उतर चलना चाहिए।''

बात के अंदाज से मालूम हो गया कि वह आदमी जो बहुत देर से पहाड़ी के ऊपर टहल रहा था उन सभों का सरदार है। अब उसने अपने चेहरे पर नकाब डाल ली और अपने साथियों को लेकर तेजी के साथ पहाड़ी के नीचे उतर आने वालों का मुहाना रोक लिया।

कपड़े में लपेटी हुई एक लाश उठाए और उसे चारों तरफ से घेरे हुए कई आदमी उस दर्रे में घुसे। वे लोग कदम बढ़ाये जा रहे थे। उन्हें स्वप्न में भी यह गुमान न था कि हम लोगों के काम में बाधा डालने वाला इस पहाड़ के बीच में से कोई निकल आएगा।

जब लाश उठाए हुए वे लोग उस दर्रे के बीच में घुसे बल्कि उन लोगों ने जब आधा दर्रा तै कर लिया, तब यकायक चारों तरफ से छिपे हुए कई आदमी उन लोगों पर टूट पड़े और हर तरह से उन्हें लाचार कर दिया। वे लोग किसी तरह भी लाश को न ले जा सके और तीन-चार आदमियों के घायल होने तथा एक के मर जाने पर उसी जगह उस लाश को छोड़ आखिर सभों को भाग ही जाना पड़ा।

दुश्मनों के भाग जाने पर उस सरदार ने जो पहले ही से उस पहाड़ी पर मौजूद था जिसका जिक्र हम कर आये हैं, अपने साथियों को पुकारकर कहा, ''पीछा करने की कोई जरूरत नहीं हमारा मतलब निकल गया, मगर यह देख लेना चाहिए कि यह किशोरी ही है या नहीं!''

एक ने बटुए में से मोमबत्ती निकालकर जलाई और उस लाश के मुंह पर से कपड़ा हटाकर देखने के बाद कहा, ''किशोरी ही तो है।'' सरदार ने किशोरी की नब्ज पर हाथ रखा और कहा -

सरदार - ओफ! इसे बहुत तेज बेहोशी दी गई है, देखो तुम भी देख लो!

एक - (नब्ज देखकर) बेशक बहुत ज्यादे बेहोशी दी गई है, ऐसी हालत में अक्सर जान निकल जाती है!

दूसरा - इसे कुछ कम करना चाहिए।

सरदार ने अपने बटुए में से एक डिबिया निकाली तथा खोलकर किशोरी को सुंघाने के बाद फिर नब्ज पर हाथ रखा और कहा, ''बस इससे ज्यादे बेहोशी कम करने से यह होश में आ जायेगी। चलो उठाओ, अब यहां ठहरना मुनासिब नहीं है।''

किशोरी को उठाकर वे लोग उसी दर्रे की राह घूमते हुए पहाड़ी के पार हो गये और न मालूम किस तरफ चले गये। इनके जाने के बाद उसी जगह जहां पर लड़ाई हुई थी छिपा हुआ एक आदमी बाहर निकला और चारों तरफ देखने लगा। जब वहां किसी को मौजूद न पाया तो धीरे से बोल उठा -

''मेरा पहले ही से यहां पहुंचना कैसा मुनासिब हुआ! मैं उन लोगों को खूब पहचानता हूं जो लड़-भिड़कर बेचारी किशोरी को ले गये! खैर, क्या मुजायका है, मुझसे भागकर ये लोग कहां जायेंगे। मेरे लिए तो दोनों ही बराबर हैं, वे ले जाते तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती, और ये लोग ले गये हैं तब भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी। खैर हरि इच्छा, अब बाबाजी को ढूंढ़ना चाहिए। उन्होंने भी इसी जगह मिलने का वादा किया था।''

इतना कह वह आदमी चारों तरफ घूमने और बाबाजी को ढूंढ़ने लगा। इस समय इस आदमी को यदि माधवी देखती तो तुरंत पहचान लेती क्योंकि यह वही साधु है जो रामशिला पहाड़ी के सामने टीले पर रहता था, जिसके पास माधवी गई थी, या जिसने भीमसेन के हाथ से उस समय किशोरी की जान बचाई थी जब खंडहर के बीच में वह उसकी छाती पर सवार हो खंजर उसके कलेजे के पार किया ही चाहता था।

साफ सबेरा हो चुका था बल्कि पूरब तरफ सूर्य की लालिमा ने चौथाई आसमान पर अपना दखल जमा लिया था। वह साधु इधर-उधर घूमता - फिरता एक जगह अटक गया और सोचने लगा कि किधर जाय या क्या करे इतने ही में सामने से इसी की सूरत-शक्ल के दूसरे बाबाजी आते हुए दिखाई पड़े। देखते ही यह उनकी तरफ बढ़ा और बोला, ''मैं बड़ी देर से आपको ढूंढ़ता रहा हूं क्योंकि इसी जगह मिलने का आपने वादा किया था।''

अभी आए हुए बाबाजी ने कहा, ''मैं भी वादा पूरा करने के लिए आ पहुंचा। (हंसकर) बहुत अच्छे! यदि इस समय कोई देखे तो अवश्य बावला हो जाय और कहे कि एक ही रंग और सूरत-शक्ल के दो बाबाजी कहां से पैदा हो गये अच्छा हमारे पीछे-पीछे चले आओ।''

दोनों बाबाजी ने एक तरफ का रास्ता लिया और देखते-देखते न मालूम किधर गायब हो गये या किसी खोह में जा छिपे।

किशोरी की जब आंख खुली तो उसने अपने को एक सुंदर मसहरी पर लेटे हुए पाया और उम्दा कपड़ों और जेवरों से सजी हुई कई औरतें भी उसे दिखाई पड़ीं। पहले तो किशोरी ने यही समझा कि वे सब अच्छे अमीरों और सरदारों की लड़कियां हैं मगर थोड़ी ही देर बाद उनकी बातचीत और कायदे से मालूम हो गया कि लौंडियां हैं। अपनी बेबसी और बदकिस्मती पर रोती हुई किशोरी को यह जानने की बड़ी उत्कंठा हुई कि किस महाराजाधिराज के मकान में आ फंसी हूं जिसकी लौंडियां इस शान और शौकत की दिखाई पड़ती हैं।

किशोरी को होश में आते देख उनमें की दो-तीन लौंडियां न मालूम कहां चली गईं मगर किशोरी ने समझ लिया कि मेरे होश में आने की किसी को खबर करने गई हैं।

ताज्जुब-भरी निगाहों से किशोरी चारों तरफ देखने लगी। वाह-वाह, क्या सुंदर कमरा बना हुआ है। चारों तरफ दीवारों पर मीनाकारी का काम किया हुआ है, छत में सुनहरी बेल और बीच-बीच में जड़ाऊ फूलों को देखकर अक्ल दंग होती है, न मालूम इसकी तैयारी में कितने रुपये खर्च हो गये होंगे! छत से लटकती हुई बिल्लोरी हांडियों की परइयों में मानिक की लोलकें लटक रही हैं, जड़ाऊ डारों पर बेशकीमती दीवारगीरें अपनी बहार दिखा रही हैं, दरवाजों की महराबों पर बेलें और उस पर बैठी हुई छोटी-छोटी खूबसूरत चिड़ियों के बनाने में कारीगर ने जो कुछ मेहनत की होगी उसका जानना बहुत ही मुश्किल है। उन अंगूरों में कहीं पके अंगूर की जगह मानिक और कच्चे की जगह पन्ना काम में लाया गया था। अलावा इन सब बातों के उस कमरे में कुल सजावट का हाल अगर लिखा जाय तो हमारा असल मतलब बिल्कुल छूट जायेगा और मुख्तसर लिखावट के वादे में फर्क पड़ जायगा, अस्तु इस बारे में हम कुछ नहीं लिखते।

इस मकान को देख किशोरी दंग हो गई। उसकी हालत को लिखना बहुत ही मुश्किल है। जिधर उसकी निगाह जाती उधर ही की हो रहती थी, पर उस जगह की सजावट किशोरी अच्छी तरह देखने भी न पाई थी कि पहले की-सी और कई लौंडियां वहां आ मौजूद हुईं और बोलीं, ''महाराज को साथ लिए रानी साहिबा आ रही हैं!''

महाराज को साथ लिए रानी साहिबा उस कमरे में आ पहुंचीं। बेचारी किशोरी को भला क्या मालूम कि ये दोनों कौन हैं या कहां के राजा हैं तो भी इन दोनों की सूरत-शक्ल देखते ही किशोरी रुआब में आ गई। महाराज की उम्र लगभग पचास वर्ष की होगी। लंबा कद, गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें, चौड़ी पेशानी, ऊपर को उठी हुई मूंछें, बहादुरी चेहरे पर बरस रही थी। रानी साहिबा की उम्र भी लगभग पैंतीस वर्ष के होगी फिर भी उनके बदन की बनावट और खूबसूरती नौजवान परीजमालों की आंखें नीची करती थी। उनकी बड़ी-बड़ी रतनार आंखों में अब भी वही बात थी जो उनकी जवानी में होगी। उनके अंगों की लुनाई में किसी तरह का फर्क नहीं आया था। इस समय एक कीमती धानी पोशाक उनकी खूबसूरती को बढ़ा रही थी और जड़ाऊ जेवरों से उनका बदन भरा हुआ था मगर देखने वाला यही कहेगा कि उन्हें जेवरों की कोई जरूरत नहीं, यह तो हुस्न ही के बोझ से दबी जाती हैं।

उन दोनों के रुआब ने किशोरी को पलंग पर पड़े रहने न दिया। वह उठ खड़ी हुई और उनकी तरफ देखने लगी। रानी साहिबा चाहे कैसी ही खूबसूरत क्यों न हों और उन्हें अपनी खूबसूरती पर चाहे कितना ही घमंड क्यों न हो, मगर किशोरी की सूरत देखते ही वे दंग हो गईं और इनकी शेखी हवा हो गई। इस समय वह हर तरह से सुस्त और उदास थी, किसी तरह की सजावट उसके बदन पर न थी, तो भी महारानी के जी ने गवाही दे दी कि इससे बढ़कर खूबसूरत दुनिया में कोई न होगा। किशोरी उनकी खूबसूरती के रुआब में आकर पलंग के नीचे नहीं उतरी थी बल्कि इज्जत के लिहाज से और यह सोचकर कि जब इस कमरे की इतनी बड़ी सजावट है तो उनके खास कमरे की क्या नौबत होगी और वह कितने बड़े राज्य और दौलत की मालिक होंगी, उठ खड़ी हुई थी।

राजा और रानी दोनों ने प्यार की निगाह से किशोरी की तरफ देखा और राजा ने आगे बढ़कर किशोरी की पीठ पर हाथ फेरकर कहा, ''बेशक यह मेरी ही पतोहू होने के लायक है।''

इस आखिरी शब्द ने किशोरी के साथ वह काम किया जो नमक जख्म के साथ, आग फूस की झोंड़ड़ी के साथ, तीर कलेजे के साथ, शराब धर्म के साथ, लालच ईमान के साथ और बिजली गिरकर तनोबदन के साथ करती है।

 

बयान - 5

कुंअर इंद्रजीतसिंह नाहरसिंह और तारासिंह को साथ लिए घर आये और अपने छोटे भाई से सब हाल कहा। वे भी सुनकर बहुत उदास हुए और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। दोनों कुमार बड़े ही तरद्दुद में पड़े। अगर तारासिंह को पता लगाने के लिए भेजें तो गया में कोई ऐयार न रह जायगा और यह बात अगर उनके पिता सुनें तो बहुत रंज हों, जिसका खयाल उन्हें सबसे ज्यादा था। दो पहर दिन चढ़े तक दोनों भाई बड़े ही तरद्दुद में पड़े रहे, दोपहर बाद उनका तरद्दुद कुछ कम हुआ जब पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह और जगन्नाथ ज्योतिषी वहां आ मौजूद हुए। तीनों के वहां पहुंचने से दोनों कुमार बहुत खुश हुए और समझा कि अब हमारा काम अटका न रहेगा।

कुंअर इंद्रजीतसिंह आनंदसिंह, तारासिंह, पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह और ज्योतिषीजी ये सब बाग की बारहदरी में एकांत समझकर चले गये और बातचीत करने लगे।

आनंद - लीजिए साहब अब तो दुश्मन लोग यहां भी बहुत से हो गये।

ज्योतिषी - कोई हर्ज नहीं।

इंद्र - भैरोसिंह, पहले तुम अपना हाल कहो, यहां से जाने के बाद क्या हुआ

भैरो - मुझे तो रास्ते में ही मालूम हो गया था कि किशोरी वहां नहीं है।

इंद्र - यह सब हाल मुझे भी मालूम हुआ था।

भैरो - ठीक है, वह आदमी आपके पास भी आया होगा जिसने मुझे खबर दी थी।

इंद्र - खैर तब क्या हुआ

भैरो - फिर भी मैं वहां चला गया (बद्रीनाथ और ज्योतिषीजी की तरफ इशारा करके) और इन लोगों के साथ मिलकर काम करने लगा। ये लोग दो सौ बहादुरों के साथ वहां पहले से मौजूद थे। आखिर यह हुआ कि दीवान अग्निदत्त और दो-तीन उसके साथी गिरफ्तार करके चुनार भेज दिये गये। माधवी का पता नहीं कि वह कहां गई, वहां की रियाया सब अग्निदत्त से रंज थी इसलिए राजगृही अपने कब्जे में कर लेना हम लोगों को बहुत ही सहज हुआ। अब उन्हीं दो सौ आदमियों के साथ पन्नालाल को वहां छोड़ आया हूं।

बद्री - आप यहां का हाल भी कहिये। सुना है यहां बड़े-बड़े बेढब मामले हो गये हैं!

इंद्र - यहां का हाल भैरोसिंह की जबानी आपने सुना ही होगा, इसके बाद आज रात को एक अजीब बात हो गई है।

तारासिंह ने रात भर का कुल हाल उन लोगों से कहा जिसे सुन वे लोग बहुत ही तरद्दुद में पड़ गये।

इन लोगों की बातचीत हो रही थी कि एक चोबदार ने आकर अर्ज किया कि ''अखंडनाथ बाबाजी बाहर खड़े हैं और यहां आना चाहते हैं।'' अखंडनाथ नाम सुन ये लोग सोचने लगे कि कौन हैं और कहां से आये हैं। आखिर इंद्रजीतसिंह ने उन्हें अपने पास बुलाया और सूरत देखते ही पहचान लिया।

पाठक, ये अखंडनाथ बाबाजी वही हैं जो रामशिला के सामने फलगू के बीच भयानक टीले पर रहते थे, जिनके पास माधवी जाती थी, तथा जिन्होंने उस समय किशोरी की जान बचाई थी जब खंडहर में उसकी छाती पर सवार हो भीमसेन खंजर उसके कलेजे में भोंका ही चाहता था और जिसका कुल हाल इसी भाग के तीसरे बयान में हम लिख आये हैं। इन बाबाजी को तारासिंह भी पहचानते थे क्योंकि कल रात यह भी इंद्रजीतसिंह के साथ ही थे।

इंद्रजीतसिंह ने उठकर बाबाजी को प्रणाम किया। इनको उठते देख और सब लोग भी उठ खड़े हुए। कुमार ने अपने पास बाबाजी को बैठाया और ऐयारों की तरफ देख के कहा, ''इन्हीं का हाल मैं कह चुका हूं, इन्होंने ही उस खंडहर में किशोरी की जान बचाई थी।''

बाबा - जान बचाने वाला तो ईश्वर है मैं क्या कर सकता हूं। खैर, यह तो कहिये उस मामले के बाद की भी आपको खबर है कि क्या हुआ!

इंद्रजीत - कुछ भी नहीं, हम लोग इस समय इसी सोच-विचार में पड़े हैं।

बाबा - अच्छा तो फिर मुझसे सुनिये। दो औरतें और जो उस मकान में थीं उनका हाल तो मुझे मालूम नहीं कि किशोरी की खोज में कहां गईं, मगर किशोरी का हाल मैं खूब जानता हूं।

बाबाजी की बातों ने सभों का दिल अपनी तरफ खींच लिया और सब लोग एकाग्र होकर उनकी बातें सुनने लगे। बाबाजी ने यों कहना शुरू किया -

''नाहरसिंह से जब कुमार लड़ रहे थे उस समय भीमसेन के साथियों को जो उसी जगह छिपे हुए थे मौका मिला और वे लोग किशोरी को लेकर शिवदत्तगढ़ की तरफ भागे, मगर ले न जा सके क्योंकि रास्ते ही में रोहतासगढ़1 के राजा के ऐयार लोग छिपे हुए थे जिन लोगों ने लड़कर किशोरी को छीन लिया और रोहतासगढ़ ले गये। किशोरी की खूबसूरती का हाल सुनकर रोहतासगढ़ के राजा ने इरादा कर लिया कि अपने लड़के के साथ उसे ब्याहेगा और बहुत दिन से उसके ऐयार लोग किशोरी की धुन में लगे हुए भी थे। अब मौका पाकर वे लोग अपना काम कर गये। अगर आप लोग जल्द उसके छुड़ाने की फिक्र न करेंगे तो बेचारी के बचने की उम्मीद जाती रहेगी। लड़-भिड़कर रोहतासगढ़ के किले को फतह करना बहुत मुश्किल है, चाहे फौज और दौलत में आप लोग बढ़ के क्यों न हों मगर पहाड़ के ऊपर के उस आलीशान किले के अंदर घुसना बड़ा ही कठिन है मगर फिर भी चाहे जो हो आप लोग हिम्मत न हारें। किशोरी का खयाल चाहे न भी हो मगर यह सोचकर कि आपके समीप का यह मजबूत किला आप ही के

1.रोहतासगढ़ बिहार के इलाके में मशहूर है। यह किला पहाड़ के ऊपर है। उस जमाने में इस किले की लंबाई-चौड़ाई लगभग दस कोस की होगी। बड़े-बड़े राजा लोग भी इसको फतह करने का हौसला नहीं कर सकते थे। आजकल यह इमारत बिल्कुल टूट-फूट गई है तो भी देखने योग्य है।

योग्य है, जरूर मेहनत करनी चाहिए। ईश्वर आपको विजय देगा और जहां तक हो सकेगा मैं आपकी मदद करूंगा।''

बाबाजी की जुबानी सब हाल सुनकर कुंअर इंद्रजीतसिंह बहुत प्रसन्न हुए। एक तो किशोरी का पता लगने की खुशी दूसरे रोहतासगढ़ के राजा से बड़ी भारी लड़ाई लड़कर जवानी का हौसला निकालने और मशहूर किले पर अपना दखल जमाने की खुशी से गद्गद हो गये और जोश भरी आवाज में बाबाजी से बोले -

इंद्रजीतसिंह - बड़े-बड़े वीरों की आत्माएं स्वर्ग से झांककर देखेंगी कि रोहतासगढ़ की लड़ाई कैसी होती है और किस तरह हम लोग उस किले को फतह करते हैं। रोहतासगढ़ का हाल हम बखूबी जानते हैं, मगर बिना कोई सबब हाथ लगे ऐसा इरादा नहीं कर सकते थे।

बाबा - अच्छा एक लोटा जल मंगाइये।

तुरंत जल आया। बाबाजी ने अपनी दाढ़ी नोचकर फेंक दी और मुंह धो डाला। अब तो सभों ने पहचान लिया कि ये देवीसिंह हैं।

पाठक, रामशिला पहाड़ी के सामने भयानक टीले पर रहने वाले बाबाजी से देवीसिंह का मिलना आप भूले न होंगे और आपको यह भी याद होगा कि देवीसिंह से बाबाजी ने कहा था कि 'कल इस स्थान को हम छोड़ देंगे।' बस बाबाजी के जाने के बाद देवीसिंह ही उनकी सूरत में उस गद्दी पर जा विराजे और जो कुछ काम किया आप जानते ही हैं। उस दिन बाबाजी की सूरत में देवीसिंह ही थे जिस दिन माधवी ने मिलकर कहा था कि 'हमारी मदद के लिए भीमसेन आ गया है।' असली बाबाजी भी उस पहाड़ी पर देवीसिंह से मिल चुके हैं जहां हमने लिखा है कि एक ही सूरत के दो बाबाजी इकट्ठे हुए हैं और उन्हीं बाबाजी की जुबानी रोहतासगढ़ का मामला देवीसिंह ने सुना था।

देवीसिंह ने अपना बिल्कुल हाल दोनों कुमारों से कहा और आखिर में बोले, ''अब रोहतासगढ़ पर हम जरूर चढ़ाई करेंगे।''

इंद्र - बहुत अच्छी बात है, हम लोगों का हौसला भी तभी दिखाई देगा! हां यह तो कहिए नाहरसिंह से कैसा बर्ताव किया जाय

देवी - कौन नाहरसिंह

इंद्र - उस खंडहर में जो मुझसे लड़ा था बड़ा ही बहादुर है। उसने प्रण कर रखा था कि जो मुझे जीतेगा उसी का मैं ताबेदार हो जाऊंगा। अब उसने भीमसेन का साथ छोड़ दिया और हम लोगों के साथ रहने को तैयार है।

देवी - ऐसे बहादुर पर जरूर मेहरबानी करनी चाहिए मगर आज हम उसे आजमावेंगे। आज से उसके लिए एक मकान दे दें और हर तरह के आराम का बंदोबस्त कर दें।

इंद्र - बहुत अच्छा।

कुंअर इंद्रजीतसिंह ने उसी समय नाहरसिंह को अपने पास बुलाया और बड़ी मेहरबानी के साथ पेश आये। एक मकान देकर अपने सेनापति की पदवी उसे दी और भीमसेन को कैद में रखने का हुक्म दिया।

अपने ऊपर कुमार की इतनी मेहरबानी देख नाहरसिंह बहुत प्रसन्न हुआ। कुछ देर तक बातें करता रहा, तब सलाम करके अपने ठिकाने चला गया और सेनापति के काम को ईमानदारी के साथ पूरा करने का उद्योग करने लगा।

आधी रात जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। गलियों और सड़कों पर चौकीदारों के ''जागते रहियो, होशियार रहियो'' पुकारने की आवाज आ रही है। नाहरसिंह अपने मकान में पलंग पर लेटा हुआ कोई किताब देख रहा है और सिरहाने शमादान जल रहा है।

नाहरसिंह के हाथ में श्रुति स्मृति या पुराण की कोई पुस्तक नहीं है, उसके हाथ में तस्वीरों की एक किताब है जिसके पन्ने वह उलटता है और एक-एक तस्वीर को देर तक बड़े गौर से देखता है। इन तस्वीरों में बड़े-बड़े राजाओं और बहादुरों की मशहूर लड़ाइयों का नक्शा दिखाया गया है और पहलवानों की बहादुरी और दिलावरों की दिलावरी का खाका उतरा हुआ है जिसे देख-देखकर नाहरसिंह की रगें जोश मारती हैं और वह चाहता है कि ऐसी लड़ाइयों में हमें भी कभी हौसला निकालने का मौका मिले।

तस्वीरें देखते-देखते बहुत देर हो गई और नाहरसिंह की नींद भरी आंखें भी बंद होने लगीं। आखिर उसने किताब बंद करके एक तरफ रख दी और थोड़ी ही देर बाद गहरी नींद में सो गया।

इस मकान के किसी कोने में एक आदमी न मालूम कब का छिपा हुआ था जो नाहरसिंह को सोता जानकर उस कमरे में चला आया और पलंग के पास खड़ा हो उसे गौर से देखने लगा। इस आदमी को हम नहीं पहचानते क्योंकि यह मुंह पर नकाब डाले हुए है। थोड़ी देर बाद अपनी जेब से उसने एक पुड़िया निकाली और एक चुटकी बुकनी नाहरसिंह की नाक के पास ले गया। सांस के साथ धूरा दिमाग में पहुंचा और वह छींक मारकर बेहोश हो गया।

उस आदमी ने अपनी कमर से एक रस्सी खोली और नाहरसिंह के हाथ-पैर मजबूती से बांधकर उसे होशियार करने के बाद तलवार खेंच मुंह पर से नकाब हटा सामने खड़ा हो गया। होश में आते ही नाहरसिंह ने अपने को बेबस और हाथ में नंगी तलवार लिए महाराज शिवदत्त को सामने मौजूद पाया।

शिव - क्यों नाहरसिंह, एक नाजुक समय में हमारे लड़के का साथ छोड़ देना और उसे दुश्मनों के हाथ में फंसा देना क्या तुम्हें मुनासिब था

नाहर - जब तक बहादुर इंद्रजीतसिंह ने मुझ पर फतह नहीं पाई तब तक मैं बराबर तुम्हारे लड़के का साथ देता रहा, जब कुमार ने मुझे जीत लिया था तो अपने कौल के मुताबिक मैंने उनकी ताबेदारी कबूल कर ली। मेरे कौल को तुम भी जानते ही थे।

शिव - जो कुछ तुमने किया है उसकी सजा देने के लिए इस समय मैं मौजूद हूं।

नाहर - खैर ईश्वर की जो मर्जी।

शिव - अब भी अगर तुम हमारा साथ देना मंजूर करो तो छोड़ सकता हूं।

नाहर - यह नहीं हो सकता। ऐसे बहादुर का साथ छोड़ तुम्हारे ऐसे बेईमान का संग करना मुझे मंजूर नहीं।

शिव - (डपटकर और तलवार उठाकर) क्या तुम्हें अपनी जान देना मंजूर है?

नाहर - खुशी से मंजूर है मगर मालिक का संग छोड़ना कबूल नहीं है!

शिव - देखो फिर तुम्हें समझाता हूं, सोचो और मेरा साथ दो!

नाहर - बस, बहुत बकवाद करने की जरूरत नहीं, जो कुछ तुम कर सको कर लो। मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता।

शिवदत्त ने बहुत समझाया और डराया-धमकाया मगर बहादुर नाहरसिंह की नीयत न बदली। आखिर लाचार होकर शिवदत्त ने अपने हाथ से तलवार दूर फेंक दी और नाहरसिंह की पीठ ठोंककर बोला -

''शाबाश बहादुर! तुम्हारे ऐसे जवांमर्द का दिल अगर ऐसा न होगा तो किसका होगा मैं शिवदत्त नहीं हूं, कुमार का ऐयार देवीसिंह हूं, तुम्हें आजमाने के लिए आया था!''

इतना कहकर उन्होंने नाहरसिंह की मुश्कें खोल दीं और वहां से फौरन चले गये। देवीसिंह ने यह हाल दोनों कुमारों से कहकर नाहरसिंह की तारीफ की मगर बहादुर नाहरसिंह ने अपनी जिंदगी भर इस आजमाने का हाल किसी से न कहा।

दूसरे दिन देवीसिंह चुनार चले गये और कह गए कि रोहतासगढ़ की चढ़ाई का बंदोबस्त करके मैं बहुत जल्द आऊंगा।

यह जानकर कि किशोरी को रोहतासगढ़ वाले ले गये हैं कुंअर इंद्रजीतसिंह की बेचैनी हद से ज्यादे बढ़ गई। दम भर के लिए भी आराम करना मुश्किल हो गया, दो ही पहर में सूरत बदल गई। किसी का बुलाना या कुछ पूछना उन्हें जहर-सा मालूम पड़ने लगा। इनकी ऐसी हालत देख भैरोसिंह से न रहा गया, निराले में बैठे उन्हें समझाने लगा।

इंद्र - तुम्हारे समझाने से मेरी हालत किसी तरह बदल नहीं सकती और किशोरी की जान का खतरा जो मुझे लगा हुआ है किसी तरह कम नहीं हो सकता।

भैरो - किशोरी को अगर शिवदत्तगढ़ वाले ले जाते तो बेशक उसकी जान का खतरा था, क्योंकि शिवदत्त रंज के मारे बिना उसकी जान लिये न रहता, मगर अब तो वह रोहतासगढ़ के राजा के कब्जे में है और वह अपने लड़के से उसकी शादी किया चाहता है, ऐसी हालत में किशोरी की जान का दुश्मन वह क्योंकर हो सकेगा

इंद्र - मगर जबर्दस्ती किशोरी की शादी कर दी गई तब क्या होगा

भैरो - हां, अगर ऐसा हो तो जरूर रंज होगा, खैर आप चिंता न करिये, ईश्वर चाहेगा तो पांच ही सात दिन में कुल बखेड़ा तय कर देता हूं।

इंद्र - क्या किशोरी को वहां से ले आओगे

भैरो - रोहतासगढ़ के किले में घुसकर किशोरी को निकाल लाना तो दो-तीन दिन का काम नहीं, इसके अतिरिक्त क्या रोहतासगढ़ का किला ऐयारों से खाली होगा

इंद्र - फिर तुम पांच-सात दिन में क्या करोगे

भैरो - कोई ऐसा काम जरूर करूंगा जिससे किशोरी की शादी रुक जाय।

इंद्र - वह क्या

भैरो - जिस तरह बनेगा वहां के राजकुमार कल्याणसिंह को पकड़ लाऊंगा, जब हम लोगों का फैसला हो जायेगा तब छोड़ दूंगा।

इंद्र - हां अगर ऐसा करो तो क्या बात है!

भैरो - आप चिंता न कीजिए। मैं अभी यहां से रवाना होता हूं, आप किसी से मेरे जाने का हाल न कहिएगा।

इंद्र - क्या अकेले जाओगे

भैरो - जी हां।

इंद्र - वाह! कहीं फंस जाओ तो मैं तुम्हारी राह ही देखता रह जाऊं, कोई खबर देने वाला भी नहीं।

भैरो - ऐसी उम्मीद न रखिए।

कुंअर इंद्रजीतसिंह से वादा करके भैरोसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए, मगर भैरोसिंह का अकेले रोहतासगढ़ जाना इंद्रजीतसिंह को न भाया। उस समय तो भैरोसिंह की जिद से चुप हो रहे मगर उसके बाद कुमार ने सब हाल पंडित बद्रीनाथ से कहकर दोस्त की मदद के लिए जाने का हुक्म दिया। हुक्म पाते ही पंडित बद्रीनाथ भी रोहतासगढ़ रवाना हुए और रास्ते में ही भैरोसिंह से जा मिले।

दो रोज चलकर ये दोनों आदमी रोहतासगढ़1 पहुंचे और पहाड़ के ऊपर चढ़ किले में दाखिल हुए। यह बहुत बड़ा किला पहाड़ पर निहायत खूबी का बना हुआ था और इसी के अंदर शहर भी बसा था जो बड़े-बड़े सौदागरों, महाजनों, व्यापारियों और जौहरियों के कारबार से अपनी चमक-दमक दिखा रहा था। इस शहर की खूबी और सजावट का हाल इस जगह लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती और इतना समय भी नहीं है, हां मौके पर दो-चार दफे पढ़कर इसकी खूबी का हाल पाठक मालूम कर लेंगे।

1. राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने अपनी किताब जान-जहांनुमा में लिखा है - ''आरे से करीब पचहत्तर मील के दक्खिन-पश्चिम को झुकता हुआ हजार फीट ऊंचे पहाड़ के ऊपर का एक बड़ा ही मजबूत किला ''रोहतासगढ़'' जिसका असल नाम ''रोहताश्म'' है दस मील मुरब्बा की बसअत में सोन नदी के बाएं किनारे पर उजाड़ पड़ा हुआ है। उसमें जाने के वास्ते सिर्फ एक ही रास्ता दो कोस की चौड़ाई का तंग-सा बना है बाकी सब तरफ वह पहाड़, जंगल और नदियों से ऐसा घिरा हुआ है कि किसी तौर से वहां आदमी का गुजर नहीं हो सकता। उस किले के अंदर दो मंदिर अगले जमाने के अभी मौजूद हैं बाकी सब इमारतें महल, बाग, तालाब वगैरह जिनका अब सिर्फ निशान भर रह गया है मुसलमान बादशाहों के बनाये हुए हें।''

(ग्रंथकर्ता) - मगर अकबर के जमाने में जो ''बिहार'' का हाल लिखा गया है उससे मालूम होता है कि यह मुकाम मुसलमानों की अमलदारी के पहले से बना हुआ है।

इस किले के अंदर एक छोटा किला और भी था जिसमें महाराज और उनके आपस वाले रहा करते थे और लोगों में वह महल के नाम से मशहूर था।

इस पहाड़ पर छोटे झरने और तालाब बहुत हैं। ऊपर जाने के लिए केवल एक ही राह है और वह भी बहुत बारीक है। उसके चारों तरफ घना जंगल इस ढंग का है कि जरा भी आदमी कूदा और राह भूलकर कई दिन तक भटकने की नौबत आई। दुश्मनों का और किसी तरह से इस पहाड़ पर चढ़ना बहुत ही मुश्किल है और वह बारीक राह भी इस लायक नहीं कि पांच-सात आदमी से ज्यादा एक साथ चढ़ सकें। भेष बदले हुए हमारे दोनों ऐयार रोहतासगढ़ पहुंचे और वहां की रंगत देखकर समझ गये कि इस किले को फतह करने में बहुत मुश्किल पड़ेंगी।

भैरोसिंह और पंडित बद्रीनाथ मथुरिया चौबे बने हुए रोहतासगढ़ में घूमने और एक-एक चीज को अच्छी तरह देखने लगे। दोपहर के समय एक शिवालय पर पहुंचे जो बहुत ही खूबसूरत और बड़ा बना हुआ था, सभामंडल इतना बड़ा था कि सौ-डेढ़ सौ आदमी अच्छी तरह उसमें बैठ सकते थे। उसके चारों तरफ खुला-सा सहन था जिस पर कई ब्राह्मण और पुजारी बैठे धूप सेंक रहे थे। उन्हीं लोगों के पास जाकर हमारे दोनों ऐयार खड़े हो गये और गरजकर बोले - ''जै जमुना मैया की!''

पुजारियों ने हमारे दोनों चौबों को खातिदारी से बैठाया और बातचीत करने लगे।

एक पुजारी - कहिये चौबेजी, कब आना हुआ

बद्री - बस अभी चले ही तो आते हैं महाराज! पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते थक गये, गला सूख गया, कृपा करके सिल-लुढ़िया दो तो भंग छने और चित्त ठिकाने हो।

पुजारी - लीजिये, सिल-लुढ़िया लीजिये, मसाला लीजिये, चीनी लीजिये, खूब भंग छानिये।

भैरो - भंग मसाला तो हमारे साथ है, आप ब्राह्मणों का क्यों नुकसान करें।

पुजारी - नहीं, नहीं, हमारा कुछ नहीं है, यहां सब चीजें महाराज के हुक्म से मौजूद रहती हैं, ब्राह्मण परदेशी जो कोई आवे सभी को देने का हुक्म है।

बद्री - वाह-वाह, तब क्या बात है! लाइये फिर महाराज की जयजयकार मनावें!

पुजारी ने इन दोनों को सब सामान दिया और इन दोनों ने भंग बनाई, आप भी पी और पुजारियों को भी पिलाई। दोनों ऐयारों ने बातचीत और मसखरेपन से वहां के पुजारियों को अपने बस में कर लिया। बड़े पुजारी बहुत प्रसन्न हुए और बोले, ''चौबेजी महाराज, बड़े भाग्य से आप लोगों के दर्शन हुए हैं। आप लोग दो-चार रोज यहां जरूर रहिये! इसी जगह आपको महाराजकुमार से भी मिलावेंगे और आप लोगों को बहुत कुछ दिलावेंगे। महाराजकुमार बहुत ही हंसमुख, नेक और बुद्धिमान हैं। आप उन्हें देख बहुत प्रसन्न होंगे!''

बद्री - बहुत खूब महाराज, आप लोगों की इतनी कृपा है तो हम जरूर रहेंगे और आपके महाराजकुमार से भी मिलेंगे। वे यहां कब आते हैं

पुजारी - प्रातः और सायंकाल दोनों समय यहां आते हैं और इसी मंदिर में संध्या-पूजा करते हैं।

भैरो - तो आज भी उनके दर्शन होंगे

पुजारी - अवश्य।

यह मंदिर किले की दीवार के पास ही था। इसके पीछे की तरफ एक छोटी-सी लोहे की खिड़की थी जिसकी राह ये लोग किले के बाहर जंगल में जा सकते थे। पुजारी के हुक्म से भंग पीने के बाद दोनों ऐयार उसी राह से जंगल में गए और मैदान होकर लौट आये, पुजारी लोग भी उसी राह से जंगल मैदान गये।

संध्या समय महाराजकुमार भी वहां आये और मंदिर के अंदर दरवाजा बंद करके घंटे भर से ज्यादे देर तक संध्या-पूजा करते रहे। उस समय केवल एक बड़ा पुजारी उस मंदिर में तब तक मौजूद रहा जब तक महाराजकुमार नित्य नेम करते रहे। दोनों ऐयारों ने भी महाराजकुमार को अच्छी तरह देखा मगर पुजारी को कह दिया था कि आज महाराजकुमार को यह मत कहना कि यहां दो चौबे आये हैं, कल सायंकाल को हम लोगों का सामना कराना।

दोनों ऐयारों ने रात भर उसी मंदिर में गुजारा किया और अपने मसखरेपन से पुजारी महाशय को बहुत ही प्रसन्न किया, साथ ही इसके उन्हें इस बात का भी विश्वास दिलाया कि इस पहाड़ के नीचे एक बड़े भारी महात्मा आये हुए हैं, आपको उनसे जरूर मिलावेंगे, हम लोगों पर उनकी बड़ी कृपा रहती है।

सबेरे उठकर इन दोनों ने फिर भंग घोटकर पी और सभों को पिलाने के बाद उसी खिड़की की राह मैदान गये। दोनों ऐयार तो अपनी धुन में थे, महाराजकुमार को यहां से उड़ाने की फिक्र-सोच में रहे थे तथा उसी खिड़की की राह निकल जाने का उन्होंने मौका तजवीजा था, इसलिए मैदान जाते समय इस जंगल को दोनों आदमी अच्छी तरह देखने लगे कि इधर से सीधी सड़क पर निकल जाने का क्योंकर हम लोगों को मौका मिल सकता है। इस काम में उन्होंने दिन भर बिता दिया और रास्ता अच्छी तरह समझ-बूझकर शाम होते-होते मंदिर में लौट आये।

पुजारी - कहिये चौबेजी महाराज! आप लोग कहां चले गये थे

बद्री - अजी महाराज, कुछ न पूछो! जरा आगे क्या बढ़ गये बस जहन्नुम में मिल गये। ऐसा रास्ता भूले कि बस हमारा ही जी जानता है।

भैरो - ईश्वर की ही कृपा से इस समय लौट आये नहीं तो कोई उम्मीद यहां पहुंचने की न थी।

पुजारी - राम-राम, यह जंगल बड़ा ही भयानक है, कई दफे तो हम लोग इसमें भूल गये हैं और दो-दो दिन तक भटकते ही रह गये हैं, आप बेचारे तो नये ठहरे। आइये, बैठिये, कुछ जलपान कीजिये।

भैरो - अजी कहां का खाना कैसा पीना! होश तो ठिकाने ही नहीं हैं, बस भंग पीकर खूब सोवेंगे। घूमते-घूमते ऐसे थके कि तमाम बदन चूर-चूर हो गया। कृपानिधान, आज भी हम लोगों की इत्तिला कुमार से ना कीजिएगा, हम लोग मिलाने लायक नहीं हैं, इस समय तो खूब गहरी छनेगी!!

पुजारी - खैर ऐसा ही सही! (हंसकर) आइये, बैठिये तो।

दोनों ऐयारों ने भंग पी और बाकी लोगों को भी पिलाई। इसके बाद कुछ देर आराम करके बाजार में घूमने-फिरने के लिए गये और अच्छी तरह देख-भालकर लौट आये। सोते समय फिर उन्हीं महात्मा का जिक्र पुजारी से करने लगे जिनसे मिलाने का वादा कर चुके थे और यहां तक उनकी तारीफ की कि पुजारीजी उनसे मिलने के लिए जल्दी करने लगे और बोले, ''यह तो कहिये, कल आप उनके दर्शन करावेंगे या नहीं'

बद्री - जरूर, बस कुमार यहां से संध्या-पूजा करके लौट जायं तो चले चलिये, मगर अकेले आप ही चलिए, नहीं तो महात्मा बड़ा बिगड़ेंगे कि इतने आदमियों को क्यों ले आए। वह जल्दी किसी से मिलने वाले नहीं हैं।

पुजारी - हमें क्या गरज पड़ी है जो किसी को साथ ले जायें, अकेले आपके साथ चलेंगे।

भैरो - बस तभी तो ठीक होगा।

दूसरे दिन जब महाराजकुमार संध्या-पूजा करके लौट गए तो बद्रीनाथ और भैरोसिंह पुजारी को साथ ले वहां से रवाना हुए और पहाड़ के नीचे उतरने के बाद बोले, ''बस अब यहीं बूटी छान लें तब आगे चलें इसीलिए लुटिया लेता आया हूं।

पुजारी - क्या हर्ज है, बूटी छान लीजिए।

बद्री - आपके हिस्से की भी बनाऊं न

पुजारी - इस दोपहर के समय क्या बूटी पिलाइएगा! हमें तो इतनी आदत न थी, आप ही लोगों के सबब दो दिन से खूब पीने में आती है।

बद्री - क्या हर्ज है, थोड़ा-सा पी लीजिएगा।

पुजारी - जैसी आपकी मर्जी।

हमारे बहादुर ऐयारों ने एक पत्थर की चट्टान पर भंग घोंटकर पी और नजर बचा थोड़ी-सी बेहोशी की दवा मिला पुजारी को भी पिलाई। थोड़ी ही देर में पुजारीजी महाराज तो चीं बोल गए और गहरी बेहोशी में मस्त हो गए। दोनों ऐयार उन्हें उठाकर ले गए और एक झाड़ी में छिपा आए।

बद्री - अब क्या करना चाहिए

भैरो - आप यहां रहिए मैं उसी तरकीब से कुमार को उठा लाता हूं।

बद्री - अच्छी बात है, मैं अपने हाथ से इस पुजारी की सूरत तुम्हें बनाता हूं।

भैरो - बनाइए।

पुजारी की सूरत बना बद्रीनाथ को उसी जगह छोड़ भैरोसिंह लौटे। संध्या होने के पहले ही मंदिर में पहुंचे। लोगों ने पूछा, ''कहिये पुजारीजी महात्मा से मुलाकात हुई या नहीं और अकेले क्यों लौटे, चौबेजी कहां रह गए'

नकली पुजारी ने कहा - ''महात्मा से मुलाकात हुई। वाह क्या बात है, महात्मा क्या वह तो पूरे सिद्ध हैं। दोनों चौबों को बहुत मानते हैं। उन्हें तो आने न दिया मगर मैं चला आया। अब चौबेजी कल आवेंगे।''

समय पर महाराजकुमार भी आ पहुंचे और संध्या करने के लिए मंदिर के अंदर घुसे। मामूली तौर पर पुजारी के बदले में नकली पुजारी अर्थात भैरोसिंह मंदिर के अंदर रहे और कुमार के अंदर आने पर भीतर से किवाड़ बंद कर लिया। संध्या करने के समय महाराजकुमार के साथ मंदिर के अंदर घुसकर पुजारी क्या-क्या करते थे यह दोनों ऐयारों ने उनसे बातों-बातों में पहले ही दरियाफ्त कर लिया था। पुजारीजी मंदिर के अंदर बैठे कुछ विशेष काम नहीं करते थे, केवल पूजा का सामान कुमार के आगे जमा कर देते और एक किनारे बैठे रहते थे। चलती समय प्रसादी में माला कुमार को देते थे और वे उसे सूंघ आंखों से लगा उसी जगह रख चले जाते थे। आज इन सब कामों को हमारे ऐयार पुजारीजी ने ही पूरा किया।

इस मंदिर में चारों तरफ चार दरवाजे थे। आगे की तरफ तो कई आदमी और पहरे वाले बैठे रहते थे बाईं तरफ के दरवाजे पर होम करने का कुंड बना हुआ था, दाहिने दरवाजे पर फूलों के कई गमले रखे हुए थे, और पिछला दरवाजा बिल्कुल सन्नाटा पड़ता था।

मंदिर के अंदर दरवाजा बंद करके कुमार संध्या करने लगे। प्राणायाम के समय मौका जानकर नकली पुजारी ने आशीर्वाद में देने वाली फूलों की माला में बेहोशी का धूरा मिलाया। जब कुमार चलने लगे, पुजारी ने माला गले में डाली, कुमार ने उसे गले से निकाल सूंघा और माथे से लगाकर उसी जगह रख दिया।

माला सूंघने के साथ ही कुमार का सिर घूमा और वे बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। भैरोसिंह ने झटपट उनकी गठरी बांधी और पिछले दरवाजे की राह बाहर निकल आये, इसके बाद उसी छोटी खिड़की की राह किले के बाहर हो जंगल का रास्ता लिया और दो ही घंटे में उस जगह जा पहुंचे जहां पंडित बद्रीनाथ को छोड़ गये थे। वे दोनों कुमार कल्याणसिंह को ले गयाजी की तरफ रवाना हुए।

 

बयान - 6

इश्क भी क्या बुरी बला है! हाय, इस दुष्ट ने जिसका पीछा किया उसे खराब करके छोड़ दिया और उसके लिए दुनिया भर के अच्छे पदार्थ बेकाम और बुरे बना दिये। छिटकी हुई चांदनी उसके बदन में चिनगारियां पैदा करती है, शाम की ठंडी हवा उसे लू-सी लगती है, खुशनुमा फूलों को देखने से उसके कलेजे में कांटे चुभते हैं, बाग की रविशों पर टहलने से पैरों में छाले पड़ते हैं, नरम बिछावन पर पड़े रहने से हड्डियां टूटती हैं, और वह करवटें बदलकर भी किसी तरह आराम नहीं ले सकता!

खाना-पीना हराम हो जाता है, मिसरी की डली जहर मालूम होती है, गम खाते-खाते पेट भर जाता है, प्यास बुझाने के लिए आंसू की बूंदें बहुत हो जाती हैं, हजार दुख भोगने पर भी किसी की जुल्फ में उलझी हुई जान को निकल भागने का मौका हाथ नहीं लगता! दोस्तों की नसीहतें जिगर के टुकड़े-टुकड़े करती हैं, जुदाई की आग में कलेजा भुजा जाता है, बदन का खून पानी हो जाता है और इसी से उसकी भूख-प्यास दोनों ही जाती रहती हैं। जिसकी सूरत उसकी आंखों में छुपी रहती है, दरोदीवार में वही दिखाई देता है, स्वप्न में भी इठलाता हुआ वही नजर आता है। उसकी सुनी हुई बातें रात-दिन कान में गूंजा काती हैं, हंसी के समय दिखाई दिये हुए मोतियों-से दांत गले का हार बन बैठते हैं, भुलाए नहीं भूलते, जादू भरी चितवनों की याद दिल को उचाट कर देती है, गले में हाथ डालकर ली हुई अंगड़ाई बदन को दबाए देती है, उसकी याद में एक तरफ झुके हुए कभी सीधे भी नहीं होने पाते।

वे दिन-रात आंखें बंद कर हुस्न के बाग में टहला करते हैं। ठंडी सांसें आंधी का काम देती हैं। सूखे पत्ते उड़ाया करते हैं और धीरे-धीरे आप भी ऐसे सूख जाते हैं कि सांस के साथ उड़ जाने की हिम्मत बांधते हैं, मुहब्बत का गुरु चाबुक लिए हरदम पीछे मौजूद रहता है, बुदबुदाते हुए अपने चेले को कहीं ठहरने नहीं देता और न माशूक के नाम के सिवाय कोई दूसरा शब्द मुंह से निकालने देता है।

आदमी का क्या हवा तक ऐसों से दिल्लगी करती है, किवाड़ खटखटा माशूक के आने की याद दिला-दिला चुटकियां लेती है, और कभी कान में झुककर कहती है कि मैं उस गली से आई हूं जिसमें तेरा प्यारा रहता है!

बाग में टहलने के समय हवा के चपेटों में पड़ी हुई पेड़ों की टहनियां हिल-हिलकर अपने पास बुलाती हैं और जब वह पास जाता है हंसी के दो फूल गिराकर चुप हो जाती हैं जिससे उसका दिल और भी बेचैन हो जाता है और वह दोनों हाथों से कलेजा थामकर बैठ जाता है। उसके प्यारे रिश्तेदार यह हालत देख अफसोस करते हैं और उसकी नर्म अंगुलियों को हाथ में लेकर पूछते हैं कि क्या अपनी जुल्फें संवारने के लिए ये नाखून बढ़ा रखे हैं

बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि आधे घंटे तक के लिए भी ध्यान एक तरफ नहीं जमता और न एक जगह थोड़ी देर तक आराम के साथ बैठने की मोहलत मिलती है। आंखों में छिपी रहने वाली नींद भी न मालूम कहां चली जाती है और अपनी जगह टकटकी को जो दम-दम में तरह-तरह की तस्वीरें बनाने और बिगाड़ने वाली है, छोड़ जाती है।

यही हमारे कुंअर इंद्रजीतसिंह और उनकी प्यारी किशोरी की हालत है, इस समय दोनों एक-दूसरे से दूर पड़े हैं मगर मुहब्बत का भूत रंग-बिरंगी सूरत बना दोनों की आंखों में नाचा करता है और बढ़ती हुई उदासी और बेचैनी को किसी तरह कम नहीं होने देता।

रोहतासगढ़ महल में रहने वाली जितनी औरतें हैं सभी के किशोरी की खातिरदारी का ध्यान रहने पर भी किशोरी की उदासी किसी तरह कम नहीं होती। यद्यपि उसे यहां किसी तरह की भी तकलीफ नहीं थी मगर कलेजे को टुकड़े-टुकड़े करने वाली बात एक सायत के लिए भी उसके दिल से नहीं भूलती थी जो उसने यहां आने के साथ ही पीठ पर हाथ फेरते हुए महाराज के मुंह से सुनी थी, अर्थात - ''यह तो मेरी पतोहू होने लायक है!''

यों तो ऊंचे दर्जे की औरतों के जिद करने से लाचार होकर जनाने नजरबाग में किशोरी को टहलना ही पड़ता था मगर वहां की कोई चीज उस बेचारी के जी को ढाढ़स नहीं दे सकती थी। खिले हुए गुलाब के फूल पर नजर पड़ते ही वह मुर्झा जाती, नर्गिस की तरफ देखते ही उसकी शर्मीली आंखें पलकों की चिलमन में छिप जातीं, सरों के पास पहुंचते ही वह गम के बोझ से झुक जाती और खुशनुमा फूलों से लदी हुई पेचीली लतायें उसके सामने पड़कर कुंअर इंद्रजीतसिंह की सुंबली जुल्फों की याद दिलातीं जिसमें उलझी हुई उसकी जान को जीते जी छूटने की उम्मीद न थी।

रविशों को वह यार की जुदाई का मैदान समझती, छोटे-छोटे रंगीन फूलों से भरे हुए पेड़ों की क्यारियों को वह घना जंगल जानती और गूंजते हुए भौंरों की आवाज उसके कानों में झिल्ली की झनकार मालूम होती जो जंगल में बिना मौसम पर ध्यान दिये बारहों महीने बोला और इत्तिफाक से आ पड़े हुए नाजुक-बदनों के कलेजों को दहलाया करती है।

नर्म हवा के झोंकों से हिलती हुई रंग-बिरंगी खूबसूरत पत्तियों को देखते ही वह कांप जाती, सुंदर और साफ मोती-सरीखे जल से भरे और बहते हुए बनावटी झरने के पास पहुंचते ही उसका दिल डूब जाता, छूटते हुए फव्वारे पर नजर पड़ते ही कलेजा मुंह को आता और आंखों से टपाटप आंसू की बूंदें गिरने लगतीं जिन्हें देख तरह-तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली बाग की नाजुक चिड़ियों से चुप न रहा जाता और वे बोल उठतीं - ''हाय-हाय! इस बेचारी का दिल किसी की जुदाई में खून हो गया और वह खून पानी होकर आंखों की राह निकला जाता है।''

उन कुछ जवान, नाजुक और चंचल औरतों को जो किशोरी के साथ रहने पर मुस्तैद की गई थीं उसकी हालत पर अफसोस आता मगर लाचार थीं क्योंकि उन्हें अपनी जान बहुत प्यारी थी।

रात के समय जब किशोरी अपने को अकेली पाती, तरह-तरह की बातें सोचा करती। कभी तो वह निकल भागने की तरकीब सोचती मगर अनहोनी जान उधर से खयाल को लौटाकर अपने प्यारे इंद्रजीतसिंह की तरफ ध्यान लगाती और कहती कि क्या वे मेरी मदद न करेंगे और मुझे यहां से न छुड़ावेंगे नहीं, जरूर छुड़ावेंगे, मगर कब जब उन्हें यह खबर होगी कि किशोरी फलानी जगह कैद है। हाय-हाय! कहीं ऐसा न हो कि खबर होते-होते तक मुझे यह दुनिया छोड़ देनी पड़े और दिल के अरमान दिल ही में ले जाने पड़ें। नहीं, अगर मेरे साथ जबर्दस्ती की जायगी तो जरूर ऐसा करूंगी और सिवाय उसके जिसके ऊपर न्योछावर हो चुकी हूं, दूसरे की न कहलाऊंगी, ऐसी नौबत आने के पहले ही शरीर छोड़ उनसे जा मिलूंगी, कोई ताकत ऐसी नहीं जो ऐसा करने से मुझे रोक सके। हे ईश्वर! क्या तू उन आफत के परकाले ऐयारों को यहां का रास्ता न बतावेगा जो कुमार के लिए जान तक दे देने को हरदम मुस्तैद रहते हैं

एक रात वह इसी सोच-विचार में पड़ी थी कि सबेरा हो गया और कमरे के बाहर से एक ऐसी आवाज उसके कान में आई कि वह चौंक पड़ी। उसके फैले हुए खयाल इकट्ठे हो गये, साथ ही कुछ-कुछ खुशी उसके चेहरे पर झलकने लगी। वह आवाज यह थी -

''यह काम बेशक वीरेंद्रसिंह के ऐयारों का है।''

किशोरी उठ खड़ी हुई और कमरे के बाहर निकलने पर घंटे ही भर में उसे मालूम हो गया कि कुंअर कल्याणसिंह को वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग ले भागे।

अब किशोरी को अपने छूटने की कुछ-कुछ उम्मीद हुई और वह दिन भर इसी खयाल में डूबी रहने लगी कि देखें इसके आगे क्या होता है।

 

बयान - 7

आधी रात से ज्यादे जा चुकी है, किशोरी अपने कमरे में मसहरी पर लेटी हुई न मालूम क्या-क्या सोच रही है, हां उसकी डबडबाई हुई आंखें जरूर इस बात की खबर देती हैं कि उसके दिल में किसी तरह का द्वंद्व मचा हुआ है। उसकी आंखों में नींद बिल्कुल नहीं है, घड़ी-घड़ी करवटें बदलती और लंबी सांसें लेकर रह जाती है।

यकायक कमरे के बाहर से कोई तड़पा देने वाली आवाज उसके कान में आई जिसके सुनते ही यह बेचैन हो गई, किसी तरह लेटी रह न सकी, पलंग से नीचे उतर पड़ी और दरवाजा खोल बाहर इधर-उधर देखने लगी। वह आवाज किसी के सिसककर रोने की थी।

कमरे के बाहर आठ दर का दालान था जहां एक खंभे के सहारे खड़ी बिलख-बिलखकर रोती हुई एक कमसिन औरत को किशोरी ने देखा। खंभे और उस औरत पर चांदनी अच्छी तरह पड़ रही थी। पास जाने से मालूम हुआ कि सर्दी से कांप रही है क्योंकि कोई भारी कपड़ा उसके बदन पर न था जिससे सर्दी का बचाव होता।

किशोरी का दिल तो पहले ही से जख्मी हो रहा था, वह इस तरह से बिलख-बिलख किसी को रोते कब देख सकती थी! जाते ही उस औरत का हाथ थाम लिया और पूछा -

''तुम पर क्या आफत आई है जो इस तरह बिलख-बिलखकर रो रही हो'

औरत - हाय, मेरे ऊपर वह आफत आई है जो किसी तरह टल नहीं सकती!

किशोरी उसे अपने कमरे में ले आई और अपने पास फर्श पर बैठाकर बातचीत करने लगी। इस औरत की उम्र अठारह वर्ष से ज्यादे न होगी। यह हर तरह से खूबसूरत और नाजुक थी, इसके बदन में जो कुछ जेवर था उसके देखने से साफ मालूम होता था कि यह जरूर किसी बड़े खानदान की लड़की है।

किशोरी - मैं उम्मीद करती हूं कि अपने दिल का हाल साफ-साफ मुझसे कहोगी और मुझे बहिन समझकर कुछ न छिपाओगी।

औरत - बहिन, मैं जरूर अपना हाल तुमसे कहूंगी क्योंकि तुम भी उसी बला में फंसी हो जिसमें मैं।

किशोरी - (चौंककर) क्या मेरी ही तरह से तुम पर भी जुल्म किया गया है

औरत - बेशक।

किशोरी - (लंबी सांस लेकर) हे ईश्वर! मैंने तो किसी के साथ बुराई नहीं की थी, फिर क्यों यह दुख भोग रही हूं!!

औरत - मगर मैं अब इस जगह ठहर नहीं सकती!

किशोरी - सो क्यों क्या किसी तरह का खौफ मालूम होता है

औरत - नहीं - नहीं, डर किसी बात का नहीं है, पर इस समय मुझे किसी की मदद से निकल भागने की उम्मीद है, इसीलिए अपने कमरे से निकल यहां तक आई थी।

किशोरी - क्या कोई तरकीब निकाली गई है

औरत - हां, और अगर चाहो तो तुम भी मेरे साथ यहां से भाग सकती हो। इसी राज्य का एक जबर्दस्त आदमी आज हमारी मदद करेगा।

यह सुनकर किशोरी बहुत ही खुश हुई। वह औरत कौन है, उसका नाम क्या है, उस पर क्या दुख पड़ा है यह सब पूछना तो बिल्कुल भूल गई और निकल भागने की खुशी में उस औरत का हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर प्रेम से उसकी तरफ देख पूछने लगी, ''क्या तुम्हारी मदद से मेरा भी छुटकारा यहां से हो सकता है'

औरत - जरूर हो सकता है मगर अब देर न करनी चाहिए।

इसके जवाब में किशोरी कुछ कहा ही चाहती थी कि सामने का दरवाजा खुला और एक हसीन औरत अंदर आती हुई दिखाई पड़ी। इसकी अवस्था लगभग बीस वर्ष के होगी, सफेद गेहूं का-सा रंग, कद न लंबा न नाटा, बदन साफ और सुडौल, नमकीन चेहरा, रस भरी आंखें, नाक में एक हीरे की कील के अलावे दो-चार मामूली गहने पहिरे हुए थी, तो भी वह इस लायक थी कि ऊंचे दर्जे के खूबसूरती की पंक्ति में बैठ सके। इसे देखते ही वह औरत जो किशोरी के पास बैठी थी चौंकी और उसकी तरफ देखकर बोली, ''लाली, इस समय तुम्हारा यहां आना मुझे ताज्जुब में डालता है!''

लाली - लेकिन यह सुनकर तुम्हें और भी ताज्जुब होगा कि मैं तुम्हारे पंजे से बेचारी किशोरी की जान बचाने के लिए आई हूं।

इतना सुनते ही उस औरत का रंग-ढंग बिल्कुल बदल गया। उसके चेहरे पर जो अभी तक उदासी छाई हुई थी बिल्कुल जाती रही ओैर तमतमाहट आ मौजूद हुई, उसकी आंखें भी जो डबडबाती हुई थीं खुश्क हो गईं और उनमें गुस्से की सुर्खी दिखाई देने लगी, वह इस निगाह से लाली को देखने लगी जैसे उस पर किसी तरह की हुकूमत रखती हो।

लाली को किशोरी भी पहचानती थी, क्योंकि यह उन हसीनों में से थी जो किशोरी का दिल बहलाने और उसकी हिफाजत करने के लिए तैनात की गई थीं।

हुकूमत भरी निगाहों से कई सायत तक लाली की तरफ देखने के बाद वह औरत फिर बोली -

''लाली, क्या तू आज पागल हो गई है जो मेरे सामने इस तरह से बेअदब होकर बोलती है'

लाली - तू कौन है जो तेरे साथ अदब का बर्ताव करूं

औरत - (खड़ी होकर) तू नहीं जानती कि मैं कौन हूं

लाली - कुंदन, मैं तुझे खूब जानती हूं, मगर तू यह नहीं जानती कि तेरी नकेल मेरे हाथ में है जिससे तू मेरा कुछ नहीं कर सकती और न अपनी बेईमानी का जाल ही बेचारी किशोरी पर फैला सकती है!

इतना सुनते ही वह औरत जिसका नाम कुंदन था लाल हो गई और अपने जोश को किसी तरह सम्हाल न सकी, छुरा जो कमर में छिपाये हुए थी हाथ में ले लिया और मारने के लिए लाली की तरफ झपटी। मगर लाली ने झट अपने बगल से एक नारंगी निकालकर उसे दिखाई और पूछा, ''क्या तू भूल गई कि इसमें कै फांकें हैं'

नारंगी देखने के साथ ही और लाली के मुंह से निकले हुए शब्दों को सुनते ही उसका जोश जाता रहा और घबराहट से उसका रंग बिल्कुल उड़ गया और वह एक चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ी।

 

बयान - 8

रोहतासगढ़ किले के सामने पहाड़ी से कुछ दूर हटकर वीरेंद्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। चारों तरफ फौजी आदमी अपने-अपने काम में लगे हुए दिखाई देते हैं। कुछ फौज आ चुकी और बराबर चली ही आती है। बीच में राजा वीरेंद्रसिंह का कारचोबी खेमा शान-शौकत के साथ खड़ा है, उसके दोनों बगल कुंअर इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह का खेमा है, सामने और पीछे की तरफ दुपट्टी बड़े-बड़े सरदारों और बहादुरों का डेरा पड़ा है। बाजार लगने की तैयारियां हो रही हैं, लड़ाई का सामान इतना इकट्ठा हो रहा है कि देखने से दुश्मनों का कलेजा दहल जाय।

डेरा खड़ा होने के दूसरे दिन कुंअर इंद्रजीतसिंह, आनंदसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह, तारासिंह, जगन्नाथ ज्योतिषीजी, फतहसिंह (पुराने सेनापति जो नौगढ़ में थे) और नाहरसिंह इत्यादि को साथ लिये राजा वीरेंद्रसिंह भी आ पहुंचे और सब लोग अपने-अपने खेमे में उतरे। पन्नालाल गयाजी में ओैर रामनारायण तथा चुन्नीलाल चुनारगढ़ में रखे गये। इस लड़ाई के लिए सेनापति की पदवी नाहरसिंह को दी गई। तीसरे दिन और भी फौज आ जाने पर पांच झंडे, पचास हजार फौज का निशान खड़ा किया गया। बहादुरों के चेहरों पर खुशी मालूम होती थी, सब इसी फिक्र में थे कि जहां तक हो लड़ाई जल्दी छिड़ जाये और बेशक एक ही दो दिन में लड़ाई छिड़ जाने की उम्मीद थी मगर वीरेंद्रसिंह के लश्कर पर यकायक ऐसी आफत आ पड़ी कि कुछ दिनों तक लड़ाई रुकी रही। इस आफत के आने का किसी को स्वप्न में भी गुमान न था जिसका हाल हम आगे चलकर लिखेंगे।

राजा दिग्विजयसिंह का पत्र लेकर उनका एक ऐयार वीरेन्द्रिसिंह के पास आया। वीरेंद्रसिंह ने पत्र लेकर मुंशी को पढ़ने के लिये दिया, उसमें जो कुछ लिखा था उसका संक्षेप यह है -

''हमारे - आपके बीच कभी की दुश्मनी नहीं, तो भी न मालूम आपस में लड़ने या बिगाड़ पैदा करने का इरादा आपने क्यों किया खैर इसका सबब जो कुछ हो हम नहीं कह सकते मगर इतना याद रखना चाहिए कि पचास वर्ष लड़कर भी यह किला आप हमसे नहीं ले सकते। अगर हम चुपचाप बैठे रहें तो भी आप हमारा कुछ नहीं कर सकते, फिर भी हम आपसे लड़ेंगे और मैदान में निकलकर बहादुरी दिखायेंगे। अगर आपको अपनी बहादुरी या जवांमर्दी का घमंड है तो फौज की जान क्यों लेते हैं, एक पर एक लड़ के फैसला कर लीजिये। बहादुरों की कार्रवाई देखने के बाद हमसे और आपसे द्वंद्व-युद्ध हो जाये, आप हम पर फतह पाइये तो यह राज्य आपका हो जाय, नहीं तो आप हमारे मातहत समझे जायें। अफसोस, इस समय हमारा लड़का मौजूद नहीं है, अगर होता तो आपके दोनों लड़कों से वह अकेला ही भिड़ जाता।''

इस पत्र के जवाब में जो कुछ राजा वीरेंद्रसिंह ने लिखा हम उसका भी संक्षेप नीचे लिख देते हें -

''आप हमारे राज्य में घुसकर किशोरी को ले गये क्या यह आपकी जबर्दस्ती नहीं है क्या इसे लड़ाई की बुनियाद कायम करना नहीं कह सकते हां, अगर आप किशोरी को इज्जत के साथ हमारे पास भेज दें तो हम बेशक अपने घर लौट जायेंगे। नहीं तो याद रहे हम इस किले की एक-एक ईंट उखाड़कर फेंक देंगे जिसकी मजबूती पर घमंड करते हैं। हम लोग आपसे द्वंद्व-युद्ध करने के लिए भी तैयार हैं, जिसका जी चाहे एक पर एक लड़के हौसला निकाल ले। आपका लड़का मेरे यहां कैद है, यदि आप किशोरी को हमारे पास भेज दें तो हम उसे छोड़ने के लिए तैयार हैं।''

इस पत्र के जवाब में रोहतासगढ़ के किले से तोप की एक आवाज आई। अब लड़ाई में किसी तरह का शक न रहा। दोनों तरफ के ऐयार अपनी-अपनी कार्रवाई दिखाने पर मुस्तैद हो गये और उन लोगों ने जो कुछ किया उसका हाल आगे चलकर मालूम होगा।

रोहतासगढ़ किले के अंदर राजमहल की अटारियों पर चढ़ी हुई बहुत-सी औरतें उस तरफ देख रही हैं जिधर वीरेंद्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। कुंअर कल्याणसिंह के गिरफ्तार हो जाने से किशोरी को एक तरह निश्चिंत-सी हो गई थी क्योंकि ज्यादे डर उसे अपनी शादी उसके साथ हो जाने का था, अपने मरने की उसे जरा भी परवाह न थी। हां, कुंअर इंद्रजीतसिंह की याद वह एक सायत के लिए भी नहीं भुला सकती थी जिनकी तस्वीर उसके कलेजे में खिंची हुई थी। वीरेंद्रसिंह की चढ़ाई का हाल सुन, उसे बड़ी खुशी हुई और वह भी अपनी अटारी पर चढ़कर हसरत भरी निगाहों से उस तरफ देखने लगी जिधर वीरेंद्रसिंह की फौज पड़ी हुई थी। चाहे यहां से बहुत दूर हो तो भी किशोरी की निगाहें वहां तक पहुंच और भीड़ में घुस-घुसकर किसी को ढूंढ़ निकालने की कोशिश कर रही थीं। इस समय किशोरी के साथ ही लाली थी जिसने आज कई दिन हुए किशोरी के कमरे में कुंदन को नारंगी दिखाकर डरा दिया था।

लाली किशोरी की निगहबानी पर रखी गई थी तो भी वह किशोरी पर मेहरबानी रखती थी। किशोरी ने नारंगी वाले भेद को जानने की कई दफे कोशिश की मगर पता न लगा। उस दिन के बाद कई दफे कुंदन से भी मुलाकात हुई मगर पूछने पर उसने ऐसी कोई बात न कही जिससे किशोरी का शक दूर हो जाय। नित्य एक घर में रहने पर भी लाली और कुंदन में फिर किसी तरह की दुश्मनी न दिखाई पड़ी। इस बात ने किशोरी के ताज्जुब को और भी बढ़ा रखा था।

इस समय किशोरी के साथ सिवाय लाली के दूसरी कोई और औरत न थी। ये दोनों वीरेंद्रसिंह के लश्कर की तरफ बड़े गौर से देख रही थीं कि यकायक किशोरी को फिर वही नारंगी वाली बात याद आई और थोड़ी देर तक सोचने के बाद वह लाली से पूछने लगी।

किशोरी - लाली, उस दिन की बात जब मैं याद करती हूं, उस पर विचार करती हूं तो कुंदन की दगाबाजी साफ झलक जाती है। कुंदन अगर सच्ची होती तो तुम्हें मारने के लिए न झपटती या हकीकत में अगर वह उस समय यहां से भाग जाने वाली होती तो उसके काम में विघ्न पड़ जाने से उसे रंज होता, सो उसके बदले में वह खुश दिखाई देती है।

लाली - नहीं, वह एकदम से झूठी भी नहीं है।

किशोरी - क्या उसकी बातों का कोई हिस्सा सच भी था?

लाली - जरूर था।

किशोरी - वह क्या?

लाली - यही कि वह भी इस किले में उसी काम के लिए लाई गई है जिस काम के लिए आप लाई गई हैं।

किशोरी - यानी तुम्हारे राजकुमार से ब्याहने के लिए!

लाली - हां।

किशोरी - अच्छा उसकी और कौन-सी बात सच थी

लाली - इन सब बातों को पूछकर क्या करोगी, इस भेद के खुलने से बहुत बड़ी बुराई पैदा होगी।

किशोरी - नहीं-नहीं, मेरी प्यारी लाली, मेरी जुबान से वह बात कोई दूसरा कभी नहीं सुन सकता और मैं उम्मीद करती हूं कि तुम मुझसे उसका हाल साफ-साफ कह दोगी। उस दिन से मुझे विश्वास हो गया है कि तुम मेरी दर्दशरीक हो, अस्तु अगर मेरा खयाल ठीक है तो तुम उसका हाल मुझे जरूर बता दो जिससे मैं हरदम होशियार रहूं।

लाली - अब वह तुम्हारे साथ बुराई कभी न करेगी।

किशोरी - तो भी मेहरबानी करके...

लाली - खैर बता देती हूं, मगर खबरदार, इसका जिक्र किसी दूसरे के सामने कभी मत करना!

किशोरी - ऐसा मैं कदापि नहीं कर सकती और तुम खुद ही जानती हो कि इस महल में सिवाय तुम्हारे कोई भी ऐसा नहीं है कि जिससे में दो बातें करती होऊं।

लाली - अच्छा तो सिवाय उस बात के जो मैं ऊपर कह चुकी हूं बाकी कुल बातें उसकी झूठ थीं। वह इस मकान से भागना नहीं चाहती थी, वह तो हमारे कुमार के साथ ब्याह होने की उम्मीद में खुश है, मगर जिस दिन से तुम आई हो, उस दिन से वह फिक्र में पड़ गई है क्योंकि वह खूबसूरती और इज्जत में तुमको अपने से बहुत बढ़ के समझती है और हकीकत में ऐसा ही है। उसे यह खयाल सता रहा है कि राजकुमार से पहले किशोरी की शादी हो लेगी तब मेरी होगी और ऐसी अवस्था में किशोरी बड़ी रानी कहलावेगी और उसी के लड़के गद्दी के मालिक समझे जायेंगे, इसी से वह इस फिक्र में थी कि तुम्हें मार डाले मगर किसी ऐसे ठिकाने पर ले जाकर जिससे उस पर कोई शक न कर सके।

किशोरी - छिः-छिः!

लाली - मगर अब वह तुम्हारे साथ बुराई नहीं कर सकती।

किशोरी - और वह नारंगी वाला भेद क्या है

लाली - वह मैं नहीं कह सकती। मगर तुम उसी से क्यों नहीं पूछतीं, अब तो वह हरदम तुम्हारी खुशामद किया करती है।

किशोरी - मैं उससे पूछ चुकी हूं।

लाली - उसने क्या कहा

किशोरी - उसने कहा कि लाली ने नारंगी दिखाकर यह नसीहत की कि देखो इसमें कई फांकें हैं, मगर एक साथ रहने और छिलके से ढंके रहने के कारण एक ही गिनी जाती है, कोई कह नहीं सकता कि इसमें कै फांकें हैं, इसी तरह हम लोगों को भी रहना चाहिए।

लाली - ठीक तो कहा।

किशोरी - वाह-वाह! तुमने तो उसी का साथ दिया, एकदम छोकरी बनाकर भुलावा देने लगीं!

लाली - (हंसकर) खैर घबराओ मत सब मालूम हो जायगा।

इतने में सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आहट मालूम हुई और दोनों उस तरफ देखने लगीं। कुंदन ने पहुंचकर दोनों को सलाम किया और हंसी-हंसी में लाली की तरफ देखकर बोली, ''एक आदमी तुम्हें खोजता हुआ आया है, वह कहता है कि लाली ने मेरी किताब चुराई है, वह किताब जो किसी के खून से लिखी गई है।''

कुंदन के इन शब्दों में न मालूम क्या भेद भरा हुआ था कि सुनने ही से लाली का रंग उड़ गया। खौफ के मारे उसके तमाम बदन में कंपकंपी पैदा हो गई और मालूम होता था कि किसी ने उसके बदन का खून खींच लिया है। थोड़ी देर तक वह अपने हवास में न रही अंत में हाथ जोड़ के उसने कुंदन से कहा -

लाली - कुंदन, मुझसे बड़ी भूल हुई, मुझ पर रहम खा, मैं तमाम उम्र तेरी लौंडी बनकर रहूंगी!

कुंदन - क्या गुलामी की दस्तावेज मेरे आंचल पर लिख देगी

कुंदन के इस दूसरे जुमले ने लाली को एकदम ही बदहवास कर दिया। अबकी दफे वह अपने को किसी तरह न सम्हाल सकी, उसका सिर घूमने लगा और वह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी।

लाली का यह हाल देख कुंदन चुपचाप वहां से चली गई, मगर उसकी सूरत से मालूम होता था कि वह अपनी कार्रवाई पर खुश है या उसने लाली के ऊपर अपनी हुकूमत पैदा कर ली है। उसका मुंह सिकोड़कर सिर हिलाना कहे देता था कि वह लाली पर कुछ और भी जुल्म किया चाहती है।

बेचारी किशोरी का अजब हाल था। नारंगी वाला भेद जानने के लिये वह पहले ही परेशान थी, अब इस दूसरे भेद ने और भी कलेजा ऐंठ दिया। उसने बड़ी मुश्किल से अपने को सम्हाला और लाली को उसी तरह छोड़ छत के नीचे उतर आई तथा अपने कमरे से एक गिलास जल लाकर लाली के मुंह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में लाली होश में आई और बिना कुछ बात किये रोती हुई अपने रहने की जगह में चली गई और किशोरी भी अपने कमरे की तरफ रवाना हुई।

जिस कमरे में किशोरी रहती थी वह एक खुशनुमा बाग के बीचोंबीच में था। इस बाग के चारों कोनों में छोटी-छोटी चार इमारतें और भी थीं, एक में वे कुल औरतें रहती थीं जो किशोरी की हिफाजत के लिए मुकर्रर की गई थीं। उन औरतों की अफसर लाली थी। दूसरे मकान में दो-तीन लौंडियों के साथ लाली रहती थी। तीसरा मकान अमीराना ठाठ से रहने के लिए कुंदन को मिला हुआ था, चौथे मकान में जो सबसे छोटा था ताला बंद था मगर बारी-बारी से कई औरतें नंगी तलवार लिये उसके दरवाजे पर पहरा दिया करती थीं। यह बाग जनाने महल में था और किसी गैर का यहां आना या यहां से किसी का निकल भागना मुश्किल था।

 

बयान - 9

आधी रात का समय है, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, राजा वीरेंद्रसिंह के लश्कर में पहरा देने वालों के सिवाय सभी आराम की नींद सोये हुए हें, हां थोड़े से फौजी आदमियों का सोना कुछ विचित्र ढंग का है जिन्हें न तो जागा ही कह सकते हैं और न सोने वालों में ही गिन सकते हैं, क्योंकि ये लोग जो गिनती में एक हजार से ज्यादा न होंगे लड़ाई की पोशाक पहिरे और उम्दे हरबे बदन पर लगाये लेटे हुए हें। जाड़े का मौसम है मगर कोई ऐसा कपड़ा जो बखूबी सर्दी को दूर कर सके ओढ़े हुए नहीं हैं, इसलिए तेज हवा के साथ मिली हुई सर्दी उन्हें नीद में मस्त होने नहीं देती।

राजा वीरेंद्रसिंह के खेमे की चौकसी फतहसिंह कर रहे हैं, खुद तो दरवाजे के आगे एक चौकी पर बैठे हुए हैं मगर मातहत के सिपाही खेमे के चारों तरफ नंगी तलवारें लिए घूम रहे हैं। कुंअर इंद्रजीतसिंह के खेमे की चौकसी कंचनसिंह और आनंदसिंह के खेमे की हिफाजत नाहरसिंह सिपाहियों के साथ कर रहे हैं।

जब आधी रात से ज्यादे जा चुकी, एक आदमी कुंअर इंद्रजीतसिंह के खेमे के दरवाजे पर आया और कंचनसिंह को सलाम करके पास आ खड़ा हो गया। यह आदमी लंबे कद का और मजबूत मालूम होता था, सिर पर मुंड़ासा बांधे और ऊपर से एक काश्मीरी स्याह चौगा डाले हुए था।

कंचन - तुम कौन हो और क्यों आये हो

आदमी - मैं रोहतासगढ़ किले का रहने वाला हूं और किशोरीजी का संदेशा लेकर आया हूं।

कंचन - क्या संदेशा है

आदमी - हुक्म है कि कुमार के सिवाय और किसी से न कहूं।

कंचन - कुमार तो इस समय सोये हुए हैं!

आदमी - अगर आप मेरा आना जरूरी समझते हो तो मुझे खेमे के अंदर ले चलिए या कुमार को उठाकर खबर कर दीजिये।

कंचन - (कुछ सोचकर) बेशक ऐसी हालत में कुमार को जगाना ही पड़ेगा, कहो, तुम्हारा नाम क्या है

आदमी - मैं अपना नाम नहीं बता सकता मगर कुमार मुझे अच्छी तरह जानते हैं, आप अपने साथ मुझे खेमे के अंदर ले चलिए, आंख खुलते ही मुझे पहचान लेंगे, आपको कुछ कहने की जरूरत न पड़ेगी!

कंचनसिंह उस आदमी को लेकर खेमे के अंदर घुसा, आगे-आगे कंचनसिंह और पीछे-पीछे वह आदमी। जब दोनों खेमे के मध्य में पहुंचे तो उस आदमी ने अपने कपड़े के अंदर से एक भुजाली निकालकर धोखे में पड़े हुए बेचारे कंचनसिंह की गरदन पर पीछे से इस जोर से मारी कि खट से सिर कटकर दूर जा गिरा, बेचारे के मुंह से कोई आवाज तक न निकल पाई। इसके बाद वह भुजाली पोंछ अपनी कमर में रखी और नींद में मस्त सोए हुए कुंअर इंद्रजीतसिंह के पास आकर खड़ा हो गया, कमर से एक शीशी निकाली और बहुत सम्हलकर कुमार की नाक से लगाई। इस शीशी में तेज बेहोशी की दवा थी। कुमार के बेहोश हो जाने के बाद उसने अपनी कमर से एक लोई खोली और उसमें उनकी गठरी बांध दरवाजे पर परदे के पास आकर देखने लगा कि आगे की तरफ सन्नाटा है या नहीं।

इस समय पहरे वाले गश्त लगाते हुए खेमे के पीछे की तरफ निकल गये थे। आगे सन्नाटा पाकर उसने कुमार की गठरी उठाई और खेमे के बाहर हो अपने को बचाता हुआ लश्कर से निकल गया। लश्कर से कुछ दूर पर एक रथ खड़ा था जिसमें दो मजबूत मुश्की रंग के घोड़े जुते हुए थे, कोचवान तैयार बैठा था, गठरी खोलकर कुमार को उसी पर लेटा दिया और खुद भी सवार हो रथ हांकने का हुक्म दिया।

रथ थोड़ी ही दूर गया था कि सारथी को मालूम हो गया कि पीछे कोई सवार आ रहा है। उसने घबड़ाकर अंदर बैठे हुए आदमी से कहा कि कोई सवार बराबर रथ के साथ चला आ रहा है।

रथ और तेज किया गया मगर सवार ने पीछा न छोड़ा। सुबह होते-होते रथ बहुत दूर निकल गया और ऐसी जगह पहुंचा जहां सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। तब वह सवार घोड़ा बढ़ाकर रथ के बराबर आया और बोला, ''बस अब रथ रोक लो!''

सारथी - तुम कौन हो जो तुम्हारे कहने से रथ रोका जाय!

सवार - हम तुम्हारे बाप हैं! बस खबरदार, अब रथ आगे न बढ़ने पावे!!

इस सवार के हाथ में एक बरछी थी। जब सारथी ने उसकी बात न सुनी तो लाचार हो उसने बरछी मारी। चोट खाकर सारथी जमीन पर गिर पड़ा। रथ के घोड़े भड़ककर और तेजी के साथ भागे और पहिया सारथी के ऊपर से होकर निकल गया।

सवार ने घोड़े को बरछी मारी, एक घोड़ा जख्मी होकर गिर पड़ा, दूसरा घोड़ा भी रुक गया। वह आदमी जो रथ के अंदर बैठा था कूदकर तलवार खींचकर सवार के सामने आ खड़ा हुआ। बात की बात में सवार ने उसे भी बेजान कर दिया और घोड़े के नीचे उतर पड़ा। यह सवार नकाबपोश था।

बरछी गाड़कर सवार ने घोड़े को उसके साथ बांध दिया और बड़ी होशियारी से कुंअर इंद्रजीतसिंह को रथ से नीचे उतारा। सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। कुमार को उठाकर जंगल में ले गया और एक सलाई के पेड़ के नीचे रख लौट आया और अपने घोड़े पर सवार हो फिर उसी जगह पहुंचने के बाद कुमार के पास बैठ उनको होश में लाने की फिक्र करने लगा।

सुबह की ठंडी हवा लगने पर कुमार होश में आये और घबड़ाकर उठ बैठे। सवार तलवार खींच सामने खड़ा हो गया। कुमार भी संभलकर खड़े हो गये और बोले -

कुमार - क्या तुम हमें यहां लाये हो?

सवार - नहीं, कोई दूसरा ही आपको लिये जाता था, मैंने छुड़ाया है।

कुमार - (चारों तरफ देखकर) जब तुमने मुझे दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है तो स्वयं तलवार लेकर सामने क्यों खड़े हो गये?

सवार - आपकी बहादुरी और दिलावरी की बहुत कुछ तारीफ सुनी है, लड़ने का हौसला रखता हूं।

कुमार - मेरे पास कोई हरबा न होने पर भी लड़ने को तैयार हूं, वार करो!

सवार - जो आदमी रथ पर सवार करके आपको लिए जाता था उसकी ढाल-तलवार मैं ले आया हूं, (हाथ का इशारा करके) वह देखिए, आपके बगल में मौजूद है, उठा लीजिए और मुकाबला कीजिए। मैं खाली हाथ आपसे लड़ना नहीं चाहता।

कुंअर इंद्रजीतसिंह ढाल-तलवार उठा पैंतरे के साथ उस नकाबपोश सवार के मुकाबिले में खड़े हो गए। थोड़ी देर तक लड़ाई होती रही। कुमार को मालूम हो गया कि यह दुश्मनी के तौर पर नहीं लड़ता। ललकार के बोले, ''तुम लड़ते हो या खिलवाड़ करते हो'

सवार - कोई दुश्मनी तो आपसे है नहीं!

कुमार - फिर लड़ने को तैयार क्यों हुए?

सवार - इसलिए कि आपके बदन में जरा फुर्ती आये, बहुत देर तक बेहोश पड़े रहने से रगों में सुस्ती आ गई होगी। अगर आपसे दुश्मनी रहती तो आपको दुश्मन के हाथ से ही क्यों बचाते

कुमार - तो क्या तुम हमारे दोस्त हो?

सवार - मैं यह भी नहीं कह सकता।

कुमार - जरूर तुम हमारे दोस्त हो अगर दुश्मन के हाथ से हमें बचाया।

सवार - क्या इस बारे में आपको कोई शक है कि मैंने आपकी जान बचाई!

कुमार - जरूर शक है। मैं कैसे विश्वास कर सकता हूं कि तुम मुझे यहां लाए हो या कोई दूसरा।

सवार - इसके लिए मैं तीन सबूत दूंगा। एक तो अगर मैं दुश्मन होता तो बेहोशी में आपको मार डालता।

कुमार - बेशक और दो सबूत कौन से हैं?

सवार - जरा ठहरिए, मैं अभी आता हूं तो ये दोनों सबूत भी देता हूं।

इतना कह वह नकाबपोश सवार झट अपने घोड़े पर सवार हुआ और वहां पहुंचा जहां वह रथ था जिस पर कुमार लाए गए थे। एक घोड़ा मरा हुआ पड़ा था, दूसरा बागडोर से बंधा अलग खड़ा था, उस ऐयार की लाश भी उसी जगह पड़ी हुई थी जो कुमार को बेहोश करके उठा लाया था। पीछे की तरफ थोड़ी दूर पर सारथी की लाश थी।

वह नकाबपोश सवार अपने घोड़े से उतर पड़ा और जोर लगाकर किसी तरह उस रथ को उलट दिया जो अभी तक खड़ा था। फिर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए उसकी निगाह सारथी की लाश पर पड़ी, वहां गया और उस लाश को घसीट लाकर रथ के पास रख दिया और फिर कुछ सोचकर धीरे से बोला, ''अब कुमार नहीं समझ सकते कि उनका लश्कर किधर है और वे किस तरफ से लाए गए, उन्हें धोखे में डालकर अपनी और उनकी किस्मत का अंदाजा लेना चाहिए।'' इसके बाद वह सवार फिर अपने घोड़े पर चढ़ा और वहां पहुंचा जहां कुमार उसकी राह देख रहे थे।

कुमार - तुम कहां गए थे

सवार - एक आदमी की खोज में गया था मगर वह नहीं मिला।

कुमार - खैर तुम अपनी सचाई के लिए और सबूत देने वाले थे!

सवार घोड़े पर से उतर पड़ा और कुमार से बोला, ''आप घोड़े पर सवार हो लीजिए और मेरे साथ चलिए।'' मगर कुमार ने मंजूर न किया। सवार ने भी घोड़े की लगाम थामी और पैदल कुमार को लिए हुए उस रथ के पास पहुंचा और सब हाल कहकर बोला, ''देखिए इसी रथ पर आप लाए गए, यही बदमाश आपको लाया है, और यह दूसरा सारथी है। मैं इत्तिफाक से आपके पास मिलने के लिए जा रहा था जो आपके काम आया। अब उस रथ का एक घोड़ा जो बचा हुआ है उसी पर आप सवार होकर लश्कर में चले जाइए!''

कुमार - बेशक तुमने मेरी जान बचाई, इसका अहसान कभी न भूलूंगा।

सवार - क्या इसका अहसान आप मानते हैं!

कुमार - जरूर।

सवार - तो आप कुछ देकर इस अहसान का बोझ अपने ऊपर से उतार दीजिए।

कुमार - बड़ी खुशी के साथ मैं ऐसा करने को तैयार हूं, जो कहो दूं।

सवार - इस समय तो मैं आपसे कुछ नहीं ले सकता, मगर आप वादा करें तो जरूरत पड़ने पर आपसे कुछ मांगूं और मदद लूं!

कुमार - मैं वादा करता हूं कि जो कुछ मांगोगे दूंगा, जब चाहे ले लो।

सवार - देखिए फिर बदल न जाइएगा।

कुमार - कभी नहीं, यह क्षत्रियों का धर्म नहीं।

सवार - अच्छा अब एक सबूत और देता हूं कि बिना आपको किसी तरह का कष्ट दिये अपने घर चला जाता हूं।

कुमार - तुम अपने चेहरे पर से नकाब तो हटाओ जिससे तुमको पहचान रखूं।

सवार - यह बात तो जरूरी है।

इतना कहकर सवार ने चेहरे पर से नकाब उलट दी और कुमार को हैरत में डाल दिया क्योंकि वह एक हसीन और नौजवान औरत थी।

बेशक सिवाय किशोरी के ऐसी हसीन औरत कुमार ने कभी नहीं देखी थी। उसने अपनी तिरछी चितवन से कुमार के दिल का शिकार कर लिया और उनकी बंधी हुई टकटकी की तरफ कुछ खयाल न कर उन्हें उसी तरह छोड़ सड़क से नीचे उतर जंगल का रास्ता लिया।

उसके चले जाने के बाद थोड़ी देर तक तो कुमार उसी तरफ देखते रहे जिधर वह घोड़े पर सवार होकर गई थी, इसके बाद रथ और सड़क की तरफ देखा फिर उस घोड़े के पास गये जो रथ के दोनों घोड़ों में से जीता मौजूद था। उसकी पीठ पर जो कुछ असबाब था खोल दिया सिर्फ लगाम रहने दी और नंगी पीठ पर सवार हो उसी तरफ का रास्ता लिया जिधर वह नकाबपोश औरत उनके देखते-देखते चली गई थी।

भूखे-प्यासे दोपहर तक घोड़ा दौड़ाते चले गये मगर उस औरत का पता न लगा कि किधर गई और क्या हुई। भूख और प्यास से परेशान हो गये और इस फिक्र में पड़े कि कहीं ठंडा पानी मिले तो प्यास बुझावें मगर इस जंगल में कहीं किसी सोते या झरने का पता न लगा, लाचार वह आगे बढ़ते ही गये और शाम होते तक एक ऐसे मैदान से पहुंचे जिसके चारों तरफ तो घना जंगल था मगर बीच में सुंदर साफ जल में लहराता हुआ एक अनूठा तालाब था।

कुंअर इंद्रजीतसिंह उस विचित्र तालाब को देख बड़े ही विस्मित हुए और एकटक उसकी तरफ देखने लगे। इस तालाब के बीचोंबीच एक खूबसूरत छोटा-सा मकान बना हुआ था जिसके चारों तरफ सहन था और चारों कोनों में चार औरतें तीर-कमान चढ़ाये मुस्तैद थीं, मालूम होता था कि ये अभी तीर छोड़ा ही चाहती हैं। मकान की छत पर एक छोटे-से चबूतरे पर भी एक औरत दिखाई पड़ी जिसका सिर नीचे और पैर आसमान की तरफ थे। बड़ी देर तक देखने के बाद मालूम हुआ कि ये औरतें जानदार नहीं हैं बल्कि बनावटी हैं जिन्हें पुतली कहना मुनासिब है। एक छोटी-सी डोंगी भी उसी चबूतरे के साथ रस्सी के सहारे बंधी हुई थी जिससे मालूम होता था कि इस मकान में जरूर कोई रहता है जिसके आने-जाने के लिए यह डोंगी मौजूद है।

कुमार घोड़े की लगाम एक पत्थर से अटकाकर तालाब के नीचे उतरे, हाथ-मुंह धो जल पिया और कुछ सुस्ताने के बाद फिर उसी मकान की तरफ देखने लगे क्योंकि कुमार का इरादा हुआ कि तैरकर उस मकान तक जायं और देखें कि उसमें क्या है।

सूर्य अस्त होते-होते एक औरत उस मकान के अंदर से निकली और सहन पर खड़ी हो कुमार की तरफ देखने लगी, इसके बाद हाथ के इशारे से कहा कि यहां से चले जाओ। कुमार ने उस औरत को साफ पहचान लिया कि यह वही नकाबपोश सवार है जिसने कुमार को रथ पर ले जाते हुए ऐयार के हाथ से बचाया था।

 

बयान - 10

कुछ रात जा चुकी है। रोहतासगढ़ किले के अंदर अपने मकान में बैसठी हुई बेचारी किशोरी न मालूम किस ध्यान में डूबी हुई है और क्या सोच रही है। कोई दूसरी औरत उसके पास नहीं है। आखिर किसी के पैर की आहट पा अपने खयाल में डूबी हुई किशोरी ने सिर उठाया और दरवाजे की तरफ देखने लगी। लाली ने पहुंचकर सलाम किया और कहा, ''माफ कीजियेगा, मैं बिना हुक्म के इस कमरे में आई हूं।''

किशोरी - मैंने लौंडियों को हुक्म दे रखा है कि इस कमरे में कोई न आने पावे मगर साथ ही इसके यह भी कह दिया था कि लाली आने का इरादा करे तो उसे मत रोकना।

लाली - बेशक आपने मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी की।

किशोरी - मगर न मालूम तुम मेरे ऊपर दया क्यों नहीं करतीं! आओ बैठो।

लाली - (बैठकर) आप ऐसा न कहें, मैं जी-जान से आपके काम आने को तैयार हूं।

किशोरी - ये सब बनावटी बातें करती हो। अगर ऐसा ही होता तो अपना और कुंदन वाला भेद मुझसे क्यों छिपातीं नारंगी वाले भेद से तो मैं पहले ही हैरान हो रही थी मगर जब से कुंदन ने अपनी बातों का असर तुम पर डाला है तब से मेरी घबराहट और भी बढ़ गई है।

लाली - बेशक आपको बहुत कुछ ताज्जुब हुआ होगा। मैं कसम खाकर कह सकती हूं कि कुंदन ने उस समय जो मुझे कहा था या कुंदन की जिन बातों को सुनकर मैं डर गई थी वह उसे पहले से मालूम न थीं, अगर मालूम होतीं तो जिस समय मैंने नारंगी दिखाकर उसे धमकाया था उसी समय वह मुझसे बदला ले लेती। अब मुझे विश्वास हो गया कि इस मकान में कोई बाहर का आदमी जरूर आया है जिसने हमारे भेद से कुंदन को होशियार कर दिया। अफसोस, अब मेरी जान मुफ्त में जाया चाहती है क्योंकि कुंदन बड़ी ही बेरहम और बदकार औरत है।

किशोरी - तुम्हारी बातें मेरी घबड़ाहट को बढ़ा रही हैं, कृपा करके कुछ कहो तो सही, क्या भेद है

लाली - मैं बिल्कुल हाल आपसे कहूंगी और आपकी चिंता दूर करूंगी मगर आज रात भर आप मुझे और माफ कीजिये और इस समय एक काम में मेरी मदद कीजिए।

किशोरी - वह क्या

लाली - यह तो मुझे विश्वास हो ही गया कि अब मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती, तो भी अपने बचने के लिए मैं कोई-न-कोई उद्योग जरूर करूंगी। मैं चाहती हूं कि अपने मरने के पहले ही कुंदन को इस दुनिया से उठा दूं मगर एक ऐसी अंड़स में पड़ गई हूं कि ऐसा करने का इरादा भी नहीं कर सकती, हां कुंदन का कुछ विशेष हाल जानना चाहती हूं और इसके बाद बाग के उस कोने वाले मकान में घुसा चाहती हूं जिसमें हरदम ताला बंद रहता है और दरवाजे पर नंगी तलवार लिए दो औरतें बारी-बारी से पहरा दिया करती हैं। इन्हीं दोनों कामों में मैं आपसे मदद लिया चाहती हूं।

किशोरी - उस मकान में क्या है, तुम्हें कुछ मालूम है

लाली - हां, कुछ मालूम है और बाकी भेद जानना चाहती हूं। मुझे विश्वास है कि अगर आप भी मेरे साथ उस मकान के अंदर चलेंगी और हम दोनों आदमी किसी तरह बचकर निकल आवेंगे तो फिर आपको भी इस कैद से छुट्टी मिल जायगी, मगर उसके अंदर जाना और बचकर निकल आना यही मुश्किल है।

किशोरी - यह और ताज्जुब की बात तुमने कही, खैर ऐसी जिंदगी से मैं मरना उत्तम समझती हूं। जो कुछ तुम्हें करना हो करो और जिस तरह की मदद मुझसे लिया चाहती हो लो।

लाली - (एक छोटी-सी तस्वीर कमर से निकाल और किशोरी के हाथ में देकर) थोड़ी देर बाद मामूली तौर पर कुंदन जरूर आपके पास आवेगी, उस समय यह तस्वीर ऐसे ढंग से उसे दिखाइए जिससे उसे यह न मालूम हो कि आप जान-बूझकर दिखा रही हैं, फिर उसके चेहरे की जैसी रंगत हो या जो कुछ वह कहे मुझसे कहिए। इस समय तो यही एक काम है।

किशोरी - यह काम मैं बखूबी कर सकूंगी।

किशोरी ने लाली के हाथ से तस्वीर लेकर पहले खुद देखी। इस तस्वीर में एक खोह की हालत दिखाई गई थी जिसमें एक आदमी उलटा लटक रहा था और एक औरत हाथ में छुरा लिए उसके बदन में घाव लगा रही थी, पास में एक कमसिन औरत खड़ी थी और कोने की तरफ कब्र खोदी जा रही थी।

पाठक, यह तस्वीर ठीक उस समय की थी जिसका हाल हम पहले भाग के आठवें बयान में लिख आये हैं, मगर यह हाल किशोरी को अभी तक मालूम नहीं हुआ था। किशोरी उस तस्वीर को देखकर बहुत ही हैरान हुई और उसके बारे में लाली से कुछ पूछना चाहा। मगर लाली तस्वीर देने के बाद वहां न ठहरी, तुरंत बाहर चली गई।

लाली के जाने के थोड़ी ही देर बाद कुंदन आ पहुंची मगर उस समय किशोरी उस तस्वीर को देखने में अपने को यहां तक भूली हुई थी कि कुंदन का आना उसे तब मालूम हुआ जब उसने पास आकर कुछ देर तक खड़े रहकर पूछा, ''कहो बहिन, क्या देख रही हो'

किशोरी - (चौंककर) हैं! तुम यहां कब से खड़ी हो

कुंदन - कुछ देर से। इस तस्वीर में कौन-सी ऐसी बात है जिसे तुम बड़े गौर से देख रही हो।

किशोरी - तुमने इस तस्वीर को देखा है

कुंदन - सैकड़ों दफे। मैं समझती हूं कि यह तस्वीर तुम्हें लाली ने खास मुझे दिखाने के लिए दी है। आप लाली से कह दीजिएगा कि मैं इस तस्वीर को देखकर नहीं डर सकती। मैं बिना बदला लिए कभी न छोडूंगी क्योंकि जिस दिन पहले-पहल रात को आपसे मुलाकात हुई थी उस दिन यहां से मेरे निकल जाने का सामान बिल्कुल ठीक था, इसी लाली ने मेरे उद्योग को मिट्टी कर दिया और मेरे मददगारों को भी फंसा दिया, खैर देखा जायगा। मैं आपके मिलने से प्रसन्न थी मगर अफसोस, उसने झूठी बात गढ़कर आपका दिल भी मेरी तरफ से फेर दिया। तो भी मैं आपके साथ बुराई न करूंगी और जहां तक हो सकेगा उसकी चालबाजियों से आपको होशियार कर दूंगी, मानने-न-मानने का आपको अख्तियार है।

किशोरी - मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि क्या हो रहा है। हे ईश्वर, मैंने क्या अपराध किया था कि चारों तरफ से संकट ने आकर घेर लिया! हाय, मैं बिल्कुल नहीं जान सकती कि कौन मेरा दोस्त हे और कौन दुश्मन!

इतना कह किशोरी रोने लगी, उसने अपने को बहुत संभालना चाहा मगर न हो सका, हिचकियों ने उसका गला दबा दिया। कुंदन किशोरी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने दोनों हाथों में दबाकर बोली -

''प्यारी किशोरी, यह समझना तो बहुत मुश्किल है कि यहां आपका दोस्त कौन है। बात बनाकर दोस्ती साबित करना भूल है तिसमें दुश्मन के घर में, हां, यह मैं जरूर साबित कर दूंगी कि लाली आपसे दुश्मनी रखती है। लाली ने आपसे जरूर कहा होगा कि आपकी तरह मैं भी कुमार के साथ ब्याह करने के लिए लाई गई हूं मगर नहीं, यह बात बिल्कुल झूठ है। असल तो यह है कि लाली मुझको बिल्कुल नहीं जानती और न मैं जानती हूं, कि लाली कौन है मगर आजकल लाली जिस फिक्र में पड़ी है उससे मैं समझती हूं कि वह आपके साथ दुश्मनी कर रही है। ताज्जुब नहीं कि वह आपको एक दिन उस मकान में ले जाय जिसका ताला बराबर बंद रहता है और जिसके दरवाजे पर नंगी तलवार का पहरा पड़ा रहता है क्योंकि आजकल वह वहां पहरा देने वाली औरतों से दोस्ती बढ़ा रही है और ताला खोलने के लिए एक ताली तैयार कर रही है। उसकी दुश्मनी का अंत उसी दिन होगा जिस दिन वह आपको उस मकान के अंदर कर देगी, फिर आपकी जान किसी तरह नहीं बच सकती। उसका ऐसा करना केवल आप ही के साथ दुश्मनी करना नहीं बल्कि यहां के राजा और इस राज्य के साथ भी दुश्मनी करना है। बेशक वह आपको उस मकान के अंदर भेजेगी और आप उस चौखट के अंदर पैर भी न रखेंगी।''

किशोरी - उस मकान के अंदर क्या है?

कुंदन - सो मैं नहीं जानती।

किशोरी - यहां का कोई आदमी जानता है?

कुंदन - कोई नहीं, बल्कि जहां तक मैं खयाल करती हूं, यहां का राजा भी उसके अंदर का हाल नहीं जानता।

किशोरी - क्या मकान कभी खोला नहीं जाता?

कुंदन - मेरे सामने तो कभी खोला नहीं गया।

किशोरी - फिर कैसे कह सकती हो कि उसके अंदरन जाकर कोई बच नहीं सकता?

कुंदन - इसका जानना तो कोई मुश्किल नहीं है। पहले तो यही सोचिए कि वहां हरदम ताला बंद रहता है, अगर कोई चोरी से भीतर गया भी तो निकलने का मौका मुश्किल से मिलेगा, फिर हम लोगों को उसके अंदर जाकर फायदा ही क्या होगा आपने देखा होगा, उस दरवाजे के ऊपर लिखा है कि - 'इसके अंदर जो जायगा उसका सिर आपसे आप कटकर गिर पड़ेगा'! जो हो मगर यह सब होते हुए भी लाली आपको उस मकान के अंदर जरूर भेजना चाहेगी।

किशोरी - खैर, इस तस्वीर का हाल अगर तुम जानती हो तो कहो।

कुंदन - कहती हूं सुनो-जब कुंअर इंद्रजीतसिंह को धोखा देकर माधवी ले गई तो उनके छोटे भाई आनंदसिंह उनकी खोज में निकले। एक मुसलमानी ने उन्हें धोखा देकर गिरफ्तार कर लिया और उनके साथ शादी करनी चाही मगर उन्होंने मंजूर न किया और तीन दिन भूखे उसके यहां कैद रह गये। आखिर उन्हीं के ऐयार देवीसिंह ने उस कैद से उनको छुड़ाया मगर उन्हें अभी तक मालूम नहीं है कि उन्हें देवीसिंह ने छुड़ाया था।

इसके बाद उस तस्वीर के बारे में जो कुछ आनंदसिंह ने देखा - सुना था कुंदन ने वहां तक कह सुनाया जब आनंदसिंह बेहोश करके उस खोह के बाहर निकाल दिये गये बल्कि घर पहुंचा दिये गये।

किशोरी - यह सब हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ

कुंदन - मुझसे देवीसिंह ने कहा था।

किशोरी - देवीसिंह से तुमसे क्या संबंध

कुंदन - जान-पहचान है। आपने इस तस्वीर के बारे में लाली से कुछ सुना है या नहीं

किशोरी - कुछ नहीं।

कुंदन - पूछिये, देखें क्या कहती है! अच्छा, अब मैं जाती हूं, फिर मिलूंगी।

किशोरी - जरा ठहरो तो।

कुंदन - अब मत रोको, बेमौका हो जायगा। मैं फिर बहुत जल्द मिलूंगी।

कुंदन चली गई मगर किशोरी पहले से भी ज्यादे सोच में पड़ गई। कभी तो उसका दिल लाली की तरफ झुकता और उसको अपने दुख का साथी समझती, कभी सोचते-सोचते लाली की बातों में शक पड़ जाने पर कुदंन ही को सच्ची समझती। उसका दिल दोनों तरफ के खिंचाव में पड़कर बेबस हो रहा था, वह ठीक निश्चय नहीं कर सकती थी कि अपना हमदर्द लाली को बनावे या कुंदन को क्योंकि लाली और कुंदन दोनों अपने असली भेदों को किशोरी से छिपा रही थीं।

उस दिन लाली ने फिर मिलकर किशोरी से पूछा, ''उस तस्वीर को देखकर कुंदन की क्या दशा हुई' जिसके जवाब में किशोरी ने कहा, ''कुंदन ने उस तस्वीर की तरफ ध्यान भी न दिया और मेरे खुद पूछने पर कहा, मैं नहीं जानती यह तस्वीर कैसी है और न इसे कभी मैंने पहले देखा ही था।''

यह सुनकर लाली का चेहरा कुछ उदास हो गया और वह किशोरी के पास से उठकर चली गई। किशोरी ने कहा, ''भला तुम ही बताती जाओ कि यह तस्वीर कैसी है' मगर लाली ने इसका कुछ जवाब न दिया और चली गई।

इस बात को कई दिन बीत गये। लश्कर से कुंअर इंद्रजीतसिंह के गायब होने का हाल भी चारों तरफ फैल गया जिसे सुन धीरे-धीरे किशोरी की उदासी और भी ज्यादे बढ़ गई।

एक दिन रात को अपनी पलंगड़ी पर लेटी हुई किशोरी तरह-तरह की बातें सोच रही थी, लाली और कुंदन के बारे में भी गौर कर रही थी। यकायक वह उठ बैठी और धीरे-से आप ही बोली, 'अब मुझे खुद कुछ करना चाहिए, इस तरह पड़े रहने से काम नहीं चलता। मगर अफसोस, मेरे पास कोई हरबा भी तो नहीं है।'

किशोरी पलंग के नीचे उतरी और कमरे में इधर-उधर टहलने लगी, आखिर कमरे के बाहर निकली। देखा कि पहरेदार लौंडियां गहरी नींद में सो रही हैं। आधी रात से ज्यादे जा चुकी थी, चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई कुंदन के मकान की तरफ बढ़ी। जब पास पहुंची तो देखा कि एक आदमी काले कपड़े पहने उसी तरफ लपका हुआ जा रहा है बल्कि उस कमरे के दालान में पहुंच गया जिसमें कुंदन रहती है। किशोरी एक पेड़ की आड़ में खड़ी हो गई, शायद इसलिए कि वह आदमी लौटकर चला जाय तो आगे बढ़ूं।

थोड़ी देर बाद कुंदन भी उसी आदमी के साथ बाहर निकली और धीरे-धीरे बाग के उस तरफ रवाना हुई जिधर घने दरख्त लगे हुए थे। जब दोनों उस पेड़ के पास पहुंचे जिसकी आड़ में किशोरी छिपी हुई थी तब वह आदमी रुका और धीरे से बोला -

आदमी - अब तुम जाओ, ज्यादे दूर तक पहुंचाने की कोई जरूरत नहीं।

कुंदन - फिर भी मैं कहे देती हूं कि अब पांच-सात दिन 'नारंगी' की कोई जरूरत नहीं।

आदमी - खैर, मगर किशोरी पर दया बनाये रखना।

कुंदन - इसके कहने की कोई जरूरत नहीं।

वह आदमी पेड़ों के झुंड की तरफ चला गया और कुंदन लौटकर अपने कमरे में चली गई। किशोरी भी फिर वहां न ठहरी और अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही क्योंकि उन दोनों की बातों ने जिसे किशोरी ने अच्छी तरह सुना था उसे परेशान कर दिया और वह तरह-तरह की बातें सोचने लगी, मगर अपने दिल का हाल किससे कहे इस लायक वहां कोई भी न था।

पहले तो किशोरी बनिस्बत कुंदन के लाली को सच्ची और नेक समझती थी मगर अब वह बात न रही। किशोरी उस आदमी के मुंह से निकली हुई उस बात को फिर याद करने लगी कि 'किशोरी पर दया बनाये रखना।'

वह आदमी कौन था इस बाग में आना और यहां से निकलकर जाना तो बड़ा ही मुश्किल है, फिर वह क्योंकर आया! उस आदमी की आवाज पहचानी हुई-सी मालूम होती है, बेशक मैं उससे कई दफे बातें कर चुकी हूं, मगर कब और कहां, सो याद नहीं पड़ता और न उसकी सूरत का ध्यान बनता है। कुंदन ने कहा था, 'पांच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।' इससे मालूम होता है कि नारंगी वाली बात कुछ उस आदमी से संबंध रखती है और लाली उस भेद को जानती है। इस समय तो यह निश्चय हो गया कि कुंदन मेरी खैरख्वाह है और लाली मुझसे दुश्मनी किया चाहती है मगर इसका भी विश्वास नहीं होता। कुछ भेद खुला मगर इससे तो और भी उलझन हो गई। खैर कोशिश करूंगी तो कुछ और भी पता लगेगा मगर अबकी लाली का हाल मालूम करना चाहिए।

थोड़ी देर तक इन सब बातों को किशोरी सोचती रही, आखिर फिर अपने पलंग से उठी और कमरे के बाहर आई। उसकी हिफाजत करने वाली लौंडियां उसी तरह गहरी नींद में सो रही थीं। जरा रुककर बाग के उस कोने की तरफ बढ़ी जिधर लाली का मकान था। पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाती और रुक-रुककर चारों तरफ की आहट लेती हुई चली जाती थी, जब लाली के मकान के पास पहुंची तो धीरे-धीरे किसी की बातचीत की आहट पा एक अंगूर की झाड़ी में रुक रही और कान लगाकर सुनने लगी, केवल इतना ही सुना, ''आप बेफिक्र रहिये, जब तक मैं जीती हूं कुंदन किशोरी का कुछ बिगाड़ नहीं सकती ओैर न उसे कोई दूसरा ले जा सकता है। किशोरी इंद्रजीतसिंह की है और बेशक उन तक पहुंचाई जायेगी।''

किशोरी ने पहचान लिया कि यह लाली की आवाज है। लाली ने यह बात बहुत धीरे से कही थी मगर किशोरी बहुत पास पहुंच चुकी थी इसलिए बखूबी सुनकर पहचान सकी कि लाली की आवाज है मगर यह न मालूम हुआ कि दूसरा आदमी कौन है। लाली अपने कमरे के पास ही थी बात कहकर तुरंत दो-चार सीढ़ियां चढ़ अपने कमरे में घुस गई और उसी जगह से एक आदमी निकलकर पेड़ों की आड़ में छिपता हुआ बाग के पिछली तरफ जिधर दरवाजे में बराबर ताला बंद रहने वाला मकान था चला गया, मगर उसी समय जोर-जोर से ''चोर-चोर'' की आवाज आई। किशोरी ने आवाज को भी पहचानकर मालूम कर लिया कि कुंदन है जो उस आदमी को फंसाया चाहती है। किशोरी फौरन लपकती हुई अपने कमरे में चली आई और चोर-चोर की आवाज बढ़ती ही गई।

किशोरी अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही और उन बातों पर गौर करने लगी जो अभी दो-तीन घंटे के हेर-फेर में देख-सुन चुकी थी। वह मन ही मन में कहने लगी, 'कुंदन की तरफ भी गई और लाली की तरफ भी गई जिससे मालूम हो गया कि वे दोनों ही एक-एक आदमी से जान-पहचान रखती हैं जो बहुत छिपकर इस मकान में आता है। कुंदन के साथ जो आदमी मिलने आया था उसकी जुबानी जो कुछ मैंने सुना उससे जाना जाता था कि कुंदन मुझसे दुश्मनी नहीं रखती बल्कि मेहरबानी का बर्ताव किया चाहती है, इसके बाद जब लाली की तरफ गई तो वहां की बातचीत से मालूम हुआ कि लाली सच्चे दिल से मेरी मददगार है और कुंदन शायद दुश्मनी की निगाह से मुझे देखती है। हां ठीक है, अब समझी बेशक ऐसा ही होगा। नहीं-नहीं मुझे कुंदन की बातों पर विश्वास न करना चाहिए! अच्छा देखा जायेगा। कुंदन ने बेमौके चोर-चोर का शोर मचाया, कहीं ऐसा न हो कि बेचारी लाली पर कोई आफत आवे।'

इन्हीं सब बातों को सोचती हुई किशोरी ने बची हुई थोड़ी-सी रात जागकर ही बिता दी और सुबह की सफेदी फैलने के साथ ही अपने कमरे के बाहर निकली क्योंकि रात की बातों का पता लगाने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा था।

किशोरी जैसे ही दालान में पहुंची, सामने से कुंदन को आते हुए देखा। कुंदन ने पास आकर सलाम किया और कहा, ''रात का कुछ हाल मालूम है या नहीं'

किशोरी - सब-कुछ मालूम है! तुम्हीं ने तो गुल मचाया था!

कुंदन - (ताज्जुब से) यह कैसी बात कहती हो

किशोरी - तुम्हारी आवाज साफ मालूम होती थी।

कुंदन - मैं तो चोर-चोर का गुल सुनकर वहां पहुंची थी और उन्हीं की तरह खुद भी चिल्लाने लगी थी।

किशोरी - (हंसकर) शायद ऐसा ही हो।

कुंदन - क्या इसमें आपको कोई शक है

किशोरी - बेशक। लो यह लाली भी आ रही है।

कुंदन - (कुछ घबड़ाकर) जो कुछ किया उन्होंने किया।

इतने में लाली भी आकर खड़ी हो गई और कुंदन की तरफ देखकर बोली, ''आपका वार खाली गया।''

कुंदन - (घबड़ाकर) मैंने क्या...

लाली - बस रहने दीजिये, आपने मेरी कार्रवाई कम देखी होगी मगर दो घंटे पहले मैं आपकी पूरी कार्रवाई मालूम कर चुकी थी।

कुंदन - (बदहवास होकर) आप तो कसम खा...

लाली - हां-हां, मुझे खूब याद है, मैं उसे नहीं भूलती।

किशोरी - जो हो, मुझे अब पांच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।

किशोरी की इस बात ने लाली और कुंदन दोनों को चौंका दिया। लाली के चेहरे पर कुछ हंसी थी मगर कुंदन के चेहरे का रंग बिल्कुल ही उड़ गया था क्योंकि उसे विश्वास हो गया कि किशोरी ने भी रात की कुल बातें सुन लीं। कुंदन की घबराहट और परेशानी यहां तक बढ़ गई कि किसी तरह अपने को सम्हाल न सकी और बिना कुछ कहे वहां से उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई। अब लाली और किशोरी में बातचीत होने लगी -

लाली - मालूम होता है तुमने भी रात भर ऐयारी की!

किशोरी - हां, मैं कुंदन की तरफ छिपकर गई थी।

लाली - तब तो तुम्हें मालूम हो गया होगा कि कुंदन तुम्हें धोखा दिया चाहती है।

किशोरी - पहले तो यह साफ नहीं जान पड़ता था मगर जब तुम्हारी तरफ गई और तुमको किसी से बातें करते सुना तो विश्वास हो गया कि इस महल में केवल तुम्हीं से मैं कुछ भलाई की उम्मीद कर सकती हूं।

लाली - ठीक है, कुंदन की कुल बातें तुमने नहीं सुनीं, क्या मुझसे भी...(रुककर) खैर जाने दीजिये। हां, अब वह समय आ गया कि तुम और हम दोनों यहां से निकल जायें। क्या तुम मुझ पर विश्वास रखती हो

किशोरी - बेशक, तुमसे मुझे नेकी की उम्मीद है, मगर कुंदन बहुत बिगड़ी हुई मालूम होती है।

लाली - वह मेरा कुछ नहीं कर सकती।

किशोरी - अगर तुम्हारा हाल किसी से कह दे तो

लाली - अपनी जुबान से वह नहीं कह सकती, क्योंकि वह मेरे पंजे में उतना ही फंसी हुई है जितना मैं उसके पंजे में।

किशोरी - अफसोस! इतनी मेहरबानी रहने पर भी तुम वह भेद मुझसे नहीं कहतीं

लाली - घबड़ाओ मत, धीरे-धीरे सब-कुछ मालूम हो जाएगा।

 

बयान - 11

इसके बाद लाली ने दबी जुबान से किशोरी को कुछ समझाया और दो घंटे में फिर मिलने का वादा करके वहां से चली गयी।

हम ऊपर कई दफे लिख आये हैं कि उस बाग में जिसमें किशोरी रहती थी एक तरफ ऐसी इमारत है जिसके दरवाजे पर बराबर ताला बंद रहता है और नंगी तलवार का पहरा पड़ा करता है।

आधी रात का समय है। चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ है। तेज हवा चलने के कारण बड़े-बड़े पेड़ों के पत्ते लड़खड़ाकर सन्नाटे को तोड़ रहे हैं। इसी समय हाथ में कमंद लिए हुए लाली अपने को हर तरफ से बचाती और चारों तरफ गौर से देखती हुई उसी मकान के पिछवाड़े की तरफ जा रही है। जब दीवार के पास पहुंची कमंद लगाकर छत के ऊपर चढ़ गई। छत के ऊपर चारों तरफ तीन-तीन हाथ ऊंची दीवार थी। लाली ने बड़ी होशियारी से छत फोड़कर एक इतना बड़ा सूराख किया जिसमें आदमी बखूबी उतर जा सके और खुद कमंद के सहारे उसके अंदर उतर गई।

दो घंटे के बाद एक छोटी-सी संदूकड़ी लिए हुए लाली निकली और कमंद के सहारे छत के नीचे उतर एक तरफ को रवाना हुई। पूरब तरफ वाली बारहदरी में आई जहां से महल में जाने का रास्ता था, फाटक के अंदर घुसकर महल में पहुंची। यह महल बहुत बड़ा और आलीशान था। दो सौ लौंडियों और सखियों के साथ महारानी साहिबा इसी में रहा करती थीं। कई दालानों और दरवाजों को पार करती हुई लाली ने एक कोठरी के दरवाजे पर पहुंचकर धीरे से कुंडा खटखटाया।

एक बुढ़िया ने उठकर किवाड़ खोला और लाली को अंदर करके फिर बंद कर दिया। उस बुढ़िया की उम्र लगभग अस्सी वर्ष की होगी, नेकी और रहमदिली उसके चेहरे पर झलक रही थी। सिर्फ छोटी-सी कोठरी, थोड़ा-सा जरूरी सामान और मामूली चारपाई पर ध्यान देने से मालूम होता था कि बुढ़िया लाचारी से अपनी जिंदगी बिता रही है। लाली ने दोनों पैर छूकर प्रणाम किया ओैर उस बुढ़िया ने पीठ पर हाथ फेरकर बैठने के लिए कहा।

लाली - (संदूक आगे रखकर) यही है

बुढ़िया - क्या ले आईं हां ठीक है, बेशक यही है, अब आगे जो कुछ कीजियो बहुत सम्हलकर! ऐसा न हो कि आखिर समय में मुझे कलंक लगे।

लाली - जहां तक हो सकेगा बड़ी होशियारी से काम करूंगी, आप आशीर्वाद दीजिए कि मेरा उद्योग सफल हो।

बुढ़िया - ईश्वर तुझे इस नेकी का बदला दे, वहां कुछ डर तो नहीं मालूम हुआ

लाली - दिल कड़ा करके इसे ले आई, नहीं तो मैंने जो कुछ देखा, जीते जी भूलने योग्य नहीं, अभी तो फिर एक दफे देखना नसीब होगा। ओफ! अभी तक कलेजा कांपता है।

बुढ़िया - (मुस्कराकर) बेशक वहां ताज्जुब के सामान इकट्ठे हैं मगर डरने की कोई बात नहीं, जा ईश्वर तेरी मदद करे।

लाली ने उस संदूकड़ी को उठा लिया और अपने खास घर में आकर संदूकड़ी को हिफाजत से रख पलंग पर जा लेट रही। सबेरे उठकर किशोरी के कमरे में गई।

किशोरी - मुझे रात भर तुम्हारा खयाल बना रहा और घड़ी-घड़ी उठकर बाहर जाती थी कि कहीं से गुल-शोर की आवाज तो नहीं आती।

लाली - ईश्वर की दया से मेरे काम में किसी तरह का विघ्न नहीं पड़ा।

किशोरी - आओ मेरे पास बैठो, अब तो तुम्हें उम्मीद हो गई होगी कि मेरी जान बच जायगी और यहां से जा सकूंगी।

लाली - बेशक अब मुझे पूरी उम्मीद हो गई।

किशोरी - संदूकड़ी मिली

लाली - हां, यह सोचकर कि दिन को किसी तरह मौका न मिलेगा उसी समय मैं बूढ़ी दादी को भी दिखा आई, उन्होंने पहचानकर कहा कि बेशक यही संदूकड़ी है। उसी रंग की वहां कई संदूकड़ियां थीं मगर वह खास निशान जो बूढ़ी दादी ने बताया था देखकर मैं उसी एक को ले आई!

किशोरी - मैं भी उस संदूकड़ी को देखना चाहती हूं।

लाली - बेशक मैं तुम्हें अपने यहां ले चलकर वह संदूकड़ी दिखा सकती हूं मगर उसके देखने से तुम्हें किसी तरह का फायदा नहीं होगा। बल्कि तुम्हारे वहां चलने से कुंदन को खुटका हो जायगा और यह सोचेगी कि किशोरी लाली के यहां क्यों गई। उस संदूकड़ी में भी कोई ऐसी बात नहीं है जो देखने लायक हो, उसे मामूली एक छोटा-सा डिब्बा समझना चाहिए जिसमें कहीं ताली लगाने की जगह नहीं है और मजबूत भी इतनी है कि किसी तरह टूट नहीं सकती।

किशोरी - फिर वह क्योंकर खुल सकेगी और उसके अंदर से वह चाभी क्योंकर निकलेगी जिसकी हम लोगों को जरूरत है

लाली - रेती से रेतकर उसमें सुराख किया जायगा।

किशोरी - देर लगेगी!

लाली - हां, दो दिन में यह काम होगा क्योंकि सिवाय रात के दिन को मौका नहीं मिल सकता।

किशोरी - मुझे तो एक घड़ी सौ-सौ वर्ष के समान बीतती है।

लाली - खैर जहां इतने दिन बीते वहां दो दिन और सही।

थोड़ी देर तक बातचीत होती रही। इसके बाद लाली उठकर अपने मकान में चली गई और मामूली कामों की फिक्र में लगी।

इसके तीसरे दिन आधी रात के समय लाली अपने मकान से बाहर निकली और किशोरी के मकान में आई। वे लौंडियां जो किशोरी के यहां पहरे पर मुकर्रर थीं गहरी नींद में पड़ी खुर्राटे ले रही थीं मगर किशोरी की आंखों में नींद का नाम-निशान नहीं, वह पलंग पर लेटी दरवाजे की तरफ देख रही थी। उसी समय हाथ में एक छोटी-सी गठरी लिए लाली ने कमरे के अंदर पैर रखा जिसे देखते ही किशोरी उठ खड़ी हुई, बड़ी मुहब्बत के साथ हाथ पकड़ लाली को अपने पास बैठाया।

किशोरी - ओफ! ये दो दिन बड़ी कठिनता से बीते, दिन-रात डर लगा ही रहता था।

लाली - क्यों

किशोरी - इसलिए कि कोई उस छत पर जाकर देख न ले कि किसी ने सेंध लगाई है।

लाली - ऊंह, कौन उस पर जाता है और कौन देखता है! लो अब देर करना मुनासिब नहीं।

किशोरी - मैं तैयार हूं, कुछ लेने की जरूरत तो नहीं है

लाली - जरूरत की सब चीजें मेरे पास हैं, तुम बस चली चलो।

लाली और किशोरी वहां से रवाना हुईं और पेड़ों की आड़ में छिपती हुई उस मकान के पिछवाड़े पहुंचीं जिसकी छत में लाली ने सेंध लगाई थी। कमंद लगाकर दोनों ऊपर चढ़ीं, कमंद खींच लिया और उसी कमंद के सहारे सेंध की राह दोनों मकान के अंदर उतर गईं। वहां की अजीब बातों को देख किशोरी की अजब हालत हो गई मगर तुरंत ही उसका ध्यान दूसरी तरफ जा पड़ा। किशोरी और लाली जैसे ही उस मकान के अंदर उतरीं वैसे ही बाहर से किसी के ललकारने की आवाज आई, साथ ही फुर्ती से कई कमंद लगा दस-पंद्रह आदमी छत पर चढ़ आये और ''धरो-धरो, जाने न पावे, जाने न पावे!'' की आवाज लगी।

 

बयान - 12

कुंअर इंद्रजीतसिंह तालाब के किनारे खड़े उस विचित्र इमारत और हसीन औरत की तरफ देख रहे हैं। उनका इरादा हुआ कि तैरकर उस मकान में चले जायं जो इस तालाब के बीचोंबीच में बना हुआ है, मगर उस नौजवान औरत ने इन्हें हाथ के इशारे से मना किया बल्कि वहां से भाग जाने के लिए कहा, उसका इशारा समझ ये रुके मगर जी न माना, फिर तालाब में उतरे।

उस नाजनीन को विश्वास हो गया कि कुमार बिना यहां आये न मानेंगे, तब उसने इशारे से ठहरने के लिए कहा और यह भी कहा कि किश्ती लेकर मैं आती हूं। उस औरत ने किश्ती खोली और उस पर सवार हो अजीब तरह से घुमाती-फिराती तालाब के पिछले कोने की तरफ ले गई और कुमार को भी उसी तरफ आने का इशारा किया। कुमार उस तरफ गये और खुशी-खुशी उस औरत के साथ किश्ती पर सवार हुए। वह किश्ती को उसी तरह घुमाती-फिराती मकान के पास ले गई। दोनों आदमी उतरकर अंदर गये।

उस छोटे से मकान की सजावट कुमार ने बहुत पसंद की। वहां सभी चीजें जरूरत की मौजूद थीं। बीच का बड़ा कमरा अच्छी तरह से सजा हुआ था, बेशकीमती शीशे लगे हुए थे, काश्मीरी गलीचे जिसमें तरह-तरह के फूल-बूटे बने हुए थे, छोटी-छोटी मगर ऊंची संगमर्मर की चौकियों पर सजावट के सामान और गुलदस्ते लगाये हुए थे, गाने-बजाने का सामान भी मौजूद था, दीवारों पर की तस्वीरों को बनाने में मुसव्वरों ने अच्छी कारीगरी खर्च की थी। उस कमरे के बगल में एक और छोटा-सा कमरा सजा हुआ था जिसमें सोने के लिए एक मसहरी बिछी हुई थी, उसके बगल में एक कोठरी नहाने की थी जिसकी जमीन सफेद और स्याह पत्थरों से बनी हुई थी। बीच में एक छोटा-सा हौज बना हुआ था, जिसमें एक तरफ से तालाब का जल आता था ओर दूसरी तरफ से निकल जाता था, इसके अलावे और भी तीन-चार कोठरियां जरूरी कामों के लिए मौजूद थीं, मगर उस मकान में सिवाय उस औरत के और कोई दूसरी औरत न थी, न कोई नौकर या मजदूरनी ही नजर आती थी।

उस मकान को देख और उसमें सिवाय उस नौजवान नाजनीन के और किसी को न पा कुमार को बड़ा ताज्जुब हुआ। वह मकान इस योग्य था कि बिना पांच-चार आदमियों के उसकी सफाई या वहां के सामान की दुरुस्ती हो नहीं सकती थी।

थके-मांदे और धूप खाये हुए कुंअर इंद्रजीतसिंह को वह जगह बहुत ही भली मालूम हुई और उस हसीन औरत के अलौकिक रूप की छटा में ऐसे मोहित हुए कि पीछे की सुध बिल्कुल ही जाती रही। बड़े नाज और अंदाज से उस औरत ने कुमार को कमरे में ले जाकर गद्दी पर बैठाया और आप उनके सामने बैठ गई।

कुमार - तुमने जो कुछ एहसान मुझ पर किया है मैं किसी तरह उसका बदला नहीं चुका सकता।

औरत - ठीक है, मगर उम्मीद करती हूं कि आप कोई काम ऐसा भी न करेंगे जो मेरी बदनामी का सबब हो।

कुमार - नहीं-नहीं, मुझसे ऐसी उम्मीद न करना, लेकिन क्या सबब है जो तुमने ऐसा कहा

औरत - इस मकान में जहां मैं अकेली रहती हूं आपका इस तरह आना और देर तक रहना बेशक मेरी बदनामी का सबब होगा।

कुमार - (कुछ सोचकर) तुम इतनी खूबसूरत क्यों हुईं अफसोस! तुम्हारी एक-एक अदा मुझे अपनी तरफ खींचती है। (कुछ अटककर) जो हो मुझे अब यहां से चला ही जाना चाहिए। अगर ऐसा ही था तो मुझे किश्ती पर चढ़ाकर यहां क्यों लाईं

औरत - मैंने तो पहले ही आपको चले जाने का इशारा किया मगर जब आप जल में तैरकर यहां आने लगे तो लाचार मुझे ऐसा करना पड़ा। मैं जान-बूझकर उस आदमी को किसी तरह आफत में फंसा नहीं सकती हूं जिसकी जान खुद एक जालिम ऐयार के हाथ से बचाई हो। आप यह न समझें कि कोई आदमी इस तालाब में तैरकर यहां तक आ सकता है, क्योंकि इस तालाब में चारों तरफ जाल फेंके हुए हैं, अगर कोई आदमी यहां तैरकर आने का इरादा करेगा तो बेशक जाल में फंसकर अपनी जान बर्बाद करेगा। यही सबब था कि मुझे आपके लिए किश्ती ले जानी पड़ी।

कुमार - बेशक, तब इसके लिए भी मैं धन्यवाद दूंगा। माफ करना मैं यह नहीं जानता था कि मेरे यहां आने से तुम्हारा नुकसान होगा, अब मैं जाता हूं मगर कृपा करके अपना नाम तो बता दो जिससे मुझे याद रहे कि फलानी औरत ने बड़े वक्त पर मेरी मदद की थी।

औरत - (हंसकर) मैं अपना नाम नहीं किया चाहती और न इस धूप में आपको यहां से जाने के लिए कहती हूं बल्कि मैं उम्मीद करती हूं कि आप मेरी मेहमानी कबूल करेंगे।

कुमार - वाह-वाह! कभी तो आप मुझे मेहमान बनाती हैं और कभी यहां से निकल जाने के लिए हुक्म लगाती हैं, आप लोग जो चाहे करें।

औरत - (हंसकर) खैर ये सब बातें पीछे होती रहेंगी, अब आप यहां से उठें और कुछ भोजन करें क्योंकि मैं जानती हूं कि आपने अभी तक कुछ भोजन नहीं किया।

कुमार - अभी तो स्नान-संध्या भी नहीं किया। लेकिन मुझे ताज्जुब है कि यहां तुम्हारे पास कोई लौंडी दिखाई नहीं देती।

औरत - आप इसके लिए चिंता न करें, आपकी लौंडी मैं मौजूद हूं। आप जरा बैठें, मैं सब सामान ठीक करके अभी आती हूं।

इतना कह बिना कुमार की मर्जी पाये वह औरत वहां से उठी और बगल के एक कमरे में चली गई। उसके जाने के बाद कुमार कमरे में टहलने और एक-एक चीज को गौर से देखने लगे। यकायक एक गुलदस्ते के नीचे दबे हुए कागज के टुकड़े पर उनकी नजर पड़ी। मुनासिब न था कि उस पुर्जे को उठाकर पढ़ते मगर लाचार थे, उस पुर्जे के कई अक्षर जो गुलदस्ते के नीचे दबने से रह गये थे साफ दिखाई पड़ते थे और उन्हीं अक्षरों ने कुमार को पुर्जा निकालकर पढ़ने के लिए मजबूर किया। वे अक्षर ये थे - ''किशोरी''

लाचार कुमार ने उस पुर्जे को निकालकर पढ़ा, यह लिखा था -

''आपके कहे मुताबिक कुल कार्रवाई अच्छी तरह हो रही है। लाली और कुंदन में खूब घातें चल रही हैं। किशोरी ने भी पूरा धोखा खाया। किशोरी का आशिक भी यहां मौजूद है और उसे किशोरी से बहुत कुछ उम्मीद है। मैंने भी इनाम पाने लायक काम किया है। इस समय लाली कुछ अजब ही रंग लाया चाहती है, खैर दो-तीन दिन में खुलासा हाल लिखूंगी।

आपकी लौंडी - तारा।''

कुमार ने उस पुर्जे को झटपट पढ़कर उसी तरह रख दिया और गद्दी पर आकर बैठ गये। सोच और तरद्दुत ने चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। इस पुर्जे ने तो उनके दिल का भाव ही बदल दिया। इस समय उनकी सूरत देखकर उनका हाल कोई सच्चा दोस्त भी नहीं मालूम कर सकता था, हां कुछ देर सोचने के बाद इतना तो कुमार ने लंबी सांस के साथ खुलकर कहा, ''खैर कहां जाती है कम्बख्त! मैं बिना कुछ काम किये टलने वाला नहीं।''

इतने ही में वह औरत भी आ गई और बोली, ''उठिये, सब सामान दुरुस्त है।'' कुमार उसके साथ नहाने वाली कोठरी में गए जिसमें हौज बना हुआ था।

धोती, गमछा और पूजा का सब सामान वहां मौजूद था, कुमार ने स्नान और संध्या किया। वह औरत एक चांदी की रिकाबी में कुछ मेवा और खोए की चीजें इनके सामने रखकर चली गई और दूसरी दफे पीने के लिए जल भी लाकर रख गई। उसी समय कुमार ने सुना कि बगल के कमरे में दो औरतें बातें कर रही हैं। उन्हें ताज्जुब हुआ कि ये दूसरी औरतें कहां से आईं! कुमार भोजन करके उठे, हाथ-मुंह धोकर कोठरी से बाहर निकलना चाहते थे कि सामने का दरवाजा खुला और दो औरतें नजर पड़ीं जिन्हें देखते ही कुमार चौंक पड़े और बोले - ''हैं! ये दोनों यहां कहां से आ गईं!!''

 

बयान - 13

आधी रात के समय सुनसान मैदान में दो कमसिन औरतें आपस में कुछ बातें करती चली जा रही हैं। राह में छोटे-छोटे टीले पड़ते हैं जिन्हें तकलीफ के साथ लांघने और दम फूलने पर कभी ठहरकर फिर चलने से मालूम होता है कि इन दोनों को इसी समय किसी खास जगह पर पहुंचने या किसी से मिलने की ज्यादे जरूरत है। हमारे पाठक इन दोनों औरतों को बखूबी पहचानते हैं इसलिए इनकी सूरत-शक्ल के बारे में कुछ लिखने की जरूरत नहीं, क्योंकि इन दोनों में से एक तो किन्नरी है और दूसरी कमला।

किन्नरी - कमला, देखो किस्मत का हेर-फेर इसे कहते हैं। एक हिसाब से गयाजी में हम लोग अपना काम पूरा कर चुके थे मगर अफसोस!

कमला - जहां तक हो सका तुमने किशोरी की मदद जी-जान से की, बेशक किशोरी जन्म-भर याद रखेगी और तुम्हें तो अपनी बहन मानेगी। खैर कोई चिंता नहीं, हम लोगों को हिम्मत न हारनी चाहिए और न किसी समय ईश्वर को भूलना चाहिए। मुझे घड़ी-घड़ी बेचारे आनंदसिंह की याद आती है। तुम पर उनकी सच्ची मुहब्बत है मगर तुम्हारा कुछ हाल न जानने से न मालूम उनके दिल में क्या-क्या बातें होंगी, हां अगर वे जानते कि जिसको उनका दिल प्यार करता है वह फलानी है तो बेशक वे खुश होते।

किन्नरी - (ऊंची सांस लेकर) जो ईश्वर की मर्जी!!

कमला - देखो वह उस पुराने मकान की दीवार दिखाई देने लगी।

किन्नरी - हां ठीक है, अब आ पहुंचे।

इतने ही में वे दोनों एक ऐसे टूटे-फूटे मकान के पास पहुंचीं जिसकी चौड़ी-चौड़ी दीवारें और बड़े-बड़े फाटक कहे देते थे कि किसी जमाने में यह इज्जत रखता होगा। चाहे इस समय यह इमारत कैसी ही खराब हालत में क्यों न हो तो भी इसमें छोटी-छोटी कोठरियों के अलावे कई बड़े दालान और कमरे अभी तक मौजूद हैं।

ये दोनों उस मकान के अंदर चली गईं। बीच में चूने-मिट्टी-ईंटों का ढेर लगा हुआ था जिसके बगल में घूमती हुई दोनों एक दालान में पहुंचीं। इस दालान में एक तरफ एक कोठरी थी जिसमें जाकर कमला ने मोमबत्ती जलाई और चारों तरफ देखने लगी। बगल में एक अलमारी दीवार के साथ जुड़ी हुई थी जिसमें पल्ला खींचने के लिए दो मुट्ठे लगे थे। कमला ने बत्ती किन्नरी के हाथ में देकर दोनों हाथों से दोनों मुट्ठों को तीन-चार दफे घुमाया, तुरंत पल्ला खुल गया और भीतर एक छोटी-सी कोठरी नजर आई। दोनों उस कोठरी के अंदर चली गईं और उन पल्लों को फिर बंद कर लिया। उन पल्लों में भीतर की तरफ भी उसी तरह खोलने और बंद करने के लिए दो मुट्ठे लगे हुए थे।

इस कोठरी में तहखाना था जिसमें उतर जाने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां बनी हुई थीं। वे दोनों नीचे उतर गईं और वहां एक आदमी को बैठे देखा जिसके सामने मोमबत्ती जल रही थी और वह कुछ लिख रहा था।

इस आदमी की उम्र लगभग साठ वर्ष के होगी। सिर और मूंछों के बाल आधे से ज्यादे सफेद हो रहे थे, तो भी उसके बदन में किसी तरह की कमजोरी नहीं मालूम होती थी। उसके हाथ-पैर गठीले और मजबूत थे तथा चौड़ी छाती उसकी बहादुरी को जाहिर कर रही थी। चाहे उसका रंग सांवला क्यों न हो मगर चेहरा खूबसूरत और रोबीला था। बड़ी-बड़ी आंखों में जवानी की चमक मौजूद थी, चुस्त मिर्जई उसके बदन पर बहुत भली मालूम होती थी, सिर नंगा था मगर पास ही जमीन पर एक सफेद मुंड़ासा रखा हुआ था जिसके देखने से मालूम होता था कि गरमी मालूम होने पर उसने उतारकर रख दिया है। उसके बायें हाथ में पंखा था जिसके जरिये वह गरमी दूर कर रहा था मगर अभी तक पसीने की नमी बदन में मालूम होती थी।

एक तरफ ठीकरे में थोड़ी-सी आग थी जिसमें कोई खुशबहार चीज जल रही थी जिससे वह तहखाना अच्छी तरह सुगंधित हो रहा था। कमला और किन्नरी के पैर की आहट पा वह पहले ही से सीढ़ियों की तरफ ध्यान लगाये था, और इन दोनों को देखते ही उसने कहा, ''तुम दोनों आ गईं'

कमला - जी हां।

आदमी - (किन्नरी की तरफ इशारा करके) इन्हीं का नाम कामिनी है

कमला - जी हां।

आदमी - कामिनी! आओ बेटी, तुम मेरे पास बैठो। मैं जिस तरह कमला को समझता हूं उसी तरह तुम्हें भी मानता हूं।

कामिनी - बेशक कमला की तरह मैं भी आपको अपना सगा चाचा मानती हूं।

आदमी - तुम किसी तरह की चिंता मत करो। जहां तक होगा मैं तुम्हारी मदद करूंगा। (कमला की तरफ देखकर ) तुझे कुछ रोहतासगढ़ की खबर भी मालूम है?

कमला - कल मैं वहां गई थी मगर अच्छी तरह मालूम न कर सकी। आपसे यहां मिलने का वादा किया था इसलिए जल्दी लौट आई।

आदमी - अभी पहर भर हुआ मैं खुद रोहतासगढ़ से चला आता हूं।

कमला - तो बेशक आपको बहुत कुछ हाल वहां का मिला होगा।

आदमी - मुझसे ज्यादे वहां का हाल कोई नहीं मालूम कर सकता। पच्चीस वर्ष तक ईमानदारी और नेकनामी के साथ वहां के राजा की नौकरी कर चुका हूं। चाहे आज दिग्विजयसिंह हमारे दुश्मन हो गये हैं। फिर भी मैं कोई काम ऐसा न करूंगा जिससे उस राज्य का नुकसान हो, हां तुम्हारे सबब से किशोरी की मदद जरूर करूंगा।

कमला - दिग्विजयसिंह नाहक ही आपसे रंज हो गये।

आदमी - नहीं, नहीं, उन्होंने अनर्थ नहीं किया। जब वे किशोरी को जबर्दस्ती अपने यहां रखा चाहते हैं और जानते हैं कि शेरसिंह ऐयार की भतीजी कमला किशोरी के यहां नौकर है और ऐयारी के फन में तेज है, वह किशोरी के छुड़ाने के लिए दाव-घात करेगी, तो उन्हें मुझसे परहेज करना बहुत मुनासिब था चाहे मैं कैसा ही खैरख्वाह और नेक क्यों न समझा जाऊं। उन्होंने कैद करने का इरादा बेजा नहीं किया। हाय! एक वह जमाना था कि रणधीरसिंह (किशोरी का नाना) और दिग्विजयसिंह में दोस्ती थी, मैं दिग्विजय के यहां नौकर था और मेरा छोटा भाई तुम्हारा बाप (ईश्वर उसे बैकुण्ठ दे) रणधीरसिंह के यहां रहता था। आज देखा कितना उलट-फेर हो गया है। मैं बेकसूर कैद होने के डर से भाग तो आया मगर लोग जरूर कहेंगे कि शेरसिंह ने धोखा दिया।

कमला - जब आप दिल से रोहतासगढ़ की बुराई नहीं करते तो लोगों के कहने से क्या होता है, वे लोग आपकी बुराई क्योंकर दिखा सकते हैं।

शेर - हां ठीक है खैर इन बातों को जाने दो, हां कुंदन बेचारी को लाली ने खूब ही छकाया, अगर मैं लाली का एक भेद न जानता होता और कुंदन को न कह देता तो लाली कुंदन को जरूर बर्बाद कर देती। कुंदन ने भी भूल की, अगर वह अपना सच्चा हाल लाली को कह देती तो बेशक दोनों में दोस्ती हो जाती।

कमला - कुछ कुंअर इंद्रजीतसिंह का भी हाल मालूम हुआ?

शेर - हां मालूम है, उन्हें उसी चुड़ैल ने फंसा रखा है जो अजायबघर में रहती है।

कमला - कौन-सा अजायबघर?

शेर - वही जो तालाब के बीच में बना है और जिसे जड़बुनियाद से खोदकर फेंक देने का मैंने इरादा किया है, यहां से थोड़ी ही दूर तो है।

कमला - जी हां मालूम हुआ, उसके बारे में बड़ी-बड़ी विचित्र बातें सुनने में आती हैं।

शेर - बेशक वहां की सभी बातें ताज्जुब से भरी हैं। अफसोस, न मालूम कितने खूबसूरत नौजवान बेचारे बेदर्दी के साथ मारे गये होंगे!

इतने ही में छत के ऊपर किसी के पैर की आहट मालूम हुई। तीनों का ध्यान सीढ़ियों पर गया।

कमला - कोई आता है।

शेर - हमें तो यहां किसी के आने की उम्मीद न थी, जरा होशियार हो जाओ।

कमला - मैं होशियार हूं, देखिए वह आया!

एक लंबे कद का आदमी सीढ़ी से नीचे उतरा और शेरसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी उम्र चाहे जो भी हो मगर बदन की कमजोरी, दुबलेपन और चेहरे की उदासी ने उसे पचास वर्षों से भी ज्यादे उम्र का बना रखा था। उसके खूबसूरत चेहरे पर उदासी और रंज के निशान पाये जाते थे, बड़ी-बड़ी आंखों में आंसुओं की तरी साफ मालूम होती थी, उसकी हसरत भरी निगाहें उसके दिल की हालत दिखा रही थीं कि रंज, गम, फिक्र, तरद्दुद और नाउम्मीदी ने उसके बदन में खून और मांस का नाम नहीं छोड़ा केवल हड्डी ही बच गई हैं। उसके कपड़े भी बहुत पुराने और फटे हुए थे।

इस आदमी की सूरत से भलमनसी और सूधापन झलकता था मगर शेरसिंह उसकी सूरत देखते ही कांप गया। खौफ और ताज्जुब ने उसका गला दबा दिया। वह एकदम ऐसा घबड़ा गया जैसे कोई खूनी जल्लाद की सूरत देखकर घबड़ा जाता है। शेरसिंह ने उसकी तरफ देखकर कहा, ''अहा हा...आप...हैं! आइ...ए...!'' मगर ये शब्द घबराहट के मारे बिल्कुल ही उखड़े-पुखड़े शेरसिंह के मुंह से निकले।

उस आदमी ने कमला की तरफ इशारा करते हुए कहा, ''क्या यही लड़की?''

शेर - हां... आप... (कमला और कामिनी की तरफ देखकर) तुम दोनों जरा ऊपर चली जाओ, ये बड़े नेक आदमी हैं, मुझसे मिलने आये हैं, मैं इनसे कुछ बातें किया चाहता हूं।

कमला और कामिनी दोनों तहखाने से निकलकर ऊपर चली आईं। उस आदमी के आने और अपने चाचा को विचित्र अवस्था में देखने से कमला घबड़ा गई। उसके जी में तरह-तरह की बातें पैदा होने लगीं। ऐसे कमजोर, लाचार और गरीब आदमी को देखकर उसका ऐयारी के फन में बड़ा ही तेज और शेरदिल चाचा इस तरह क्यों घबड़ा गया और इतना क्यों डरा, वह इसी सोच में परेशान थी। बेचारी कामिनी भी हैरान और डरी हुई थी यहां तक कि घंटे भर बीत जाने पर भी उन दोनों में कोई बातचीत न हुई। घंटे भर बाद वह आदमी तहखाने से निकलकर ऊपर चला आया और कामिनी की तरफ देखकर बोला, ''अब तुम लोग नीचे जाओ, मैं जाता हूं।'' इतना कहता हुआ उसी तरह किवाड़ खोलकर चला गया जिस तरह कामिनी को साथ लिये हुए कमला इस मकान में आई थी।

कमला और कामिनी तहखाने के नीचे जा शेरसिंह के सामने बैठ गईं। शेरसिंह के चेहरे से अभी तक घबड़ाहट और परेशानी गई नहीं थी। बड़ी मुश्किल से थोड़ी देर में उसने होश-हवास दुरुस्त किये और कमला की तरफ देखकर कहा -

शेर - अच्छा अब हम लोगों को क्या करना चाहिए?

कमला - जो हुक्म हो सो किया जाय। यह आदमी कौन था जिसे देख आप...?

शेर - था एक आदमी, उसका हाल जानने का उद्योग न करो और न उसका खयाल ही करो बल्कि उसे बिल्कुल भूल जाओ।

उस आदमी के बारे में कमला बहुत कुछ जानना चाहती थी मगर अपने चाचा के मुंह से साफ जवाब पाकर दम न मार सकी और दिल की दिल में रखने पर लाचार हुई।

शेर - कमला, तू रोहतासगढ़ जा और दो-तीन दिन में लौटकर वहां का जो कुछ हाल हो मुझसे कह। किशोरी से मिलकर उसे ढाढ़स दीजियो और कहियो कि घबड़ाये नहीं। उसी रास्ते से किले के अंदर बल्कि उस बाग में जिसमें किशोरी रहती है चली जाइयो जिस राह का हाल मैंने तुमसे कहा था, उस राह से आना-जाना कभी किसी को मालूम न होगा।

कमला - बहुत अच्छा, मगर कामिनी के लिए क्या हुक्म होता है

शेर - मैं इसे ले जाता हूं, अपने एक दोस्त के सुपुर्द कर दूंगा। वहां यह बड़े आराम से रहेगी। जब सब तरफ से फसाद मिट जायगा मैं इसे ले आऊंगा, तब यह भी अपनी मुराद को पहुंच जायगी।

कमला - जो मर्जी!

तीनों आदमी तहखाने के बाहर निकले और जैसा ऊपर लिखा जा चुका है उसी तरह कोठरियों और दालानों में से होते हुए इस मकान के बाहर निकल आये।

शेर - कमला, ले अब तू जा और कामिनी की तरफ से बेफिक्र रह। मुझसे मिलने के लिए यह ठिकाना मुनासिब है।

कमला - अच्छा मैं जाती हूं मगर यह तो कह दीजिये कि उस आदमी से मुझे कहां तक होशियार रहना चाहिए जो आपसे मिलने आया था

शेर - (कड़ी आवाज में) एक दफे तो कह दिया कि उसका ध्यान भुला दे, उससे होशियार रहने की जरूरत नहीं और न वह तुझे कभी दिखाई देगा।

 

बयान - 14

रोहतासगढ़ किले के चारों तरफ घना जंगल है जिसमें साखू, शीशम, तेंदू, आसन और सलई इत्यादि के बड़े-बड़े पेड़ों की घनी छाया से एक तरह को अंधकार-सा हो रहा है। रात की तो बात ही दूसरी है वहां दिन को भी रास्ते या पगडंडी का पता लगाना मुश्किल था क्योंकि सूर्य की सुनहरी किरणों को पत्तों में से छनकर जमीन तक पहुंचने का बहुत कम मौका मिलता था। कहीं-कहीं छोटे-छोटे पेड़ों की बदौलत जंगल इतना घना हो रहा था कि उसमें भूले आदमियों को मुश्किल से छुटकारा मिलता था। ऐसे मौके पर उसमें हजारों आदमी इस तरह छिप सकते थे कि हजार सिर पटकने और खोजने पर भी उनका पता लगाना असंभव था। दिन को तो इस जंगल में अंधकार रहता ही था मगर हम रात का हाल लिखते हैं जिस समय उसकी अंधेरी और वहां के सन्नाटे का आलम भूले-भटके मुसाफिरों को मौत का समाचार देता था और वहां की जमीन के लिए अमावस्या और पूर्णिमा की रात एक समान थी।

किले के दाहिने तरफ वाले जंगल में आधी रात के समय हम तीन आदमियों को जो स्याह चौगे और नकाबों से अपने को छिपाये हुए थे घूमते देख रहे हैं। न मालूम ये किसकी खोज और किस जमीन की तलाश में हैरान हो रहे हैं! इनमें से एक कुंअर आनंदसिंह, दूसरे भैरोसिंह और तीसरे तारासिंह हैं। ये तीनों आदमी देर तक घूमने के बाद छोटी-सी चारदीवारी के पास पहुंचे जिसके चारों तरफ की दीवार पांच हाथ से ज्यादे ऊंची न थी और वहां के पेड़ भी कम घने और गुंजान थे, कहीं-कहीं चंद्रमा की रोशनी भी जमीन पर पड़ती थी।

आनंद - शायद यही चारदीवारी है!

भैरो - बेशक यही है, देखिए फाटक पर हड्डियों का ढेर लगा हुआ है।

तारा - खैर भीतर चलिए, देखा जायगा।

भैरो - जरा ठहरिये, पत्तों की खड़खड़ाहट से मालूम होता है कि कोई आदमी इसी तरफ आ रहा है!

आनंद - (कान लगाकर) हां ठीक तो है, हम लोगों को जरा छिपकर देखना चाहिए कि वह कौन है और इधर क्यों आता है।

उस आने वाले की तरफ ध्यान लगाये हुए तीनों आदमी पेड़ों की आड़ में छिप रहे और थोड़ी ही देर में सफेद कपड़े पहिरे एक औरत को आते हुए उन लोगों ने देखा। वह औरत पहले तो फाटक पर रुकी, तब कान लगाकर चारों तरफ की आहट लेने के बाद फाटक के अंदर घुस गई। भैरोसिंह ने आनंदसिंह से कहा, ''आप दोनों इसी जगह ठहरिये, मैं उस औरत के पीछे जाकर देखता हूं कि वह कहां जाती है।'' इस बात को दोनों ने मंजूर किया और भैरोसिंह छिपते हुए उस औरत के पीछे रवाना हुए।

ऐसे घने जंगल में भी उस चारदीवारी के अंदर पेड़, झाड़ी या जंगल का न होना ताज्जुब की बात थी। भैरोसिंह ने वहां की जमीन बहुत साफ-सुथरी पाई, हां छोटे जंगली बेर के दस-बीस पेड़ वहां जरूर थे जो किसी तरह का नुकसान न पहुंचा सकते थे और न उनकी आड़ में कोई आदमी छिप ही सकता था, मगर मरे हुए जानवरों और हड्डियों की बहुतायत से वह जगह बड़ी ही भयानक हो रही थी। उस चारदीवारी के अंदर बहुत-सी कब्रें बनी हुई थीं जिनमें कई कच्ची तथा कई ईंट-चूने और पत्थर की भी थीं और बीच में एक सबसे बड़ी कब्र संगमर्मर की बनी हुई थी।

भैरोसिंह ने फाटक के अंदर पैर रखते ही उस औरत को जिसके पीछे गए थे बीच वाली संगमर्मर की बड़ी कब्र पर खड़े और चारों तरफ देखते पाया, मगर थोड़ी देर में वह देखते-देखते कहीं गायब हो गई। भैरोसिंह ने उस कब्र के पास जाकर उसे ढूंढ़ा मगर पता नहीं लगा, दूसरी कब्रों के चारों तरफ और इधर-उधर भी खोजा मगर कोई निशान न मिला। लाचार वे आनंदसिंह और तारासिंह के पास लौट आये और बोले -

भैरो - वह औरत वहां ही चली गई जहां हम लोग जाया चाहते हैं।

आनंद - हां!

भैरो - जी हां।

आनंद - फिर अब क्या राय है

भैरो - उसे जाने दीजिये, चलिये हम लोग भी चलें। अगर वह रास्ते में मिल ही जायगी तो क्या हर्ज है एक औरत हम लोगों का कुछ नुकसान नहीं कर सकती।

ये तीनों आदमी उस चारदीवारी के अंदर गए और बीच वाली संगमर्मर की बड़ी कब्र पर पहुंचकर खड़े हो गए। भैरोसिंह ने उस कब्र की जमीन को अच्छी तरह टटोलना शुरू किया। थोड़ी ही देर में एक खटके की आवाज आई और एक छोटा-सा पत्थर का टुकड़ा जो शायद कमानी के जोर पर लगा हुआ था दरवाजे की तरह खुलकर अलग हो गया। ये तीनों आदमी उसके अंदर घुसे और उस पत्थर के टुकड़े को उसी तरह बंद कर आगे बढ़े। अब ये तीनों आदमी एक सुरंग में थे जो बहुत ही तंग और लंबी थी। भैरोसिंह ने अपने बटुए में से एक मोमबत्ती निकालकर जलाई और चारों तरफ अच्छी तरह निगाह करने के बाद आगे बढ़े। थोड़ी ही देर में यह सुरंग खत्म हो गई और ये तीनों एक भारी दालान में पहुंचे। इस दालान की छत बहुत ऊंची थी और इसमें कड़ियों के सहारे कई जंजीरें लटक रही थीं। इस दालान के दूसरी तरफ एक और दरवाजा था जिसमें से होकर ये तीनों एक कोठरी में पहुंचे। इस कोठरी के नीचे एक तहखाना था जिसमें उतरने के लिए संगमर्मर की सीढ़ियां बनी हुई थीं। ये तीनों नीचे उतर गये। अब एक बड़े भारी घंटे के बजने की आवाज इन तीनों के कान में पड़ी जिसे सुन ये कुछ देर के लिए रुक गये। मालूम हुआ कि इस तहखाने वाली कोठरी के बगल में कोई और मकान है जिसमें घंटा बज रहा है। इन तीनों को वहां और भी कई आदमियों के मौजूद होने का गुमान हुआ।

इस तहखाने में भी दूसरी तरफ निकल जाने के लिए एक दरवाजा था जिसके पास पहुंचकर भैरोसिंह ने मोमबत्ती बुझा दी और धीरे से दरवाजा खोल उस तरफ झांका। एक बड़ी संगीन बारहदरी नजर पड़ी जिसके खंभे संगमर्मर के थे। इस बारहदरी में दो मशाल जल रहे थे जिनकी रोशनी से वहां की हर एक चीज साफ मालूम होती थी और इसी से वहां दस-पंद्रह आदमी भी दिखाई पड़े जिनमें रस्सियों से मुश्कें बंधी हुई तीन औरतें भी थीं। भैरोसिंह ने पहचाना कि इन तीनों औरतों में एक किशोरी है जिसके दोनों हाथ पीठ की तरफ कसकर बंधे हुए हैं और वह नीचे सिर किए रो रही है। उसके पास वाली दोनों औरतों की भी वही दशा थी मगर उन्हें भैरोसिंह, आनंदसिंह या तारासिंह नहीं पहचानते थे। उन तीनों के पीछे नंगी तलवार लिए तीन आदमी भी खड़े थे जिनकी सूरत और पोशाक से मालूम होता था कि वे जल्लाद हैं।

उस बारहदरी के बीचोंबीच चांदी के सिंहासान पर स्याह पत्थर की एक मूरत इतनी बड़ी बैठी हुई थी कि आदमी पास में खड़ा होकर भी उस बैठी हुई मूरत के सिर पर हाथ नहीं रख सकता था। उस मूरत की सूरत-शक्ल के बारे में इतना ही लिखना काफी है कि उसे आप कोई राक्षस समझें जिसकी तरफ आंख उठाकर देखने से डर मालूम होता था।

भैरोसिंह, तारासिंह और आनंदसिंह उसी जगह खड़े होकर देखने लगे कि उस दालान में क्या हो रहा है। अब घंटे की आवाज बड़े जोर से आ रही थी मगर यह नहीं मालूम होता था कि वह कहां बज रहा है।

उन तीनों औरतों को जिनमें किशोरी भी थी छः आदमियों ने अच्छी तरह मजबूती से पकड़ा और बारी-बारी से उस स्याह मूरत के पास ले गए जहां उसके पैरों पर जबर्दस्ती सिर रखवाकर पीछे हटे और फिर उसी के सामने खड़ा कर दिया।

इसके बाद दो आदमी एक औरत को लेकर आगे बढ़े जिसे हमारे तीनों आदमियों में से कोई भी नहीं पहचानता था, उस औरत के पीछे जो जल्लाद नंगी तलवार लिए खड़ा था वह भी आगे बढ़ा। दोनों आदमियों ने उस औरत को स्याह मूरत के ऊपर इस जोर से ढकेल दिया कि बेचारी बेतहाशा गिर पड़ी, साथ ही जल्लाद ने एक हाथ तलवार का ऐसा मारा कि सिर कटकर दूर जा पड़ा और धड़ तड़पने लगा। इस हाल को देख वे दोनों औरतें जिनमें बेचारी किशोरी भी थी, बड़े जोर से चिल्लाईं और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ीं।

इस कैफियत को देखकर हमारे दोनों ऐयारों और कुंअर आनंदसिंह की अजब हालत हो गई। गुस्से के मारे थर-थर कांपने लगे। थोड़ी देर बाद उन लोगों ने किशोरी को उठाया और उस मूरत के पास ले चले। उसके साथ ही दूसरा जल्लाद भी आगे बढ़ा। अब ये तीनों किसी तरह बर्दाश्त न कर सके। कुंअर आनंदसिंह ने दोनों ऐयारों को ललकारा - ''मारो इन जालिमों को! ये थोड़े से आदमी हैं क्या चीज!''

तीनों आदमी खंजर निकाल आगे बढ़ना ही चाहते थे कि पीछे से कई आदमियों ने आकर इन लोगों को भी पकड़ लिया और ''यही हैं, यही हैं, पहले इन्हीं की बलि देनी चाहिए!'' कहकर चिल्लाने लगे।

(तीसरा भाग समाप्त)

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