बरगद के पेड़ पर झूला (बाल कहानी) : अनुराधा प्रियदर्शिनी
Bargad Ke Ped Par Jhoola (Baal Kahani) : Anuradha Priyadarshini
मम्मा मुझे बरगद के पेड़ पर झूला झूलना है जब हम आपके गाँव जाएँगे तो वहाँ झूलेंगे। स्कूल से आते ही शैली ने लाड़ दिखाते हुए कहा तो पार्थ ने भी जिद की हाँ माँ मैं भी दीदी के साथ बरगद के पेड़ पर झूला झूलूँगा।
ठीक है नीरू ने हँसते हुए कहा।
आपके गाँव में बरगद का पेड़ तो है न?
हाँ, बरगद ही नहीं इसके अलावा भी बहुत सारे पेड़ हैं जैसे पीपल,नीम, आम, अमरूद, बबूल और भी बहुत सारे पेड़ पौधे हैं।
बेलन नदी भी बहती है। मेरे गाँव में जिससे थोड़ी दूर पर ही आम और आँवले का एक भाग भी है।
हम कब वहाँ जाएँगे माँ……
हम सब कल यहाँ से प्रयागराज जाएँगे और फिर वहाँ से तुम्हारे नाना नानी के गाँव जाएँगे ।
शाम को मथुरा से प्रयागराज की ट्रेन है जो सुबह हमें प्रयागराज पहुँचा देगी उसके बाद वहाँ से हम लोग मिर्जापुर होते हुए घोरावल जाएँगे। घोरावल से लगभग एक किलोमीटर दूरी पर मेरा गाँव है मन्दहाँ……
अच्छा है……….
हम बहुत मस्ती करेंगे वहाँ पर
ठीक है तुम्हें वहाँ पर अपने जैसे बहुत सारे बच्चे भी मिलेंगे जिनके साथ तुम लोग खेलना।
नीरू भी सोच रही थी बच्चों को लेकर अपने गाँव जाए उसकी भी कितनी यादें जुड़ी हैं वहाँ से।
शाम को मथुरा स्टेशन से उनकी ट्रेन थी जो शाम साढ़े सात बजे आएगी। नीरू बच्चों के साथ स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रही थी। बच्चे भी स्टेशन पर आती-जाती गाड़ियों के डिब्बों को गिन रहे थे।
कभी कुरकुरे तो कभी चिप्स की डिमांड करते नीरू ने जंक फूड मना कर रखा था लेकिन कभी-कभी दे देती थी। अब ट्रेन एक घंटा देर से आने वाली थी प्लेटफार्म पर एनाउंस हुआ।
धीरे-धीरे समय अपने गति से बढ़ता गया और ट्रेन आ गयी। सभी अपने-अपने सीट पर बैठ गए। रात का समय था तो सभी यात्री सोने की तैयारी कर रहे थे। नीरू भी बच्चों को खाना खिलाने के बाद सो गयी। सुबह साढ़े चार बजे ट्रेन प्रयागराज स्टेशन पर पहुंच गई। दोनों बच्चे नानी के यहाँ जाने के लिए अति उत्साहित थे।
प्रयागराज से एक कैब बुक करके नीरू बच्चों को लेकर अपने गांव की ओर चल पड़ी।
रास्ते में चाय नाश्ता किया गया। बहुत दिनों के बाद आज सुबह-सुबह सुर्योदय की छटा अत्यंत मनोरम लग रही थी। चिड़ियों की चहचहाहट पेड़ों पर उछल-कूद करते बंदर दानों को बीन-बीनकर खाती छोटी-छोटी गिलहरी। दोनों बच्चे बहुत खुश हो रहे थे।
रास्ते में नदी नालों को पार करती गाड़ी दौड़ती चली जा रही थी। साढ़े दस बजे तक नीरू अपने घर के द्वार पर पहुँच गयी।
गाँव का घर किसी राजघराने से कम नहीं लग रहा था। बड़ा सा द्वार बरामदा आँगन पार करते हुए नीरू घर के अंदर पहुँच गयी। घर में अखण्ड रामायण का पाठ चल रहा था जिसने उत्सव का माहौल बना रखा था। बहुत सारे मेहमान आए हुए थे। बच्चे और बच्चों के साथ मिलकर खेलने लगे।
नीरू भी अपने माँ चाची बहनों और भाभी से मिलकर अत्यंत प्रसन्न थी। रामायण का पाठ लगभग समाप्त होने वाला था। पूजा के बाद आरती की तैयारी होने लगी। आरती के पश्चात सबके भोजन की व्यवस्था थी। आज पूरे दिन लोगों के आने जाने का चक्र चलता रहा।
बच्चे तो बस अभी भी बरगद का पेड़ देखने की जिद पर अड़े हुए थे। नीरू ने समझाया भी कि अभी थोड़ी देर रूको फिर चलेंगे और तुम्हें बरगद का पेड़ देखने को मिलेगा। तब तक और बच्चों के साथ मिलकर खेलो।
जो भी हो बच्चे गाँव के इस खुले माहौल में अत्यंत प्रसन्न थे और खूब धमाचौकड़ी मचा रहे थे।
शाम को जब सूरज और चाँद एक साथ छत पर दिखे तो शैली खुशी से नाचने लगी। कितना सुन्दर दृश्य है एक तरफ पश्चिम दिशा में सुर्यास्त हो रहा था तो दूसरी तरफ चंद्रमा अपनी शीतल चांदनी बिखेर रही थी।
गाँव चाहे जितना बदल गया हो आज भी वो आपको वैसे ही आत्मीयता से गले लगाता है कि तन और मन प्रसन्न हो जाता है।
शहरों के दौड़-भाग की जिंदगी में से सुकून के पल अगर पाना है तो अपने जड़ों की ओर लौटना अत्यंत आवश्यक है। खुला आसमान और मिट्टी हमें अपने संस्कारों और संस्कृति की जड़ों से जोड़ती है।
जब भीड़ थोड़ी कम हुई तो शैली अपने मम्मी मौसी और थोड़े और बच्चों के साथ भाग की ओर गए। बाग के रास्ते में एक बरगद का पेड़ था जिसकी जड़ें हवा से लहराते हुए जमीन को छू रही थी। उन्ही जड़ों को पकड़कर बच्चे झूला झूले और खूब मस्ती किए।
शैली बहुत खुश हो रही थी और बोल रही थी कि अपने दोस्तों को यहां की सारी बातें बताएगी।