बंदर ने की मदद (बाल-कहानी) : जयचन्द प्रजापति 'जय'
Bandar Ne Ki Madad (Hindi Children Story) : Jaychand Prajapati 'Jay'
एक धूप भरी सुबह, छोटा सा बच्चा रमेश अपने गाँव के पास वाले बाग में गया। वहाँ अमरूद के पेड़ों पर लाल-लाल चमकते अमरूद लटक रहे थे। रमेश का मन ललचा गया। "अरे वाह! कितने मीठे लग रहे हैं," उसने सोचा।
वह पेड़ के पास पहुँचा और कूदने लगा। एक छलांग, दो छलाँग... लेकिन अमरूद ऊँचे थे। हाथ छोटे पड़ जाते। रमेश ने डंडा उठाया, पत्थर फेंका, पर कुछ न हुआ। थककर वह नीचे बैठ गया और उदास हो गया।
तभी झाड़ियों से एक चतुर बंदर निकला। उसने रमेश की सारी हरकतें देख ली थीं। "अरे भइया, अमरूद चाहिए?" बंदर ने चहकते हुए पूछा। रमेश ने हामी भरी। बंदर झट से पेड़ पर चढ़ गया। उछल-कूद करता हुआ उसने ढेर सारे रसीले अमरूद तोड़ लिए और रमेश को दे दिए।
रमेश खुश हो गया। उसने बंदर को गले लगाया और उसके सिर पर हाथ फेरा। "तुम मेरे सच्चे दोस्त हो, बंदर भैया!" दोनों ने मिलकर कुछ अमरूद खाए। फिर रमेश बाकी अमरूद लेकर घर लौटा। रास्ते भर वह गुनगुनाता रहा – "दोस्ती में कोई ऊँच-नीच नहीं!"