बहुआयामी रचनाकार : सुब्रमण्यम भारती (आलेख) : मंगला रामचंद्रन

Bahuayami Rachnakar : Subramaniam Bharati (Article in Hindi) : Mangala Ramachandran

जब भी सुब्रमण्यम भारती जी का नाम दिमाग में कौंधता है तो उनके अनेकों रूपों में से दो रूप प्रमुखता से उभर कर सामने आतें हैं। एक कवि रूप और दूसरा देश भक्त, स्वतंत्रता सेनानी का।जब भी इस विषय पर चर्चा या बहस होती है कि उनका कवि रूप श्रेष्ठ है या देशभक्त का रूप तो हर बार बिना नतीजे के ही चर्चा समाप्त हो जाती है। क्योंकि चर्चाकार बहस के दौरान भारतीजी के अन्य अपरिमित गुणों को जानते चले जाते और चकित रह जाते और बहस अधूरी रह जाती।

भारतीजी का कविरूप तो उनके बचपन में जब वो मात्र सात वर्ष के थे तभी नज़र आ गया था। प्रकृति के सानिध्य में स्वयं को मुक्त कर छंदों की रचना करने लगे थे। ग्यारह वर्ष के बालक थे तभी से लम्बे एवं अर्थपूर्ण पद्ध रचने लगे थे। परिस्थिति के अनुसार तुरन्त कविता बनाना तो भारती जी चुटकी बजाते ही कर लेते थे पर उन्हें आशु कवि कहना कदापि उचित नहीं होगा।आशु कवि की रचनाएं कालजयी नहीं हुआ करतीं पर भारतीजी की तो इस तरह से बनी रचनाएं भी प्रसिद्ध और कालजयी हुईं हैं। भक्ति, प्रकृति, श्रंगार से लेकर देशप्रेम, स्वतंत्रता, राष्ट्रीय आंदोलन, राष्ट्रीय नायक - नायिकाएं, तामिलनाडु, तामिल भाषा के अलावा विदेशों के हालात और उनकी हस्तियों पर भी पद्ध रचना की है ।इतनी प्रचुर मात्रा के रचने के साथ रूक नहीं गये, बच्चों के लिए बालगीत, नीति एवं आदर्शों पर गीत, समाज के अलग -अलग वर्गों, नारी के लिए विशेषतः प्रगतिशील विचारों से युक्त,देवीय एवं वर्नाकुलर शिक्षा पर भी कविताएं लिखीं। भावुक तथा अति संवेदनशील भारतीजी का ध्यान जब कोई विषय या घटना अपनी ओर खींचती तो कदापि मां सरस्वती ही उनके मुखश्री से झरने लगती थी।

प्रकृति के साथ एक चित्त हो जाना और अपने आसपास से बेखबर होकर ऊंचे स्वरों में गाने लगना उनका प्रमुख गुण था। उनकी भावुकता का ये हाल था कि जब वे भक्ति संगीत का गीत रचते तो ईश्वर या दैवी की स्तुति में अश्रु स्वत: ही उनकी आंखों से बहने लगते।श्री गणेश, कृष्ण, कार्तिकेय (दक्षिण भारत में जिन्हें मुरुगन या षटाननम् कहा जाता है) से लेकर लगभग सभी देवी देवताओं पर उन्होंने गीत रचे हैं।इतना ही नहीं इन पद्ध रचनाओं को बाकायदा संगीत के रागों में पिरोकर गाया भी। मां सरस्वती पर रची रचनाओं को भावपूर्ण कोमल स्वरों वाले रागों में करूणा भरी आवाज में गाते तो दुर्गा और शक्ति स्वरूपा देवी की रचनाओं को आवेशपूर्ण रागों में गाते हुए स्वयं भी आवेश में आ जाते।अति स्पष्ट उच्चारण एवं गहन गंभीर ओजपूर्ण ध्वनि श्रवण करने वालों के मनों में भी जोश पैदा कर देता। राष्ट्रभक्ति और भारतमाता पर रचे गीत को भी इसी जोश के साथ गाते। सुनने वाले के ह्रदय की गहराइयों को छूने से उन्हें वो गीत आसानी से याद भी हो जाता।

हालांकि भारतीजी ने शास्रोक्त रूप में संगीत की शिक्षा नहीं ली थी पर मां शारदे का वरद् हस्त मानों उन पर सदैव रहा।शायद इसीलिए गीत रचते -रचते उसका समन्वय विशिष्ट राग से भी हो जाता था। महाभारत ग्रंथ के एक हिस्से को उन्होंने पांच अध्यायों में बांटा और पद्ध के रूप में खण्ड काव्य रच दिया।यह हिस्सा दुर्योधन की चालाकी से पाण्डवों को ध्यूत क्रीड़ा पर आमंत्रण से लेकर पांचाली (द्रौपदी) का शपथ लेने तक का वर्णन है।यह पुस्तक ' पांचाली शपथम् ॔ शीर्षक से बहुत प्रसिद्ध हुआ तथा पाठकों को बहुत पसंद आया और अभी भी आ रहा है।भारतीजी की पद्ध रचनाओं के अथाह सागर का यह सर्वश्रेष्ठ मोती माना जाता है। उनकी रची कविताओं और गीतों की विशाल संख्या वास्तव में चकित और स्तंभित कर देता है।

सन् 1929 में भारतीजी की कुछ कविताओं को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर प्रकाशित न होने देने की कोशिश की थी। उन्हीं में से कुछ कविताओं को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने अंग्रेजी में अनुवाद कर गांधीजी की 'यंग- इंडिया' पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। साबरमती आश्रम से निकलने वाली 'मधुपुड़' (शहद का छत्ता) नामक गुजराती पत्रिका में स्व. जगतराम दवे ने कुछ कविताओं के अनुवाद प्रकाशित किए थे।यह गीत अंग्रेजों के अत्याचार और भारत की गुलामी को असहनीय बताते हुए ह्दयद्रावक है जिसका शीर्षक है 'ह्दय सहन नहीं करेगा'। इस तरह कह सकतें हैं कि भारतीजी ने गुजराती भाषी लोगों के मन में भी जगह बना लिया था। वैसे इससे पहले सन् 1919 में भारतीजी जब महात्मा गांधीजी से प्रथम बार मिले थे तभी उन्होंने राजाजी से कह दिया था कि ये ऐसा हीरा है इसे संभाल कर रखना पड़ेगा।

सन् 1929 में भारतीजी के गीतों का अनुवाद पढ़ कर गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि बोल पड़े – ' इनकी रचनाओं से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।' भगवद्गीता का भारतीजी ने तामिल में अनुवाद किया था जिस पर गांधीजी ने गुजराती में प्रेम पूर्वक आशीर्वचन लिखा था। दक्षिण भारत में उन्हें एक महाकवि का ही रूप दिया गया है और कुछ एक लोग उनकी तुलना अंग्रेज महाकवि शेक्सपियर से करतें हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि इतनी प्रचुर मात्रा में पद्ध रचने वाले भारतीजी को प्रमुखता से कवि ही माना जाए?इस प्रश्न का उत्तर इतना सरल या सहज रूप में हां - ना कहने लायक कैसे हो सकता है,जब उनके गद्ध लेखन की मात्रा भी असीमित और अनेक रंगों और भावों में है। बच्चों को केन्द्र में रखकर लिखे उनके विशाल साहित्य में जीवन के आदर्शों और मूल्यों की पहल बच्चों पर ना तो थोपी हुई लगती है ना नीरस उपदेशात्मक । वैसे भी उनके लेखन में हास्य- व्यंग का प्राकृतिक पुट विषय के साथ ही गुंथा रहता है।उस काल में जब बच्चों के साहित्य के बारे में तो छोड़िए बच्चों पर बहुत अधिक ध्यान दिया ही नहीं जाता था।देश परतंत्रता की जंजीरों में जकड़ा हुआ था तब भारतीजी ने बच्चों को संबोधित करते हुए लिखा था, 'ओडी विलैयाडु पापा—' (बच्चों,खेलों कूदो, क्रियाशील रहो) का आव्हान किया था।उनकी ये सोच उन्हें अपने समय से बहुत आगे ले जाता है, प्रगतिशीलता की ओर।

साहित्य की हर विधा पर भारतीजी ने अपनी लेखनी का चमत्कार दिखाया है।इतनी आसानी और खूबसूरती से कलम का उपयोग किया कि उनकी अधिकांश रचनाओं ने प्रशंसा और प्रसिद्धि पाई तथा इसी कारण कालजयी हुईं।यही नहीं ये रचनाएं वर्तमान युग में भी प्रासंगिक हैं।सन् 1910 के बाद उनका लेखन पत्र पत्रिकाओं के स्तंभ लेखन तक सीमित ना रहकर बहुत विस्तार पा गया।यही पुदूचेरी (पांडिचेरी) प्रवास का काल था इसी दौरान उन्होंने अपनी क‌ई पांडुलिपियों को प्रकाशन हेतु पूर्ण किया। इनमें से प्रमुख है भगवदगीता का तामिल अनुवाद, जिससे मात्र तामिल पढ़ने वाले भी भागवत का सार और महत्व जान पाएं।इसी दौरान उनका खंडकाव्य ' पांचाली शपथम्' भी प्रकाशित हुई थी। इसमें द्रौपदी की पीड़ा को उन्होंने जिस तरह व्यक्त किया है वो उनके मन में महिलाओं के प्रति करुणा एवं अन्य कोमल भावनाओं का आभास कराता है।

द्रौपदी में उन्होंने भारत माता की प्रतिच्छवि देखी तथा कौरवों को अंग्रेज सरकार के रुप में। इस काव्य में उन्होंने द्रौपदी के विलाप के साथ काव्य समाप्त कर दिया। इसके बारे में स्वयं भारती जी का कहना था कि एक सती स्त्री के विलाप और त्रासदी के बाद कोई कुछ भी कहे या समझाए उसका ना कोई अर्थ होता है और ना औचित्य।

भारतीजी का बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व उनकी रचनाओं में नज़र आता है।पर वे मात्र एक उच्च कोटि के साहित्यकार ही नहीं थे ,उनके जीवन के रेखाचित्र का अध्ययन करतें हैं तो अनेक रूप दिखतें हैं।मसलन स्वतंत्रता सेनानी,समाज सुधारक, बच्चों की चिंता और परवाह करने वाले, स्त्री के प्रति उदारमना और उच्च विचार के स्वामी,एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के स्वामी तथा हिन्दी के कविवर निराला की तरह फक्कड़ तबीयत के।पत्र पत्रिकाओं की सम्पादकीय तो परिवार पालने के लिए करना ही था पर इसे मात्र नौकरी की तरह नहीं वरन् एक मिशन या पवित्र उद्देश्य की तरह करते थे।हर रूप में उनका देशप्रेम और प्रगतिशील विचारों के दर्शन हो ही जाते। उनके जैसे उत्साही और जोखिम उठाने को तैयार व्यक्ति के देश के लिए देखे सपने और द्रष्टि भी अति विशाल थे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं!

भारतीजी को सदैव लगता था कि देश में मेधा की कोई कमी नहीं है और भारत आजाद होने के बाद एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बन सकता है। भले अपने पिता की तरह वो गणित एवं विज्ञान में रुचि नहीं रखते थे पर इन विषयों की अहमियत को समझते थे।भाषा और साहित्य में भी मात्र तामिल के विद्वान बन कर संतुष्ट नहीं हो ग‌ए थे। संत त्यागराज महाराज के गायन को समझने के लिए उन्होंने तेलूगू सीखी। अंग्रेजी भाषा का ज्ञान तो उन्हें मिडिल स्कूल से हो गया था,समय आने पर फ्रेंच और जर्मन भी सीखी । पूरे देश को ही नहीं समस्त विश्व को बंधुत्व में बंधे हुए देखना चाहते थे।असंभव शब्द से दूरी बनाए रखते थे कदाचित इसीलिए उनके कल्पना चित्र इतने विशाल हुआ करते थे। असंभव की तरह झूठ शब्द उनके आसपास भी फटक नहीं सकता था।अपनी बाल रचनाओं में बच्चों के लिए एक आदर्श स्वरूप की उनकी कल्पना वास्तविक जीवन में भी वैसी ही थी चाहे वो उनकी दोनों पुत्रियों के लिए हों या अन्य बच्चों के लिए हों। गांधीजी ने ' नवजीवन ' पत्रिका में विधवाओं के दुःखी जीवन पर लेख लिखा था और उनके दुःख दूर करने के कुछ उपाय भी बताए थे।पर गांधीजी विधवाओं के पुनर्विवाह के खिलाफ थे।

भारतीजी उनके इस विचार से असहमत थे ,उनका कहना था कि ॑ विधवा या विधुर अपने वय और काबिलियत के अनुसार साथी चुन कर पुनर्विवाह करें।नारी को पुनर्विवाह की स्वीकृति मिलने से उसके खिलाफ हो रहे अन्याय एवं अत्याचार को रोक सकतें हैं।ये दृष्टांत बताता है कि भारतीजी जैसा सोचते थे, जैसा लिखते थे वहीं जीते भी थे। अर्थात् साहसी और स्पष्टवादी जो काले को काला और सफेद को सफेद कहने में संकोच न करे।

मद्रास (चेन्नई) में वाय .एम .सी .ए में गांधीजी का उदबोधन था जहां उन्होंने युवाओं से ग्यारह तरह के व्रत लेने का संकल्प कराया। इसकी प्रशंसा करते हुए भारतीजी ने तराज़ू नामक पत्रिका में लिखा, मैं एक बारहवां संकल्प लेने को कहता हूं कि अगर कोई आपको मारने की पहल करें तो चुप चाप स्वीकार नहीं करें। ये अहिंसा नहीं कायरता होगी। उन्होंने तो मृत्यु देवता पर भी कविता रचते हुए कहा था कि तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ऐसा दुस्साहस एक साहसी, निर्मल ह्रदय और स्पष्टवादी ही कर सकता है। परिवार पालने के लिए कलम पर निर्भर रहने वाले भारतीजी ने 'स्वदेश मित्रन 'पत्रिका इसीलिए छोड़ी कि अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर लिख नहीं पा रहे थे और तीखे वार भी नहीं कर पा रहे थे।सन् 1904 में पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित बाल गंगाधर तिलक के विचार जानते रहे और उनसे प्रभावित होने लगे।सन् 1907 में सूरत अधिवेशन में उनके दर्शन कर, मिलकर एवं उनका ओजपूर्ण भाषण सुनकर उनके तीव्रवादी विचारों के पक्षधर हो गये।तभी उन्होंने इंडिया पत्रिका में नौकरी कर ली और अपने उग्र सटीक संपादकीय,वीर रस के गीत, आलेखों वो कार्टून द्वारा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ डंका बजाने लगे।

देश के सभी बड़े नेताओं से प्रभावित थे और अरविंद घोष के साथ पुदूचेरी में विपिनचंद्र पाल से मुलाकात के बाद उनसे लगातार संपर्क में और चर्चारत रहे। स्वामी विवेकानंद के तो भक्त थे और उनके असमय मृत्यु से दुःख के सागर में डूब गये थे। विवेकानंद की तरह उन्होंने युवाओं में देशप्रेम की अलख जगा कर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम और देश सेवा से जोड़ा। दक्षिण भारत के अनेकों युवा भारती के आव्हान पर इस पुनीत कार्य में जुट गए। भारतीजी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेखन एवं वाक चातुर्य से बहुत प्रभावित थे ही उनके रवीन्द्र संगीत से भी लगाव था। गुरूदेव से बीस वर्ष छोटे भारतीजी गुरूदेव से बीस वर्ष पूर्व मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। गुरूदेव चेन्नई में एनीबेसेंट के घर में रूकते थे और एनीबेसेंट भारती को अच्छे से जानती ही नहीं थी वरन् उन्हें जेल से रिहा करवाने में भी उन्होंने मदद की थी।पर कभी ऐसा संयोग ही नहीं बना कि दोनों महान विभूतियां आमने सामने मिलती।

भारतीजी के लिए कर्म ही प्रधान था ,इसे समझने के लिए उनके विशाल हृदय की थाह पाने से पता लग जाता है।वो जिस तरह किसी के विशेष और अच्छा कार्य करने पर दिल खोलकर प्रशंसा करते थे और प्रभावित हो जाते थे वो भी बिना किसी पूर्वाग्रह या ग्रंथि के फिर वो व्यक्ति किसी भी जाति या धर्म या संप्रदाय का हो।भले ही इस कारण से क‌भी- कभी संकट में भी पड़ जाते थे। उन्होंने अल्लाह, गुरुनानक,ईसामसीह पर भी गीत रचे और भक्ति भाव से प्रस्तुत भी किया। जिस तरह सारे धर्मों को समान रूप से सम्मान देते थे संगीत के समस्त रूपों को भी इसी तरह मानते थे। उनके हिसाब से कानों को मधुर लगने वाला हर संगीत श्रेष्ठ है चाहे वो भारतीय हो या पाश्चात्य।

उन दिनों पुदूचेरी (पांडिचेरी) में प्रत्येक गुरुवार को समुद्र तट के एक खास हिस्से पर एक घंटे तक फ्रैंच बैंड बजाया जाता था।भारतीजी सपरिवार तथा अपनी मानसपुत्री यदुगिरी के साथ रेत पर बैठ कर आनंद उठाते।उनकी पुत्रियां तंगम और शकुन्तला उनसे पाश्चात्य संगीत की विशेषता एवं भारतीय संगीत से उसकी भिन्नता आदि के बारे में प्रश्न करतीं और भारतीजी बड़ी सहजता से उनका समाधान कर देते थे। ऐसे में एक दिन बच्चों ने कहा—ऺ कल सरस्वती पूजा है, आप बैंड वाली धुन पर देवी के लिए एक रचना तैयार कर सकतें हैं क्या?'

पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब मिला —ऺ हां हां, क्यों नहीं! '

उधर बैंड पर धुन बदली तो यदुगिरी बोली— ' इस धुन पर लक्ष्मी जी की स्तुति गाएं तो बहुत अच्छा लगेगा।'

'इस धुन पर भी तैयार हो जाएगा।'—-बिना झिझके तुरन्त बोल पड़े ।

धन की कमी से सदा परेशान रहने वाली चेल्लमा ,भारती जी की पत्नी, बोली—ऺ सुना है काशी, कलकत्ता में इन दिनों काली व दुर्गा देवी की पूजा होती है,हम लोग भी इन देवियों की पूजा व स्तुति करें तो शायद सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाए।'

भारतीजी मुस्कुरा दिए और अगले ही दिन तीनों देवीयों पर एक -एक स्तुति गीत बनाकर उन्हें पाश्चात्य धुनों में बांध कर सुना भी दिया। उन जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व के लिए शायद कुछ भी असंभव नहीं था। देश और देशवासियों के लिए उनके मन में, दिमाग में ढेरों सपने थे जो अवश्य पूरे होते अगर उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती। वर्तमान में महिलाओं ने जो प्रगति की है उसे देख कर प्रसन्न होते और जो अत्याचार हो रहें हैं उससे उबल पड़ते इसमें कोई संदेह नहीं होगा। उनके लिए स्त्री और पुरुष दो आंखों के सद्दश्य थे, जिन्हें समान अवसर मिलना चाहिए और शुचिता का पैमाना भी समान होना चाहिए।अपनी मां को बाल्यकाल में खो देने से प्रत्येक स्त्री में मां की छवि और ममता की खोज करते थे। स्त्री का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।

बच्चों को ओडी विलैयाडु पापा का संदेश देने वाले भारतीजी वर्तमान में बच्चों की क‌ई क्षेत्रों में एक साथ दक्षता देख पाते तो प्रसन्न होकर स्वयं भी बच्चे बन जाते। शारीरिक रूप से कमजोर और शारीरिक खेलों से कुछ दूर रह जाने का भारतीजी को दुःख था। उन्होंने जो उपलब्धि हासिल की वो अपने मनोबल और दृढ़ चरित्र और दृढ़ निश्चय से प्राप्त किया।

11 सितंबर 1921 में उनकी मृत्यु पर 'दैनिक हिन्दू' समाचार पत्र के संपादकीय में प्रकाशित हुआ ' वरकवि ' ( अर्थात् ईश्वर से कवित्व का वर प्राप्त किए हुए) श्री सुब्रमण्यम भारती की अकाल मृत्यु से देश ने एक स्वस्फूर्त पैदाइशी कवि एवं देशभक्त को खो दिया। इस हानि की पूर्ति नहीं हो सकती।'

तामिलनाडु के प्रिय पुत्र,शारदे मां के आशीर्वाद से ओतप्रोत, दूरद्रष्टा, उत्साह से भरपूर, हमारे प्रेरणा पुंज का असमय,अल्पवय में निधन मात्र तामिलनाडु ही नहीं पूरे देश के लिए ऐसी हानि का सूचक है जिसकी भरपाई होना लगभग असंभव है। पर हम मायूस या निराश नहीं हैं और हमारी आशाएं अभी तो उनकी अमर रचनाओं द्वारा सदियों तक जीवित रहेंगी इसमें तनिक भी संदेह नहीं । पंजाबी भाषी प्रोफेसर श्री करमजीत घटवाल जी ने भारती जी की कविताओं को पंजाबी में अनुवाद कर मात्र भारत ही नहीं विश्व के पंजाबी भाषी लोगों को उनसे जोड़ दिया । यह इस लिए संभव हुआ कि भारती जी की अर्थपूर्ण और ओजस्वीनी लेखनी ने उन प्रोफेसर को प्रभावित किया । उनकी अमर रचनाओं का खज़ाना उनकी उपस्थिति का एहसास सदा कराती रहतीं हैं और हम आश्वस्त हैं कि भविष्य में भी सदियों तक कराती रहेंगी।

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