बदली छंटी (कहानी): मंगला रामचंद्रन
Badli Chhanti (Story in Hindi) : Mangala Ramachandran
राकेशजी का जब सेवानिवृत्ति का समय करीब आने लगा तो वो पहले से अधिक खुश रहने लगे। उनके साथी और परिचित आश्चर्य करते कि दो बच्चों की उच्च शिक्षा तो पूर्ण नहीं हुई है और ये तो ऐसे प्रसन्न मानों लॉटरी जीत ली हो। अत्यंत ईमानदारी से सरकारी नौकरी करने के बाद मात्र आधी तनख्वाह, जिसे पेंशन कहा जाता है, में गुजारे की चिंता करने के बजाय? आखिर उनके करीबी मित्रों ने उनके खुशी का राज़ जानने के लिए तरह-तरह से घेरा। पर राकेशजी तो उन दिनों अपने आप में या कहें अपने बनाये कल्पना के ऊँचे सतरंगी आसमान में खोये हुए यूं विचर रहे थे कि उन्हें जो सामने था वो भी नज़र नहीं आ रहा था। पत्नी अवश्य स्वयं भी परेशान थी और राकेशजी को बार-बार चेताती रहती थी कि सेवानिवृत्ति के बाद घर कैसे चलेगा! कहीं पार्ट टाईम नौकरी ही कर लें वो स्वयं भी घर से कोई कार्य प्रारंभ कर देगी तो किसी तरह जीवन की गाड़ी खींच लेगें।
‘अरे भई, इतना क्यों परेशान होती हो, पेंशन नहीं आयेगी क्या?’
‘ऊहं पेंशन, जब तनख्वाह में ही खींचतान कर-कर के किसी तरह इज्जत बचाई है तो इस आधी रकम से आपको लगता है नैया पार हो जायेगी?’
‘सभी लोग तो यही करते है, हम सबसे अलग थोड़ी ना हैं, जैसे सब पलते हैं, हमारा भी कुछ न कुछ हो ही जायेगा।' – राकेशजी कुछ रूक रूक कर अपनी बात पूरी करते हुए बोले।
पत्नी माथे को हथेली से ठोंकते हुए बोली - आपको सही में आपके साथी कर्मचारियों और आपके बीच का फर्क समझ नहीं आता है या समझ कर अनदेखा करना चाहते हैं।'
‘ललिता, तुम समझ क्यों नहीं रही हो, जब ईमानदारी का टोकरा उठाने का बीड़ा मैंने उठाया है तो मैं उनकी बराबरी भी नहीं कर सकता। लेकिन मेरे जैसे भी तो कुछ लोग हैं ना?
ललिता ने उनकी बात काटते हुए कहा – ‘हां हैं ना, और ऐसे जो भी हैं उनके पास या तो पुरखों की जमीन या कोई अन्य तरह की सम्पत्ति है। पर हमारे पास क्या है, मात्र आपकी मासिक आमदनी के। उसमें इतना कुछ बचता भी तो नहीं है कि मैं बच्चों के भविष्य को लेकर कोई बड़ी या अच्छी योजना बनाऊँ। आप ही बताईये बच्चे इतनी मेहनत से पढ़ रहे हैं पर भविष्य के सुरंग में कहीं जरा सी भी रोशनी नज़र आ रही है क्या?
ये रोदन लगभग प्रतिदिन का होता जा रहा था। राकेशजी पत्नी की बात नहीं समझ पा रहें हो ऐसा भी नहीं था, पर करें तो क्या करें। सरकारी नौकरी में रहते हुए जनता के साथ होते व्यवहार को देख वो कितनी बार द्रवित हुए, तभी से उनके मन में एक सेवाभावी इच्छा ने करवट ली थी। जब सेवानिवृत्ति होगें तो इन दिशा और दशाविहिन लोगों को आवेदन लिखवाने से लेकर संबंधित विभाग तक पहुँचाने में मदद करेगें। इतना ही नहीं उनके कार्य ठीक से संपादित हो रहें हैं या नहीं, कोई एवज में बहुत बड़ी रकम की मांग तो नहीं कर रहा आदि का भी संज्ञान लेने का सोचा था। बेचारे पूरे-पूरे दिन सरकारी दफ्तरों के चक्कर में अपनी दिनचर्या और जीवन यापन के आवश्यक कार्यों को भी पूरे नहीं कर पाते। ये सिर्फ एक दिन या दो दिन की बात नहीं होती, अपना कार्य होने की आशा में महीनों आना-जाना करते। लेन-देन के लिए किसी तरह जुगाड़ करते तब तक उनकी कमर टूट चुकी होती है। एक डाक्युमेन्ट, एक रसीद या एक कागज के टुकड़े को पाने तक तो इनकी खुशी और हौसला खत्म हो चुका होता है और आंखें दुख और आंसुओं से धुंधला चुकी होती है।
‘एक बात बताईये, अगर आपके घर में बड़ी सी आग लगी हुई हो तो आप उसे बुझाने के काम में लगेंगे या यहां- वहां किसके यहां आग लगी है ये ढूढ़ेंगे?
राकेशजी एक अबोध बच्चे की तरह पत्नी की ओर देखने लगे। उनके चेहरे पर फैली बेचारगी और भोलापन देख ललिता को हंसी भी आई और खीझ भी उत्पन्न हुआ। वो सोचने लगी कि उन्हें देखकर कौन विश्वास करेगा कि वे क्लास वन के वरिष्ठ अफसर हैं। ललिता ने अपने स्वर को भरसक मुलायम रखते हुए समझाया
– ‘हमारे बड़े बेटे अनिल को अगले वर्ष कॉलेज में भर्ती करने की तैयारी करनी है। भले ही वो पढ़ाई में अच्छा छात्र है और अनथक मेहनत भी करता है पर एक अच्छे विश्वविद्यालय में उसे सही पढ़ाई करवाने के लिए हमारे पास धन है क्या? क्या ये हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम उसके भविष्य की योजना तरीके से, याने सही तरीके से बनायें।'
‘ललिता मैं भी समझता हूँ और कुछ वर्षों से इसके लिए कोशिश भी करता आ रहा हूँ। हर महीने एक निश्चित रकम इनकी शिक्षा के लिए ही जमा कर रहा हूँ। अगर फिर भी कम पड़े तो कुछ न कुछ करके इस कार्य को पूरा करूँगा, इतना विश्वास मुझ पर रखो।'
पता नहीं ललिता उनकी बात से कितनी संतुष्ट हुई पर कुछ तसल्ली मिली कि पति को बच्चों के भविष्य की और शिक्षा की चिंता है और उसके लिए प्रयास भी करते आ रहे हैं। पर फिर भी पेंशन में तो आमदनी आधी हो जायेगी तो समस्या तो फिर भी बनी रहेगी। उन लोगों का विवाह कुछ बड़ी उम्र में हुआ और बच्चे भी देर से हुए, जो भी हो बच्चों के भविष्य के लिए कौन माता-पिता चिंतित नहीं रहता है। ललिता को अपने पति पर उनकी ईमानदारी और काम के प्रति निष्ठा को देखते हुए सदैव गर्व ही होता है। पर उसे कोफ्त तब होती है जब राकेशजी के साथ ऐसे-ऐसे अफसरों को भी रिवार्ड और सम्मान मिलता है जो अपने वरिष्ठ की चापलूसी या मंहगे तोहफे से खुश रखा करते हैं। जिस समय ललिता के पति देर से आने का कह कर दफ्तर में अतिरिक्त कार्य निपटा रहे होते तब उनके ऐसे सह कर्मचारी बीवी के साथ थियेटर में फिल्में देख रहे होते या और कहीं ऐय्याशी में लगे होते। पति की इस उक्ति को मान कर मन को मार लेती कि ‘ईमानदारी और कठोर निष्ठापूर्ण कर्म करने का बीड़ा उठाया है तो .... ‘
कुछ दिन शांति से निकले और राकेशजी कुछ निश्चिंत से थे कि मानों उन्होंने पत्नी की समस्या का समाधान ही कर दिया हो। जरूरत मंदों की हर संभव सहायता करने की उनकी मंशा फिर सिर चढ़ने लगी थी। अपने पेंशन पेपर की तैयारी आदि के अलावा एक डायरी में लोगेां की मदद के मुददे पर भी बाकायादा बिंदुवार कुछ नोटस् बना कर रखते जा रहे थे। उनको पूरा विश्वास था कि पार्ट टाईम जॉब के साथ वो प्रतिदिन दो-तीन घंटे इस कार्य को दे सकेगें। उनकी यही आशावादी दृष्टिकोण उनसे कई बार पत्नी से बात करते हुए कहला देती है ‘हो जायेगा, भई’, या ‘कितनी चिंता करती हो, मैं कुछ न कुछ करूँगा, मुझ पर विश्वास नहीं है।'
ललिता वही तो जानना चाहती है, एक बार ये तो समझा दें कि सारी बातों का इंतज़ाम कैसे होगा जिससे वो स्वयं भी पति की तरह निश्चिंत हो जाये। ललिता को लगता है कि पति पर उनके दादी और मां का असर कुछ अधिक ही है। राकेशजी की दादी तो ललिता के इस घर में बहू बन कर आने के बाद तीन-चार वर्ष ही जीवित रहीं। पर वो सदा टी वी में पौराणिक या धार्मिक कथाओं से संबंधित सीरीयल ही देखती रहती थी। उन्हें अक्षरों का ज्ञान नहीं था और उम्र और परिस्थितियों के कारण एक तरह से घर परिवार में सिमट कर रहना पड़ा। तभी टी.वी. के घमाकेदार प्रवेश ने उन्हें एक नई ऊर्जा दे दी। उन दिनों दादाजी पत्नी को छेड़ा करते थे – ‘अरे वाह, तुम्हारी याददाश्त तो बहुत सुधर गई। भले ही अपनी, मेरी दवाई का समय भूल जाओ पर ये पता है कि राम वाली कथा कितने बजे से है और शिरडी के सांईं कितने बजे।'
‘ऐसा कुछ नहीं है, रोज-रोज देखती हूँ तो इतना तो मालूम ही होगा ना, अक्षर ज्ञान नहीं है तो क्या ! ' –दादी कुछ शर्माती हुई बोलती।
'आपको अक्षर ज्ञान या पढ़ने की क्या जरूरत है? अलग-अलग चैनल के नाम पता हैं, बस और क्या चाहिए ! '
– दादाजी के स्वर में संतुष्टि और शरारत का मिलाजुला पुट होता।
राकेशजी की मां इसलिए प्रसन्न रहतीं कि सास को टी. वी. के साथ उलझाने से घर के कार्य सम्पादित करने में बिना किसी रोकटोक के उनके काम होते जाते थे। राकेशजी की पत्नी ललिता को ये सारी बातें वैवाहिक जीवन के शुरूआत् में ही बता दी थीं। ललिता जब इस घर में ब्याह कर आई तो मात्र दादीजी ही जीवित थीं। पर वो जिस तरह आसन लगा कर अपने पसंदीदा कार्यक्रम टी.वी. पर तल्लीनता से देखती थीं वो उसने भी देखा है। वो अपने पोते राकेश को यदा कदा कहती – ‘बच्चे सिर्फ मैच ही देखता रहता है उससे सीखने को क्या मिलता है? मेरे साथ इनको देख कुछ भला ही होगा।'
ललिता को अपने पैंतीस वर्षीय पति को ‘बच्चा’ बुलाते हुए सुनना कौतुहल पैदा करता था। शायद वो समझदार बच्चे ही थे जो दादी का लिहाज कर के मुस्कुराते हुए चुप ही रहते। उनकी मां जरूर धीरे-धीरे भुनभनाती रहती – ‘ये नकली कहानियां? उस समय औरतें ऐसे कपड़े पहनती थीं, अचानक चमत्कार हो जाता है, पता नहीं सच क्या था? राकेशजी के पिताजी का देहांत दादाजी की मृत्यु के अगले वर्ष ही हो गई थी सो ललिता ने उनको रूबरू कभी देखा नहीं। बेचारी दादी किस चमत्कार की आशा करते हुए श्री चरणों में चली गईं, पता नहीं, पर पड़पोते का मुंखड़ा देखकर गईं। ललिता को उनकी याद कभी-कभाध इसलिए भी आ जाती है कि उसकी सास का आसन भी धीरे धीरे टी.वी. के सामने जमने लगा। दादी और इनमें फर्क ये रहा कि ये उनके देखे कार्यक्रम के अलावा और भी बहुत कुछ देख लेती हैं। दोनों में समानता थी तो यही कि जहां चमत्कार होने की गुंजाइश होती तो लालायित नज़रे और भक्ति भाव कुछ अधिक ही उमड़ने लगता। फर्क था तो यही कि ये अपने पोतों को पास बैठ कर देखने को कहती तो दोनों कहते – ‘दादी आप ही देखिये ये स्टुपिड सी स्टोरिज़, समय की बर्बादी है, इसे देखना।'
‘अच्छा, मैं समय बर्बाद करती हूँ, सुना ललिता, तेरे बेटे क्या कह रहे हैं?’
अभी तक जो उनके लाड़ले पोते थे वो बहू के बेटे हो गये। ललिता को अपनी सास को संभालना और बिगड़ी बात को बनाना अच्छे से आता है। खिचड़ी लेकर आई और उनके सामने स्टूल पर रख दिया, और बोली –
‘क्या मां आप भी इन बच्चो से कहां उलझ रही हैं? बच्चे ही तो है, जीवन का अनुभव कहां है!
गर्म-गर्म खिचड़ी की भाप और सु्गंध ने उनके नथुनों में प्रवेश किया और उनका चेहरा चमक उठा – ‘ललिता तेरे हाथ में तो जादू है, कुछ भी बनाती है तो भूख अपने आप जाग जाती है।'
ललिता मुस्कुराते हुए कुछ बोलने को हुई तो बड़ा पोता बोल पड़ा – ‘दादी, जल्दी मत करना याद है पिछली बार जीभ जल गई थी ......’
दादी को गुस्सा और शर्म दोनों सम्मिलित रूप से महसूस हो रहा था और कुछ करारा जवाब देने का सोच ही रही थी कि छोटा पोता बोल पड़ा – ‘दादी, ये जो भगवान बने हुए हैं ना ये सिर्फ भगवान की एक्टिंग करते हैं। इनको इसके लिए बहुत पैसे मिलते हैं।'
‘हां, तो क्या हुआ? कोई राजा बनता है कोई मंत्री, मुझे पता है ये लोग नाटक करते हैं, अलग-अलग स्वांग भरते हैं।' – दादी ठसके से बोली।
’जब इनके पार्ट की शूटिंग हो जाती है तो ये ही सब एक्टर ड्रिंक और स्मोक करते हैं’ – ललिता उसको रोके तब तक तो उसने दादी को जान बूझ कर छेड़ दिया था।
ललिता ने दोनों बेटों को डांट कर वहां से हटा दिया और अपने आप को तैयार कर रही थी कि सास आगे क्या पूछ सकती है। उसने देखा वो अनमनी सी खिचड़ी खा रही हैं। उसे उनकी अज्ञानता और भोलेपन पर दया आ गई।
’मां, आप इन बच्चों की बातों को तूल देगें तो सिवाय उलझन और परेशानी के कुछ नहीं मिलेगा। खिचड़ी तो ठंडी हो गई होगी, गर्म कर लाऊँ क्या?’ – ललिता को स्नेह से देखते हुए बोली – ‘अरे नहीं रे, ऐसी भी ठंडी नहीं हुई, खा लूँगी। पर ये तो बता ये छोटा क्या बोल रहा था, समोक याने सिगरेट पीना ना। ये जो एक्टर हैं ये भगवान का रूप धर कर भी ये सब करते हैं?’ कुछ दिन नहीं करें तो क्या बिगड़ जायेगा।'
ये सीरीयल कितने महीनों चलते हैं, साल-साल भर से भी अधिक तो अचानक अपनी आदत को इतने लंबे समय तक बदल थोड़ी सकते हैं।'
ललिता की सास दो चार दिनों तक कुछ अनमनी खोई-खोई सी ही रहीं और ललिता को लगा कि दोनों बेटों ने यूं ही व्यर्थ में उन्हें विकल कर दिया। इन कहानियों को, इनके झूठे-सच्चे दावों और चमत्कारिक रूप से होते क्षण-प्रतिक्षण के बिंब अगर उन्हें खुशी प्रदान करते हैं तो बुरा क्या है! पांचवें ही दिन उनका आसन टी.वी. के सामने जम चुका था और उनकी लालायित नज़रों में उनके भक्तिभाव और चमत्कार के आस की झलक दिख रही थी। ललिता को कुछ तसल्ली हुई, साथ ही मन में ये विचार उठा कि सभी तो किसी न किसी रूप में किसी चमत्कार का ही तो इंतजार करते हैं। जब फिल्में देखते हैं तो अकेला नायक दर्जनों गुंड़ों या विलेन को पीट देता है तो भले ही इसकी सत्यता पर संदेह होते हुए भी मन को राहत तो मिलती है। वो जिस प्रदेश की है वहां उसके कॉलेज के दिनों में एक डाकू का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था। वो डाकू अमीरों को ही लूटता था और गरीबों की मदद करता था। हालांकि राकेशजी को जब ललिता ने ये किस्सा बताया तो उन्होंने यही कहा – ‘भले ही उसकी मंशा अच्छी और ठीक थी कि गरीबों की मदद करे, पर रास्ता और तरीका तो गलत ही है।'
खैर उनके बड़े बेटे का अच्छे कॉलेज में एडमिशन हो ही गया क्योंकि उसके मार्क्स अच्छे थे और इस कारण दोनों पति पत्नी प्रसन्न थे। राकेशजी कहते – ‘ललिता मैंने कहा था ना कि समय आने पर सब ठीक से हो जायेगा। तुम यूं ही अनावश्यक चिंता करती थी।'
ललिता कुछ बोली नहीं बस मुस्कुरा कर रह गई। अभी काम हो गया पर खर्चों में कितनी कतर ब्यौंत करके इंतज़ाम किया ये वो समझा नहीं सकती और राकेशजी समझ पायेगें इसकी आशा काम ही है। यही क्या कम है कि उनकी आशावादी सोच के अनुसार उन्हें पार्ट टाईम नौकरी भी मिल गई और उनके समाज सेवा वाले विचार को कुछ समय। पर ललिता के लिए एक अनचाहा सिर दर्द जरूर पैदा होने लगा था। राकेशजी जिनकी मदद की मंशा से काम कर रहे थे उनमें से कोई न कोई, मसलन कोई ऑटो रिक्शा ड्राईवर, छोटा-मोटा सीमांत किसान और जितने सेवकीय कार्य करने वाले, उनके दरवाजे पर दस्तक देता। कभी आवेदन पत्र देने तो कभी ये बताने की काम तो हो नहीं रहा उन्हें यूं ही इधर-उधर दौड़ाया जा रहा है। सर से कहिये कि वो फोन करे दें वर्ना कोई ध्यान नहीं देता है। ललिता मन मार के उन लोगों की बातें सुन लेती और चेहरे पर थकान या बोझिलता का चिन्ह नज़र न आये इसका ख्याल भी रखती। पर मन ही मन तय भी करती कि पति से कह कर इन लोगों को एक निश्चित समय पर आने का तय करेगी। आखिर इतनी मेहनत करने के बाद उसका अपने लिए भी तो कोई समय है जिसे वो शांत वातावरण में अपनी मर्जी से गुज़ारे।
तभी कुछ ऐसा हुआ कि राकेशजी स्वयं ही अपने समाज सेवा कार्य के परिणाम से सहम से गये। बेटा कॉलेज से लौटा तो गुस्से में तमतमाते हुए – ‘पापा, आप पता नहीं क्यों इन लोगों की मदद करना चाहते हैं?’
‘क्यों, ऐसा क्या हो गया जो तुम मुझसे ऐसे गुस्से में पूछ रहे हो?’
’आप को कहूँगा तो आप रोने लगेंगे।' – स्वयं को थोड़ा संयत कर के बोला – ‘कोई देवराज है जिसने आज मुझे रास्ते में रोका और कुटिल मुस्कान फेंकते हुए बोला – ‘अपने बाप से कह देना मेरा काम हो गया और पैसा उस एकाउंट में जमा कर दिया है, वो अपना हिस्सा ले लें।'
राकेशजी को ना गुस्सा आया न रोना, क्योंकि उन्हें तो बात ही समझ नहीं आई। एकाउंट और हिस्सा के क्या मायने होंगे।
पर उसने तुम्हें क्यों रोका, घर आकर मुझसे भी तो बात कर सकता है। मैं पता करता हूँ कि –
ललिता बिफर गई – ‘आपको कुछ भी समझ नहीं आ रहा है ना, और आयेगा भी नहीं। आप कितने भी ईमानदार हो, भलार्इ करने की सोच रखते हों पर जिन्हें आपको नीचा दिखाना हो वो कितना भी नीचा गिर सकते हैं। आपके नाम से पैसा लिया जा रहा है और आपको मालूम ही नहीं।'
‘पर कैसे? मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है ........ अभी भी राकेशजी हैरान परेशान से थे।
’पापा, मम्मी समझ गई और आपको इसमें जो चाल है वो दिख नहीं रही है, विश्वास नहीं होता कि ......’ बेटे की आवाज़ में निराशा की झलक साफ दिख रही थी।
देर से ही सही तब जाकर राकेशजी का माथा ठनका। ‘ओह, ये बात है! वो गोवर्धन मेरे नाम से ......... और सही में रोने लगे – ‘मैंने अनजाने में स्वयं पर दाग लगा लिया।
अगले कुछ दिनों तक घर में मुर्दनी छाई रही। स्थिति को किस तरह सामान्य किया जाये ये कोई समझ नहीं पा रहा था। राकेशजी की हालत ऐसी हो रही थी मानों उनसे कोई अपराध हो गया हो वो अपने ही घर के लोगों से मुंह छिपाये फिर रहे थे। ललिता से ये तनाव और घर का बोझिल वातावरण सहा नहीं जा रहा था। पति ना खाना ठीक से खा रहे थे और चार दिन में तो ऐसे लगने लगे मानों वर्षों से बीमार हों। उस दिन शाम के खाने के बाद ललिता ने दोनों बेटों को रोक लिया और पति से बात करने लगी।
‘आप हर बात को दिल से ऐसे लगा लेते हैं कि तकलीफ बढ़ती ही जाती है। दुख को जितना अधिक पालेगें उसका बोझ बढ़ता ही जायेगा। दुनिया क्या किसी एक गलती या एक दोष के कारण रूक जाती है?’
‘तुम क्या कहना चाह रही हो वो मैं समझ रहा हूँ पर जो दाग एक उजले दामन में लग गया उसे मिटा सकता हूँ क्या?’ – राकेशजी की आवाज़ मानों किसी गहरे कुंए से आ रही थी।
‘पापा आप तो बस एक ही बात को लेकर बैठ गये क्योंकि ये आपको पता लग गया, पर हो सकता है लोग हमारे बारे में ना जाने क्या-क्या बोलते होंगे जो हमें पता भी नहीं होगा। मैं, बंटी और मम्मी को तो आपकी सच्चाई का पता है और हम आपका आदर भी करते हैं। पर इससे बाहर नहीं निकलेंगे तो आप कुछ नहीं कर पायेंगे।'
बड़े बेटे जो अभी कॉलेज के तीसरे वर्ष में ही था, समझदारी से भरी बातें सुन कर तो ललिता भी चमत्कृत हो गई।
‘और क्या, सही तो कह रहा है बेटा। याद है मां जब टी.वी. के सामने अपने प्रिय कार्यक्रमों को देखते हुए इस आस में बैठी रहती थीं कि बुराई या गलत बातों पर अच्छाई की जीत देखना है। ये दोनों बेटे दादी को छेड़ने के लिए कुछ न कुछ बोलते थे तब वो क्या कहती थी?’
'क्या ?’
‘बच्चों तुम लोग अपनी पढ़ाई पर अच्छे से ध्यान दो और सफलता पाते जाओ। बस इस दादी की एक बात याद रखना – ‘अच्छा या भला कार्य करने में अनेक विघ्न आते हैं पर उन सबको हरा कर ही विजय मिलती है। वही तो चमत्कार है, पर अच्छे कार्यों को करने के लिए तुम लोगों को अधिक सतर्क और सचेत रहना चाहिये। तुम्हारे दोस्त दोस्ती के नाम पर तुम्हारा समय तो बर्बाद नहीं कर रहे हैं।‘ –बच्चे तो अधिक ध्यान नहीं देते थे पर वो बातें हम सभी के लिए सही हैं।' – ललिता इतना लंबा वक्तव्य देकर मानों थक गई थी। उसने पानी पीया और पसीना पोंछ कर आराम से बैठ गई।
आखिर राकेशजी ने ही पूछा - इन सब से देवराज की बात का क्या तालमेल या संबंध है?’ दोनों बेटे भी ललिता का मुंह ताकने लगे।
– ललिता ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ पूछा। ’तीनों मे से किसी को भी समझ नहीं आया?’
छोटा बेटा बंटी बोला – मुझे तो एक बात समझ आई कि सच्चे दोस्त वही होते हैं जो आपकी पढ़ाई में मदद करते हैं ना कि वो जो आपको लक्ष्य से भटकाते हैं।
‘अरे वाह, मेरे शेर,ये हुई न बात। पापा को जब समाज सेवा करनी ही है तो पूरी तैयारी के साथ इस क्षेत्र में उतरना चाहिये था। जब बुरे या गलत काम करते हैं तो उतनी बाधायें नहीं आती जितनी भले कार्य करने में आती हैं। सोच-समझ कर संभावित बाधाओं को रोकने की तैयारी भी साथ-साथ कर लेनी चाहिए थी।
...............
‘मम्मी, कोई बात नहीं इस बार पापा के साथ हम सब भी बैठ कर सोच समझ कर योजना बनायेंगे। पापा की इच्छा सही तरह से कामयाब भी हो और पूरी भी।' – ललिता की लंबी बात को काटते हुए बड़ा बेटा बोला। राकेशजी के चेहरे पर छाई हुई मलीनता की बदली छंटने लगी।