अंतिम लघु यात्रा ठिकाने की ओर (यात्रा वृत्तान्त) : मंगला रामचंद्रन
Antim Laghu Yatra Thikane Ki Ore (Travelogue in Hindi) : Mangala Ramachandran
‘अपने ही देश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा अब क्रमशः पूर्व की तरह होती दिख रही है। पर सावधानी के तौर पर हवाई-अड्डों पर आपके शरीर का तापमान जांचा जाता है। मास्क और फेस-शील्ड तो पहनना होता ही है तीन- तीन सीट के बीच में बैठने वाले यात्री को पीपीई गाउन भी पहनना पड़ता है। सो बेटी बीच की सीट पर बैठी और मुझे किनारे वाली सीट पर बैठा कर आराम से ले आई। आराम का अर्थ सारे आवरणों से लदे फदे, सांस लेने व कुछ देखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करते हुए पहुंच ही गये अपने इंदौर’।
इतने सारे स्थानों पर नियमों का स्वेच्छा से पालन करते हुए देखती आई, इंदौर आने पर लगा मानो वही प्राचीन युग के हों। बेफिक्र जुगाड़ पर भरोसा करने वाले। व्हीलचेयर ऐसी कि मैं डरते सहमते बैठी फिर भी कोहनी के पास खरोंच आ गई और कपड़े पहियों में अटक गए । शायद कोई छुट भैया नेता भी उस उड़ान से आया होगा तो उसके स्वागत में ढोल-धमाका और ढेरों फूल मालाओं से लदे फंदे अनियंत्रित बीस-पच्चीस लोगों का हूजूम। इंदौर हवाई अड्डे की एक खासियत जो यहां आने वाले यात्रियों के लिए त्रासदायक है, अजीब व्यवस्था है। सामान लेकर आपको सड़क पार कर थोड़ी दूर जाकर खड़े रहना पड़ता है। आपने जो केब या टैक्सी अंदर ही बुक कर ली है उसकी पर्ची लेकर खड़े रहो। अनिश्चितता की मनोदशा में समय के एक बड़े अंतराल के बाद गाड़ी आ जाती है शायद यही गनीमत है मन कुछ खराब और उदास हो जाता है। अपने शहर की छबि इस तरह धूमिल होते देखना भला किसको भायेगा। ये कम था जो टैक्सी चालक की वाचालता और करोना पर बुद्धिमता (मूर्खतापूर्ण?) पूर्ण टिप्पणी और व्याख्यान ने याद दिला दिया कि अपना इंदौर सदा यूं ही रहा था और यूं ही रहेगा। बेटी ने चेता तो दिया ही था कि तुम दूसरी जगहों से तुलना तो करना ही मत।
घर पहुंचने तक मन को पिछले दस दिनों की बातों ने सहज कर दिया था। मैंने बैंगलोर से ही अपने अच्छे पड़ोसी, मेरी पुत्री की तरह नेहा से घर की सफाई और दूसरी व्यवस्थाओं के लिए बात की थी। काम करने वाली बाई ने भी वर्ष भर बंद पड़े घर की सफाई पूरी मुस्तैदी से की थी। जब घर पहुंचे तो लगा जैसे घर कभी बंद था ही नहीं। यहां के लोगों के इसी अपनेपन ने हमें इस शहर के मोह बंधन में बांध रखा है। जब बीमार भी पड़ती हूं तो तय करना मुश्किल हो जाता था कि कौन अस्पताल में साथ रहेगा, कौन खाने आदि का प्रबंध करेगा। सदैव सहायता को तत्पर एक छोटी-मोटी फोज तैयार मिल जाती। इसके अलावा ‘सिका’ तो है ही। ‘सिका’ अर्थात SICA (South Indian Cultural Association) के मेंबरस् एक दूसरे से इस तरह जुड़े हैं कि आप स्वयं को एकाकी समझ ही नहीं सकते। इसके अलावा भी इन लोगों ने स्थानीय लोगों से भी अच्छे संबंध स्थापित कर लिए हैं। शिक्षा, चिकित्सा, समाज-सेवा तथा सांस्कृतिक क्रिया कलापों से इन तमिल-भाषी जनों ने मध्यप्रदेश में सम्मानीय स्थान बना लिया।
ऐसे प्यारे शहर से भला कौन दूर जाना चाहेगा? पंछी भी तो संध्या बेला में अपना ठिकाने की ओर लौटते ही हैं।