अंतिम फैसला (हिंदी कहानी) : महेश केशरी

Antim Faisla (Hindi Story) : Mahesh Keshri

पीहू मोहित की दीदी थी। पीहू का रँग काला था । और एक हाथ से हल्का सा विकलांग थी पीहू। लेकिन ये मामूली विकलांगता थी। पीहू दीदी के चेहरे पर हमेशा उदासी पूती रहती थी। हमेशा लगता कुछ ना कुछ सोच रहीं हैं। उदासी और नाखुशी ने उनके चेहरे पर जैसे स्थायी तौर पर कब्जा जमा लिया था।

पीहू , मोहित से दस बारह साल बड़ी थी। पीहू मोहित के लिए माँ तो नहीं थी, लेकिन माँ से कम भी नहीं थी । पीहू ने मम्मी-पापा के देहांत के बाद से मोहित को मम्मी - पापा की कमी कभी महसूस ही नहीं होने दी थी। पीहू दीदी ने मम्मी -पापा के गुजर जाने के बाद से मोहित को ही नहीं बल्कि घर को भी सँभाल लिया था। पीहू दीदी बिल्कुल माँ पर गईं थीं । रोटी बनाती तो माँ की तरह गोल -गोल। सब्जी भी माँ की तरह बनाती थी। पीहू दीदी के दम आलू को हम सब ऊँगलियाँ चाट- चाटकर खाते थे। एक तरह से ये कहा जा सकता था, कि घर की जो धूरी थी वो पीहू दीदी थी। और घर पीहू दीदी के भरोसे चलता था। चाहे किताबों की बात हो , होमवर्क करवाने हो। चाहे पेरेंटस् -टीचर मीटिंग में जाना हो । सब कुछ पीहू दीदी ही संभालती थी। इस तरह मम्मी- पापा की याद मोहित को कम ही आती थी।

मोहित के मम्मी-पापा को गुजरे अरसा हो गया था । जब पीहू को लड़के वाले देखने के लिए आते थे । मोहित ही मुहल्ले की दुकान से नाश्ता और कोल्डड्रिंक लेकर आता था। मोहित देखता हर बार लड़के वाले आते और पीहू दीदी को देखकर चले जाते। कई बार ऐसा हो चुका था। पीहू दीदी की जब शादी की बात चलती तो मम्मी पापा खुश हो जाते। उनको लगता इस बार तो पीहू की शादी हो ही जाएगी। सब चीजें तो पसँद आ जाती थी । लेकिन जैसे ही लोग पीहू दीदी को देखते उनका मन उदास हो जाता। वो चेहरे पर जबरजस्ती की मुस्कान बिखेरते और कहते आपको घर जाकर इत्मीनान से बताऊँगा। लेकिन लड़के वालों का कभी कोई जबाब नहीं आता था । इस तरह बीसियों बार हो चुका था।

पीहू दीदी को अनुशासन बहुत पसँद था। वो मम्मी -पापा से ज्यादा डाँट -डपट हम भाई बहनों से करतीं थीं।जो चीज जहाँ हो नियम से वहीं रखी होनी चाहिए। ग्लोब की जगह ग्लोब, एटलस की जगह एटलस। किताबें लाईन से और सीधी क्रम में सजी होनी चाहिए थीं । उनका पेन डर से कोई छूता नहीं था। उनके टेबल के आसपास डर से कोई नहीं फटकता था। भाई- बहनों को कभी हाथ से बेहाथ ना होने देतीं थीं । जब भी इधर- उधर किसी को कुछ करते देखतीं फट से टोक देतीं थीं। पीहू दीदी बिना मम्मी -पापा से पूछे हम भाई-बहनों की ठुकाई -पिटाई कर देतीं थीं। जिससे हम लोग ठीक रहें। हैरत की बात थी कि मम्मी -पापा उनको कुछ नहीं कहते थे। हमें हमेशा अपने मन का करना होता था। हम चाहते थे कि पीहू दीदी की कोई बात हम लोग ना मानें। हम मतलब ,रानी दीदी और सोनी दीदी और मैं। समय ने अपनी उड़ान जारी रखी। और रानी दीदी और सोनी दीदी का ब्याह हो गया। वे लोग अपने अपने ससुराल चलीं गईं। लौटती तो दोनों बहनें गले लगकर घँटों रोतीं। रानी कहती आज मैं जितना चुस्त -दुरुस्त और अनुशासित अपने आपको पाती हूँ। वो आपके कारण ही पाती हूँ। मेरी परवरिश में माँ के अनुशासन से ज्यादा आपका अनुशासन काम आया। मम्मी- पापा मुझे रानी दीदी और सोनी दीदी को कहाँ टोका टाक करते थे। आज रानी दीदी जिला कोर्ट में मैजिस्ट्रेट थी। सोनी दीदी बी. डी. ओ. बन गई थीं । हमारे चरित्र निर्माण और व्यक्तित्व निर्माण में आपका कितना योगदान था। कहने की जरूरत नहीं है। जब मेरे ग्रेजुशन के फाईनल का एग्जाम चल रहा था। और मेरी सहेलियाँ पिकनिक -पिकनिक की रट लगाए हुए थीं। तब आपने ही समझाया था कि पहले परीक्षा पर ध्यान दो। फिर पिकनिक पर जाने की सोचना। और मैं पिकनिक पर नहीं गई थी। और उस साल कॉलेज टॉप किया था। फिर धीरे -धीरे रानी दीदी और सोनी दीदी का विवाह हो गया था। और वे अपने -अपने घर चलीं गईं। एक से एक कहानियाँ थीं पीहू दीदी की। अनुशासन और जीवण को जीने का गुण उन्हें मम्मी पापा से विरासत में मिला था। और हम जो बने थे। वो पीहू दीदी कि वजह से बने थे।

मोहित अतीत में कहीं गहरे समाता चला गया। आज से पाँच साल पहले यही समय था। यही महीना था। जब पीहू दीदी को लड़के वाले देखने के लिए आनेवाले थे। मोहित के मम्मी- पापा को गुजरे आज पाँच साल हो गए थे। माँ की कमी ना खले इसके लिए पीहू को जब -जब कोई देखने के लिए लड़के वाले आते तो मानसी चाची अगुआई करतीं। उनका संबंध इस घर से बहुत ही गहरा था। पीहू और मोहित की वो सगी चाची तो नहीं थी। लेकिन कुछ रिश्ते सगे से भी बढ़कर होते हैं। और ऐसे समय में अपनों से भी बढ़कर साथ देते हैं। उनके पति वृँदा चाचा भी मोहित के घर में एक पिता की भूमिका निभाते थे। कोई भी अच्छी बुरी बात हो। वे लोग मानसी और वृँदा से साझा करते थे। पीहू और मोहित के माता -पिता की मौत के बाद से वे लोग एक तरह से इस घर के गार्जियन थे।

आज विनोद पीहू को देखने के लिए आ रहा था। साथ में उसके पिता रामबिलास और विनोद की माँ अंजनी भी पीहू को देखने के लिए आए थे। मोहित, वृँदा चाचा, और मानसी सब लोग चाह रहे थे कि ये रिश्ता यहाँ हो जाए। सबसे ज्यादा घबराहट और तनाव वृँदा और मानसी के चेहरे पर था। वृँदा चाचा और मानसी यही चाहते थे कि उनके रहते पीहू की शादी कहीं बढ़िया जगह हो जाए। और जो उत्तरदायित्व पीहू के माँ-बाप ने वृँदा और मानसी के कँधों पर डाल दिया था। उस जिम्मेदारी के भार से वे लोग मुक्त हो जाएँ।

पड़ोस की मानसी चाची आज पीहू के घर आईं हुईं थीं। आज पीहू को लड़के वाले देखने आने वाले थे। मानसी , मोहित और वृँदा उनका बेहद बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।

समय से कुछ लेट ही रामविलास जी और विनोद आए। नाश्ता- पानी के बाद इधर -उधर की बातचीत चल रही थी। सब कुशल- क्षेम पूछने के बाद रामविलास जी ने इच्छा जताई कि लड़की दिखाई जाए।

रामबिलास जी अनाथ बच्चों का एन . जी. ओ. चलाते थे। जो बेघर बच्चे थे। उनकी देखभाल उनकी संस्था " नई सुबह " करती थी। वो शहर के गणमान्य लोगों में से थे। उनके व्यक्तित्व और त्याग की शहर लोग मिसाल देते थे। विनोद मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। विनोद की माँ अंजनी विधवा आश्रम चलाती थी।

कहने की जरूरत नहीं थी कि वे लोग शहर के प्रतिष्ठित लोग थे। जो दूसरों के लिए एक मिसाल की तरह थे। लोग उनका और उनके परिवार का उदाहरण देते ना थकते थे। शहर का हर आदमी उनका बड़ा ही सम्मान करता था। एक बार चाय का दौर चल चुका था। फिर से एक बार चाय चलाने की बात चली।

मिसेज अंजनी ने कहा -" थोड़ा जल्दी कीजिए। हमलोगों को चलना है। "

वृँदा चाचा ने आवाज लगाई -" मानसी पीहू को तैयार करके लेती आओ। "

मानसी भीतर गई और पीहू को लेकर आई।

अंजनी देवी ने जब पीहू को देखा तो चौंक गईं -"अरे ये क्या लड़की का हाथ मुड़ा हुआ है। लड़की तो अपाहिज है , अपाहिज ! क्या वृँदा जी आपने हमें अँधेरे में रखा। ये लड़की एक तो अपाहिज है और दूसरा ये तो पूरा कोयला है । आखिर हमारा लड़का अपँग या अपाहिज तो नहीं है। जो ऐसी लड़की से शादी करेगा। "

वृँदा जी कातर स्वर में बोले -" बहन जी ऐसा ना कहिए। ये लड़की बहुत पढ़ी-लिखी और होनहार है। इंटरव्यू की तैयारी कर रही है। थोड़ा -बहुत मामूली सा हाथ ही तो मुड़ा हुआ है। हाँ रँग थोड़ा गहरा जरूर है। लेकिन आप लोग केवल लड़की का ऐब देख रहे हैं। मास्टर की डिग्री है इसके पास। कंप्टीशन का पेपर दे रही है। कहीं नौकरी लग गई तो आपकी प्रतिष्ठा में चार -चाँद लगा देगी। पी.सी.एस . का एग्जाम दे चुकी है। प्री और मेंस क्लीयर कर लिया है। हो सकता है कल को हमारे शहर की एस .डी. एम. बनकर पीहू आ जाए। तो आपकी शान कितनी बढ़ जाएगी। "

अंजनी देवी - " लेकिन ,वो एस .डी. एम. तो बनी नहीं है ना। जिस दिन बन जाएगी उस दिन देखा जाएगा। कोई जानबूझकर अपने गले में मक्खी नहीं निगलता है। "

मानसी ने सुन रखा था कि रामबिलास जी बेटियों को बड़ा स्नेह देते हैं। साल में दो- चार -सौ लड़कियों की शादी वो अपने खर्चे पर करवा देते हैं।

मानसी अतिरेक में बह गई । रामबिलास जी के पैरों में गिर गई -" मैं पैर पड़ती हूँ आपके। पीहू बिन माँ बाप की है ! आप सैंकड़ों बच्चियों की शादी मुफ्त में करवाते हैं। पीहू को भी अपनी बहू बना लीजिए। आखिर ये भी तो किसी की बच्ची है। आप लोग समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं। समाज आपसे सीखता है। बड़ा दिल दिखाईए। आप लोग एक मिसाल कायम कीजिये और ये रिश्ता कर लीजिए।"

तभी रामबिलास जी के भतीजे सौरभ ने रामबिलास जी के कान में फुसफुसाया।

रामबिलास जी के साथ उनका भतीजा सौरभ भी आया हुआ था।

रामबिलास जी की आँखों में अचानक क्रोध उतर आया। उनकी भृकुटियाँ तन गईं। वो गुस्से से काँपते हुए बोले -" इतना बड़ा धोखा। इतनी बड़ी बात आपने मुझसे छुपाई। "

वृँदा जी और मानसी चौंक पड़े।

वृँदा जी अचरज से बोले -" कौन सी बात भाई साहब। ऐसा तो कुछ नहीं है। जो कुछ भी बताया वो सही बताया है। सबकुछ तो सामने है। आप देख लीजिए। "

"बहुत सी चीजें जो होतीं हैं। वो पर्दे के पीछे छिपी हुई होती हैं।जो दिखाई नहीं देती।क्या आपने ये नहीं छुपाया है कि पीहू लावारिश है। "

इस बार मोहित के चौंकने की बारी थी। पीहू भी चौंक पड़ी। वो अपनी जगह से जैसे उछल से पड़े। उनके मुँह में जैसे जुबान ही नहीं थी।

कहने की जरूरत नहीं है कि ये किसी अपने का किया हुआ कारनामा था। जो नहीं चाहता था कि पीहू का घर बसे। लेकिन‌ ये तो सालों पहले की बात है। ये इनको कैसे पता चली। क्या ये लोग बनियाहर पुर गए थे। क्या पीहू के माँ-बाप और पीहू की असलियत किसी ने इनको बता दी थी।

" ये आपसे किसने कहा। "

" रिश्ता करने से पहले हमलोगों ने पूछताछ किया था। आपलोगों के बारे में। "

मानसी बोली -" लेकिन‌ इस बात से अब क्या फर्क पड़ता है। ये तो सालों पुरानी बात है। कुछ दिनों में ही पीहू का रिजल्ट होना है।कल को वो अफसर बन जाएगी। "

" बात ये नहीं है। बात ये है कि अव्वल तो आपने रिश्ता होने से पहले ये बात छुपाई। आपको पहले बता देना चाहिए था। "

वृँदा -" ये बेकार की बात है। इसका इस शादी से क्या लेना -देना। हमें लगा इस तरह की किसी बात से पीहू का रिश्ता टूट जाएगा। आज नहीं तो कल वो अफसर बन जाएगी। फिर इन बातों से भला किसी को क्या मतलब हो सकता है। "

" मतलब कैसे नहीं हो सकता है। आदमी अपने कुल-गोत्र में शादी -ब्याह करता है। "

" सफल होने के बाद कैसा कुल -गोत्र। आप सफल आदमी की जात पूछते हैं। जब आदमी सफल हो जाता है तो लोगों को समय लेकर उनसे मिलना पड़ता है। सफल लोगों से पूछते हैं आपलोग कि आप किस कुल- गोत्र के हैं। कतई नहीं। आप उनसे मिलने का समय माँगते हैं। मिन्नतें करते हैं। "

" आप बेकार की दलील मत दीजिये। "

मानसी रोने लगी थी। बहुत जोर- जोर से रोने लगी थी। रोते हुए बोली -" जिस तरह मेरे आँखों से निकलने वाले आँसू पवित्र हैं। वैसे ही पीहू पवित्र है। "

" हाँ अब गटर का पानी भी पवित्र होने लगा। "

इस बार मानसी का धैर्य चूक गया -" क्यों नहीं हो सकता गटर का पानी पवित्र। यही गटर का पानी जब गँगा में मिल जाता है तो वो गँगा का जल कहलाने लगता है। तब कैसे हम अंतर कर पाते हैं गँगा जल में और गटर के पानी में । ये हमारी जाति- धर्म को लेकर पाली गईं कुँठाएँ हैं। "

"वही तो मैं कह रहा हूँ। पारस- पत्थर ,पारस- पत्थर होता है। नाला , नाला होता है। "

" वही तो मैं कह रही हूँ। किसी नाले को जब वो गँगा में मिल जाए तब उसकी पवित्रता पर कैसे कोई सँदेह कर सकता है। आगे बढ़िए और समाज में एक मिसाल कायम कीजिए। पीहू को अपनी बहू बनाकर। "

" कोई जान-बूझकर मक्खी निगल भी लें। लेकिन कोई जान-बूझकर मैला कैसे खा सकता है। "

" मैले को हम तभी तक मैला देखते हैं। जब तक वो हमें दिखाई देता है। खेत में यही मैला नष्ट हो जाने के बाद उर्वरक बन जाता है। फिर आदमी की जैसी परवरिश होती है। आदमी में संस्कार भी वैसे ही बनते हैं। कोई गटर से पैदा हो या गँगा जल से इस बात से फर्क नहीं पड़ता। गँगा के किनारे रहने वाला आदमी कोई डकैती की योजना बनाता है। तो वो अपराधी है। दुर्गंध मारने वाली किसी कुटिया में कोई रामचरित मानस पढ़ रहा है तो वो संत है , संस्कारी है। विचार परवरिश से बनते हैं। "

रामबिलास जी , अंजनी , सौरभ और विनोद जाने के लिए उठ खड़े हुए।

वृँद जी ने कहा -" छोड़िए मानसी की बातों को वो अतिरेक में बोल गई। उसको इस बात को पहले ही बता देना चाहिए था । लेकिन अब तो गलती हो गई है। माफ कीजिये। ये रिश्ता हो जाने दीजिए। "

" आप क्यों माफी माँगते हैं चाचा जी। इसमें पीहू दीदी की क्या गलती है। पीहू दीदी अगर लावारिश भी हैं तो क्या हुआ। वो मेरी बहन है। मेरे पिता की बेटी है। मेरी मानवी चाची और वृँदा चाचा की बेटी है। जैसे वो मेरे लिए कल तक थी। वैसे ही मेरे लिए आज भी है। रिश्ता दिल का होता है। विचारों का होता है, कुँठाओं का नहीं। एक सभ्य समाज में कुँठा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। " इस बार मोहित पीहू कि तरफ से बोला था।

रामबिलास घर से निकलते हुए बोले -" प्रतिष्ठित होना और बड़ा दिल दिखाना और बात है। वो दूसरों के लिए होता है। और दूसरे संदर्भ में होता है। व्यहवारिक जीवण में लोग अलग ढँग से सोचते हैं?

विनोद मेरा एकलौता बेटा है। मैं हर्गिज उसकी शादी किसी अपंग लड़की से नहीं करूँगा। "

* * * * *

रामबिलास जी चले गए थे। लेकिन पीहू के दिल में तूफान मचा हुआ था। अगले दिन दोपहर के समय पीहू के पास मानसी बैठी थी। और मोहित खाना खाकर लेटा था। यूँ तो पीहू दीदी के बारे में मोहित को जानने की उत्सुकता थी। लेकिन एक तो पीहू दीदी उससे उम्र में बहुत बड़ी थीं । दूसरे मोहित चाहता था कि मानसी चाची से पीहू दीदी खुद ही पूछें ।

संयोग से पीहू ने टोका -" क्या कह रहे से थे उस दिन रामबिलास चाचा जब वो मुझे देखने आए थे। "

मानसी- "छोड़ ना बेटी जाने दो। क्यों पुराने घाव कुरेदती हो। जो होना था। वो हो ही गया। अब क्या करोगी जानकर। "

पीहू -" सो तो है ,फिर भी दिल नहीं मानता। जब से ये बात मुझे पता चली है। तब से मुझे नींद नहीं आई है। मैं सारी रात जागती रही। सोचती रही मैं कौन हूँ। मेरे मम्मी -पापा कौन हैं। और जो मेरे असली माँ- बाप थे वो कौन थे। क्या उनके सीने में दिल नहीं था। जो मुझे छोड़ दिया। ना जाने कितने सारे सवाल हैं। जिनको सोच- सोचकर मैं परेशान हो जा रही हूँ। "

मानसी की आँखें भी पनिया गईं थीं। वो अतीत के खुरदरे स्पर्श में धँसती चली गई। वृँदा और नँदू दोनों बनियापुर में काम करते थे। मानसी और मानवी दोनों सहेलियाँ थीं। दोनों बनियापुर में भी अड़ोस -पड़ोस में रहती थीं। वो एक किटकिटाती हुई ठंढ़ी सुबह थी। जब बनियापुर के साधो मुहल्ले में शोर मच गया था। जब कठुआती हुई ठंढ़ में किसी ने एक शिशू को फेंक दिया था।

सबसे पहले मानवी की नजर कचरा फेंकते हुए उस बच्ची पर पड़ी थी। कचरा में से बच्ची के किलकारने और जोर- जोर से रोने की आवाजें आ रही थी। मुहल्ले की सब औरतों को जैसे पाला मार गया था। सब कोई बस ताक रहा था। किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी, कि बच्ची को कोई उठा ले। कोई गर्म शॉल में लपेट ले। कोई दूध लाकर उसके नाजुक होंठों तक पहुँचा दे। लेकिन मानवी की नजर उस बच्ची पर पड़ गई थी। वो एकटक उस बच्ची को ताके जा रही थी।

फिर तुरंत ही आगे बढ़कर मानवी ने बच्ची को गोद में उठा लिया।

लाक्षा - " लगता है किसी का पाप है। किसी ने फेंक दिया है यहाँ लाकर। राम -राम बहुत खराब दिन आ गए हैं। लोग अपना पाप दिन -दहाड़े फेंक कर भाग रहें हैं। "

प्रीती बोली -" अरे देखो लड़की है, लड़की। लड़का होता तो कोई बात भी थी। "

मानवी -" लड़का - लड़की से क्या फर्क पड़ता है। जैसा लड़़का होता है। वैसी ही लड़की होती है। ये तो विचार -विचार की बात है। अगर लड़की को भी लड़़के की तरह पालो तो लड़की लड़के से कम है क्या। "

लाक्षा -" सब कहने की बातें हैं। लड़का-लड़का होता है। और लड़की- लड़की। "

मानवी -" ऐसा नहीं है। आज लड़की क्या नहीं कर रहीं हैं। वो स्कूलों में पढ़ा रहीं हैं। बैंकों में काम कर रहीं हैं। सेना में बहाल हो रहीं हैं । बाईक चला रही हैं। एरोप्लेन चला रही हैं । ये लड़कियों का समय है। लड़कियाँ आज ओलंपिक में मेडल ला रहीं हैं। सब कुछ तो कर रहीं हैं ये लड़कियाँ। "

लाक्षा ने टोका -" लड़का होता तो कोई फेंकता ही नहीं। "

प्रीती बोली -" अरे पता नहीं किसका पाप है। घोर कलयुग आ गया है। पाप करने में तो मजा आता है। लेकिन बच्ची को पालने में सबकी जान जाती है।"

तभी लाक्षा ने टोका - " अरे , देखो तो कितनी काली है। लगता है जैसे कोयला है। फेंक दो इसको वापस कूड़े में। "

प्रीती -" अरे इसका तो हाथ ही नहीं है। "

" सच में दिखा तो। हाँ सच में इसका तो बायाँ हाथ खराब है। "

मानवी लोगों के मुँह से केवल और केवल इस बच्ची के बारे में बुरा ही सुन रही थी। कोई इसके बारे में अच्छा नहीं सोच रहा था। कोई उसका भला नहीं चाह रहा था। सब लोग बस उसकी बुराई पर बुराई कर रहे थे। इन सब में इस बच्ची की भला क्या गलती थी। जिसको इस तरह से लोग बुरा- भला कह रहे थे। सही कहा है किसी ने औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत ही है। किसी ने उस बच्ची के बारे में भला नहीं सोचा था। मुहल्ले में पूरा मछली बाजार लग गया था। हर तरफ इस बच्ची के ही चर्चे चल रहे थे।

सहसा मानवी की आवाज से लोग चौंक गए -" मैं पालूँगी इस बच्ची को। "

लाक्षा को आश्चर्य हुआ तंज कसते हुए बोली - " क्या तू पालेगी इसको। तेरा दिमाग खराब है गया है जो इस बच्ची को पालेगी। पता नहीं किसका पाप है। पता नहीं कौन जात कि है। पता नहीं किस धरम की है। "

तब तक प्रीती ने मोर्चा संभाल लिया था -" काली -कलूठी बिलाई की तरह है तो है ये चूहिया। अगर पाल भी लिया तो इसको अपना नाम देना होगा। तेरे खानदान में बट्टा लग जाएगा। "

मानवी - " कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने ठान लिया है पालूँगी तो पालूँगी। झूठे हठ और खर -खानदान के चक्कर में क्यों पड़ना। जब आदमी ही ना बचेगा। जब मानवता ही ना बचेगी। हम अपनी कुँठाओं से ग्रसित होकर ही हमेशा बात करते हैं। जब कुँठाएँ बड़ी हो जातीं हैं और आदमी छोटा। किसका होना जरूरी है इस धरती पर। कुँठाओं का या मानवता का। हम किसके लिए जिंदा हैं। सच्ची मानवता के लिए या अपने अहंकार के लिए। खर -खानदान की बात सतही लोग करते हैं। बड़े लोग मानवता में विश्वास करते हैं। "

लाक्षा का जब कोई जोर ना चला तो लाक्षा थेथरई पर उतर आई। सीधे अंतस पर हमला करना ठीक समझा -" अरे तुम तो बाँझिन हो बाँझिन। खुद तो बच्चा पैदा नहीं कर सकती। चली हो दूसरे का पाप पालने। हुँह। चली है इस कचरे पर अभिमान करने। " लाक्षा ने घृणा से मुँह टेढ़ा कर लिया।

मानवी -" देख लेना लाक्षा यही कचरा एक दिन इस देश का, इस मुहल्ले का नाम रौशन करेगी। इसको इतना पढ़ाऊँगीं- लिखाऊँगी। अच्छे संस्कार दूँगी कि दुनिया की हर माँ ऐसी बेटी पर अभिमान करेगी। देख लेना कहे देती हूँ। "

मानवी को दस साल से कोई बच्चा नहीं हो रहा था। लोगों के मुँह से बाँझिन शब्द सुनती तो उसका मन चीत्कार करने लगता। माँ का मातृत्व जिसकी आँच या चिंगारी अंतस में कहीं अंदर दबी थी। उसको हवा मिलती तो वो कराह उठती। मन में एक वेदना एक टीस जागती। लेकिन वो कर भी क्या सकती थी? माँ बनना उसके अपने हाथ में ना था। लेकिन आज ईश्वर ने माँ बनने का एक मौका दिया था। तो कैसे वो इस मौके को जाने देती। और यहाँ तो हवा ना चली थी। भयंकर तूफान मचा हुआ था। मानवी का मातृत्व आज कुदरत की इस मेहरबानी पर अपना सबकुछ न्योछावर करने को तैयार था।

आज एक माँ के लिए ये चुनौती की तरह ही तो था कि वो दुनिया से अपने मातृत्व और उसके सुख के लिए लड़े। दुनिया आज उसके आगे ठोकरों पर थी। मानवी इस खुशी में फूले ना समाती थी। उसके पैर धरती पर ना पड़ते थे। उसके अँदर की इंसानियत और मानवता ने उसे झिंझोड़ दिया था। उसको अब जीने का एक मकसद मिल गया था। और उसी समय उसका नाम उसने सोच लिया था कि वो उसका नाम पीहू रखेगी।

प्रीती -" लेकिन इस कलूटी से इस पाप की जनी से शादी कौन करेगा। एक दम कोयला है कोयला! "

मानवी -" इसकी चिंता तू मत कर। आएगा इसके लिए भी कोई सपनों का राजकुमार स्वर्ग से उतरकर। "

करीब साल भर के बाद मानसी और मानवी बरहामपुर आ गए थे। नँदू और वृँदा का तबादला बनियापुर से बरहामपुर हो गया था। जब से पीहू मानसी की जिंदगी में आई थी। मानसी का जीवण बाँझ नाम के अभिशाप से मुक्त हो गया था। उसको एक- के -बाद एक तीन बच्चे रानी , सोनी और मोहित हुए थे ।

फिर एक- एक कर दोनों बेटियों की शादी नँदू और मानसी ने कर दी थी । चिंता लगी रहती तो पीहू कि की कैसे उसकी शादी होगी। एक हाथ से विकालांग थी। और उसपर से उसका रँग भी काला था। जमाना बिल्कुल बदल चुका था। समाज के सोचने- समझने का ढ़ँग बदल गया था। सबको गोरी बहू ही चाहिए थी। कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं था। सभ्यता -संस्कार की सब बातें गौण होती जा रही थी। सबको बस रँग से मतलब था। अब पीहू जैसी लड़की की इसमें क्या गलती थी। क्या अपने रँग के लिए वो खुद जिम्मेदार थी। क्या उसकी विकलांगता आंशिक ही सही के लिए वो खुद जिम्मेदार थी। ये सब तो ईश्वरीय विधान था। फिर समाज और लोगों को ये बात समझ क्यों नहीं आती थी। समाज आज किस पतन की तरफ जा रहा था। जब जब नँदू और मानसी सोचते दुखी हो जाते।

लेकिन कहते हैं ना ईश्वर सब दरवाजे एक साथ बँद नहीं करता है। एक दरवाजा बँद करता है। तो दूसरा दरवाजा खोल देता है। ऐसा ही पीहू के साथ हुआ था। वो पढ़ने में कुशाग्रबुद्धि की थी। हर कक्षा में अव्वल आती। इस कारण सब बच्चों से ज्यादा स्नेह मानवी और नँदू पीहू को करते थे । लेकिन जीवण हमेशा एक सा नहीं रहता है। छाँव के बाद धूप भी जीवण में आता ही है। एक दिन एक सड़क दुर्घटना में मानवी और नँदू चल बसे? पीहू टूट चुकी थी। उसने जिंदगी की गाड़ी खींचने के लिए और आर्थिक रूप से मजबूत बने रहने के लिए पिता की बनाई हुई बुटिक चलाने लगी । पीहू के सोचने- समझने और उसके व्यहवार से ग्राहक बढ़ने लगे थे। पीहू पढ़ाई भी जारी रखे हुए थी। बीच में मोहित की पढ़ाई, घर की देखभाल और बुटिक चलाने की जिम्मेदारी के कारण उसको पढ़ने- लिखने का समय ही नहीं मिलता था। लेकिन जब से रामविलास जी वाली घटना हो गई थी। तब से उसने प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी जमकर करनी शुरू कर दी थी। दो -तीन बार प्रयास करने के बाद भी पीहू को आशातीत सफलता नहीं मिली थी। लोगों ने तो बात बनाना भी शुरू कर दिया था कि बेकार में ही इतनी मेहनत कर रही है। होना तुमसे कुछ नहीं है। छोड़ दो परीक्षा देना। बुटिक पर ध्यान दो। फिर पीहू का ध्यान माँ का बातों पर चला जाता कि पढ़-लिखकर कुछ बनना है। याद रखो योग्यता के आगे, पढ़ाई के आगे, रँग और विकलांगता की कोई औकात नहीं है। माँ की सीख से पीहू दूने उत्साह से मेहनत करने लगी। और उसका चयन बाल विकास और परियोजना पदाधिकारी के तौर पर अंतत: हो ही गया। वो बहुत खुश थी। मोहित, मानसी , वृँदा चाचा सब लोग खुश थे। इधर तीन -चार सालों में शहर का घटनाक्रम तेजी से बदला था। रामबिलास चाचा की पत्नी कोरोना की भेंट चढ़ चुकी थीं । रामबिलास चाचा जो शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे उनके लड़के विनोद की मौत हार्ट अटैक से हो गई थी। करोड़ों रूपयों का व्यापार में घाटा हो गया था। अब रामविलास चाचा शहर के एक साधारण आदमी थे। बच्चों का अनाथ आश्रम वो अब भी चलाते थे। एक दिन जब पीहू कोई काम अपने केबिन में निपटा रही थी तो वे किसी काम से वे वहाँ पहुँचे।

वो बाहर ही बैठे थे। लेकिन अच्छे काम करने वालों को कभी भी इंतजार नहीं करवाना चाहिए। ऐसा उसने मानवी से सुन और सीख रखा था। सबसे पहले उसने प्यून से रामबिलास चाचा को बुलाने के लिए कहा। रामबिलास चाचा आगे आकर कुर्सी के आगे खड़े हो गए।

पीहू फाईल पर कुछ लिखती हुई बोली -"बैठिए चाचाजी कैसे आना हुआ, बताईए। "

रामबिलास जी को कभी इस बात का अनुमान नहीं था कि जिंदगी के किसी मोड़ पर पीहू से इस तरह की मुलाकात होगी। रोते हुए बोले -" पीहू मुझे माफ कर दो। मैं कुँठा में जी रहा था। ईश्वर ने उसका फल दे दिया है। मुझे माफ कर दो बिटिया। मेरा बेटा विनोद और मेरी पत्नी अंजनी चल बसे। "

" मुझे पता है। आपके घर की बात अखबार में पढ़ा था। कैसे आना हुआ बताईए। "

" बेटी मेरे अनाथ आश्रम में आग लग ग ई थी। वो तो संयोग था कि बच्चों के साथ हमलोग पिकनिक पर गए हुए थे। और पीछे से किसी ने आग लगा दी।सारी किताबें , बच्चियों के यूनिफॉर्म सब जलकर राख हो गए। बेंच, कुर्सी- टेबल सब जलकर खराब हो गए हैं। कुछ आपदा फँड से सरकारी मदद हो जाती तो बढ़िया रहता। अब किस मुँह से कहूँ। कहते हुए भी शर्म आती है। लेकिन अनाथ बच्चियों की बात ना होती तो यहाँ नहीं आता। अगर कुछ मदद हो सके तो कर दो । "

" चाचाजी सरकारी मदद आने में तो समय लग जाएगा। चूँकि मै बाल विकास परियोजना पदाधिकारी हूँ। इसलिए आपकी मदद मैं कर दूँगी। आपदा राहत कोष को लिख दूँगी। लेकिन उसमें समय लग जाएगा। करीब साल -छ: महीने तो लग ही सकते है़ं। तब तक वे बच्चियाँ कहाँ पढ़ेगीं। और क्या पहनेंगीं। इसकी चिंता मुझे हो रही है। मैं आपके अनाथ आश्रम के लिए व्यक्तिगत रूप से मदद करना चाहती हूँ। मैं आपको पाँच लाख की आर्थिक मदद कर देती हूँ।"

पीहू ने चेक फाड़कर दे दिया।

" आखिर मैं भी तो अनाथ ही हूँ। इस बात की जानकारी मुझे अच्छे से है कि एक अनाथ का जीवण आखिर कैसा होता है। आखिर इसका एहसास आप लोगो ने ही तो करवाया था , मुझे। "

रामबिलास चाचा इस वाक्य मे छिपे व्यंग्य को अच्छे से समझ रहे थे।

इतवार का दिन था और सब लोग घर पर ही थे। किसी बात को लेकर हँसी -मजाक चल रहा था। तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।

वृँदा चाचा ने जाकर दरवाजा खोला। देखा दरवाजे पर रामबिलास चाचा और सौरभ आए हुए थे। इधर -उधर की बातों के बाद वृँदा जी ने पूछा -" कहिए रामविलास जी कैसे आना हुआ। "

साथ में सौरभ भी आया हुआ था। रामबिलास जी जैसे हकला रहे थे। उनके मुँह से आवाज ही नहीं निकल रही थी।

इस बार मानसी ने टोका -"संकोच मत कीजिये। बताईए कैसे आना हुआ। "

रामविलास जी -" मैं रिश्ते के लिए आया था। "

मानसी -" किसके रिश्ते के लिए। "

रामबिलास जी -" पीहू और सौरभ के रिश्ते के लिए। "

मानसी -"अच्छा क्यों करना है अब आपको मेरे यहाँ रिश्ता। सौरभ को और बहुत सी लड़कियाँ मिल जाएँगी। गोरी- चिटटी , खूबसूरत और खानदानी। पीहू तो मैला है। जान-बूझकर मैला कौन निगलता है। यही कहा था ना आपने कि जान-बूझकर मैला कौन खाता है। फूल फूल ही होता है। चाहे फकीर के कटोरे में पड़ा हो। चाहे रास्ते में। चाहे भगवान् की चरणों में। फूल का महत्व जगह बदलने से कभी कम नहीं होता है। पीहू तो फूल थी। लेकिन आपको और सौरभ को तो मैला दिखी। आप लोग जान-बूझकर मैला क्यों खाना चाहते हैं। "

" एक बार पीहू की राय भी तो पूछ लो। "इस बार सौरभ बोला।

अचानक पीहू का स्वर तल्ख हो गया -" अनाथ लोगों को अपने घर की बहू बनाने की कोई जरूरत आपलोगों को नहीं है । आपलोग खानादानी लोग हैं। मैला आपके घर की शोभा नहीं बढ़ा सकता। आप लोग जा सकते हैं। यही मेरा आखिरी फैसला है।"

  • मुख्य पृष्ठ : महेश केशरी हिन्दी कहानियाँ, लघुकथाएँ, व्यंग्य और अन्य गद्य रचनाएँ
  • संपूर्ण काव्य रचनाएँ : महेश केशरी