उदयपुर की फ़िज़ाओं में आज भी पानी के महलों की ठंडी नमी बसती है। उसी शहर में श्रवण रहता था—एक शांत स्वभाव का, फ़ोटोग्राफ़ी का दीवाना युवक।
एक दिन पिछोला झील के किनारे तस्वीरें लेते हुए उसकी नज़र अचानक एक लड़की पर ठहर गई—सफेद दुपट्टा हवा में लहरा रहा था, और उसकी आँखों में किसी बिछड़े मौसम की उदासी थी।
लड़की ने मुस्कुराकर कहा—
“कभी-कभी कुछ नज़रें तस्वीर बन जाती हैं, और कुछ… तक़दीर।”
बस इतनी-सी बात थी, पर श्रवण को लगा जैसे उसके अंदर कोई अनसुनी धुन बज उठी हो।
उसका नाम था भावना
दोनों की बातचीत शुरू हुई—झील की ठंडी हवा उनका मौन तोड़ती रही, और आंखें अनकही बातें कहती रहीं।
भावना और श्रवण रोज़ उसी झील के पास मिलने लगे।
ना किसी ने इज़हार किया, ना किसी ने वादा—पर हर शाम एक खामोश इंतज़ार होता।
कभी भावना अपने स्केचबुक में झील के किनारे की इमारतें बनाती…
कभी श्रवण उसके हेयरक्लिप पर जमी छोटी-सी धूल भी कैमरे में कैद कर लेता।
दोनों जानते थे…
“कुछ रिश्ते नाम माँगते ही टूट जाते हैं। इसलिए उन्हें बिना नाम के जीना ही बेहतर है।”
पर किस्मत की चालें बड़ी गहरी होती हैं।
एक शाम भावना आई, पर उसकी आँखों में चुप्पी थी।
श्रवण समझ नहीं पाया।
वह सिर्फ इतना बोली—
“मैं कुछ दिनों बाद शहर छोड़ रही हूँ… शायद हमेशा के लिए।”
श्रवण का दिल धड़क उठा—
“क्यों?”
भावना ने जवाब नहीं दिया, बस धीरे से कहा—
“हर कहानी को खत्म होने के लिए दर्द नहीं, साहस चाहिए… और मेरे पास दोनों हैं।”
उस रात श्रवण पहली बार रोया, लेकिन उसके आँसू उसने खुद से भी छुपा लिए।
भावना की ट्रेन सुबह थी
श्रवण स्टेशन पहुँचा।
भावना ने उसे देखकर बस इतना कहा—
“मुझे याद मत करना… मैं लौटकर नहीं आऊँगी।”
श्रवण ने हल्की मुस्कान दी—
“मैं याद नहीं करूँगा… क्योंकि तू कभी भूली ही नहीं जा सकेगी।”
ट्रेन चली… धुएँ के बादलों में भावना खो गई।
और उनके बीच की मुलाक़ात—अधूरी रह गई।
समय तेज़ी से बीता।
श्रवण ने अपनी फ़ोटोग्राफ़ी को प्रोफेशन बना लिया।
लेकिन उसकी तस्वीरों में आज भी हर फ्रेम में एक खालीपन नजर आता था।
एक दिन उसे नगर महोत्सव में फ़ोटो प्रदर्शनी लगाने का मौका मिला।
लोग उसकी तस्वीरों को सराह रहे थे, पर श्रवण को लगा उसके दिल को कोई तालियाँ नहीं छू रहीं।
और तभी…
एक परिचित खुशबू हवा में घुली।
श्रवण ने पीछे मुड़कर देखा भावना थी l
भावना बदली-बदली थी—चुप, गंभीर, आँखों में हल्का पानी।
श्रवण ने पूछा—
“उस दिन तुम चली क्यों गई?”
भावना ने गहरी साँस ली—
“क्योंकि मैं किसी बीमारी से लड़ रही थी, जिसकी मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि बच पाऊँगी।
मैं तुम्हें दर्द नहीं देना चाहती थी… इसलिए दूर चली गई।”
श्रवण के कदम रुक गए।
भावना ने धीमे से कहा—
“कभी-कभी दूरी प्यार की मौत नहीं, उसकी सुरक्षा होती है।”
अगले कुछ हफ़्तों में दोनों फिर मिलने लगे।
लेकिन इस बार मुलाक़ातों में झील वाला हल्कापन नहीं था—जगह ले चुकी थी एक सच्ची, पकी हुई परिपक्वता।
एक शाम बारीश में भीगते हुए भावना बोली—
“अगर मैं उस बीमारी से वापस जीत गई, तो क्या हम फिर…?”
श्रवण ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
“हम पूरी जिंदगी मिलेंगे।”
लेकिन किस्मत फिर मुस्कुराई… और इस बार ज्यादा तेज़।
एक दिन भावना अचानक गायब।
फोन बंद।
घर खाली।
कोई खबर नहीं।
श्रवण फिर टूट गया।
उसे लगा शायद बीमारी फिर से लौट आई थी… या शायद भावना किसी डर से फिर दूर चली गई।
उस रात श्रवण ने अपनी डायरी में लिखा—
“कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में आते हैं ताकि हमें सिखा जाएँ कि इंतज़ार भी प्रेम का एक रूप है।”
छह महीने बाद, श्रवण एक अस्पताल में फ़ोटोग्राफ़ी टीम का सदस्य बना।
वहीं उसने ICU विंडो से एक लड़की को देखा—कमज़ोर, पर मुस्कुराती हुई।
भावना।
उसने उसे देखकर कहा—
“मैंने सोचा तुम मिलोगे… इसलिए जिंदा रहने का हौसला रखती रही।”
श्रवण अंदर आया, उसका हाथ थामा।
भावना ने धीरे से कहा—
“अगर मेरी कहानी अधूरी रह जाए तो… उसे किसी और को मत सुनाना।
बस अपने दिल में रखना।”
श्रवण बोला—
“हमारी कहानी अधूरी कैसे हो सकती है?
तुम हो… यही काफी है।”
भावना धीरे-धीरे ठीक होने लगी।
दोनों ने शहर बदलने का फैसला किया ताकि पुरानी यादें बोझ न बनें।
झील के पास आखिरी बार बैठे हुए श्रवण बोला—
“हमारी पहली मुलाक़ात अधूरी थी…
दूसरी अधूरी थी…
पर तीसरी—”
भावना मुस्कुराई—
“तीसरी मुलाक़ात ने अधूरापन खत्म कर दिया।”
और आसमान के नीचे बैठकर दोनों ने एक नई कहानी की शुरुआत की l