कोख जली (कहानी) : राजिन्दर सिंह बेदी

Kokh Jali (Hindi Story) : Rajinder Singh Bedi

घमंडी ने ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया।

घमंडी की माँ उस वक़्त सिर्फ अपने बेटे के इंतेज़ार में बैठी थी। वो ये बात अच्छी तरह जानती थी कि पहले पहर की नींद के चूक जाने से अब उसे सर्दियों की पहाड़ ऐसी रात जाग कर काटना पड़ेगी। छत के नीचे ला-तादाद सरकंडे गिनने के इलावा टिड्डियों की उदास और परेशान करने वाली आवाज़ों को सुनना होगा। दरवाज़े पर-ज़ोर ज़ोर की दस्तक के बावजूद वो कुछ देर खाट पर बैठी रही, इसलिए नहीं कि वो सर्दी में घमंडी को बाहर खड़ा कर के इस के घर में देर से आने की आदत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना चाहती है, बल्कि इसलिए कि घमंडी अब आ ही तो गया है।

यूँ भी बूढ़ी होने की वजह से उस पर एक क़िस्म का ख़ुशगवार आलकस, एक मीठी सी बे-हिसी छाई रहती थी। वो सोने और जागने के दरमयान मुअल्लक़ रहती। कुछ देर बाद माँ ख़ामोशी से उठी। चारपाई पर फिर से औंधी लेट कर उसने अपने पाँव चारपाई से दूसरी तरफ़ लटकाए और घसीट कर खड़ी हो गई। शमादान के क़रीब पहुँच कर उसने बत्ती को ऊँचा किया। फिर वापिस आकर खाट के साँघे में छुपाई हुई हुलास की डिबिया निकाली और इतमीनान से दो चुटकियाँ अपने नथनों में रखकर दो गहरे साँस लिए और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगी। लेकिन तीसरी दस्तक पर यूँ मालूम हुआ जैसे किवाड़ टूट कर ज़मीन पर आ रहेंगे।
“अरे थम जा। उजड़ गए।” माँ ने बरहम हो कर कहा… “मुझे इंतेज़ार दिखाता है और आप एक पल भी तो नहीं ठहर सकता।”

किवाड़ के बाहर घमंडी के कानों पर लिपटे हुए मफ़लर को चीरते हुए माँ के ये अल्फ़ाज़ घमंडी के कानों में पहुंचे। ‘उजड़ गए’ माँ की ये गाली घमंडी को बहुत पसंद थी। माँ अपने बेटे के ब्याह का तज़किरा करती और बेटा ब-ज़ाहिर बे-एतिनाई का इज़हार करता, जब भी वो यही गाली देती थी। एक पल में घर को बसा देने और उजाड़ देने का माँ को ख़ास मलका था।

इस तौर पर उतावले होने का घमंडी को ख़ुद भी अफ़सोस हुआ। उसने मफ़लर से अपने कान अच्छी तरह ढाँप लिए, और जेब से चुराए हुए मैक्रो पोलो का टुकड़ा सुलगा कर खड़ा हो गया। शायद आग से क़रीब होने का एहसास उसे बेपनाह सर्दी से बचा ले। फिर वो मैक्रो पोलो को हवा में घुमा कर कुंडल बनाने लगा। ये घमंडी का महबूब मशग़ला था जिससे उसकी माँ उसे अवगुण बता कर मना किया करती थी। लेकिन इस वक़्त कुंडल से न सिर्फ तसकीन मल्हूज़-ए-ख़ातिर थी, बल्कि माँ के इन प्यारे अल्फ़ाज़ के खिलाफ़ एक छोटी सी ग़ैर महसूस बग़ावत भी।

सिगरेट का आवारा जुगनू हवा में घूमता रहा। घमंडी अब एक और दस्तक देना चाहता था लेकिन उसे ख़ुद ही अपनी अहमक़ाना हरकत पर हंसी आ गई। वो लोग भी कितने अहमक़ होते हैं, उसने कहा, जो हर मुनासिब और नामुनासिब जगह अपना वक़्त ज़ाए करते रहते हैं। लेकिन जब उन्हें किसी जगह पहुँचना होता है तो वक़्त की सारी कसर साईकल के तेज़ चलाने, या भाग-भाग कर जान हलकान करने में लगा देते हैं। और ये सोचते हुए घमंडी ने सिगरेट का एक कश लगाया और दरवाज़े के एक तरफ़ नाली के क़रीब दुबक गया।

धोबियों की कटड़ी मैं उगा हुआ गून्दनी का दरख़्त पछवा के सामने झुक गया था। झुकाव की तरफ़, टहनियों में चाँद की हल्की सी फांक उलझी हुई दिखाई दे रही थी। माँ ने ज़रूर आज गले में दुपट्टा डाल कर दुपट्टे की फ़ोएं एकम के चाँद की तरफ़ फेंके होंगे। इसके बाद एका-एकी साएँ-साएँ की भयानक सी आवाज़ बुलंद हुई। हवा, चाँद की फाँक और गूँदनी का दरख़्त मिल-जुल कर उसे डराने वाले ही थे, कि माँ ने दरवाज़ा खोल दिया।
“माँ... ही ही...” घमंडी ने कहा और ख़ुद दरवाज़ा से एक क़दम पीछे हट गया। इससे एक लम्हा पहले वो अपने दाँतों को भींच रहा था।
“आ जाओ।” माँ ने कुछ रुखाई से कहा। और फिर बोली। “आ जाओ अब डरते क्यों हो। तुम्हारा क्या ख़्याल था, मुझे पता नहीं चलेगा?”
घमंडी को एक मामूली बात का ख़्याल आया कि माँ के मुँह में एक भी दाँत नहीं है, लेकिन उसने अपने आपको सँभालते हुए कहा।
“किस बात का पता नहीं चलेगा?”
“हुँह...” माँ ने दिए की बे-बिज़ा’त रौशनी में सर हिलाते और चिढ़ाते हुए कहा। “किस का पता नहीं चलेगा...”

घमंडी को पता चल गया कि माँ से किसी बात का छुपाना अबस है। माँ जो चौबीस साल एक शराबी की बीवी रही है। घमंडी का बाप जब भी दरवाज़े पर दस्तक दिया करता, माँ फ़ौरन जान लेती कि आज उसके मर्द ने पी रखी है। बल्कि दस्तक से उसे पीने की मिक़दार का भी अंदाज़ा हो जाता था। फिर घमंडी का बाप भी इसी तरह दुबके हुए दाख़िल होता। इसी तरह पछवा के शोर को शर्मिंदा करते हुए। और यही कोशिश करता कि चुपके से सो जाये और उसकी औरत को पता ना चले। लेकिन शराब के मुताल्लिक़ घमंडी की माँ बाप में एक अन लिखा और उन कहा समझौता था। दोनों एक दूसरे को आँखों ही आँखों में समझ जाते थे। पीने के बाद घमंडी का बाप एक भी वाफ़र लफ़्ज़ मुँह से न निकालता और उसकी माँ अपने मर्द को पीने के मुताल्लिक़ कुछ भी न जताती। वो चुपके से खाना निकाल कर उसके सिरहाने रख देती और सोने से पहले मामूल के ख़िलाफ़ पानी का एक बड़ा कटोरा चारपाई के नीचे रखकर ढाँप देती। सुबह होते ही अपने पल्लू से एक-आध सिक्का खोल कर घमंडी की तरफ़ फेंक देती और कहती,
“ले… अध बिलोया ले आ!”

और घमंडी अपने बाप के लिए शक्र डलवा कर अध बिलोया दही ले आता, जिसे पी कर वो ख़ुश होता, रोता, तौबा करता और फिर ‘हाथ से जन्नत न गई’ को झुटलाता। घमंडी ने माँ के मुँह से ये बात सुनी और ख़िफ़्फ़त की हंसी हंसकर बोला।

“माँ! माँ! तू कितनी अच्छी है...” फिर घमंडी को एक चक्कर आया। शराब पछवा के झोंकों से और भी पुर-असर हो गई थी। सिगरेट का जुगनू जो अपनी फास्फोरस खो चुका था, दूर फेंक दिया गया और माँ का दामन पकड़ते हुए घमंडी बोला “और लोगों की माँ उनकी बीवी होती है, लेकिन तू मेरी माँ ही माँ है।”

और दोनों मिलकर इस अहमक़ाना फ़िक़रे पर हँसने लगे। दरअस्ल इस छोकरे के ज़ह्न में बीवी का नक़्शा मुख़्तलिफ़ था। घमंडी समझता था, बीवी वो औरत होती है जो शराब पी कर घर आए हुए ख़ावंद की जूतों से तवाज़ो करती है। कम अज़ कम रोलिंग मिल्ज़ के मिस्त्री की बीवी, जिसके तहत घमंडी शागिर्द था, अपने शराबी शौहर से ऐसा ही सुलूक क्या करती थी और इस क़िस्म के जूति पैज़ार के क़िस्से आए दिन सुनने में आते हैं। फिर कोई माँ भी अपने बेटे को इस क़िस्म की हरकत करते देखकर अच्छा सुलूक नहीं करती थी। ब-ख़िलाफ़ उनके घमंडी की माँ, माँ थी। एक वसीअ-ओ-अरीज़ दल की मुतरादिफ़, जिसके दिल की पहनाइयों में सब गुनाह छिप जाते थे और अगर घमंडी के इस ब-ज़ाहिर अहमक़ाना फ़िक़रे की अंदरूनी सेहत को तस्लीम कर लिया जाये तो इसकी मतनाक़स शक्ल में घमंडी की माँ अपने शौहर की भी माँ थी।

बिस्तर पर धम से बैठते हुए घमंडी ने अपने रबड़ के जूते उतारे। ये जूते सर्दियों में बर्फ़ और गर्मियों में अंगारा हो जाते थे। लेकिन इन जूतों को पहने हुए कौन कह सकता था कि घमंडी नंगे पाँव घूम रहा है। घमंडी ने हमेशा की तरह जूते उतार कर गर्म करने के लिए चूल्हे पर रख दिए। माँ फिर चिल्लाई,
“है, मरे तेरी माँ भगवान करे से। है, गोर भोग ले तो को।”

लेकिन हिंदू धर्म भ्रष्ट होता रहता। माँ जूते उतार कर दूर कोने में फेंक देती। फिर बकती झुकती अपने दामन में एक चवन्नी बाँध घमंडी के सिरहाने पानी का एक बड़ा सा कटोरा रख, मुतअफ़्फ़िन बिस्तर की आँतों में जा दुबकती।

हद हो गई... माँ ने दो तीन मर्तबा सोचा। घमंडी ने बनवारी और रसीद की संगत छोड़ दी है। उसने घमंडी को शराब पीने से मना भी नहीं किया और न अपने ओबाश संगी सुंगाती के साथ घूमने से। माँ ने सोचा शायद ये नरमी के बरताव का असर है। लेकिन वो डर गई और जल्द-जल्द हुलास की चुटकियाँ अपने नथनों में रखने लगी। अपने आपको मारने का उसके पास एक ही ज़रिया था। हुलास से अपने फेफड़ों को छलनी कर देना लेकिन अब हुलास का कोई भी असर नहीं होता था। इसी नरमी से माँ ने अपने शौहर का मुँह भी बंद कर दिया था। उसकी शख़्सियत को कुचल दिया था और वो बेचारा कभी अपनी औरत की तरफ़ आँख भी नहीं उठा सकता था। इसी तरह घमंडी भी अपनी माँ के साथ हम कलाम होने से घबराता था। माँ ने इस बात को महसूस किया और फिर वही... ‘तेरी माँ मरे भगवान करे से’ लेकिन इस बात का उसे कोई हल न सूझ सका।

आज फिर छः बजे शाम घमंडी कारख़ाने से लौट आया, हालाँकि वो नथुआ चौकीदार की आवाज़ के साथ महल्ले में दाख़िल होता था। इससे पहले वो कोई पुरानी तस्वीर देखने चला जाता। वादिया की मिस नादिया के गीत गाता और एक दो साल से उसके पुरासरार तरीक़े से ग़ायब हो जाने के मुताल्लिक़ सोचता। आज फिर इतनी जल्दी लौट आने से माँ के दिल में वस्वसे पैदा हुए। उसने बेकार एक काम पैदा करते हुए कहा।
“ले तो बेटा, ज़ीरा ले आ थोड़ा।”
“ज़ीरा? घमंडी ने पूछा दही के लिए माँ?”
“और तो का तुम्हारे सर पे डालूँगी।” माँ ने लाड से कहा और ज़रूरत से वाफ़र पैसे देती हुई बोली। “लो ये पैसे, ठीटर देखना।”
“मैं सिनेमा नहीं जाऊँगा माँ।” घमंडी ने सर हिलाते हुए कहा।
“यही सैर तमाशा तो हम लोगों को ख़राब करता है।“
माँ हैरान हो कर अपने बेटे का मुँह तकने लगी।

“अभी ख़ैर से हाथ पाँव भी नहीं खुले। इतनी दानिस की बातें करने से नजर लग जाएगी रे…” और दरअस्ल वो अपने बेटे को एक शराबी देखना चाहती थी। नहीं शराबी नहीं, शराबी से कुछ कम, जिससे तबाह-हाल न हो जाये कोई। लेकिन ये भल मानसत भी माँ को रास ना आती थी। उसने कई अक़्लमंद बच्चे देखे थे जो अपनी उम्र के लिहाज़ से ज़्यादा अक़्लमंदी की बातें करते थे, और उन्हें इश्वर ने अपने पास बुला लिया था।

घमंडी ज़ीरा लाने के लिए उठ खड़ा हुआ। पैसे लेकर दरवाज़े तक पहुँचा। मशकूक निगाहों से उसने दरवाज़े के बाहर झाँका। एक क़दम बाहर रखा, फिर पीछे की जानिब खींच लिया और बोला “बाहर चची खड़ी है और मंसी भी है।”
“तो फिर का?” माँ ने त्यूरियों का त्रिशूल बनाते हुए कहा।
“फिर कुछ है…” घमंडी बोला “मैं उनके सामने बाहर नहीं जाऊँगा।“
माँ ने समझाते हुए कहा “तू ने मंसी का कंठा उतार लिया है, जो बाहर नहीं जाता?”

लेकिन घमंडी बाहर न गया। माँ मुँह में दुपट्टा डाल कर खड़ी हो गई। माँ मुँह में दुपट्टा उस वक़्त डाला करती थी जब कि वो निहायत परेशान या हैरान होती थी। और अपने कलेजे में मुक्का उस वक़्त मारा करती थी जब कि बहुत ग़मगीं होती। इससे पहले तो घमंडी किसी से शरमाया नहीं था। वो तो मुहल्ले की लौंडियों में डंड पेला करता था। औरतों के कूल्हों पर से बच्चे छीन लेता और उन्हें खिलाता फिरता। और इसी असना में औरतें घर का धंदा कर लेतीं और घमंडी को दुआएं देतीं और आज वो मंसी और चची से भी झेंपने लगा था।

घमंडी ने वापिस आते हुए अपने बाप के ज़माने का ख़रीदा हुआ एक फटा पुराना मोमजामा नीचे बिछाया, और एक टूटा हुआ शीशा और राल सामने रखकर टांगें फैला दें। टाँगों पर चंद सख़्त से फोड़ों पर उसने राल लगाई और फिर शीशे की मदद से मुँह पर रिसने वाले फोड़े से पानी पोंछने लगा और फिर उस पर भी मरहम लगा दी। माँ ने अपनी धुंदली आँखों से मुँह वाले फोड़े का जायज़ा लेते हुए कहा... “हाय, कितना ख़ून-ख़राब हो गया है तुम्हारा।” और फिर करंजवा और नीम के नुस्खे़ गिनाने लगी।

इस वक़्त तक रात हो गई थी। राल लगाने के बाद घमंडी मोम जामे पर ही दराज़ हो गया और लेटते ही उसने आँखें बंद कर लीं। आज माँ को भी जल्दी सो जाने का मौक़ा था, लेकिन वो ऊँचे मूँढे पर जूँ की तूँ बैठी रही। वो जानती थी कि बिस्तर में जा दुबकने पर वो निसबतन बेहतर रहेगी, लेकिन एक ख़ुशगवार तसाहुल ने उसे मूँढे के साथ जकड़े रखा और वहीं सिकुड़ती गई। उसका बुढ़ापा उस मीठी नींद के मानिंद था जिसमें पड़े हुए आदमी को सर्दी लगती हो और वो अपनी टांगें समेट कर कलेजे से लगाता चला जाये लेकिन पाँव में पड़े हुए लिहाफ़ को उठाने के लिए हिल न सके।

एका-एकी माँ चौंकि। उसे अपने बेटे की ख़ामोशी का पता चल गया था। इस नियम-ख़्वाबी में बड़े बड़े राज़ खुल जाते हैं। माँ ने कलेजे में मारने के लिए मुक्का हवा में उठाया, लेकिन वो वहीं का वहीं रुक गया और वो फिर एक हसीन ग़शी में खो गई। लेकिन उसे घमंडी और उसके साथ उसका बाप याद आता रहा और उसकी ख़ुश्क आँखों में दास्तानें छलकने लगीं। हवा के एक झोंके से दरवाज़े के पट खुल गए और एक सर्द बगूले के साथ बाहर से गोइन्दी और बेल के पत्ते, गली में बिखरे हुए काग़ज़ों के साथ उड़ कर अंदर चले आए। एक सूखा हुआ बेल कहीं से लुढ़कता हुआ दहलीज़ में अटक गया। घमंडी ने उठ कर दरवाज़ा बंद करना चाहा लेकिन बल को निकाले बग़ैर कामयाबी न हुई।

गोइन्दी के शोर और झींगुरों की आवाज़ ने माँ के ख़ून को और मुंजमिद कर दिया। शम्अ-दान में दीए का शोला और मुतवाज़ी हो रहा था। घमंडी ने कहा... “बिस्तर पर लेटेगी माँ?” लेकिन माँ ने नफ़ी में सर हिला दिया। घमंडी ने सर हिला कर माँ को अपने बाज़ुओं में उठा लिया और जूँ का तूँ खाट पर रख ऊपर लिहाफ़ दे दिया। माँ को ख़ुद पता नहीं था कि अगर वो वहीं पड़ी रहती तो सुबह तक सर्दी से अकड़ जाती। फिर वो कभी सीधी न होती और वहीं ख़त्म हो जाती।

माँ को बाज़ुओं में उठाए हुए शायद घमंडी ने कुछ भी महसूस न किया, लेकिन माँ ने बड़ा हज उठाया और उसके बाद लिहाफ़ की गर्मी-ओ-नर्मी ने उसको हज-ए-अकबर में तबदील कर दिया। कभी माँ ने बेटे को गोद में उठाया था। माँ ने सोचा और फिर हुलास की एक चुटकी नथुने में रखकर उसने ज़ोर से साँस लिया। वो हज की उस सतह पर आ चुकी थी जहाँ मर कर इन्सान उस ख़ुशी को दवाम करना चाहता है। आज उसके बेटे ने उसे गोदी में उठाया था और उसे बिस्तर की क़ब्र में रख दिया था। वो बिस्तर जो क़ब्र हो न सका। दुनिया में कोई औरत माँ के सिवा नहीं। अगर बीवी भी कभी माँ होती है तो बेटी भी माँ, तो दुनिया में माँ और बेटे के सिवा, और कुछ नहीं। औरत माँ है और मर्द बेटा... माँ खिलाती है और बेटा खाता है... माँ ख़ालिक़ है और बेटा तख़लीक़, उस वक़्त वहाँ माँ थी और बेटा माँ, बेटा और दुनिया में कुछ न था।

माँ बदस्तूर ख़्वाब और बे-ख़्वाबी के दरमयान मुअल्लक़ थी। वो कुछ सोच रही थी, लेकिन उसके तख़य्युल की शक्लें बे-क़ाइदा हो कर ख़्वाब के एक अंधेरे जोहड़ में डूब रही थीं। उसके गावों के चंद मकान उसकी गली में आए थे, लेकिन किसी पुर-असरार तरीक़े से उन मकानों के पीछे भी वही धोबियों का महिला आबाद था। वहाँ भी वही बल और गुविन्दी के दरख़्त साँय-साँय कर रहे थे। अमावस की रात काजल हो रही थी और बेटे का चाँद उन ज़ुल्मतों को पाश-पाश कर रहा था। उसका शौहर, जिसे वो ग़लती से मरा हुआ तसव्वुर करती थी, ज़िंदा था और उससे सुबह के वक़्त अध-बिलोए की कटोरी माँग रहा था। उसे प्यास लगी थी। एक ना पी हुई शराब के नशे से उसे बुरी तरह आज़ा-शिकनी हो रही थी, लेकिन उसका ख़ावंद तो मर चुका था। दस साल हुए मर चुका था। मरे हुए आदमी को कोई चीज़ देना घर में किसी और मुतनफ़्फ़िस को ख़ुदा के घर भेज देने के मुतरादिफ़ है, लेकिन वो इन्कार न कर सकी। वो बीवी थी और माँ। उसने अपने शौहर के मुँह के साथ लगा हुआ कटोरा छीन लिया, लेकिन क्यों? उसका शौहर मरा थोड़े ही था। वो सामने खड़ा था। वही कटा हुआ सा होंट जिसमें सोने की कील वाला दाँत दिखाई दे रहा था। बड़ी-बड़ी मूँछें भी इस दाँत को ढाँपने से क़ासिर थीं।

दरवाज़े पर दस्तक सुनाई दी और माँ को महसूस हुआ, जैसे किसी ने उसे झिंझोड़ दिया हो। इस वक़्त उसकी आँखों से एक ग़िलाफ़ सा उतरा, लेकिन उस पर एक ग़िलाफ़ था जो उसके सारे बदन का अहाता किए हुए था। वो पड़ी रही, पड़ी रही, उसके पाँव, जो कुछ देर पहले सर्द और लकड़ी की तरह सख़्त थे, कुछ गर्म हो गए थे। शायद घमंडी ने हमेशा की तरह रगड़-रगड़ कर उसके पाँव गर्म किए थे। माँ अपने तख़य्युल में हंसी। घमंडी भी उसे मरता देखना नहीं चाहता। बीवी आ जाये तो कुछ पता नहीं। लेकिन अब इस घुन लगे हुए शरीर का क्या है? हुलास, हुलास किधर गई माँ सो गई। लेकिन दरवाज़े पर दस्तक की आवाज़ बराबर सुनाई दे रही थी। बनवारी और रशीद भी फिर घमंडी को बुलाने आए थे। माँ को एक गो न तसकीन हुई। घमंडी फिर ठीक हो जाएगा, लेकिन सद-गो न इज़तिराब हुआ। उनकी संगत फिर घमंडी को बिगाड़ देगी। उस वक़्त बुढ़िया को जाग आई। जागते ही पहली बात जो माँ के ज़ह्न में आई, वो इस बात की ख़ुशी थी कि उसने घमंडी के बाप को अध बिलोए का कटोरा मुँह से लगाने नहीं दिया। अगरचे वो किस क़दर प्यासा था और उसका उज़्व-उज़्व टूट रहा था और वो बड़ी इल्तेजा आमेज़ आँखों से उसकी तरफ़ देख रहा था। वो एक घूँट भी पी चुका था, लेकिन माँ ने समझना चाहा कि उसने कुछ नहीं पिया, और वो समझ गई। उसने दरवाज़े में खड़े अपने बेटे की तरफ़ देखा, और इस क़दर धीमी आवाज़ में कहा... “मैं सदक़े लाल” कि वो ख़ुद भी अपनी आवाज़ को न सुन सकी। इसी तरह उसने एक अनसुना बोसा हवा की लहरों में छोड़ दिया।
अपनी माँ को सोता देखकर घमंडी बाहर आ गया और बोला।
“मैं सिनेमा के इलावा और कहीं नहीं जाऊँगा। यार कहे देता हूँ।”
“निकल बाहर साले।” रशीद ने गाली बकते हुए कहा… “निकलता है या”

माँ के दिमाग़ में टिड्डियों और झींगुरों की आवाज़ दूसरी आवाज़ों के साथ बराबर आ रही थी, अगर-चे वो क़रीब-क़रीब सोई हुई थी। घमंडी ने बाहर से दरवाज़ा बंद किया और चला गया।

किसी ख़्याल के आने से माँ उठ कर बैठ गई। उसे फिर अपना शौहर याद आया और बेटा जो शक्ल और आदात के लिहाज़ से अपना बाप हो रहा था, लेकिन कम-सिनी और बलूग़त के दरमयान ही था। चंद ही दिनों में बालिग़ हो जाएगा, फिर उसे लुगाई की ज़रूरत होगी। माँ ने दिल में कहा। मुझे पता है अब घमंडी बाहर क्यों नहीं जाता?

माँ जानती थी घमंडी अपने बाप से ज़्यादा हस्सास वाक़े हुआ है। जब वो पी कर आए तो उसे जता देना बड़ी मूरखाई है और फिर अगली सुबह पल्लू से चवन्नी खोल कर देना भी तो एक चपत है। चपत, चुप-चाप चपत। शराब पी कर आए हुए ख़ावंद बेटे से जूती पैज़ार करना और चवन्नी खोल कर देना, या सिरहाने के क़रीब पानी का कटोरा रख देना एक ही क़िस्म की बदसुलूकी तो है। बल्कि ये बात जूती पैज़ार से कहीं ज़्यादा दिल-आज़ार है। इसीलिए घमंडी के बाप ने उसके सामने कभी आँख नहीं उठाई। बाप में शख़्सियत को कुचल देने की वही तो ज़िम्मेदार थी, और अब बेटे को मार रही है। माँ ने दिल में तहय्या किया कि अब वो कभी अपने पल्लू में दही के लिए चवन्नी नहीं बाँधेगी और न सुराही, सिरहाने के क़रीब रखेगी। और वो ख़ुद कुड़ेगी लेकिन बेटे को कुछ नहीं कहेगी। उसे ये पता नहीं लगेगा कि मेरी माँ सब कुछ जान गई है। घमंडी के बाप का भी ख़्याल था, कि अगर घमंडी की माँ वावेला या एहतिजाज करती, तो उस वक़्त तो ज़रूर बुरा मालूम होता लेकिन आख़िर में कितनी आसानी रहती। पहले तो इस आदत से ख़लासी हो जाती, और अगर ये लत रहती भी तो इस क़दर शर्मिंदगी का मुँह न देखना पड़ता। अब जब कि वो ख़ामोशी से पानी का कटोरा सिरहाने रख देती है और जल्दी-जल्दी हुलास नथनों में डालती है तो सारा नशा हिरन हो जाता है। शायद घमंडी इस ताज़ियाने की चोट न सह सका था और उसने शराब पीना और देर से घर आना तर्क कर दिया था। ख़ैर आज से घमंडी पी कर आएगा तो वो कुछ नहीं समझेगी, कुछ नहीं कहेगी।

रात के ग्यारह बजे हवा के झोंकों और गूंदनी के पत्तों के साथ घमंडी भी दाख़िल हुआ। आज हवा घमंडी से ज़्यादा शोर मचा रही थी। माँ बदस्तूर छत की कड़ियाँ गिन रही थी और मन ही मन में कोई भूला बिसरा बछोड़ा गा कर नींद को भगा रही थी। घमंडी ने आते ही दोनों हाथों में फूंक मारी। हाथों को रगड़ा और माँ के पाँव थामते हुए बोला।
“माँ!”
और माँ को जागते हुए पाकर बोला,
“अरे! तू सो क्यों न गई माँ?”
माँ ने वही मुख़्तसर-सा जवाब दिया,
“अब इन दीदों में नींद कहाँ रे घमंडी!”

लेकिन इससे आगे वो कुछ और न कह सकी। घमंडी बिलकुल होश में बातें कर रहा था। आज उसने एक क़तरा भी तो नहीं पी थी। अब जो माँ ने कुछ न समझने का तहय्या किया था, उसका क्या हुआ? माँ सच-मुच ही कुछ न समझ सकी वो कुछ भी न जान सकी।

पतझड़ जो होनी थी सो हो चुकी थी। इस दफ़ा पुरवा के आख़िरी झोंके और तो कुछ न लाए, एक मेहमान लेते आए। माँ ने घमंडी को बुलाते हुए कहा।
“बेटा! ले ये चपनी बदलिया”

मुहल्ले में चपनी बदलने की रस्म ख़ूब चलती थी। माँ पकी हुई सब्ज़ी चची के हाँ भेज देती और वहाँ से ख़ाली बर्तन में पकी हुई तरकारी आ जाती। इस तबादले में बड़ी बचत थी। दूसरी सब्ज़ी बनाने की ज़हमत नहीं उठाना पड़ती थी और खाने में वो बात पैदा हो जाती थी। और चची से चपनी चलती भी ख़ूब थी, लेकिन घमंडी ने यूँ ही घड़े ऐसा सर हिलाते हुए कह दिया।
“मैं अब बड़ा हो गया हूँ माँ, मैं कहीं नहीं जाने का।”
“लो एक नई मुसीबत।” माँ ने कहा, “और ख़ुश होते हुए बोली तो बड़ा हो गया है तो का?”

उस वक़्त मेहमान कहीं बाहर गया हुआ था। घमंडी ने मोमजामा झुल्लंगे के क़रीब बिछा रखा था और उस पर दही राल लगा रहा था। इन फोड़ों को आराम आता था पर न आता था। माँ ने दामन की हवा करते हुए रिसते हुए फोड़ों पर से मक्खियाँ उड़ाईं और बोली… “तेरा तो खून बिलकुल ख़राब हो गया है।”

और दरअस्ल घमंडी का ख़ून ख़राब हो गया था। उसके बाप दादा ने उसे पाक पवित्र ख़ून दिया था, लेकिन बेटे ने ख़ून में तेज़ाब डाल दिया और ख़ून फट गया। जिस्म भी साथ फटने लगा। कुछ मुजरिमाना निगाहों से घमंडी ने अपनी माँ की तरफ़ देखा और बोला,
“माँ! मुझे गर्मी हो गई।”
माँ के सारे तेवर, सवाल की सूरत में उठ गए और उसने फ़क़त इतना कहा “काओ?”

घमंडी ने झुल्लंगे की लटकती हुई रस्सियों को थामते हुए कहा ये रशीद की करतूत है। और बे-इख़्तियार रोते हुए बोला, “इसमें मेरा कोई क़सूर नहीं माँ!”

माँ ने एक दफ़ा फिर कहा “काओ?” और घमंडी की हिद्दत शोला-बार हो गई। उसने माँ को एक गाली देना चाही, लेकिन वो रुक गया। घमंडी अब ख़ुद भी चाहता था कि माँ को उसके आज़ार का पता चल जाये। बेटे को रोते देखकर माँ ठिठक कर रह गई। रोग तो जी के साथ लगा हुआ है, लेकिन इतना ख़ून ख़राब कभी किसी का नहीं हुआ और उसने सोते में अपने मरहूम ख़ावंद को अध बिलोया पिला दिया था।

मजबूर हो कर घमंडी फिर बलूग़, गुमराह बलूग़ की दास्तान रोने लगा। आज से पचास साल पहले इस बलूग़ को ज़िंदगी के दरख़्त पर इस क़दर पकने नहीं दिया जाता था कि वो सड़ कर अपने आप नीचे गिर पड़े और फिर दुनिया जहान को मुतअफ़्फ़न कर दे। माँ, जिसकी शादी दस साल की उम्र में हो गई थी, इस बात को नहीं जानती थी। जिस तरह बदन के इल्म से ना-वाक़िफ़ लोगों के लिए पीठ का हर हिस्सा कमर होता है, इसी तरह इस ना-वाक़िफ़, ना-समझ और नादान माँ के लिए ये ख़ून की ख़राबी, गर्मी या कोढ़ से परे कुछ नहीं थी। और ये सब कुछ करंजवा, नीम और अस्पग़ोल के सह्र के आगे न ठहर सकता था।

अब माँ “काओ” नहीं कहना चाहती थी, अगरचे उसे किसी बात की समझ नहीं आई थी। वो जानती थी जब से घमंडी का ख़ून ख़राब हुआ है, वो बहुत मुतलव्वुन हो गया है। घर में चीज़ें फोड़ने लगता है और जो बहुत कुछ कहो, तो अपना सर फ़र्श पर दे मारता है।

माँ ख़ुद ही चपनी बदलने चली गई। घमंडी की चची ने अपने हाँ पकी हुई तरकारी तो दे दी, लेकिन उनके हाँ की पकी हुई चीज़ क़बूल न की। माँ का माथा ठनका। दस साल से वो रँडापा अकेली काट रही थी और उसने किसी शरीक के सामने सर नहीं झुकाया था। आज जब कि वो कल के तमाम इसरार से वाक़िफ़ हो चुकी थी, भला क्यों झुक जाती? माँ अपनी देवरानी के साथ जी खोल कर लड़ी। देवरानी ने भी धता बताया और कहा, “देखा है हमने, इतनी बड़ी नाक लिए फिर्ती है तो बेटे को सँभाला होता, जो बाज़ार में झक मारता फिरता है।”

माँ ठीक कहती थी, कि चपनी बदलने से घमंडी का ताल्लुक़? तो जो बरतना नहीं चाहती तो यूँ कह दे। लेकिन दरअस्ल माँ को कोई बात समझ नहीं आती थी। ख़ून ख़राब घमंडी का हुआ है और वो गालियाँ रशीद और बनवारी को देता है। देवरानी बरतना मुझसे नहीं चाहती और सलवातें घमंडी को सुनाती है।

लेकिन मुहल्ले की दूसरी औरतें भी माँ को मुतअव्वुन करती थीं। माँ सख़्त परेशान हो रही थी। आख़िर मुंशी जी से लड़ाई हुई। उसने डाँटा कि अगर घमंडी ने हमारे मकान के इर्द-गिर्द कहीं पेशाब किया तो उससे बुरा कोई न होगा।

आख़िर मेहमान के समझाने से माँ को पता चल गया। उसने न सिर्फ़ अपना सर पीटा, बल्कि एक दो हत्थड़ बेटे के भी जमा दिया।

“हाय तूने बाप दादा का नाम डुबो दिया है रे!” पड़ोसन के साथ फिर लड़ाई हुई और माँ ने खरी खरी सुना दीं, “हरामख़ोर तुझे वो दिन याद है जब तेरी बाहिन हराम करवा के निकली थी बावा के घर से, ना अंधा देखा था ना काना। करने की की थी और वहाँ जा कर घड़ा फोड़ दिया था, जाने किस-किस का गरीब ऐसर के सर पे!” और घर आकर माँ घमंडी को कोसने देती। घमंडी जब सब हकीमों से मायूस होता तो माँ की हिकमत में आराम पाता था। लेकिन माँ उसे गालियाँ देती थी, “गोर भोग ले तो को” अब दुनिया घमंडी की आँखों में आबला थी। एक बड़ा आबला जो उत्तर से दक्खिन और पूरब से पच्छिम तक फैला हुआ था और जिसमें पीप के दरिया रिस रहे थे।

रात हो गई। माँ झुल्लंगे में पड़ी अभी तक ठनक रही थी, “ये बीमारी कहाँ से मोल ले ली रे मेरे दुश्मन! सारा जिस्म फोड़े-फोड़े हो चुका है, ये बीमारी आग है निरी आग। ये अमीरों की दौलत है। मैं ग़रीब औरत इस आग को कैसे बुझाऊँ? मैं वेदों को क्या बताऊँ? मैं तुम्हारी माँ हूँ रे घमंडी!

शरीक मुझे ताने देते हैं। पड़ोसी मुझे खड़ा कर लेते हैं और अजीब बे-ढंगे सवाल करते हैं रे।”

घमंडी क़रीब पड़ा हर क़िस्म की शर्म-ओ-हया से बे-नियाज़, एक टक छत की तरफ़ देख रहा था। छत में लगे हुए नरकुल उसकी आँखों में उतर आए थे और झींगुर उसके दिमाग़ में बोलने लगे थे। अब तक हवा के झोंकों में तल्ख़ी की नुमायाँ रमक़ पैदा हो कर उसके जिस्म के ईंधन में और शोले पैदा कर रही थी। किवाड़ भी खुले हुए थे। गोइन्दी, सुमूम के झोंकों में कराह रही थी और आसमान पर बदनुमा दाग़ों वाला आतिशक ज़दा चाँद अपनी यरक़ानी नज़रों से ज़मीन की तरफ़ देख रहा था। उसके बाद घमंडी की आँखों में पेट की तख़मीर ने एक ग़ैर मुरई धुंद सी फैला दी। उसकी पलकें बोझल होना शुरुअ हुईं। नरकुल छत पर चले गए। झींगुरों ने ज़बान बंद कर ली। फोड़े रिसने बंद हो गए।

सब दुनिया सो रही थी लेकिन माँ जाग रही थी। उसने बीस के क़रीब हुलास की चुटकियाँ नथनों में रख लीं और उठ खड़ी हुई। दाएं हाथ से उसने दिया उठाया और घिसटती हुई अपने बेटे के पास पहुँची। आहिस्ता-आहिस्ता उसके बालों में हाथ फेरने लगी। घमंडी सोया हुआ था, लेकिन माँ की शफ़क़त उसके रुएँ-रुएँ में तसकीन पैदा कर रही थी। माँ ने बेटे की तरफ़ देखा, मुस्कुराई और बोली।
“मैं सदक़े, में वारी, दुनिया जलती है तो जला करे, मेरा लाल जवान हो गया है ना? इसी लिए, हाय मरे तेरी माँ भगवान करे से।”

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