Sone Ki Kanthi Subhadra Kumari Chauhan

सोने की कंठी सुभद्रा कुमारी चौहान

बिंदो पोस्टमेन की लड़की थी। उसका पिता रायसाहब निर्मलचंद की कोठी के सागरपेशे की एक कोठरी में किराए से रहता था। पोस्टमैन की आमदनी ही कितनी? खर्च सदा ही आमदनी से कुछ ज्यादा हो जाया करता था; इसलिए बिंदो और उसकी माँ को अच्छे गहने और कपड़े कभी नसीब न हुए।

बिंदो रूपवती थी, और उसको अच्छे-अच्छे गहने-कपड़ों का शौक था। स्त्रियाँ स्वभावतः सौंदर्य की उपासिका होती हैं; जो जितनी अधिक सुंदर होती है, (उनकी सौंदर्योपासना उतनी ही अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। किंतु सुंदरी बिंदो गहनों और कपड़ों के लिए तरसा करती थी। रायसाहब की स्वजातीय होने के कारण कभी-कभी तीज-त्योहार या काम-काज होने पर कोठी से बिंदो की माँ के लिए बुलावा आता, और माँ के साथ बिंदो भी जाया करती। वहाँ रायसाहब की लड़कियों को खूब सजी-धजी देखकर, उनके चमकते हुए हीरे-मोती के गहने और दृष्टि को फिसला देने वाले रेशमी कपड़ों को देखते ही वह अधिक क्षुब्ध हो जाया करती; विशेषकर इसलिए और भी, कि रायसाहब की लड़कियाँ सुंदर न थीं; गहने- कपड़े उनके शरीर पर ऐसे जान पड़ते जैसे कि किसी ठूँठ के साथ लपेट दिए गए हों।

बिंदो की राय थी कि अच्छे कपड़े और गहने पहिनने का अधिकार उन्हीं को होना चाहिए जो सुंदर हों। कुरूप स्त्रियों का श्रृंगार तो श्रृंगार का उपहास और कला का अनादर है। रायसाहब की लड़कियों से गहने-कपड़े की प्रतियोगिता में हारकर बिंदो हताश न होती; घर लौटते ही वह शीशे में अपना सुंदर मुँह देखकर मन-ही-मन उनके प्रति कहती, गहना-कपड़ा पहिनकर भी तो उनका काला मुँह गोरा नहीं हो जाता; बड़े-बड़े दाँत मोतियों सरीखे नहीं चमकते । फिर एकाएक वह दीर्घ निःश्वास के साथ शीशे के सामने से दूर चली जाती; मानो यह सोचती कि विश्व के सारे सौंदर्य की वस्तुएँ केवल उसी के लिए बनाई गई थीं। किंतु निर्माता की भूल से वह उससे दूर रख दी गई हैं। रायसाहब की लड़कियों के पास तो वे सौंदर्य वर्धक वस्तुएँ अनावश्यक ही हैं, उनसे उन लड़कियों के सौंदर्य की वृद्धि तो नहीं हो पाती, हाँ उन वस्तुओं का सौंदर्य अवश्य घट जाता है।

बिन्दो को एक आशा थी। वह सोचती थी कि विवाह के बाद मुझे भी बहुत से गहने और कपड़े मिलेंगे, जैसे दूसरी विवाहिता लड़कियों को मिला करते हैं। उनके समान मैं भी अपने घर की मालकिन बनूंगी। मेरे 'वे' भी बहुत-सा रुपया लाकर मेरे हाथों में रख दिया करेंगे और तब मैं भी मनमाना खर्च करूंगी। बाजार में कोई अच्छा कपड़ा या गहना देखते ही 'वे' मेरे लिए खरीद लावेंगे, और मैं उसी अभिमान से पहिनूंगी जैसे ये पहिनती हैं। किसी के पूछने पर मैं जरा संकोच और सलज्ज भाव से कह दूंगी कि यह गहना या कपड़ा तो खुद वे ही अपनी पसंद से मेरे लिए खरीद लाए हैं, उसे विश्वास था कि जब विधाता ने उसे सुंदरता देने में इतनी उदारता की है, तब ये गहने-कपड़े की इच्छा भी एक-न-एक दिन अवश्य पूरी होगी। वह उस दिन की प्रतीक्षा बड़ी लगन से किया करती।

धीरे-धीरे बिन्दो सयानी हुई और उसका विवाह हो गया। किंतु निर्धन की बेटी भला धनवान के घर कैसे व्याही जाती? मित्रता बैर और विवाह-सगाई तो अपने बराबरी वालों में ही शोभा देते हैं। तात्पर्य यह कि बिन्दो के गहने-कपड़ों की प्यास ज्यों-की-त्यों बनी रही। विवाह के समय कुछ गहने और कपड़े आए अवश्य थे; किंतु ससुराल पहुंचने के वाद ही वे एक-एक करके किसी-न-किसी बहाने से ले लिए गए। बिन्दो समझ गई कि वे गहने उसके नहीं हैं। बेचारी जी मसोसकर रह गई; और करती भी क्या?

बिन्दो की ससुराल में खेती-बारी होती थी। परिवार बड़ा था। बिन्दो की दो जैठानियां थीं और एक अविवाहित देवर। तीन भाई तो खेती का काम मन लगाकर करते थे; किंतु बिन्दो के पति जवाहर का मन खेती के कामों में न लगता था। वह स्वभाव से ही कुछ शौकीन थे। उनकी गाने-बजाने की तरफ विशेष रुचि थी। कुश्ती लड़ने और पहलवानी करने का भी शीक था। गठे हुए बदन पर सदा मलमल या तनजेब का कुरता रहता; घुंघराले वाल सदा किसी-न-किसी सुगंधित तेल से बसे रहते। स्वभाव में आत्माभिमान की मात्रा भी अधिक थी। वे कुछ न कमाकर भी घर भर पर अपना रोब जमाते रहते।

बिन्दो कुछ पढ़ी-लिखी होने के कारण उस देहात में आदर की वस्तु हो गई थी; विशेषकर उस समय अवश्य, जब वह रामायण या महाभारत पढ़ती और गांव की अनेक स्त्रियां वहां एकत्र हो जातीं, वे बिन्दो की सास के भाग्य की सराहना करतीं और कहतीं, यह लक्ष्मी-सी बहू तुम्हारे घर आई है; इसके कारण भगवान के दो बोल हमलोग भी सुन पाती हैं।

बिंदो भी अपने इस देहाती जीवन से असंतुष्ट न थी। सास उसका आदर करती थी, जेठीनियाँ उसे काम न करने देतीं। इसके अतिरिक्त जवाहर उसे प्यार भी बहुत करता था। उसी घर में लड़ाई-झगड़ा होने पर कई बार ऐसे मौके आए कि उसके जेठ अपनी स्त्रियों पर हाथ चला बैठे, किंतु जवाहर बिंदो से कभी एक कड़ी बात भी न करता। वह हर तरह से, अपने देहाती, ढंग से ही सही, उसे संतुष्ट रखने का प्रयत्न करता । बिंदो भी अब सुखी थी; उसे गहने-कपड़े की याद न आती थी। वैसे तो देहात में अच्छे गहने-कपड़े पहिनता ही कौन है? फिर भी सबके बीच में बिंदो-ही-बिंदो दिख पड़ती थी। बिंदो सबसे अधिक सुंदरी तो थी ही; साथ ही पति की तरह वह सबसे अच्छे कपड़े भी पहिना करती थी।

मना करने पर भी वह जेठानियों के साथ काम करती; और सास को नियम से रोज रामायण सुना देती। रात को अलाव के पास बैठती, जहाँ गाँव की अनेक युवतियाँ, वृद्धाएँ, युवक और प्रौढ़ सभी इकट्ठे होते; फिर बहुत रात तक कभी कहानी होती और कभी पहेलियाँ बुझाई जातीं। वहाँ दिन भर के परिश्रम के बाद सब लोग कुछ घंटे निश्चित होकर बैठते; उस समय कहानी और पहेली के अतिरिक्त किसी को कोई भी चिंता न रहती थी।

सबेरे नदी का नहाना भी कम आनंद देने वाला न रहता। बूढ़ी, युवती, बहू, बेटी सब इकट्ठी होकर नहाने जाती; रास्ते में हँसी-मखौल और तरह-तरह की बातें होतीं; बिंदो भी उनके साथ जाती; नदी में नहाना उसे विशेष प्रिय था और कभी-कभी जब वह बिरहा गाते हुए दूर से आती हुई अपने पति की आवाज सुनती या जब वह देखती कि उसका पति अपनी मस्त आवाज में-
'खुदा गवाह है हम तुमको प्यार करते हैं' गा रहा है, तो उसे ऐसा प्रतीत होता कि जवाहर उसी को लक्ष्य करके कह रहा है। तात्पर्य यह कि बिंदो पूर्ण सुखी थी; अब उसकी कोई और इच्छा न थी।

एक बार बिंदों की माँ बीमार पड़ी। माँ की सेवा करने के लिए बिंदो को लगातार चार-पाँच महीने नैहर में रहना पड़ा। फिर उसकी आँखों के सामने वही रायसाहब की लड़कियाँ और वही गहने-कपड़ों का प्रदर्शन होने लगा। उसकी सोई हुई आभूषणों की आकांक्षा फिर से जाग उठी। वह सोचने लगी, क्या इस जीवन में मेरी अभिलाषा कभी पूरी न होगी? तो फिर ईश्वर ने मुझे इतना रूप ही क्‍यों दिया? किंतु विधि के विधान पर किसका जोर चलता?

रायसाहब निर्मलचन्द चालीस के उस पार पहुंच चुके थे, फिर भी उनमें रसिकता की मात्रा आवश्यकता से अधिक थी। वे प्रायः सिनेमा देखने जाया करते थे; किसी अच्छी कहानी की एक्टिंग के लिए नहीं, केवल सुंदर चेहरों को देखने के लिए। उन्होंने सब तीर्थ भी कर डाले थे; और प्रायः पर्वों पर सब काम छोड़कर भी वे स्नान-घाटों पर पहुंच जाते थे। किसी प्रकार के पुण्य-लाभ की उन्हें इच्छा रहती थी या नहीं, यह तो ईश्वर जाने; किंतु स्नान करती हुई युवतियों के अंग-प्रत्यंग की ताक-झांक की उत्कट इच्छा उनके चेहरे पर कोई भी साफ देख सकता था। वे कश्मीर और नैनीताल भी अक्सर गर्मी की छुट्टियों में जाया करते थे; किंतु वे जलवायु परिवर्तन के लिए जाते थे या और किसी उद्देश्य से यह नहीं कहा जा सकता। वे सुंदर स्त्रियों के पीछे अनायास ही मीलों का चक्कर अवश्य लगा आते थे।

वे बहुत कुरूप थे। इसलिए सुंदरी की बात तो अलग रखिए, कोई कुरूप से कुरूप स्त्री भी उनकी तरफ आंख उठाकर देखने में अपना अपमान समझती थी; इसलिए प्रायः गंदे मजाक करके ही वे अपनी वासना की तृप्ति कर लिया करते थे। इसके अतिरिक्त वे परोपकारी भी थे। उनके घर एक नामी-गिरामी वैद्यराज रहा करते थे, जो रायसाहब के मित्रों और उनके आश्रित निर्धनों का मुफ्त इलाज करते थे। उनका दवाखाना रायसाहब की बैठक से लगा था। मरीज को दवा लेने के लिए रायसाहब की बैठक से होकर ही वैद्यराज के पास जाना पड़ता था। बिन्दो की मां का इलाज भी यही वैद्यराज करते थे। घर में और कोई न होने के कारण बिन्दो को ही मां के लिए दवा लानी पड़ती थी।

एक दिन दोपहर को बिन्दो जब दवा लेने गई तो उसने देखा कि रायसाहबव के पास एक सुनार कई तरह के गहने फैलाए बैठा है। सहसा इस प्रकार गहनों की प्रदर्शनी सामने देखकर इतने दिनों की सोई हुई बिन्दो की गहनों की उत्कंठा फिर से जाग्रत हो उठी। क्षण-भर के लिए वह भूल गई कि वह यहां किसलिए आई है। वह उत्सुकता-पूर्वक उन फैले हुए गहनों के पास बैठ गई, और बड़े चाव से उन्हें उठा-उठाकर देखने लगी। उनमें से तीन लड़ की एक कंठी थी जो बिन्दो को बहुत पसंद आई। उसने उस कंठी को कई बार उठाया और रखा; और अंत में एक ठंडी सांस के साथ वह उसे वहीं रखकर अलग खड़ी हो गई। रायसाहब ने भी वही कंठी पसंद की। बाकी गहने वापिस करके सुनार को दाम देने के लिए दूसरे दिन बुलाकर उन्होंने उसे रवाना कर दिया।

यद्यपि बिन्दो की उमर की रायसाहव की लड़कियां थीं। फिर भी बिन्दो उनकी कृदृष्टि से बची न रही। उसके इस समय के हार्दिक भाव रायसाहब अच्छी तरह ताड़ गए और वार करने का यही उपयुक्त समय देखकर वे हंसते हुए बोले, बिन्दो, यह कंठी तुम्हें बहुत पसंद आई है, पहिनोगी?
एक प्रकार की अव्यक्त आशा से बिंदो का चेहरा ख़िल उठा; पर यह प्रसन्‍नता क्षणिक थी। वह गंभीर होकर बोली, नहीं, मैं न पहिनूँगी। गहने -गरीबों के लिए नहीं होते।
रायसाहब बोले, गहने तो गरीब-अमीर सभी के लिए होते हैं। फिर तुम्हारी तरह का गरीब तो इच्छा करते ही मनमाना गहना पा सकता है।
-सो कैसे? बिंदो ने पूछा, गहनों की इच्छा तो मुझे सदा से रही है; पर वे मुझे कभी नहीं मिले और न जीवन भर मिलेंगे, यह मैं अच्छी तरह जानती हूँ।
रायसाहब धीरे-धीरे बिंदो की तरफ आते हुए बोले, जीवन भर की बात तो अलग रही बिंदो, यह कंठी तुम्हें इसी समय मिल सकती है; केवल तुम्हारी इच्छा करने भर की देर है। तुम्हारे ऊपर एक क्या, ऐसी लाखों कंठियाँ निछावर की जा सकती हैं। पर बिंदो यदि तुम मेरे मन को समझती!
रायसाहब के आरक्त चेहरे और हिंसक पशु की तरह आँखों को देखते हुए बिंदो सिहर उठी और दो कदम पीछे हटकर बोली, आप मुझे दवा दिलवा दें, मैं जाऊँ अम्मा अकेली है। उसने इस बात को इतने जोर-जोर से कहा जिससे अंदर आवाज पहुँच सके ।

वह शीघ्र ही दवा लेकर लौटी। उसने मन-ही-मन सोचा, अब मैं दवा लेने न जाऊँगी, रायसाहब की नीयत ठिकाने नहीं है। मैंने समझा था कि वह बेटी समझकर मुझे कंठी देना चाहते हैं; परंतु वे तो सतीत्व के मोल उसे बेचना चाहते हैं। चूल्हे में जाए ऐसी कंठी! मुझे न चाहिए विधाता! सतीत्व कंठी से कई गुना ज्यादा कीमती है। किंतु इतने पर भी उस कंठी को वह भूल न सकी। रह-रहकर कंठी उसकी आँखों के आगे झूलने लगी। फिर उसने एक युक्ति सोची। यह हो सकता है कि जैसे वह मुझे छलना चाहते हैं मैं भी उन्हें छल लूँ। उनसे कंठी ले लूँ फिर बचकर भाग जाऊँ। ऐसे अनेक तरह के संकल्प-विकल्प करती हुई बिंदो सो गई। दूसरे दिन दोपहर को बिंदो को फिर दवा लेने जाना पड़ा । पहुँचकर उसने देखा कि रायसाहब के मसनद के पास उसी तरह की चार कंठियाँ पड़ी हैं। बिंदो के पहुँचते ही रायसाहब ने उसे बैठने के लिए कहा। बिंदो बैठ गई।

कल उसने जितने संकल्प किए थे उसे इस समय याद न रहे। कंठियों की चकाचौंध के सामने बिंदो को सब-कुछ भूल गया। बिंदो के सामने ही रायसाहब ने एक कंठी को तौलाकर उसकी कीमत ढाई सौ रुपए सुनार को देकर बिदा कर दिया। बिंदो चकित दृष्टि से उस कंठी की ओर, और कभी उन रुपयों की तरफ देखती थी। व्यापारी के जाते ही जैसे उसकी तंद्रा टूटी । वह उठकर खड़ी हो गई; बोली, दवा दिलवा दीजिए, मैं जाऊँ, देर हो रही है।

-अभी कहाँ की देरी होने लगी। कहते-कहते रायसाहब ने एक कंठी बिंदो के गले में पहिना दी और उसे जबरन पकड़कर एक बड़े शीशे के सम्मुख खड़ा कर दिया; फिर उसकी तरफ सतृष्ण नेत्रों से देखते हुए बोले, अपनी सुंदरता देखो, वहाँ बिंदो है या कोई दूसरी? बिंदो मंत्रमुग्ध-सी देखती रह गई। वह अभी रायसाहव की किसी बात का उत्तर भी न दे पाई थी कि इसी समय उन्होंने अपने बड़े-बड़े दाँतों वाला मुँह बिंदो के होंठों पर धर दिया। बिंदो को जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। वह घबराई किंतु कुछ वश न चला। इस प्रकार कुछ तो कंठी के लालच में और कुछ रायसाहब की जबरदस्ती के कारण उस दिन दोपहर के सन्‍नाटे में अभागी बिंदो अपने को खो बैठी। बेचारी को उस कंठी की बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ी। परंतु उसके बाद फिर रायसाहब के घर दवा लेने कभी न गई।

उसके कुछ ही दिन बाद बिंदो ससुराल चली गई और उस कंठी को भी वह सबसे छिपाकर अपने साथ ले गई। ससुराल में लोगों के पूछने पर उसने यही बतलाया कि यह कंठी उसकी माँ ने उसे दी है।
किंतु बिंदो ने उसे कभी पहिना नहीं । पति के आग्रह करने पर जब कभी वह उसे, घंटे-आध घंटे के लिए पहनती थी तो ऐसा मालूम होता था, जैसे काला विषधर उसके गले से लिपटा हो। कंठी को देखते ही प्रसन्‍न होने के बदले वह सदा उदास हो जाती थी।

बिंदो के पति और जेठों में अनबन हो गई। भाई-भाई अलग हो गए। दूसरे भाई तो खेती करके खुशो-खुशी आराम से रहने लगे; किंतु जवाहर से खेती का काम नहीं होता था। जिसका परिणाम यह हुआ कि सब लोग तो चार पैसे कमाकर गहने-कपड़े की फिकर करने लगे। इधर जवाहर के घर फाके होने लगे। अभिमानी स्वभाव के कारण जवाहर अपनी विपत्ति भाइयों पर प्रकट न होने देता।

अब पहलवानी छूट गई, मलमल, तनजेब के कुरते मैले दिखने लगे, सिर में तेल भी कहाँ से मिलता, जब खाने के लिए घर में अन्न का दाना भी न रहता? बिंदो से पति का कष्ट देखा न गया और उसने एक दिन कंठी निकालकर पति को बेचने के लिए दे दी। जवाहर बड़ी प्रसन्‍नता से कंठी लेकर सराफे की ओर गया; पर थोड़ी देर बाद उसने लौटकर निराशा से कहा, यह तो मुलम्मे की है।

बिंदो यह सुनकर, सर थामकर बैठ गई, मानो उस पर वज्र गिर पड़ा ।

 
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