लोक कथाएँ
Lok Kathayen
 Hindi Kavita 

Nagurai Aur Nakhlipi: Lok-Katha (Tripura)

नागुराई और नखलिपि: त्रिपुरा की लोक-कथा

बहुत समय पहले की बात है। त्रिपुरा में अनेक जनजातियां रहती थीं। ये जनजातियां एक स्थान पर न रहकर घूम-घूमकर खेती करती थीं। ये घूमते-घूमते एक स्थान पर पहुंचते। जंगल का हिस्सा साफ़ करते, खेत बनाते और खेती करने लगते। कुछ वर्षों के बाद जब उन्हें लगता कि अब मिट्टी का उपजाऊपन कम हो रहा है तो वे वह जगह छोड़कर दूसरी जगह चल देते। फिर वहां पर जंगल साफ़ करके खेत बनाते और खेती करने लगते। इन खेतों को ये लोग झुम कहते थे। 'झुम' पर सब लोग मिल-जुलकर रहते थे, मिलजुलकर खेती करते थे। ये झुम किसी एक व्यक्ति के नहीं होते थे। झुम के मुखिया को 'राई' कहते थे और उसकी बात सब लोग मानते थे। ऐसा ही एक झुम एक ऊंची पहाड़ी की तलहटी में कल-कल करती एक नदी के किनारे बसा था। इसके मुखिया का नाम चंपाराई और उनकी पत्नी का नाम खुलमति था। चंपाराई और खुलमति की एक ही संतान थी उनका बेटा नागुराई, जिस पर वे जान छिड़कते थे। नागुराई एक सुंदर, सजीला और मेहनती नौजवान था। उसका सुडौल, गठीला, शक्तिशाली बदन और अपार शक्ति उसे अन्य युवकों से अलग करती थी।

एक बार खुलमति नदी में नहा रही थी। पास ही झुम में नागुराई काम कर रहा था, अचानक उसकी मां की आवाज़ आई, “नागु... नागु जल्दी यहां आओ।" नागुराई दौड़ता हुआ वहां पहुंचा जहां उसकी मां नहा रही थी। उसकी मां नदी की तरफ़ इशारा कर रही थी। नागु ने देखा नदी के बीचोबीच एक लड़की बही जा रही है। नागु नदी की तेज़ धारा की परवाह किए बिना नदी में कूद पड़ा।

वह तैरता हुआ बीच धारा में पहुंचा, सावधानी से लड़की को पकड़ा और धीरे-धीरे उसे किनारे पर ले आया। किनारे आकर उसने लड़की को ज़मीन पर लेटा दिया। अब तक वहां और लोग भी जमा हो गए थे। खुलमति और अन्य लोग लड़की के उपचार में लग गए। नागुराई जल्दी से घर पहुंचा। उसने बांस की खपच्चियों को जोड़कर एक झूला जैसा बनाया, फिर उसे लेकर नदी किनारे गया। लड़की को झूले पर लेटाकर उसे घर ले आया। ओझा को बुलाया गया। ओझा अपनी जड़ी-बूटियों की थैली लेकर वहां आ गया। उसने लड़की के मुंह में एक बूटी का रस टपकाया। लड़की के पेट में जो पानी चला गया था, वह उसके मुंह से बाहर आने लगा और थोड़ी ही देर में उसे होश आ गया। ओझा कुछ और दवाइयां देकर वहां से चला गया।

उस लड़की की देखभाल का ज़िम्मा अब नागुराई की मां खुलमति पर था। लड़की ने अपना नाम नखलिपि बताया। उसके मां-बाप या परिवार के बारे में जब पूछा जाता तो वह चुप रहती, ज़्यादा पूछने पर रोने लगती। धीरे-धीरे खुलमति ने कुछ भी पूछना बंद कर दिया।

खुलमति के बेटी नहीं थी। वह बेटी का सारा प्यार नखलिपि पर लुटाने लगी। नखलिपि भी झुम के लड़के-लड़कियों में घुल-मिल गई। झुम की लड़कियां उसे बतातीं कि किस तरह नागुराई ने नदी की तेज़ धारा की परवाह किए बिना उसे बचाया, किस प्रकार प्रेम से उसकी देखभाल की। नखलिपि पर इन बातों का बड़ा प्रभाव पड़ता। धीरे-धीरे नखलिपि नागुराई को मन ही मन प्रेम करने लगी, पर वह कुछ कहने से डरती। सोचती कि पता नहीं नागुराई के मन में मेरे बारे में क्या है? लेकिन उसे पता नहीं था कि नागुराई भी मन ही मन उसे चाहने लगा था।

गर्मी का मौसम आया। झुम के नौजवान लड़के-लड़कियां जंगल में खाने योग्य फल-फूल, जड़ और बांस की नई कोंपलें जमा करने के लिए चल दिए। उनके साथ नखलिपि भी गई। सबकी पीठ पर बांस की टोकरी बंधी थी और सिर पर लांग (माथे पर बांधने के लिए कपड़े की पट्टी)। लड़कों ने हाथ में दाव ले रखे थे। जंगल में पहुंचकर वे लोग चारों ओर फैल गए और फल-फूल जमा करने लगे। नखलिपि भी फल-फूल जमा कर रही थी कि उसे सरसराहट की आवाज़ सुनाई दी। उसने सिर उठाकर सामने देखा तो उसकी चीख़ निकल गई। सामने एक बहुत बड़ा अजगर एक पेड़ से लिपटा नखलिपि की तरफ़ देख रहा था। वह धीरे-धीरे कुंडली ढीली कर नखलिपि की ओर बढ़ रहा था।

नखलिपि की चीख़ पास में ही काम कर रहे नागुराई ने सुनी तो वह झट से वहां पहुंच गया। वहां का दृश्य देखा तो वह समझ गया कि नखल्रिपि की जान ख़तरे में है। वह अजगर पर टूट पड़ा और उसका मुंह दोनों हाथों से कसकर दबा दिया। अजगर उसे अपनी कुंडली में दबाने का प्रयास करने लगा। तभी नागुराई ने अपने दाव से अजगर का गला काट दिया। अजगर की कुंडली ढीली पड़ गई। तब तक सब लड़के-लड़कियां वहां आ गए थे। नागुराई ने नदी में जाकर अपना शरीर धोया। फिर सब लोग अजगर को उठाकर गांव की तरफ़ चल दिए। अंत में नागुराई और नखलिपि एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए चल रहे थे। नखलिपि का दिल अब तक ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

गांव में उस शाम देवता को बलि चढ़ाई गई और रातभर उत्सव होता रहा।

नागुराई के माता-पिता नागुराई का विवाह एक योग्य कन्या से करना चाहते थे। इसलिए वे एक अच्छी कन्या की खोज में लग गए। नागुराई ने जब माता-पिता को अपने लिए लड़की ढूंढ़ते देखा तो सोच में पड़ गया कि कैसे अपने माता-पिता को बताए कि वह तो नखलिपि से विवाह करना चाहता है। इसके लिए उसने अपनी बहन पपटी की मदद मांगी। पपटी अपने चाचा-चाची के पास गई और बोली, “चाची आप नागु के लिए क्यों इधर-उधर लड़की ढूंढ रहे हैं। लड़की तो घर में है।"

“कौन?” खुलमति ने पूछा। “नखलिपि, और कौन,” पपटी बोली। “अपनी नक्खा! यह तो हम भी चाहते हैं। लेकिन क्या नागु और नक्खा एक-दूसरे से विवाह करना चाहेंगे?" नागुराई के पिता चंपाराई सरदार बोले। “मैं उन्हीं की तरफ़ से आई हूं।” पपटी ने उत्तर दिया। नागु और नक्खा का विवाह हो रहा है, यह बात सारे झुम में फैल गई। सब लोग बहुत प्रसन्‍न थे और सबसे ज़्यादा प्रसन्‍न नागु के माता-पिता थे जो कब से नखलिपि को अपनी बहू बनाने के सपने देख रहे थे। इस ख़ुशी के अवसर पर किसी को याद नहीं रहा कि उन्हें नखलिपि के माता-पिता या परिवार के बारे में कुछ नहीं पता है।

ज़ोर-शोर से विवाह की तैयारियां होने लगीं। आसपास के सारे झुमवालों और नागुराई के सारे गोतियों (गोत्र वाले) को भी न्योता भेजा गया। “एक-एक गोतिए को न्योता पहुंचना चाहिए। एक भी छूट गया तो वह सारा जीवन उलाहना देता रहेगा,” नागुराई की मां बोली।

आख़िर विवाह का दिन आ गया। सुबह से ही रात के भोज की तैयारियां हो रहीं थीं। सूअर व केकड़े का मांस, हरे कच्चे बांस का सूप और चावल। लड़के-लड़कियां रंग-बिरंगे कपड़े पहने एक तरफ़ नाच-गान में मस्त थे तो दूसरी तरफ़ बड़े-बूढ़े आपबीती और जगबीती बताने में लगे थे। एक ऊंचे स्थान पर विवाह की वेदी बनी थी जिसे झुम के लोगों ने सुंदर फूल-पत्तियों से सजाया था।

सुबह से नागुराई के गोतिए दूर-दूर से पहुंच रहे थे। उन्हीं गोतियों में एक गोतिया था-जुमिया। वह भी अपनी दूसरी पत्नी और बेटी के साथ आया।

नगुराई के पिता चंपाराई और जुमिया कभी मिले नहीं थे, चंपाराई को केवल यह मालूम था कि जुमिया की पहली पत्नी मर गई थी, तो उसने दूसरा विवाह किया और उसकी दूसरी पत्नी बहुत तेज़-तर्रार थी। आते ही जुमिया तो बड़ों के बीच में बैठ गया और उसकी पत्नी औरतों की बैठक में चली गई। उसकी बेटी सीधी वहां पहुंची, जहां दुल्हन को फूलों से सजाया जा रहा था। जब जुमिया की लड़की ने नखलिपि को देखा तो वह चौंक गई, “यह तो मेरी सौतेली बहन है जिसने नदी में कूदकर जान दे दी थी, यह यहां कैसे!” वह दौड़ी-दौड़ी अपनी मां के पास पहुंची और उसे बताया कि दुल्हन कौन है। सुनकर उसकी मां के होंठों पर कुटिल मुस्कान फैल गई, 'देखें अब कैसे नखलिपि की शादी इतने अच्छे घर में होती है।' वह नागुराई की मां के पास पहुंची और बोली कि दुल्हन तो उसके पति की पहली पत्नी की बेटी है। हमने समझा था कि वह नदी में डूबकर मर गई। नागुराई और उसका एक ही गोत्र है तो यह शादी नहीं हो सकती। “बात तो ठीक है, अगर दोनों का गोत्र एक है तो यह शादी कैसे हो सकती है,” लोग कहने लगे। विवाह का सारा आयोजन ठप्प पड़ गया। सब लोग धीरे-धीरे वहां से जाने लगे। थोड़ी देर में वहां सन्‍नाटा छा गया। नागुराई ने जब सुना तो उसने दूल्हे की पोशाक नोचकर फेंक दी। नखलिपि को छोड़कर सब लड़कियां चली गईं और वह एक कोने में बैठकर रोती रही।

बना हुआ भोज का खाना वैसे ही पड़ा रहा। किसी ने कुछ नहीं खाया। ऐसे ही रात हो गई। आधी रात के समय नागुराई नखलिपि के पास आया और बोला, “नक्खा हम एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। यहां हमारा विवाह नहीं हो सकता। चलो, हम यहां से भागकर कहीं दूर चले जाएं। वहां हम नया झुम बनाएंगे और नए सिरे से जीवन शुरू करेंगे।” नागुराई और नखलिपि रात के अंधरे में घर से निकल गए। वे तीन रातें और तीन दिन तक चलते रहे। भूख लगने पर जंगल के फल तोड़कर खा लेते और झरने का पानी पीते।

इस तरह वे पहाड़ियां पार करके एक बड़े झुम में पहुंचे। नागुराई ने झुम के सरदार से वहां रहने की अनुमति मांगी जो उन्होंने सहर्ष दे दी। न सिर्फ उन्होंने उन्हें वहां रहने दिया बल्कि उन्हें झुम साफ़ करने और अपना 'टांग' बनाने में भी मदद की। नागुराई ने एक पहाड़ी के ऊपर जमीन से पांच-छह फीट ऊंचे बांस के मचान पर अपना “टांग” यानी घर बनाया। किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि वे लोग कहां से आए हैं। सबने यह मान लिया कि वो अपना पिछला झुम छोड़कर नए झुम की तलाश में यहां आए हैं। नागुराई और नखलिपि के मीठे और परिश्रमी व्यवहार के कारण वे शीघ्र ही वहां के लोगों में घुल-मिल गए। समय ख़ुशी-ख़ुशी बीतने लगा।

इधर नागुराई के माता-पिता ने समझा कि नागुराई और नखलिपि ने विवाह न होने के कारण आत्महत्या कर ली। खुलमति अक्सर अपने बेटे को याद करके रोती और इसके लिए नखलिपि को कोसती। इस तरह वे अपने झुम से सहर्ष निकल गए। पपटी का विवाह हुआ। जब वह विदा होकर अपनी ससुराल के लिए चली, तो गांव के चार नौजवान रिवाज के अनुसार उसे उसकी ससुराल तक पहुंचाने के लिए उसके साथ चले। जब वे पपटी के ससुराल पहुंचे तो उन्हें एक पहाड़ी के ऊपर एक टांग दिखाई दिया। टांग एक ऊंचे मचान पर और सबसे अलग था। पूछने पर उन्हें बताया गया कि टांग नागुराई और नखलिपि का है। रात में नागुराई के घर में उत्सव हुआ। देर रात तक वे लोग नाचते-गाते रहे।

गांव लौटकर सबने नागुराई के माता-पिता को बताया कि नागुराई और नखलिपि जीवित हैं। नागु के माता-पिता की आंखों में ख़ुशी के आंसू आ गए। “अपना नागु ज़िंदा है।” चंपराई और खुलमति मिलने चल दिए। नागुराई और नखलिपि जंगल से लौटे। नागु की डलिया जलाने डलिया में फल, फूल और खाने योग्य पेड़-पौधों की जडें थीं। दोनों जब अपनी टांग के पास पहुंचे तो उन्हें वहां बड़ी चहल-पहल दिखाई दी। उन्होंने देखा कि उनकी टांग गांव के लोगों से भरी थी, और उनके बीच में नागु के माता-पिता बैठे थे। नागु और नक्खा बड़े ख़ुश हुए। नागु ने अपने पिता-माता के पैर छुए, नक्खा ने भी ऐसा ही किया।

“बेटा नागु, हम तुम्हें लेने आए हैं। हम तो समझे थे कि तुम लोग अब इस दुनिया में नहीं हो। तुम्हें जीवित देखकर जैसे हमें नया जीवन मिल गया है।” नागु के पिता बोले।

“तुम हमारे साथ चलो बेटा,” नागु की मां बोली, “नागु हम तुम्हारा विवाह नक्खा से भी अच्छी लड़की से कर देंगे, नक्खा का विवाह भी किसी योग्य लड़के से कर देंगे।”

“तुम्हें पता है, तुम्हारा विवाह नहीं हो सकता। यह नियम के विरुद्ध है, और देवता भी यह नहीं चाहेंगे।”

“पिताजी, माताजी, हम दोनों एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते। हमारा विवाह हो गया है। हमें क्षमा करें,” नागु ने उत्तर दिया।

नागु के माता-पिता ने बहुत कोशिश की कि नागु उनकी बात मानकर उनके साथ चले। जब नागु किसी तरह से राज़ी नहीं हुआ तो नागु की माता का सारा क्रोध नक्खा पर उतरा। “मैंने तुम्हें बेटी का प्यार दिया और तुमने मेरे साथ क्या किया! तुम जादूगरनी हो, तुमने मेरे पुत्र को मेरे विरुद्ध कर दिया है। देवता तुम्हें इसका दंड देंगे। मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई स्थान नहीं है। तुम मर गई मेरे लिए।” जब नक्खा ने यह सुना तो वह रोने लगी। उसने खुलमति के पैर छुए और बोली, “मैंने अपनी मां को बहुत पहले खो दिया था। आपमें मैंने फिर से अपनी मां को पाया था। आज मैंने फिर से उन्हें खो दिया। जब मेरी मां कहती हैं कि मैं उनके लिए मर गई तो अब मैं जीवित रहकर क्या करूंगी? मुझे मर जाना चाहिए।” इतना कहकर नखलिपि नदी की तरफ़ भागी। नागुराई ने उसकी आख़री बात सुन ली थी। वह भी “नक्खा नक्खा... रुको” कहता उसके पीछे भागा। दोनों नदी के ऊपर ऊंची कगार पर पहुंचे।

नक्खा बोली, “नागु हम इस दुनिया में एक साथ नहीं रह सकते। इससे अच्छा है हम इस दूसरी दुनिया में चलें जहां हम साथ रह सकेंगे।” नागु और नक्खा ने अपने हाथ फैलाए और नदी में कूद गए। लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। नागु और नक्खा नीचे जाने की जगह ऊपर आसमान की तरफ़ उड़ गए। आसमान में पहुंचकर देखते ही देखते वे चमकती बिजली में बदल गए। बिजली को तुरंत काले बादलों ने ढक लिया। उसके बाद नागु और नक्खा को किसी ने नहीं देखा। आज भी जब आसमान में बिजली चमकती है तो त्रिपुरा के लोग कहते हैं, “देखो... देखो... नागुराई और नखलिपि!”

(गिरिजारानी अस्थाना)

 
 
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