Karamati Dana: French Folk Tale

करामाती दाना: फ्रांस की लोक-कथा

बहुत पहले की बात है । एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था । उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया ।

वह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था । कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था । लोग उस वैगी कह कर पुकारते थे ।

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला । उसका भूख के मारे बुरा हाल था । वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था । तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपने पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा ।

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा - "यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना । जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कोई कमी नहीं होगी ।"

वैगी दाने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी ।

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था । तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा - "तुम यहां आकर पेट भर कर भोजन खा सकते हो । यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है ।"

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला । वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया ।

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया । वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दी । एक सभ्य व पढ़ी-लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा - "आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं । पहले आप भोजन कर लीजिए ।"

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है । उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा । तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी । फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा - "मेडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए । सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे वापस ले लूंगा ।"
मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई ।
प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी । फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई ।
तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी । इसी बीच वैगी की आंख खुली । उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है ।

वैगी मुर्गी के पीछे दौड़ा । मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई । उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई । जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी ।

वैगी ने शोर मचाना शुरू कर दिया । घर के सभी लोग जाग गए । घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था । वह पूछने लगा - "आप हमारे मेहमान हैं, क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?"

वैगी बोला - "मैंने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिए ।"

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे कि उस दाने में क्या खासियत थी । वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं । वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए । मेजबान ने कहा - "वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है । आप चाहें तो उस मुर्गी को ले जा सकते हैं ।"

वैगी को बात जंच गई । उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले में डाल ली और वहां से चल दिया । सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा । वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए ।

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया । सुबह उठ कर वैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी । मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं ।

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियों ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था । इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी । बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया । वैगी रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए ।

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए । उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना । तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया ।

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया । आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका । बंगले में राजकुमारी अपने परिवार के साथ रहती थी । बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया । नहला-धुला कर कपड़े दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया ।

बंगले में रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया । वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा कुत्ता मिल गया । यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाए तो बदले में मैं राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा ।

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया । जब राजकुमारी अपनी सखियों के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा । राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बड़ा पत्थर कुत्ते को दे मारा । कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा । इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से वार कर दिया । कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया ।

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा । परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया ।

वैगी जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए । बगंले की मालिकिन ने बहुत समझाया कि वह दूसरा कुत्ते ले लो, परंतु वह नहीं माना । तब बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी । वैगी बोला - "जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा ।"
मालिकिन को वैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था ।

मालिकिन ने कहा - "तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं । यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ । यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी ।"
वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया । उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल लीं और चल दिया ।

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा । परंतु वह यह नहीं समझ पा रहा था कि वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे । वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था । भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा ।
तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा । फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा ।

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुभ गया हो । उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया । उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ों कीड़े-मकौड़े उड़कर उसे काटने लगे ।

वैगी ने थैला उठा कर दूर नदी में फेंक दिया । वैगी खाली हाथ रह गया । अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था । उसे लालच का फल मिल गया था ।

(रुचि मिश्रा मिन्की)

 
 
 Hindi Kavita