Jadui Gaay: Lok-Katha (Santal/Santadi)

जादुई गाय संताड़ी/संताली लोक-कथा

किसी समय एक राजा था उसके एकलौता पुत्र का नाम कारा था और कालांतर में राजा अतिशय दरिद्रता से घिर गया बस उसकी स्थिति भिखारी से थोड़ी ही बेहतर रह गई थी। एक दिन जब कारा कुछ बड़ा हो चरवाहा का काम करने के लायक हो गया तो राजा ने उसे बुलाया और कहा “मेरे बेटे, अभी मैं निर्धन हूँ परंतु कभी मैं भी धनी हुआ करता था। मेरे पास भी एक समृद्ध राज्य था और मवेशियों के रेवड़ थे और अच्छे वस्त्र भी थे; अब सब कुछ समाप्त हो चुका है और तुम जानते हो की बड़े कठिनाई से हम सभी को भोजन मिलता है। मैं वृद्ध हो गया हूँ और शीघ्र ही मेरी मृत्यु भी हो जाएगी, इससे पहले की मैं तुम्हें छोड़ कर इस दुनिया से चला जाऊँ मैं तुम को एक परामर्श देना चाहता हूँ: इस दुनिया मैं बहुत से राजा हैं, राजा के ऊपर राजा हैं; जब मेरी मृत्यु हो जाएगी तो क्या तुम किसी शक्तिशाली राजा का आश्रय स्वीकार करोगे।“ घर में भोजन की कोई पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण कारा को पड़ोस के राजा के यहाँ बकरियों को चराने का कार्य करने की विवशता थी; इसी कार्य के द्वारा वह अपना भोजन, वस्त्र और दो रुपया वार्षिक भृति की आजीविका कर सकता था। इसके कुछ दिनों के पश्चात उसके पिता का निधन हो गया और कारा अपने नियोक्ता राजा के पास गया और अपने पिता का श्राद्ध कर्म आदि करने हेतु उसने राजा से कुछ रुपया ऋण स्वरूप देने की मांग की और राजा को यह वचन दिया की जब तक की उनसे ली गई ऋण का भुगतान नहीं कर देता है वह उनका कार्य करता रहेगा।

इस प्रकार राजा ने कारा को पाँच रुपए नगद अग्रिम और पाँच रुपए मूल्य के चावल ऋण स्वरूप दिये जिस से की कारा ने अपने पिता के अंत्येष्टि भोज का प्रबंध कर सका। पाँच या छह दिनों के बाद उसकी माता की भी मृत्यु हो गई, और वह पुनः राजा के पास गया और उनसे पुनः दस रुपए की मांग की; सर्व प्रथम राजा ने पैसे देने से मना कर दिया परंतु कारा के अनुनय-विनय करने एवं उसके यह वचन देने के बाद की यदि वह इस ऋण का चुकारा नहीं कर पाएगा तो आजीवन राजा के यहाँ अपनी सेवा देते रहेगा। तब राजा ने उसे और अतिरिक्त दस रुपए ऋण दिये, और इस प्रकार कारा ने अपनी माता के मृत्यु भोज का भी आयोजन किया। किंतु राजा के सभी सात लड़के अपने पिता से इस बात पर अति अप्रसन्न थे कि उन्होने एक ऐसे व्यक्ति को क्यों बीस रुपए उधार दे दिये हैं जिससे की रुपए वापस मिलने की संभवना कदापि नहीं है, वे लोग कारा को पैसे लेने के कारण घुड़की भी दिया करते थे और उसको उलझन में डाल रखा था। तब उसके स्मृति में अपने पिता का कथन याद आया उन्होंने कहा था कि संसार में बहुत से राजा हैं, राजा के भी राजा हैं, और कारा ने किसी अन्य बड़े राजा के परिचर्या में जाने का निर्णय लिया और वहाँ से निसृत हो लिया। इस प्रकार वहाँ से भागने के उपरांत कुछ दूरी की यात्रा करने के पश्चात उसे एक राजा मिला जो की एक पालकी पर सवार हो कर अपने साथ बहुत से लोगों को लेकर अपने बेटे के लिए दुल्हन लाने जा रहा था; और कारा ने जब यह सुना तो उसने भी उस राजा का अनुसरण करने का फैसला कर लिया; इस प्रकार वह भी पालकी के पीछे-पीछे चलने लगा और रास्ते में एक स्थान पर एक सियारिन दौड़ कर सड़क पार कर गई; तब राजा अपने पालकी से बाहर निकल कर आया और उसने सियारिन का अभिवादन किया।

जब कारा ने यह देखा तो उसने सोचा “यह दुनिया का कोई बहुत बड़ा राजा नहीं हो सकता है वरना वह क्यों सियारिन को नमस्कार करेगा। अवश्य सियारिन ही राजा से बहुत ज्यादा शक्तिशाली होगी; मैं सियारिन का ही अनुगमन करुंगा।“ इस लिए उसने बारात के जुलूस को छोड़ कर सियारिन के पीछे हो लिया; अब सियारिन जो थी वह अपने छोटे-छोटे बच्चों के भोजन के लिए शिकार के तलाश में घूम रही थी, और वह जहां भी जाती कारा उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच जाता और उसे एक भी बकरी या भेंड को मारने का अवसर नहीं मिल सका; इस प्रकार वह अपने गुफा में जहां वह रहती थी वापस चली गई। तब उसके शावक उसके पास भोजन मांगने आए और उसने अपने पति से कहा की आज वह एक भी शिकार पकड़ नहीं पाई क्योंकि जहां भी वह गई एक आदमी दिन भर उसका पीछा करता रहा है, और वह अभी भी यहाँ गुफा के बाहर प्रतीक्षा कर रहा है।

तब सियार ने सियारिन से कहा-- तुम उस आदमी से पूछो की वह क्या चाहता है। इसलिए सियारिन गुफा से बाहर गई और कारा से पूछा और कारा ने कहा—“मैं तुम्हारे पास अपने को सुरक्षित रखने के लिए तुम्हारे पास आश्रय लेने के लिए आया हूँ;” तब सियारिन ने सियार को बुलाया और दोनों सियार दंपति ने कारा से कहा—“हम लोग सियार हैं और तुम मनुष्य हो। तुम हमारे साथ कैसे रहा सकते हो; हम तुम को खाने के लिए क्या दे सकते हैं और तुम्हारे लिए हम कौन सा कार्य ढूँढेंगे? कारा ने कहा— वह उन्हें ऐसे नहीं छोड़ेगा वह काफी उम्मीद के साथ उनके पास आया है; और अंत में सियार युगल को उस पर दया आ गई और वे आपस में एक दूसरे से सलाह करके बोले की तुम इतनी अपेक्षा से हम लोगों के पास आए हो इसलिए हम तुम्हें एक सौगात देंगे; इसलिए उन्होने कारा को एक गाय दिया जो की गुफा में ही इनके पास थी, और कारा से कहा—“क्योंकि तुमने हम पर विश्वास किया है इसलिए हमने तुम को लाभ पहुंचाने का निर्णय लिया है; तुम यह गाय ले लो, यदि तुम इसे माँ कह कर संबोधित करोगे तो यह गाय तुम्हारी प्रत्येक इच्छा को पूरी करेगी; किन्तु लोगों के सामने इससे कुछ मत माँगना अन्यथा लोग इसे तुम से छीन लेंगे; और यदि कोई तुम को कोई किसी प्रकार का प्रलोभन दे तो इसे छोड़ मत देना।”

तब कारा ने उनको धन्यवाद दिया और उनसे आशीर्वाद ग्रहण कर गाय को ले कर अपने घर की ओर चल पड़ा। रास्ता में जब वह तालाब के नजदीक आया तो उसकी इच्छा स्नान करने और फिर भोजन करने की हुई; जब वह स्नान कर रहा था तो उसने एक महिला को तालाब के दूसरे किनारे पर कपड़ा साफ करते देखा लेकिन उसने सोचा की वह महिला उस पर ध्यान नहीं देगी, इसलिए वह गाय के पास गया और कहा- माँ, मुझे बदलने के लिए दूसरा कपड़ा दो।“ उसके बाद गाय ने वमन करके कुछ नए वस्त्र दे दिये और वह उसको पहन लिया और अब वह बहुत भला लग रहा था। तब उसने गाय से कुछ थाली और बर्तन की माँग की और गाय ने उसे दे दिये; तब उसने गाय से कुछ रोटी और सूखे चावल माँगे, और उसने जो भी माँगा था उनको खा लिया और गाय से कहा की थाली और बर्तन उसके लिए रख ले; और गाय उन सभी को पुनः निगल गई।

अब वह महिला जो की तालाब के दूसरे किनारे पर थी यह सब कुछ होते हुए देखा था और भाग कर अपने घर गई और अपने पति से जो देखा था वह सारा वृतांत कह सुनाया और पत्नी ने पति से जिद किया की किसी भी प्रकार वह उससे वह जादुई गाय प्राप्त कर ले। यद्यपि उसका पति इस पर भरोसा नहीं किया किन्तु इस घटना का परीक्षण करने का सोचा, इस प्रकार वे दोनों कारा के पास गए और उससे पूछा की वह कहाँ जा रहा है और उन्होने कारा को रात्रि भोजन और रात में अपने घर में ठहरने और उसके गाय को खाने के लिए घास देने का प्रस्ताव दिया। कारा ने उनके निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया और उनके घर चला गया और वहाँ उन्होने कारा को सोने के लिए अपना अतिथि कक्ष दिया और पूछा की वह क्या खाना चाहेगा, किन्तु कारा ने कहा की वह रात में भोजन नहीं करेगा कारा चाहता था कि जब घर के सभी लोग सो जाएंगे तब वह गाय से भोजन माँग लेगा। तब दोनों पति और पत्नी ने एक योजना बनाई और यह दिखावा किया की उन दोनों में बड़ा ही उग्र झगड़ा हुआ है और दोनों एक दूसरे को कुछ देर तक गाली गलौज देने के बाद पति ग़ुस्से में तमक कर घर से बाहर चला गया और यह दिखावा किया की वह घर से भाग गया है; लेकिन कुछ दूर जाने के पश्चात वह दबे पाँव चुपके से अतिथि कक्ष में लौट आया। छत पर एक छकड़ा गाड़ी का ऊपरी भाग रखा हुआ था वह उसी छकड़ा गाड़ी के ऊपरी भाग में चढ़ कर अपने आप को छुपा लिया, कारा को इसके बारे में कुछ पता नहीं चला। जब कारा ने सोचा की घर के सभी लोग सो गए हैं तो उसने गाय से कुछ भोजन सामग्री माँगी और उत्तम भोजन बना कर खाया और सोने चला गया।

वह आदमी जो की ऊपर छुपा हुआ था वहाँ से सब कुछ देख रहा था और उसने यह पाया की उसकी पत्नी ने जो कुछ भी बताया था वह सत्य था; इसलिए मध्य रात्रि में वह छकड़ा गाड़ी जहाँ वह छुपा हुआ था उस से नीचे उतरा और कारा के जादुई गाय को अपने साथ ले गया और ले जा कर उसे अपने गायों बीच उसी रंग के गाय से मिलता-जुलता रंग के गाय के साथ बदल कर रखा दिया। अगले दिन प्रातः काल में कारा जगा और अपने गाय के पगहा को खोल कर आगे की यात्रा करने के लिए जाना चाहा, किन्तु गाय ने कारा का अनुकरण नहीं किया; तब कारा ने देखा की यह गाय तो दूसरी है, बदली हुई है और उसने आतिथेय को बुलाया और उस पर गाय के चोरी का आक्षेप लगाया। उस व्यक्ति ने इस अभियोग को अस्वीकार कर दिया और उससे कहा की किसी भी ग्रामीण से पूछ लो जिसने कारा को कल यहाँ गाय को लाते हुए देखा हो; अब किसी ने कारा को कल गाय लाते नहीं देखा था लेकिन कारा इस बात पर दृढ़ रहा की उसकी गाय बदल दी गई है और वह गाँव के प्रधान और ग्रामीणों को इस विषय के निराकरण के लिए बुलाने गया: लेकिन चोर ने एक सौ रुपए ग्राम प्रधान को एवं ग्रामीणों को एक सौ रुपए रिश्वत दिये और इस बात के लिए उनको राज़ी कर लिया की वे निर्णय उसके पक्ष में देंगे; इस प्रकार जब ग्राम प्रधान एवं ग्रामीण फैसला करने आए तो उन्होने कारा से कहा की आज प्रातः काल में उसे जो गाय रस्सी से बंधी मिली है वही गाय उसकी है वह उसे अपने साथ ले कर चला जाए।

कारा ने इस निर्णय का प्रतिरोध किया और कहा-- अब वह उसको बुलायेगा जिससे उस ने यह गाय लिया है और वह उसी गाय को इंगित करते हुए अपना बताते हुए कहा की इसे ही लेकर यहाँ से जाएगा। उनको यह भी कहा की जब वह यहाँ से जाएगा उतने देर की लिए यह गाय उनकी जिम्मेदारी में है, और वह तेजी से सियारों के गुफा की ओर चल पड़ा। सियारों को किसी प्रकार यह ज्ञात हो चुका था कि कारा के पास से गाय ठग ली गई है, और उन्होने मिलते ही कहा “अच्छा, तुम ने अपने गाय को खो दिया है?” और कारा ने जवाब दिया कि वह उन्हें अपने एवं ग्रामीणों के मध्य हुए विवाद में न्यायाधीश बना कर ले जाने हेतु आया है: इसलिए दोनों सियार कारा के साथ गाँव चले गए और कारा सीधे ग्राम प्रधान के पास यह कहने के लिए चला गया कि वह सभी ग्रामीणों को इकट्ठा कर ले; इस बीच दोनों सियार एक पीपल के पेड़ के नीचे चटाई बिछा कर पान चबाते हुए बैठ गए और जब ग्रामीण जमा हो गए तब सियार ने बोलना आरंभ किया, और कहा: “यदि एक न्यायाधीश रिश्वत लेता है तो उसके वंश के कई पीढ़ी को इहलोक एवं परलोक दोनों में विष्ठा खाना पड़ेगा; लेकिन यदि वह प्रजा के बीच अपराध-स्वीकरण कर लेता है तो उसे इस सज़ा से मुक्ति मिल सकती है। यही हमारे पूर्वजों ने कहा है; और जो व्यक्ति किसी को धोखा देता है तो उसे नरक में जाना पड़ेगा यह भी पूर्वजों ने कहा है। अब तुम सभी इस विषय में ईमानदारी से जाँच करो; हम लोग ईश्वर के समक्ष निष्पक्षता पूर्ण न्याय करने कि शपथ लेंगे और शिकायतकर्ता और अभियोगी को भी यह शपथ लेना होगा।“ यह सुन कर ग्राम प्रधान का अंतःकरण व्यथित हुआ और उसने स्वीकार किया की उसने एक सौ रुपए रिश्वत लिया है और ग्रामीणों ने भी स्वीकार की उनको एक सौ रुपए रिश्वत दिया गया है; तब सियार ने अभियुक्त से पूछा की उसको इस पर क्या कहना है: किन्तु वह अडिग रहा की उसने गाय को नहीं बदला है; तब सियार ने कहा की यदि वह कसूरवार साबित हो जाता है तो वह क्या क्षतिपूर्ति देगा उस व्यक्ति ने कहा वह इसका दुगना भुगतान करेगा। तब सियार ने गाँव वालों को गवाह बनाया की इस व्यक्ति ने अपने लिए क्या सज़ा तय किया है, और सियार ने प्रस्ताव रखा की वह और उसकी पत्नी दोनों सियार मवेशियों के समूह में जाएंगे, और यदि वे उस गाय को पहचान लेते है जिसे की कारा अपना बताता है तो यह निश्चित प्रमाण होगा की वही गाय कारा का है। इसलिए दोनों सियार जाकर और गाय को चुन कर बाहर ले आए, और ग्रामीण अचंभित हो चिल्ला उठे। “यही न्याय है। वे इतनी दूर से आए हैं और एक बार में ही गाय को पहचान लिया।“ वह आदमी जिसने की चोरी की थी उसके पास देने के लिए अब कोई जवाब नहीं था; तब सियार ने कहा : तुमने स्वयं ही वादा किया था की द्विगुणित दंड दोगे; तुमने एक सौ रुपया प्रधान को और एक सौ रुपया ग्रामीणों को दिया और जिस गाय को तुमने चुराया था उस का मूल्य दो सौ रुपया है सब मिला करके चार सौ रुपया हुआ इस प्रकार तुम को आठ सौ रुपया दंड देना होगा; और उस व्यक्ति को आठ सौ रुपया दंड देना पड़ा और सियार ने सब पैसा ग्रामीणों में वितरित कर दिया केवल दस रुपया कारा को दिया; और अपने लिए कुछ नहीं रखा।

तब कारा और सियार गाय को साथ लेकर विदा हुए, और गाँव से बाहर निकलने के पश्चात सियार ने दोबारा कारा को सतर्क किया की किसी के सामने गाय से कुछ भी न माँगें और बिदाई ले कर अपने घर के लिए रवाना हो गया। कारा अपना यात्रा जारी रखा और शाम को वह आम के एक बड़े बग़ीचा में पहुंचा जहाँ रात्रि विश्राम के लिए कई गाड़ी वान पहले से ठहरे हुए थे। इस लिए कारा उन गाड़ीवानों से थोड़ी दूरी पर एक पेड़ के नीचे रुक गया और अपनी गाय को एक पेड़ के जड़ से बाँध दिया। शीघ्र ही आंधी आ गई और सभी गाड़ी वान अपने-अपने गाड़ियों के नीचे आश्रय लिए और कारा ने गाय से एक तम्बू की माँग की और वे दोनों रात में उस तम्बू में रहे। पूरी रात बड़े ज़ोरों की वर्षा होती रही और प्रातः काल में गाड़ीवानों ने तम्बू देखा और उन्हें काफी आश्चर्य हुआ यह कहाँ से आया, और वे इस निष्कर्ष पर आए की यह गाय ने ही दिया होगा, यह गाय जादुई है; इसलिए उन्होने गाय को चुरा लेने का मन बनाया।

कारा को दिन में जब की सभी गाड़ीवान वहीं आस-पास ही थे गाय से तम्बू को निगल जाने के लिए कहने की हिम्मत नहीं हुई, इसलिए वह अगले दिन और रात तक वहीं रुका रहा और गाय को तम्बू से अलग रखा। जब कारा को नींद आ गई तो कुछ गाड़ीवान आए और गाय को ले कर चले गए और उसके स्थान पर एक बछड़ा सहित दूसरी गाय को रख दिये, और उन लोगों ने उस जादुई गाय को आम के गठरी से लदे छकड़े के गठरी के पीछे छिपा दिया। प्रातः काल कारा ने अचानक देखा की क्या घटना घटी है और वह गाड़ीवानों के पास जाकर पूछा और उन पर चोरी का दोषारोपण किया; वे सभी इस मामले में किसी प्रकार की जानकारी के होने से इंकार किया और कहा की वह चाहे तो अपनी गाय को खोज ले; इस लिए वह छावनी में खोजने लगा लेकिन गाय को नहीं खोज पाया।

तब वह गाँव के प्रधान को और चौकीदार को कहा वे भी नहीं खोज पाये और कारा को सलाह दिया की उसी गाय और बछड़ा को रख ले ये दोनों पहले वाली अकेली गाय से तो अच्छे हैं; लेकिन उसने वर्जित कर दिया और कहा की वह दंडाधिकारी के पास अभियोग लगाएगा और उसने प्रधान से वचन लिया की जब तक वह वापस आ नहीं जाता है वह इन गाड़ीवानों को यहाँ से जाने नहीं देगा। इसलिए वह एक मुस्लिम दंडाधिकारी के पास गया और यह संयोग की बात थी कि वह एक ईमानदार आदमी था जो रिश्वत नहीं लेता था और केवल न्याय करता था, और अमीर गरीब में किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं करता था; वह हमेशा दोनों पक्षों कि बात बड़े ध्यान से सुना करता था, वह उन कुछ धूर्त दंडाधिकारियों में से नहीं था जो कि बराबर उन कहानियों पर भरोसा करते थे जो की पहले उनको बताया जा चुका होता, और बाद में दूसरे पक्ष की ओर से जो कुछ भी कहानी बताई जाती उस पर कोई ध्यान नहीं देते। इसलिए कारा ने जब दंडाधिकारी को अपनी शिकायत बताई तो उन्होने गाड़ीवानों को बुलाया और गाड़ीवानों ने शपथ ले कर कहा की उन लोगों ने गाय की चोरी नहीं की है: और उन्होने यह भी कहा यदि उनके पास गाय मिल जाती है तो वे अपना पूरा संपत्ति अभिग्रहीत करा देंगे।

दंडाधिकारी ने छावनी में तलाशी के लिए पुलिस को भेजा और पुलिस ने गट्ठर के ढेर में से गाय को खोज निकाला, गाय के चारों ओर गट्ठों को रख कर बीच में छिपा दिया गया था, और उसी के अंदर गाय मिली और गाय को दंडाधिकारी के पास ले जाया गया। तब दंडाधिकारी ने आदेश दिया की गाड़ीवानों को अपना संकल्प पूरा करना होगा नहीं तो उनको जेल में बंद कर दिया जाएगा और उन गाड़ीवानों ने अपनी पूरी संपत्ति कारा को दे दिया। इसलिए कारा ने सभी माल असबाब, गट्ठर को गाड़ी पर लाद करके आनंद पूर्वक अपने घर की ओर चल पड़ा। पहले तो गाँव वाले उसे पहचान नहीं पाये की यह जो इतने संपत्ति के साथ आया है कौन है लेकिन कारा ने अपना परिचय दिया तब वे बहुत ही अचंभित हुए और बड़े ही प्रसन्नता से उसको एक शानदार घर बनाने में मदद किया। तब कारा राजा के पास गया जहाँ से उसने अपने माता-पिता के श्रद्धा कर्म के लिए रुपया उधार लिया था उसने जो भी राजा का पावना था उसे राजा को लौटा दिया। राजा कारा से बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपनी बेटी का विवाह कारा के साथ कर दिया और कुछ दिनों के बाद कारा ने अपने श्वशुर के राज्य में से अपना हिस्सा लिया और उसके बाद बड़े ही समृद्धि पूर्वक रहने लगा।

और राजा के सात बेटे जो की पहले कारा को घुड़का करते थे कारा के सफलता को देख कर वे भी विदेश जाने के लिए बड़े उतावले थे और इसलिए वे सभी विदेश जाने का योजना बनाए ताकि वे भी ढेर सारा धन प्राप्ति कर लाएँगे; इसलिए वे अपने पिता से कुछ पैसे ले कर चल पड़े। लेकिन उन्होने पूरे पैसों का अपव्यय कर उसे समाप्त कर दिया और बिना एक भी पैसा उपार्जित किए वापस अपने पिता के पास चले आए।

कहानी का अभिप्राय: विश्वास सबसे बड़ा धन है।

(Folklore of the Santal Parganas: Cecil Heny Bompas);

(भाषांतरकार: संताल परगना की लोककथाएँ: ब्रजेश दुबे)

 
 
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