लोक कथाएँ
Lok Kathayen
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Dusht Kannaki: Lok-Katha (Tamil Nadu)

दुष्ट कण्णकी: तमिलनाडु लोक-कथा

तिरुच्चिरापल्‍ली के एक छोटे से गाँव में 'कण्णकी' रहती थी। वह अपने पति की दूसरी पत्नी थी। घर में पहली पत्नी से उत्पन्न एक लड़का था 'रमन'।

कण्णकी को रमन फूटी आँख नहीं भाता था। वह उस बच्चे पर बहुत जुल्म ढाती थी। कण्णकी का पति दूसरे गाँव में सब्जी बेचने का काम करता था। उसके घर से निकलते ही वह रमन्‌ को घर के काम-काज में उलझा देती।

रमन्‌ को पूरे दिन में केवल एक बार ही भोजन मिलता था। एक बार कण्णकी ने पायसम्‌ (खीर) पकाई। रमन्‌ भी खाना चाहता था किंतु कण्णकी ने एक शर्त पर ही पायसम्‌ देना स्वीकार किया। वह बोली- 'मैं जैसे ही पायसम्‌ परोसूँगी तुम्हें एक ही घूँट में उसे पी जाना होगा।'

भोले-भाले रमन्‌ ने सोचा कि माँ ठिठोली कर रही है। उसने हामी भर दी। दुष्ट कण्णकी ने चूल्हे से उबलती-उबलती पायसम्‌ उसकी थाली में परोस दी। नन्हे रमन्‌ ने जैसे ही बर्तन को मुँह से लगाया। उसका मुँह जल गया किंतु कण्णकी ने उसे बर्तन हटाने नहीं दिया। इसी तरह वह रमन को सताने की नई-नई योजनाएँ बनाती रहती थी। रमन्‌ को दिन में कई-कई बार कोडम (जल भरने का धातु से बना बर्तन) में जल भरकर लाना पड़ता था।

एक दिन तंग आकर रमन्‌ ने घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। गाँव से निकलकर चलते-चलते वह एक टूटी-फूटी झोंपड़ी में पहुँच गया।

आराम करने के लिए वह वहीं लेट गया। भूखे-प्यासे रमन्‌ को नींद भी नहीं आ रही थी।

वह लेटे-लेटे अपनी मृत माँ को याद कर रोने लगा। तभी झोंपड़ी में से एक आवाज आई-

“मैं आ जाऊँ
सारे दुख-दर्द मिटा जाऊँ!'
रमन ने रोते-रोते ही उत्तर दिया- 'हाँ, आ जाओ।'

यह कहते ही झोंपड़ी प्रकाश से जगमगा उठी। एक सुंदर-सी परी रमन के सामने थी।

उसने सफेद रंग के कपड़े पहने थे। बालों का रंग हल्का सुनहरा था। परी ने प्यार-भरे स्वर में रमन का नाम पूछा।

वह रमन के लिए सुंदर कपड़े, खाने की अच्छी-अच्छी चीजें और बहुत से पैसे लाई थी।
थोड़ी देर बाद वह लौट गई। उसने रमन्‌ से भी घर जाने को कहा।
कण्णकी ने रमन को सुंदर कपड़ों में देखा तो छाती पर साँप लोट गया।

वह भला कैसे सह सकती थी? रमन्‌ को परी से इतना कुछ मिल जाए और वह मुँह ताकती रहे।
उसने बहला-फुसलाकर रमन्‌ से सारा हाल जान लिया।
शाम होते ही वह स्वयं उस झोंपड़ी में जा पहुँची। झोपड़ी में से आवाज आई।

क्या हम आ जाएँ!
तुझको सबक सिखा जाएँ!!
कण्णकी ने पूरी आवाज सुने बिना ही चिल्लाकर 'हाँ!' बोल दिया।

बस फिर क्या था झोपड़ी में विषैले साँपों की बरसात होने लगी। कोई साँप गले में पड़ा तो कोई गोद में गिरा। कण्णकी रोती-रोती, गिरती-पड़ती बाहर की ओर भागी।
पीछे से आवाज आई-

रमन को देना
पूरा दुलार
तंग मत करना बारंबार।

कण्णकी ने उस आवाज को ईश्वर की आवाज मानकर उस पर अमल किया। उस दिन के बाद से वह रमन को प्यार करने लगी। अब वह उसकी सौतेली माँ नहीं रही थी।

 
 
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