Bandar Beta: Lok-Katha (Santal/Santadi)

बन्दर बेटा संताड़ी/संताली लोक-कथा

एक बार एक आदमी जिसके छः बेटे और दो बिटियाँ थी। उसकी मृत्यु के समय उसकी पत्नी के गर्भ में उसका नौवां संतान था और जब लड़का का जन्म हुआ तो वह बंदर के सदृश्य दिखता था।

गाँव वाले और रिश्तेदार ने जननी को इससे निर्मुक्ति का परामर्श दिए। परन्तु माता ने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा- “चांदो ही जानते हैं कि उन्होंने मुझे ऐसा संतान क्यों दिया है, और जैसे उन्होंने किया है उनकी आज्ञा से मैं इसका लालन-पालन करूंगी।”

उसके सभी संबंधियों ने कहा यदि तुम इसका लालन-पालन करोगी तो तुम्हें परिवार से निष्कासित कर दिया जायेगा। ऐसा कहने पर भी माता ने दृढ़तापूर्वक कहा की वह उसका किसी भी कीमत पर परित्याग नहीं करेगी, पालन-पोषण करेगी। इसलिए संबंधियों ने उसे बंदर बेटा के साथ गाँव से बाहर झोंपड़ी में रहने के लिए भेज दिया, और बन्दर बेटा बड़ा हुआ और मनुष्यों की तरह बोलना सीख लिया।

एक दिन उसके सभी बड़े भाई खेती के लिए जंगल की सफाई कर रहे थे और बंदर बेटा एक कुल्हाड़ी लेकर उनके साथ गया और पूछा की वह अपने लिए भूमि की सफाई करना चाहता है और उन्होंने कौतुक वश उसे एक भू स्थल दिखा दिया जहाँ जंगल सबसे ज्यादा घना था। इसी कारण बंदर बेटा वहां गया और उसने अपने कुल्हाड़ी को पेड़ के तने के उपर चलाना आरम्भ किया, और लौट कर अपने भाइयों को कठिन परिश्रम से भूमि की सफाई करते हुए देखने लगा, और जब उन्होंने अपना कार्य समाप्त कर लिया तब वह जा कर अपने कुल्हाड़ी का पुनः वार करना प्रारम्भ किया और बाद में उनके साथ घर वापस आ गया। प्रत्येक दिन वह उसी प्रकार करता रहा- और एक दिन उसके भाइयों ने पूछा क्यों वह पूरा दिन उन लोगों के साथ व्यतीत करता है?, लेकिन उसने कहा वह जब वह थक जाता है तभी काटते हुए पेड़ों को कटते देखने के लिए उनके पास आता है, सभी भाई उस पर हंस पड़े और कहा वे सभी उस स्थान को देखना चाहेंगे जहाँ उसने कटाई कर सफाई की है, इसलिए उसने भाइयों को उस स्थान के पास ले गया और तब भाइयों की आंखें विस्मय से फटी रह गई की उन सभी ने मिल कर जितनी जगह की सफाई की है उससे बड़ी जगह की बंदर बेटा ने अकेले सफाई कर डाली है। तब भाइयों ने जिस जंगल की कटाई की थी उसे आग लगा कर जलाया और भूमि का जुताई प्रारम्भ किया,

परन्तु बंदर बेटा के माता के पास न तो हल-बैल, पशु या रोपण के लिए धान का बीज था; घर में मात्र एक वस्तु थी वह था कुम्हड़ा, इसलिए बंदर बेटा कुम्हड़ा से बीज को निकाला और अपने द्वारा साफ किये हुए भूमि पर उसका रोपण कर दिया। उसके भाइयों ने पूछा की उसने किस चीज की बुनाई की है और उसने कहा- चावल की।

भाइयों ने जुताई और बुनाई कर नित्य जा कर अपने बढ़ते हुए पैदावार को देखते थे, और एक दिन वे सभी बंदर बेटा के उपज को देखने गये और उन्होंने देखा की यह तो चावल नहीं कुम्हड़ा है और वे सभी उस पर हंस पड़े। जब फसल पक कर तैयार हुआ तो भाइयों ने प्रथम फसल को देवता को अर्पित करने के रस्म के लिए तैयारी आरम्भ किया और बंदर बेटा उनको यह रस्म करते हुए देखता रहा की वह भी इनके जैसा ही इस रस्म का आयोजन करेगा। एक दिन भाइयों ने प्रथम पैदावार को घर लाए और उस प्रथम फसल को बोंगा को अर्पित किया, और उन्होंने इस प्रथम फसल के अर्पण समारोह के उत्सव में बंदर बेटा और उसकी माता को भी निमंत्रित किया।

वे दोनों वहां गये और इस समारोह का पर्याप्त आनन्द उठाया; और दो-तीन दिन के बाद बन्दर बेटा ने भी कहा की वह भी प्रथम फसल का उत्सव आयोजित करेगा, इसलिए बन्दर बेटा ने अपनी माता से कहा की आँगन की सफाई कर लिपाई-पुताई कर ले और उसने अपने भाइयों को निमंत्रित किया और पहले बन्दर बेटा ने अपना शुद्धिकरण किया और जंगल के अपने द्वारा सफाई किये हुए स्थल में उपजाये हुए उपज में से एक बड़ा सा कुम्हड़ा ले कर आया; उस उपज को उसने आत्माओं को अभ्यर्पित किया; बन्दर बेटा ने कुम्हड़ा के अव्य खंड का इस प्रकार पृथक्करण किया की मानो वह मुर्गा के मुंड का शिरोच्छेद कर रहा हो और ऐसा करने के पश्चात उसने देखा की वह कुम्हड़ा चावल से भरा हुआ था; बन्दर बेटा ने अपनी माता को बुलाया और वे उस चावल की ओसाई करने व फटकने लगे और वह इतना अधिक था की उनके टोकरी के भर जाने के बाद भी बचा रहा, टोकरी से अधिक हो गया; वे इस अप्रत्याशित लाभ से अत्यंत ही प्रसन्न हुए लेकिन उन्होंने इस प्रसंग को लुटेरों से बचे रहने के लिए गुप्त ही रखा।

बन्दर बेटा ने अपनी माता से कहा की निश्चिन्त हो इतना भात राँधो की उसके भाई सपत्नीक यथेच्छित भोजन कर सकें, और मात्र एक समय में परोसा जाने वाले भोजन की मात्रा में नहीं जैसा की उन्होंने किया था, जितनी बार परोसन चाहिए उतना मिल सके और यदि आवश्यक हुआ तो जा कर वह एक और कुम्हड़ा तोड़ लायेगा; इसी कारण उसकी माता ने अतिशय भात बनाया। जब भोज का निर्दिष्ट बेला आया तो भाइयों का कहीं अता-पता नहीं था क्योंकि उनको यह अपेक्षा ही नहीं थी कि वास्तव में भोज में कुछ भोजन मिलेगा; इसलिए बंदर बेटा जा कर उन्हें लिवा लाया, और जब वे आये तो भोज का ऐसा आयोजन देखा की यथेच्छित मात्रा में खाने को भात है यह देख कर अचंभित रह गए।

जब फसल पक गया तब बंदर बेटा ने सभी कुम्हड़ा को जमा किया और उससे उसको यथेष्ट मात्रा में चावल पूरे वर्ष के लिए प्राप्त हो गया। इसके बाद सभी भाई घोड़ा खरीदने के लिए बाहर गए और बन्दर बेटा भी उनके साथ गया किन्तु उसके पास रुपया नहीं था उसने घर से एकमात्र एक लच्छा रस्सी को ले गया; उसके भाइयों को उसे अपने साथ ले जाने में लज्जा आ रही थी इसलिए उन्होंने उसे भगा दिया, सोई वह उनसे पहले उस स्थान पर जा पहुंचा जहाँ घोड़ा बेचने वाले रहते थे। भाइयों को पहुंचने में देर रात का विलम्ब हो गया था, इसलिए उन्होंने निर्णय लिया की अब वे अगले प्रातः को घोड़ा खरीदेंगे और उस पर बैठ कर घर चले जायेंगे, इसलिए वे रात भर के लिए डेरा डाल लिए। बन्दर बेटा अस्तबल के शहतीर के उपर रात भर उन से छीप कर रहा; और रात में घोड़ों ने आपस में विचार-विमर्श करना आरम्भ किया की कौन सबसे सरपट सबसे दूर तक दौड़ सकता है, और “एक घोड़ी ने कहा की मैं बारह कोस तक धरती पर सरपट दौड़ सकती हूँ और तत्पश्चात हवा में बारह कोस उड़ सकती हूँ।” जब बन्दर बेटा ने यह सुना तो वह नीचे उतरा और उसने उस घोड़ी के खुर में एक खपच्ची खोंस कर घोड़ी को लंगड़ी बना दिया।

अगले सुबह भाइयों ने मनचाहा घोड़ा खरीदा और उस पर सवार हो कर सभी चले गये। तब बंदर बेटा घोड़ा के व्यापारी के पास गया और व्यापारी से पूछा वह घोड़ी लंगड़ी क्यों है और उसने व्यापारी को परामर्श दिया की वह उसका उपचार करे। किंतु व्यवसायी ने कहा की यह निरर्थक है: जब घोड़े अस्वस्थ हो जाते हैं तब उनकी निश्चित ही मृत्यु हो जाती है; तब बंदर बेटा ने पूछा यदि वह उस घोड़ी को बेच दे तो उसके बदले में वह उसको एक लच्छी रस्सी देगा। सौदागर यह सोच कर सहमत हो गया की यह जानवर तो अनुपयोगी है, इसी कारण बन्दर बेटा को उसने घोड़ी बेच दिया और बन्दर बेटा उसे ले कर आगे चल पड़ा, लेकिन जब वह बाहर उनके नज़रों से दूर चला आया तो उसने खुर में से खपच्ची को निकाल दिया और घोड़ी का लँगडापन खत्म हो गया। तब वह घोड़ी पर सवार हो कर अपने भाइयों के पीछे चला पड़ा और जब वह लगभग उन तक जा पहुंचा तो वह उपर हवा में उड़ान भरा और उनको पार करते हुए पहले घर पहुँच गया।

वहां उसने अपने घर के बाहर घोड़ी को बांधा और जा कर स्नान किया और भोजन के उपरान्त भाइयों का प्रतीक्षा करने लगा। वे सभी पूरा दिन रहते नहीं पहुँच सके उसके बाद जब वे आये तो उन्होंने बंदर बेटा और उसके सवारी को देखा और वे सभी जिज्ञासु हो उठे की बंदर बेटा उन लोगों से पहले घर कैसे पहुंच गया। वे सभी आत्मश्लाघा में चूर थे कि उनका घोड़ा बन्दर बेटा के घोड़ी से अत्यधिक अधिक वेगवान है। उन्होंने यह दिखाने को आतुर हो एक घुड़दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया। दो-तीन दिन के बाद घुड़दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ और बन्दर बेटा की घोड़ी सहजता पूर्वक दूसरे घोड़े को पीछे छोड़ते हुए सरपट दौड़ कर बारह कोस जमीन पर और बारह कोस हवा में उड़ कर पार कर लिया। तब वे सभी अपने घोड़े से उसे बदलना चाहे, लेकिन उसने यह कह कर मना कर दिया की पहले उन्होंने अपने घोड़े का चुनाव किया है इसलिए वह अब कोई बदलाव करने नहीं जा रहा है।

दो-तीन वर्षों के पश्चात बन्दर बेटा धनवान हो गया और उसने घोषणा किया की वह विवाह करना चाहता है; उसकी माँ के लिए यह उद्घोषणा व्याकुलता का कारण बन गया इसी कारण वह सोचने लगी की कोई मानव पुत्री इससे शादी करना नहीं चाहेगी और कोई बंदरिया उससे बात नहीं कर पायेगी; इसलिए उसने बन्दर बेटा से कहा की वह स्वयं ही अपने लिए वधू तलाश कर ले। एक दिन वह अपने लिए पत्नी खोजने हेतु घर से बाहर एक जलाशय के पास चला गया जहाँ कुछ कन्याएं स्नान कर रही थी, और उसने उनके समान एवं कपड़े ले कर भाग कर एक पेड़ के उपर जा बैठा, और जब एक लड़की ने अपने समान एवं कपड़ों को गायब पाया और देखा की सब के समान एवं कपड़े पेड़ के उपर लटक रहे हैं तो उसने बंदर बेटा से अपने सखियों के कपड़े उधार मांग कर लाये और बाद में बंदर बेटा से अपना कपड़ा मांगा; तब उसने लड़की को कहा की उसे यह तभी देगा जब वह उस से विवाह करना स्वीकार कर लेगी; यह बंदर तो बात कर सकता है यह विदित होने पर लड़की बड़ी विस्मित हुई और बन्दर बेटा ने लड़की से जिस प्रकार बात-चित किया था उस कारण वह उस पर आकृष्ट हो गई थी और बन्दर बेटा ने उसके बाल पकड़ कर उसे पेड़ पर उपर खींच लिया और लड़की ने अपने सखियों से कहा की वह जहाँ है उसे वहीं छोड़ कर सभी अपने घर जाएं। तब बन्दर बेटा ने लड़की को अपने पीठ पर बैठा कर वहां से अपने घर की ओर भाग चला।

कन्या के पिता और संबंधी तीर-धनुष ले कर बाहर उस बन्दर को खोजने आये जिसने उनकी कन्या को हस्तगत कर लिया था लेकिन तब तक वे काफी दूर जा चुके थे और उसे कभी नहीं तलाश पाए। जब बन्दर बेटा अपनी वधू के साथ गाँव में प्रस्तुत हुआ तो सभी ग्रामीण आश्चर्य चकित हो उठे की उसने किसी को विवाह करने हेतु खोज लिया है, सब कुछ तत्परता से प्रस्तुत किया गया की शीघ्रता पूर्वक ब्याह हो जाये और सभी संबंधी को शादी के अवसर पर निमंत्रित किया गया फिर उनका पाणिग्रहण हुआ और बन्दर बेटा और उसकी पत्नी हमेशा के लिए सुखपूर्वक रहने लगे।

कहानी का अभिप्राय: मात्र रूप रंग से किसी की बुद्धि का आकलन नहीं किया जा सकता है।

(Folklore of the Santal Parganas: Cecil Heny Bompas);

(भाषांतरकार: संताल परगना की लोककथाएँ: ब्रजेश दुबे)

 
 
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