Ali Khwaja Aur Dhurta Saudagar: Iraqi Folk Tale

अली ख्वाजा और धूर्त सौदागर: इराकी लोक-कथा

बहुत दिन हुए बगदाद में एक जगत्-विख्यात हारुन-उल-रशीद नामक खलीफा का राज्य था। उन दिनों बगदाद में एक साधारण सौदागर भी रहता था। उसके न कोई बीवी थी और न कोई संतान। वह ज्यों-त्यों करके अपने दिन बिता रहा था।

एक रात जब वह अपने मकान में सोया हुआ था तो उसने एक स्वप्न देखा। उसने देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति आकर उसकी चारपाई के पास खड़ा हो गया है। उस वृद्ध ने उसको फटकार सुनाते हुए कहा, “अरे मूर्ख, तू मक्का-मुअज्ज़मा हज़ के लिए क्यों नहीं जाता?”

उस दिन अली ख्वाजा ने उसकी ओर बिलकुल ध्यान न दिया परंतु वही स्वप्न वह प्रति रात लगातार कई दिनों तक देखता रहा, तो उसे भय लगने लगा कि इस वृद्ध की आज्ञा का पालन न करूं तो हो सकता है कि किसी प्रकार का दुःख मुझ पर आ जाए। यह सोच उसने जल्दी से जल्दी समय निकालकर हज-यात्रा को जाने का निश्चय कर लिया।

मन में ऐसा निश्चय करके उसने पहले तो अपनी दुकान का माल बेच डाला, बाद में अन्य सामान और अंत में दुकान के भी दाम वसूल कर लिए। इस तरह जो धन उसने इकट्ठा कर लिया उससे उसने हज-यात्रा का प्रबंध कर लिया। इतना करने पर भी उसके पास कुछ सोने की मुहरें बच रहीं। अब उसे यह चिंता लगी कि इनका क्‍या किया जाए। वह इनको सुरक्षित करने के उपाय पर सोच-विचार करने लगा तो उसे एक ख्याल आया। उसने इन मुहरों को एक मर्तबान में डाल दिया और ऊपर से ताज़ा जैतून भर दिये। मर्तबान का मुंह ठीक तरह से ढककर उसने मर्तबान उठाया और अपने एक सौदागर मित्र के पास ले गया। उसने उससे कहा, “भाई, आप जानते हैं कि मैं हज करने को जा रहा हूं। मेरे पास जैतूनों का यह मर्तबान बचा हुआ है। क्या आप इसे अपने पास रख लेंगे? मैं जब लौटूंगा तो वापस ले लूंगा।”

सौदागर ने उत्तर दिया, “भाई अली, यह भी कोई पूछने की बात है? तुम यह चाबियां लो और मेरे मालगोदाम में जिस जगह चाहो रख दो। आप जब लौटेंगे तो ज्यों-का-त्यों वहीं पड़ा मिलेगा ।”

इस पर अली ख्वाजा ने चाबियां लीं और अपना मर्तबान उसके मालगोदाम में एक कोने में रख दिया। सौदागर को धन्यवाद देकर वह दूसरे दिन हज-यात्रा के लिए रवाना हो गया।

दिन बीतते गए, यहां तक कि सात बरस हो गए और अली ख्वाजा वापस न लौटा। इतनी देर में एक दिन सौदागर की पत्नी को जैतूनों के खाने का खयाल आया और वह अपने पति से बोली, “बहुत दिन से हम लोगों ने जैतून चखे तक नहीं।” पत्नी की बात सुनते ही सौदागर को अली ख्वाजा के जैतूनों के मर्तबान की याद आयी और वह बोला, “तूने जैतूनों का नाम क्या लिया कि एक भूली-बिसरी बात याद दिला दी। मुझे इस समय अली ख्वाजा की याद आ गई जो आज से सात वर्ष पहले हज के लिए गया था और जाते समय मेरे पास जैतून से भरा मर्तबान अमानत-रूप में छोड़ गया था। न मालूम अली ख्वाजा का क्या हुआ, वह जीवित है या मर गया, इसका इल्म खुदा को ही है।”
सौदागर की बीवी ने पूछा, “पर इसकी याद आपको किस तरह आयी?”

इस पर सौदागर बोला, “वह जो जैतूनों का मर्तबान मेरे गोदाम में छोड़ गया है, चलो उसी में से इस समय जैतून निकाल लें। वह अवश्य मर गया होगा, मुझे उसके वापस लौट आने की अब कोई आशा नहीं।”

उसकी बीवी, जो एक नेकदिल औरत थी, उससे मनाही करते हुए बोली, “ख़बरदार! ऐसी बात न करना। यह तो अमानत में ख्यानत है! हो सकता है वह जीवित हो और लौट आए। फिर आप कया कहेंगे उससे ? कितनी शर्म की बात होगी यह! मैं हाथ जोड़कर कहती हूं कि ऐसा बुरा काम मत करो!”

“कितनी भोली है तू और कितनी बे-सिर-पैर की बात करती है! न तो अली ख्वाजा वापस आएगा और न मुझे उसके सामने लज्जित ही होना पड़ेगा। मैं दावे से कहता हूं कि वह मर चुका है।”

“आपकी इच्छा जो चाहें सो करें पर मेरी मर्जी इसमें नहीं है। मेरा दिल तो यही कहता है कि ऐसा करना अपराध है। इस पर भी यदि आपकी इच्छा हो तो निकाल लीजिए परंतु बाद में मुझसे यह न कहिएगा कि तूने नहीं कहा था।”

सौदागर को बीवी की बात न माननी थी और न ही मानी। उसने हाथ में दीया लिया और मालगोदाम की ओर चल दिया । वहां पहुंचकर उसने मर्तबान को एक कोने में पड़ा पाया। उस पर गर्द और मिट्टी की तह जमी हुई थी। उसने उसको झाड़कर साफ किया और ऊपर का ढक्‍कन खोला। ढक्कन खोलने से उसके बीच में से सड़े हुए जैतूनों की सड़ांध आयी और उसका दिमाग चाटने लगी। इस पर उसने मर्तबान को उठाया और पास ही एक मेज़ पर ले आया। उसने यह देखने के लिए कि अच्छे-अच्छे जैतून कौन-कौन से होंगे, मर्तबान को मेज़ पर उलटा। उलटने के साथ ही उसमें से एक मुहर नीचे गिर पड़ी। सौदागर ने कहा, “अरे, यह क्या! यह मुहर कैसी!” कहकर उसने जल्दी से मर्तबान में हाथ डाला तो देखा कि उसमें जैतूनों के नीचे मुहरें भरी पड़ी हैं।

मुहरें देखते ही उसके मन में लोभ हुआ और नीयत बदल गई। उसने यह तय कर लिया कि जो भी हो यह बात बीवी से न कहूंगा। फिर वह बीवी के पास गया और बोला, “तुम्हारा कहना ठीक है! जैतून तो गल-सड़ गए हैं, एक भी काम का नहीं है। सो मैंने फिर से मर्तबान को वैसे ही बंद करके रख दिया है। अगर अली ख्वाजा लौटकर आया भी तो उसको पता न चलेगा कि यह खोला गया है।”

बीवी ने फिर कहा, “मैं फिर भी यही कहूंगी कि आपने इसको खोलकर अच्छा नहीं किया।”

खाना खाकर सौदागर किसी बहाने से फिर मालगोदाम में गया। उसने मर्तबान में से सारी मुहरें निकालकर अपने संदूक में रख लीं। दूसरे दिन उसने बाजार से नये-ताज़ा जैतून लाकर उनको मर्तबान में भर दिया और उसी स्थान पर रखा जहां पर अली ख्वाजा ने रख दिया था। संयोग से दूसरे ही दिन अली ख्वाजा लौट आया और सीधा सौदागर के पास गया | उसे जीवित देख सौदागर तो चकित रह गया परंतु अपनी हैरानी को छिपाते हुए उसने अली ख्वाजा का खूब स्वागत किया । कुछ समय तक कुशल-समाचार पूछने के बाद अली ख्वाजा बोला, “भैया, क्या मेरा मर्तबान सुरक्षित है?”

“अरे हां, बिलकुल उसी तरह और उसी स्थान पर जहां तुम छोड़ गए थे। मुझे क्या पड़ी थी कि उसको देखता । यह लो चाबियां और निकालकर ले जाओ ।”

अली ख्वाजा ने चाबियां लीं और मालगोदाम की ओर गया। उधर से मर्तबान निकालकर लाया। उसने उधर एक मिनट भी न खोया और सीधा अपने मकान पर गया। वहां जाकर उसने मर्तबान को खोला, परंतु उसमें एक भी मुहर न पा और ताज़े जैतून भरे देख उसका हर्ष शोक में बदल गया। उसके होंठ सूख गए। वह पागल की तरह सौदागर के पास भागा-भागा आया और वहां पहुंचकर बोला, “मित्र! तुम मुझे इस प्रकार एकदम लौट आते देखकर अवश्य हैरान हो गए होगे। परंतु मैं यह कहने आया हूं कि मुझे अपने मर्तबान में रखी हुई सौ मुहरें नहीं मिल रही हैं। यह क्या बात है? मैंने इन्हें जैतूनों के नीचे छिपाकर रखा था। यदि आप किसी कारणवश निकालकर अपने काम में लाए हों तो कोई बात नहीं, जब आपकी इच्छा हो दे देना। हां, मुझे इस समय केवल रसीद लिख दें।”

सौदागर की नीयत बदल चुकी थी, इसलिए उसने इस बात का उत्तर पहले ही सोच रखा था। अतः जब अली ख्वाजा ने यह प्रश्न किया तो वह बोला, “आप किन मुहरों की बात करते हैं, मेरी समझ में तो कुछ आया ही नहीं? क्या आपको अपना मर्तबान ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ नहीं मिला? मुझे क्या मालूम कि आपने इसमें क्या रखा था? आपने चाहे इसमें मुहरें रखी हों, चाहे राख। जो कुछ भी रखा होगा वह उसी में होगा। मैंने तो उसे छुआ तक नहीं।”

सौदागर से यह उत्तर पाकर अली ख्वाजा की आंखों से टप-टप करके आंसू बह चले। वह सिसकियां भरता हुआ बोला, “ख़ुदा के लिए मुझ गरीब पर रहम करो। मेरी जन्म-भर की कमाई इतनी ही थी। मुझ पर तरस खाओ। खुदा का वास्ता देता हूं मुझे मेरा धन लौटा दो ।"

अली ख्वाजा के इस प्रकार गिड़गिड़ाने का सौदागर के मन पर वही प्रभाव हुआ जो मरुस्थल पर वर्षा का। वह टस-से-मस न हुआ। यह देख अली ख्वाजा ने फिर कहा, “अच्छा तो मैं काज़ी के पास अपना प्रार्थना-पत्र दूंगा।”

वह वहां से निकलकर सीधा काज़ी की अदालत में गया। अपना हाल सुनाया, परंतु कोई गवाह न होने के कारण उसका मुकदमा खारिज हो गया। यद्यपि काज़ी की अदालत में वह हार गया तथापि उसने हिम्मत न हारी और अपनी कहानी खलीफा तक पहुंचाने का निश्चय कर लिया । उसने एक नया प्रार्थना-पत्र तैयार किया। उसे लेकर वह शहर के ऐसे स्थान पर खड़ा हो गया जहां से खलीफा का आना ज़रूरी था। खलीफा मस्जिद से नमाज पढ़कर लौटे तो अली ख्वाजा ने अपना प्रार्थना-पत्र उनके रथ में फेंक दिया। खलीफ़ा ने उसे उठाकर रख लिया। महल में पहुंचने पर उसको पढ़ा। एक बार पढ़कर उसको फुरसत में फिर देखने के लिए रख दिया।

खलीफ़ा की आदत थी कि वह रात के समय वेश बदलकर शहर में इस बात का पता करने जाता था कि कोई किसी पर जुल्म तो नहीं करता। इस रात जब खलीफ़ा अपने प्रधान-मंत्री सहित गश्त पर निकले तो एक स्थान पर उन्हें कुछ शोर-सा सुनाई दिया। वे दोनों उस स्थान के समीप पहुंचे तो एक दरवाजे की आड़ में छिपकर देखने लगे। उस स्थान पर कुछ बालक अपने खेल में लगे थे। इनका खेल देखने के लिए खलीफ़ा वहीं रुक गए और गुप्त रूप से देखने लगे।

चांदनी रात थी। वे सब बालक एक विशेष स्थान पर गए। वहां एक बालक ने कहा, “मित्रों, अब काज़ी का खेल खेलें। मैं काज़ी बनता हूं और तुम लोग अली ख्वाजा और सौदागर को मेरे पास न्याय के लिए बुलाओ।”

खलीफ़ा ने यह शब्द सुने तो उन्हें उस प्रार्थना-पत्र की याद आयी जो उन्हें दिन में प्राप्त हुआ था, अतः उन्होंने वज़ीर से तब तक वहीं ठहरने के लिए कहा जब तक ये बालक खेल न खत्म कर लें।

इसके बाद उन बालकों ने इस नाटक के पात्र भी आपस में ही नियुक्त किये और उनकी अदालत शुरू हुई। काज़ी बना हुआ बालक गंभीर मुद्रा में पास ही एक बड़े से पत्थर को कुर्सी बनाकर बैठ गया। दो अफसरों ने बालक अली ख्वाजा और सौदागर को अदालत में हाज़िर किया। इस पर बालक काज़ी ने जबान खोली, “सौदागर, तुम्हें इस अभियोग के उत्तर में अपना पक्ष पेश करने की आज्ञा दी जाती है। कहो, तुम्हें क्या कहना है?”

बालक सौदागर ने उत्तर दिया, “सरकार! अली ख्वाजा का अभियोग झूठा है। मुझे मुहरों का पता तक नहीं है। यदि आपका हुक्म हो तो मैं कसम खाने को तैयार हूं।”

काज़ी-''नहीं, कसम खाने की आवश्यकता नहीं है। मैं पहले उस मर्तबान को देखना चाहता हूं। अली ख्वाजा, क्या तुम उसे साथ लाए हो?”
“नहीं, हुजूर !”
“तो लाकर अदालत में पेश करो!”

बालक अली ख्याजा चला गया और कुछ ही समय में एक मर्तबान लाकर काज़ी के सामने रख दिया। अब काज़ी ने पूछा, “क्या यह वही मर्तबान है?”
अली ख्वाजा और सौदागर ने देखकर कहा, “हां, हुजूर, यह वही मर्तबान है।”

तब काज़ी ने उसका ढक्कन उठाने की तथा एक जैतून लाकर दिखाने की आज्ञा दी। जैतून उनके सामने पेश किया गया। उन्होंने ऐसा अभिनय किया मानो जैतून चख रहे हों और कहा, “यह तो बड़े स्वादिष्ट जैतून हैं, बिलकुल ताज़ा मानो आज ही पेड़ पर से उतारे गए हों। पर अली ख्वाजा, तुम तो कहते हो कि यह सात साल पुराने हैं! अच्छा तो यह है कि इसकी जांच के लिए किसी जैतून बेचने वाले को अदालत में बुलाया जाए ताकि वह इनकी परख करके बताए?”

इस पर एक जैतून बेचनेवाले को हाजिर किया गया। काज़ी बने हुए लड़के ने उससे पूछा, “सौदागर, जैतूनों की आम आयु क्या होती है? वे कितने समय तक ठीक रखे जा सकते हैं? ठीक-ठीक और सोच-समझकर दोनों बातें बताओ ।”
“सरकार, यह फल केवल तीन वर्ष तक ठीक रखा जा सकता है। इसके बाद यह खाने के काम का नहीं रहता ।”
काज़ी-“'अच्छा, तो इस जैतून को चख्खो और बताओ कि यह कितने समय पुराने हैं?”

उसने मानो जैतून हाथ में लिया और चखा। फिर कहा, “ये तो बिलकुल ताज़े हैं। मालूम होता है कि इनको रखे अभी तीन महीने से अधिक नहीं हुए।"

काज़ी ने कहा, फिर सोचकर उत्तर दो। भूल न करना। ये दोनों कहते हैं कि यह सात वर्ष पुराने हैं?”

इस पर अपराधी सौदागर ने कुछ कहना चाहा, परंतु काज़ी ने डांटते हुए कहा, “जबान बंद करो! एक तो चोर और दूसरे चतुर! सिपाहियों, इसे ले जाओ और फांसी पर लटका दो। यह अपराधी है।”

उस बालक सौदागर को सिपाही ले गए और झूठ-मूठ फांसी दी तो सब बालक खूब तालियां बजा-बजाकर खुशियां मनाने लगे। खेल खत्म हो गया।

खलीफ़ा और वज़ीर भी वहां से चल दिए। उन्होंने वज़ीर से कहा, “इस बालक का पता निकालो और कल दरबार में हाज़िर करो! सौदागर और अली ख्वाजा को भी उस मर्तबान के साथ पेश करो। एक जैतून बेचने वाले को भी साथ ही हाजिर करो!”

दूसरे दिन इन सबको दरबार में पेश किया गया। खलीफ़ा ने बालक को अपने पास एक अच्छा स्थान दिया और कहा, “बालक, ये हैं अली ख्वाजा और सौदागर। इनका न्याय करो।"

बालक ने ठीक उसी तरह से न्याय किया जैसे उसने खेल में किया था। सौदागर समझ गया कि वह बच नहीं पाएगा। वह रोने-पीटने लगा और दया के लिए प्रार्थना करने लगा। परन्तु खलीफ़ा ने डांटकर कहा, “इसको ले जाकर फांसी पर लटका दो।”

सौदागर से पहले मुहरें वसूल की गईं और बाद में उसे फांसी दी गई। बालक की प्रशंसा हुई और खलीफ़ा ने उसको उचित इनाम देकर घर लौटा दिया । इस तरह बालक ने खेल ही खेल में एक कठिन मुकदमा हल कर दिया।

 
 
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